जब व्यवस्था ने छोड़ा साथ, तब संत रामपाल जी महाराज ने बचाई सोलधा की लाज: 250 एकड़ में जलभराव से खुशहाली तक की गाथा

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झज्जर (हरियाणा): अक्सर कहा जाता है कि जब इंसान के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, तब ईश्वर किसी न किसी रूप में फरिश्ता भेजता है। हरियाणा के झज्जर जिले के सोलधा गांव के लिए यह बात पत्थर की लकीर साबित हुई। बहादुरगढ़ तहसील का यह ऐतिहासिक गांव पिछले कुछ महीनों से एक ऐसी त्रासदी झेल रहा था, जिसने किसानों की कमर तोड़ दी थी। खेतों में लहलहाती फसल की जगह 5 फुट गहरा सड़ा हुआ पानी खड़ा था और घरों की नींव डगमगाने लगी थी। लेकिन आज वही सोलधा फिर से मुस्कुरा रहा है। यह कहानी है उस संघर्ष की, जहाँ सरकारी तंत्र की विफलता के बाद संत रामपाल जी महाराज की रहमत ने एक डूबते हुए गांव को नया जीवनदान दिया।

तबाही का मंजर: जब समंदर बन गए सोलधा के खेत

गांव के सरपंच प्रतिनिधि प्रदीप काजला, जो स्वयं 8 वर्ष तक पैरामिलिट्री में देश की सेवा कर चुके हैं, बताते हैं कि उनके जीवनकाल में गांव ने ऐसी तबाही पहली बार देखी थी। लगभग 200 से 250 एकड़ कृषि भूमि पूरी तरह जलमग्न हो चुकी थी। स्थिति इतनी भयावह थी कि जमीन के नीचे का जलस्तर ऊपर आने से रिहायशी मकानों तक को खतरा पैदा हो गया था।

ग्रामीणों ने मदद के लिए हर दरवाजा खटखटाया। वे बताते हैं कि उन्होंने एसडीएम, तहसीलदार, पटवारी, डीसी, और स्थानीय विधायक तक के चक्कर काटे। एक-डेढ़ महीने तक गुहार लगाने के बाद प्रशासन ने मदद के नाम पर ऊंट के मुंह में जीरे के समान कुछ पाइप दिए, जो इस महा-सैलाब के सामने बौने साबित हुए। किसानों की साल भर की मेहनत मिट्टी में मिल रही थी और भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा था।

उम्मीद की आखिरी किरण: संत रामपाल जी महाराज की शरण

जब शासन और प्रशासन से आस टूट गई, तब सोलधा की पंचायत और युवाओं ने संत रामपाल जी महाराज के चरणों में अर्जी लगाने का निर्णय लिया। ग्रामीणों का अनुभव किसी चमत्कार से कम नहीं था। जहाँ सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते हुए हफ्तों बीत गए थे, वहीं संत जी के दरबार में केवल एक बार अपनी व्यथा लिख कर देने मात्र से 24 से 48 घंटे के भीतर राहत का विशाल काफिला गांव की दहलीज पर पहुँच गया।

बिना किसी सिफारिश और बिना किसी स्वार्थ के पहुँची इस मदद को देखकर ग्रामीण भावुक हो उठे। किसानों ने एक दर्जन से अधिक सजे हुए ट्रैक्टरों के साथ इस सहायता का स्वागत किया और पूरे रास्ते फूलों की वर्षा की।

सेवा का स्वरूप: संत रामपाल जी महाराज ने की एक-एक नट-बोल्ट तक की मुकम्मल व्यवस्था

संत रामपाल जी महाराज द्वारा भेजी गई सहायता केवल औपचारिक नहीं थी, बल्कि इतनी सूक्ष्म और मुकम्मल थी कि ग्रामीणों को एक पैसे का भी खर्च नहीं करना पड़ा। इस विशेष राहत पैकेज में शामिल सामग्री इस प्रकार थी:

सामग्रीविवरण
1पाइप लाइन10,000 फीट लंबी उच्च गुणवत्ता वाली 8 इंची पाइप
2शक्तिशाली मोटरेंकुल 3 मोटरें (एक 10 HP और दो 2 HP की)
3अन्य सहायक सामग्रीनट-बोल्ट और पाइप चिपकाने वाला सलूशन (सब कुछ मुफ्त)

खुशहाली का शंखनाद: फिर से मुस्कुरा रही हरियाली

आज सोलधा के खेतों की तस्वीर बदल चुकी है। संत जी द्वारा दी गई मशीनों ने दिन-रात काम करके उस सड़े हुए पानी को गांव की सीमाओं से बाहर खदेड़ दिया है। किसान हकीकत सिंह और राजेंद्र सिंह बताते हैं कि अब तक लगभग 100 से 150 एकड़ जमीन से पानी निकल चुका है और 100 एकड़ से अधिक भूमि पर गेहूं की बिजाई भी पूरी हो चुकी है।

सीधा गणित लगाया जाए तो प्रति एकड़ 50,000 रुपये के हिसाब से केवल गेहूं की फसल से किसानों को 50 लाख रुपये का सीधा फायदा हुआ है। यदि यह मदद समय पर न मिलती, तो किसानों को खाने के लिए अनाज भी दूसरे गांवों से मांगना पड़ता।

सोलधा गाँव के लिए संत रामपाल जी महाराज बने फरिश्ता

पूर्व सैनिक प्रदीप काजला के शब्द आज पूरे गांव की आवाज बन चुके हैं— “हथियार वही अच्छा जो वक्त पर काम आए।” जब सोलधा डूब रहा था, तब संत रामपाल जी महाराज एक फरिश्ते की तरह रक्षक बनकर आए। आज गांव का हर बुजुर्ग और युवा इस बात का कायल है कि असली धर्म वही है जो बिना किसी भेदभाव और स्वार्थ के मानव सेवा के लिए समर्पित हो।

संत रामपाल जी महाराज ने न केवल सोलधा के खेतों को बचाया है, बल्कि किसानों के उस विश्वास को भी पुनर्जीवित किया है कि मानवता आज भी जीवित है। आज सोलधा का हर घर उस ‘संजीवनी बूटी’ रूपी मदद के लिए नतमस्तक है, जिसने उनकी डूबती दुनिया को फिर से आबाद कर दिया।

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