सज्जनपुर बाढ़ संकट: भिवानी में 25 वर्षों बाद फिर जीवित हुई खेती

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हरियाणा के भिवानी जिले की बावानी खेड़ा तहसील स्थित सज्जनपुर गांव के किसानों के लिए पिछले लगभग 25 वर्षों से बाढ़ एक स्थायी संकट बना हुआ है। हर साल 20–25 परिवारों की उपजाऊ भूमि 3 से 4 फीट पानी में डूब जाती थी, जिससे लगातार फसलें नष्ट होती रहीं और आर्थिक संकट गहराता गया। इस वर्ष स्थिति और भी गंभीर हो गई, जब करीब 570 एकड़ कृषि भूमि जलमग्न हो गई और कुल प्रभावित क्षेत्र 1000–1200 एकड़ तक फैल गया। सीमित प्रशासनिक सहायता और बढ़ते नुकसान के बीच कई किसान अपनी ज़मीन बेचने तक का विचार करने लगे थे। हालांकि, हालिया हस्तक्षेप ने स्थिति को बदल दिया है और अब खेती दोबारा शुरू हो सकी है।

जब किसी प्रभावी समाधान की उम्मीद नहीं दिख रही थी, तब सरपंच प्रतिनिधि नरेश कुमार और स्थानीय पंचायत के नेतृत्व में ग्रामीणों ने तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज से सहायता के लिए प्रार्थना की।

मुख्य बिंदु: सज्जनपुर बाढ़ राहत और पुनर्वास

  • सज्जनपुर गांव 25 वर्षों से बाढ़ की समस्या से प्रभावित, हर साल 20–25 परिवार प्रभावित
  • लगभग 570 एकड़ भूमि जलमग्न, प्रभाव 1000–1200 एकड़ तक फैला
  • पानी का स्तर 3 से 4 फीट तक, 2–3 महीने तक जमा रहा
  • धान, कपास और बाजरा सहित सभी फसलें पूरी तरह नष्ट
  • किसानों को 100% फसल नुकसान और भारी आर्थिक क्षति
  • संत रामपाल जी महाराज द्वारा अन्नपूर्णा मुहिम के तहत सहायता
  • उपलब्ध कराए गए उपकरण:
    • 4500–9000 फीट (8 इंच) पाइपलाइन
    • दो 10 एचपी मोटर
    • स्टार्टर, केबल, कनेक्टर, एडहेसिव, नट-बोल्ट
  • व्यवस्थित जल निकासी से 95% भूमि पुनः खेती योग्य बनी
  • गेहूं की बुवाई शुरू, खेतों में ट्रैक्टर लौटे

हर वर्ष दोहराया जाने वाला 25 वर्षों का बाढ़ संकट

भिवानी के बावानी खेड़ा स्थित सज्जनपुर गांव पिछले 25 वर्षों से लगातार बाढ़ की समस्या से जूझ रहा है। हर वर्ष 20 से 25 परिवारों की कृषि भूमि कई फीट पानी में डूब जाती थी। इस साल स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई, जब लगभग 570 एकड़ भूमि जलमग्न हो गई, जबकि कुल प्रभावित क्षेत्र 1000 से 1200 एकड़ तक पहुंच गया।

यह भी पढ़ें:  25 साल की पीड़ा का अंत: सज्जनपुर गांव, हरियाणा तक पहुँची संत रामपाल जी महाराज जी की मदद

किसानों के अनुसार, पानी का स्तर 3 से 4 फीट तक पहुंच गया और यह लगभग दो से तीन महीनों तक जमा रहा। लंबे समय तक जलभराव रहने के कारण न केवल खड़ी फसलें नष्ट हो गईं, बल्कि खेतों तक पहुंच भी असंभव हो गई, जिससे किसान कुछ भी बचाने में असमर्थ रहे।

भारी फसल नुकसान और बढ़ती परेशानी

बाढ़ का प्रभाव बेहद व्यापक और विनाशकारी रहा। धान, कपास और बाजरा जैसी फसलें पूरी तरह बर्बाद हो गईं। कई किसानों ने बताया कि उनके खेतों से एक दाना तक नहीं बचा।

एक किसान ने बताया कि पांच एकड़ धान की फसल में लगभग 3 लाख रुपये का नुकसान हुआ। लगभग 100 क्विंटल उत्पादन का अनुमान था, जिसकी कीमत 3000 रुपये प्रति क्विंटल थी, जो पूरी तरह नष्ट हो गई। कई किसानों ने इसे “100 प्रतिशत नुकसान” बताया।

कृषि के अलावा घरों पर भी असर पड़ा। कई परिवारों के घरों में पानी घुस गया, जिससे उन्हें घर छोड़ने तक की नौबत आ गई। पशुओं के लिए चारे की भी कमी हो गई, जिससे स्थिति और गंभीर हो गई।

सीमित प्रशासनिक सहायता और समाधान की तलाश

ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासनिक सहायता कुछ हद तक मिली, लेकिन समस्या के पैमाने के अनुसार पर्याप्त नहीं थी। वर्षों से लगातार हो रहे नुकसान और स्पष्ट समाधान न मिलने के कारण किसानों में निराशा बढ़ती गई।

सरपंच प्रतिनिधि नरेश कुमार के अनुसार, गांव ने सामूहिक रूप से बाहरी सहायता लेने का निर्णय लिया। इसके तहत एक प्रस्ताव तैयार किया गया और स्थानीय पंचायत ने तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी की समिति के मुनिंदर धर्मार्थ ट्रस्ट, बरवाला स्थित आफिस जाकर मदद का अनुरोध किया।

अन्नपूर्णा मुहिम के तहत सहायता

अनुरोध के बाद संत रामपाल जी महाराज द्वारा अन्नपूर्णा मुहिम के अंतर्गत सहायता प्रदान की गई। प्रस्ताव के लगभग एक सप्ताह के भीतर राहत सामग्री गांव में पहुंच गई।

इस सहायता में खेतों से पानी निकालने के लिए संपूर्ण व्यवस्था शामिल थी:

  • 4500 से 9000 फीट तक 8 इंच की पाइपलाइन
  • दो 10 एचपी मोटर
  • स्टार्टर, केबल, कनेक्टर, एडहेसिव, नट-बोल्ट जैसे सहायक उपकरण

ग्रामीणों के अनुसार, यह सभी सामग्री स्थायी रूप से उपलब्ध कराई गई, जिससे समुदाय पर कोई अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं पड़ा।

व्यवस्थित जल निकासी से फिर जीवित हुए खेत

उपकरणों को प्रभावित क्षेत्रों में स्थापित किया गया और पाइपलाइन को नहरों जैसे जल निकासी स्रोतों से जोड़ा गया। मोटर दिन-रात चलाकर खेतों से पानी निकाला गया।

स्थानीय जानकारी के अनुसार, पूरे क्षेत्र को कवर करने के लिए व्यवस्था को कई लाइनों में विभाजित किया गया। धीरे-धीरे महीनों से जमा पानी गांव के अधिकांश हिस्सों से निकाल दिया गया।

किसानों के अनुसार, लगभग 95 प्रतिशत भूमि फिर से खेती योग्य हो गई है। केवल कुछ निचले हिस्सों में पानी शेष है, जो जल्द सूखने की उम्मीद है।

खेती की वापसी और बदलाव की तस्वीर

सज्जनपुर में अब बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। जो खेत पहले जलमग्न थे, अब सूख चुके हैं और खेती की गतिविधियां फिर शुरू हो गई हैं।

  • खेतों में ट्रैक्टर चलने लगे हैं
  • अधिकांश क्षेत्रों में गेहूं की बुवाई शुरू हो गई है
  • शेष भूमि की तैयारी जारी है

किसानों का कहना है कि यदि यह सहायता नहीं मिलती, तो अगली फसल भी संभव नहीं होती, जिससे कई परिवार पूरी तरह आर्थिक रूप से टूट जाते।

एक किसान ने बताया कि पहले पानी के कारण खेतों में प्रवेश तक संभव नहीं था, जबकि अब सामान्य रूप से ट्रैक्टर चल रहे हैं।

ज़मीनी अनुभव: किसानों की जुबानी

कई ग्रामीणों ने अपने अनुभव साझा करते हुए संकट की गंभीरता और सहायता के प्रभाव को बताया।

  • किसानों ने पहले की स्थिति को “नियंत्रण से बाहर” बताया
  • अधिकांश ने पूर्ण फसल नुकसान की पुष्टि की
  • पानी निकलने के बाद बुवाई फिर संभव हुई
  • पहले पानी की गहराई के कारण खेतों में जाना भी मुश्किल था

संदीप नामक किसान ने बताया कि कुछ स्थानों पर पानी 4 से 5 फीट तक पहुंच गया था और पाइपलाइन व मोटर के बिना खेती शुरू करना संभव नहीं था।

एक अन्य किसान भूप सिंह ने कहा कि उन्होंने पहले ऐसी स्थिति नहीं देखी थी और इस सहायता से सामान्य कृषि गतिविधियां फिर शुरू हो सकीं।

पुनर्वास की ओर बढ़ता सज्जनपुर

सज्जनपुर की स्थिति अब लंबे संकट से निकलकर धीरे-धीरे सामान्य हो रही है। अधिकांश खेतों में फिर से खेती शुरू हो चुकी है और किसान अपनी आजीविका की ओर लौट रहे हैं।

हालांकि पहले हुए नुकसान अभी भी बड़े हैं, लेकिन दोबारा खेती शुरू होने से आगे का रास्ता साफ हुआ है। यह बदलाव वर्षों की परेशानी के बाद एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ है, जहां जलमग्न खेत फिर से उपजाऊ भूमि में बदल गए हैं।

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