कलयुग में ज्योति निरंजन के मिश्रित ज्ञान से प्रभावित संत जन पूर्ण परमात्मा कविर्देव (कबीर साहेब) के द्वारा दिए सत्य ज्ञान को समझना नहीं चाहते हैं। इसी कारण सतभक्ति देने वाले संतों को प्रताड़ित करते हैं। छः सौ वर्ष पूर्व कबीर साहेब को पानी में डुबोकर, हाथी से कुचलवाकर नाना प्रकार से यातनाएं दी गई। इसी प्रकार संत गरीबदास को भी सताया गया। वर्तमान में इस ब्रह्मांड के एकमात्र तत्वदर्शी संत रामपाल दास जी पर भी काल ब्रह्म के दूतों द्वारा लगातार प्रहार किया जा रहा है। यहाँ तक कि उन्हें दो बार जेल भेजकर मानसिक और शारीरिक वेदनाएं दी गईं। आज पाठक गण जानेंगे कि संतों को सताने का क्या परिणाम होता है।

सतगुरु के प्रसन्न होने से ही परमात्मा प्रसन्न होते हैं

यदि सतगुरु अपने शिष्य से प्रसन्न हैं तो निश्चित ही सत्पुरुष पूर्ण परमात्मा भी प्रसन्न होंगे। जो शिष्य पूरी तरह से गुरु मर्यादा में रहकर सत भक्ति करते हैं उनका काल ज्योति निरंजन कुछ नहीं बिगाड़ सकता। तात्पर्य है कि ऐसे शिष्य को सतभक्ति करने से मिलने वाले सभी लाभ प्राप्त होते हैं।

कबीर, गुरु दयाल तो पुरुष दयाल। जेहि गुरु व्रत छुए नहीं काल।

गुरुद्रोही की गति करोड़ों नरक से भी भयानक है

यदि जीव ने दुर्लभ मनुष्य योनि में जन्म लेकर सतगुरु का महत्व नहीं जाना तो यह समझिए कि अनमोल जीवन को बर्बाद कर दिया। सतगुरु को त्याग देने वाले साधक को तो अनेक युगों तक अपने किये पर पछतावा करना पड़ता है। अपने कृत्यों से सतगुरु को दुख पहुंचाने वाला मनुष्य नरक में अग्नि कुंडों में उबल – उबल कर कष्ट पाता है। सतगुरु द्रोही जहरीले सर्पों की योनि में करोड़ों जन्म पाता है और अपने ही विष की गर्मी से लंबी आयु तक घोर कष्ट सहता है। इन जन्मों में दुख भोगकर ये गुरु द्रोही विष्टा (मल) में कीड़े का जन्म लेता है। इस प्रकार करोड़ों जन्म नरकीय जीवन भोगता है।

कबीर, मानुष जन्म पाकर खोवै, सतगुरु विमुखा युग युग रोवै।
कबीर, गुरु विमुख जीव कतहु न बचै । अग्नि कुंड में जर – बर नाचै।
कोटि जन्म विषधर को पावै । विष ज्वाला सही जन्म गमावै।।
बिष्ट मांही क्रमि जन्म धरई। कोटि जन्म नरक ही परही।

संत को सताने वाले की सजा प्रलय काल तक भूत पिशाच योनि में जन्म लेने की है

गुरुद्रोही की गति का वर्णन हमनें ऊपर जाना है लेकिन उनकी गति का क्या जो सतगुरु को मनुष्य मानकर उन्हें झूठे आरोपों के आधार पर गलत तरीकों से फँसाकर नाना प्रकार की वेदनाएं देते हैं।

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सतगुरुदेव ने अपनी वाणी में संत को सताने के लिए दिए जाने वाले दंड के प्रावधान को बहुत खतरनाक बताया है जो सृष्टि प्रलय तक होने वाले अनंत जन्मों तक चलता रहता है। संत को सताने वाले को परमेश्वर भिन्न – भिन्न प्राणियों की योनियों में बारम्बार माँ के गर्भ में डालते हैं और वह जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। दंड-भोगी भूत पिशाच की योनि और माँ के गर्भ में असहनीय पीड़ा तब तक झेलता है जब तक सताया हुआ संत स्वयं उसे क्षमा नहीं कर दे।

अर्धमुखी गर्भवास में हरदम बारम्बार,
जूनी भूत पिशाच की जब लग सृष्टि संहार।

संत गरीबदास जी को सताने के परिणाम स्वरूप परमात्मा द्वारा दंड मिलने का वृतांत

परमात्मा कबीर साहेब के शिष्य संत गरीबदास साहेब जी के तत्वज्ञान के कारण अन्य गुरुओं आचार्यों के अधूरे ज्ञान की पोल खुलने लगी। एक बार सुनियोजित षड़यन्त्र के अंतर्गत स्वार्थी गुरूओं (आचार्यों) ने संत गरीबदास जी को घेर कर लूट लिया और गाँव के कानूनी अधिकार प्राप्त चौधरी छाजुराम जी से उन्हें छः महीने की काठ में बंद करने की सजा और पाँच सौ रूपये जुर्माना कर दिया। काठ में बंद करने में दोनों पैरों के घुटनों से ऊपर दो लकड़ी के मोटे डण्डे बांध कर दोनों हाथ पीछे बांध दिये जाते थे। कुछ मुख्य व्यक्तियों के कहने पर आदरणीय गरीबदास जी को छोड़ दिया।

कुछ दिनों उपरान्त चौधरी छाजुराम के प्रातः काल शौच क्रिया के लिए जाने के समय दो घुड़सवार उनके दोनों हाथ काट कर अदृश्य हो गए। इस मार्मिक दृश्य के कई लोग साक्षी थे । बहुत उपचार के बाद भी ठीक न होने पर कुछ लोगों की राय से उन्होंने सन्त गरीबदास जी के पास जाकर उनके चरण पकड़कर क्षमा याचना की। संत गरीबदास जी ने उन्हें सपरिवार नाम उपदेश देकर आजीवन भक्ति करने का आदेश दिया। यह भी कहा कि यह आप के संचित कर्मों का परिणाम था। अब सतभक्ति करने से आगे कष्ट कट जाएंगे।

संत गरीबदास जी की वाणीयों से प्रमाण

परमेश्वर ने कहा है कि जो मेरे संत को दुखी करता है समझो मुझे दुखी करता है। जब मेरे भक्त प्रह्लाद को दुखी किया तब मैंने हिरण्यकशिपु का पेट फाड़ दिया, मैंने ही कंस को मारा। जो मेरे साधु को दुखी करेगा मै उसका वंश मिटा दूंगा। इसलिए संत को सताने के करोड़ों पाप लगते हैं जैसे अनगिनत हत्याएं कर दी हों। अनजान लोग परमात्मा के संविधान से परिचित नहीं है इसलिए भयंकर भूल करते हैं और असंख्य दंडों के भागी बनते हैं।

तुमने उस दरगाह का महल ना देख्या।
धर्मराय के तिल-2 का लेख ।।

राम कहै मेरे साध को, दुःख ना दीजो कोए।
साध दुखाय मैं दुःखी, मेरा आपा भी दुःखी होय।।

हिरण्यकशिपु उदर (पेट) विदारिया, मैं ही मारया कंश।
जो मेरे साधु को सतावै, वाका खो-दूं वंश।।

साध सतावन कोटि पाप है, अनगिन हत्या अपराधं।
दुर्वासा की कल्प काल से, प्रलय हो गए यादव।।

सम्पूर्ण ब्रह्मांड के एकमात्र तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज से सतज्ञान लें

आज तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज का अवतरण दिवस है। आज के दिन 8 सितंबर 1951 को संत रामपाल जी ने “धरती पर अवतार” लिया था। इस अवसर पर विशेष प्रसारण प्रातः 9 बजे से साधना चैनल पर सुनें। जितना जल्दी हो सके सतज्ञान ग्रहण करें और आत्म कल्याण करा अपना दुर्लभ मनुष्य जन्म चरितार्थ करें।