पूर्व जम्मू-कश्मीर राज्यपाल सत्यपाल मलिक (Satya Pal Malik) का 79 साल की उम्र में निधन

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Satya Pal Malik Death: पूर्व जम्मू-कश्मीर राज्यपाल सत्यपाल मलिक का मंगलवार, 5 अगस्त 2025 को दोपहर 1 बजकर 12 मिनट पर दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में 79 साल की उम्र में देहांत हो गया। किडनी की बीमारी से लंबे समय से जूझ रहे मलिक दिल्ली के आरएमएल अस्पताल में भर्ती थे। उनके निजी सचिव के.एस. राणा ने मौत की पुष्टि करते हुए बताया कि मलिक काफी समय से किडनी की गंभीर समस्या से परेशान थे।

सत्यपाल मलिक ने अगस्त 2018 से अक्टूबर 2019 तक जम्मू-कश्मीर के आखिरी राज्यपाल का पद संभाला था। इसी दौरान 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म कर दिया गया था। उनके राज्यपाल बनने का दौर कश्मीर की राजनीति के लिए बेहद अहम था क्योंकि इसी वक्त राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटा गया था।

24 जुलाई 1946 को पैदा हुए मलिक की राजनीतिक यात्रा पांच दशकों से भी ज्यादा चली और वो कई पार्टियों से जुड़े रहे। 1974 में उन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत की जब वो बागपत से भारतीय क्रांति दल के टिकट पर 1974-77 तक उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य बने। शुरुआत में लोक दल से जुड़े रहे, फिर कांग्रेस, जनता दल होते हुए आखिर में भारतीय जनता पार्टी तक पहुंचे।

जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल का काम खत्म करने के बाद मलिक गोवा चले गए और वहां के 18वें राज्यपाल बने। इसके अलावा मेघालय के 21वें राज्यपाल भी रहे और अक्टूबर 2022 तक यह जिम्मेदारी निभाई। तीन अलग राज्यों में राज्यपाल बनकर उन्होंने दिखाया कि वो अलग-अलग तरह की चुनौतियों से निपट सकते हैं।

जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल रहते हुए मलिक ने इलाके के इतिहास का सबसे बड़ा बदलाव देखा। धारा 370 और धारा 35ए को एक साथ हटाना और राज्य को जम्मू-कश्मीर व लद्दाख में बांटना – यह सब उनकी नजरों के सामने हुआ।

मलिक 1980 से राज्यसभा में उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने लगे थे, जो उनकी राष्ट्रीय राजनीति में एंट्री का संकेत था। उनके संसदीय करियर से पता चलता है कि भारतीय राजनीति कितनी जटिल है – वो अपनी जिंदगी में कई बार अलग-अलग विचारधारा अपनाते रहे। 1987 में बोफोर्स घोटाले के बाद कांग्रेस छोड़ने से पता चला कि वो भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख रखते थे।

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1989 में अलीगढ़ से सांसद बनकर उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी मजबूत पकड़ बनाई। अलग-अलग पार्टियों में रहकर भी राजनीति में बने रहना उनकी खासियत थी। कई सरकारों का विरोध करने के बाद आखिर में भाजपा से जुड़ गए।

आखिरी सालों में मलिक भाजपा के लिए सिरदर्द बन गए थे क्योंकि वो 2019 के पुलवामा हमले को लेकर सरकार के खिलाफ बोलने लगे थे। उनका कहना था कि भाजपा सरकार ने पुलवामा हमले, जिसमें 40 से ज्यादा सीआरपीएफ जवान शहीद हो गए थे, का फायदा चुनावी राजनीति के लिए उठाया। उनके मुताबिक 2019 का लोकसभा चुनाव “हमारे जवानों की लाशों पर” लड़ा गया।

इंटरव्यू में मलिक का दावा था कि प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें पुलवामा की घटना में सिक्योरिटी की कमी के बारे में ‘चुप रहने’ को कहा था। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उनकी बात पर सवाल खड़े करते हुए पूछा कि जब वो राज्यपाल थे तो चुप क्यों रहे। मलिक का जवाब था कि यह कहना गलत है कि वो पद छोड़ने के बाद ही बोल रहे हैं।

मलिक का किसान आंदोलन को समर्थन देना भाजपा लीडरशिप के लिए और भी मुश्किल बन गया। उन्होंने प्रदर्शनकारी किसानों के साथ एकजुटता दिखाई और खेती के मुद्दों पर सरकार की आलोचना की। किसान नेताओं और खापों ने पुलवामा वाली बात पर मलिक का साथ दिया। पंजाब के किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल ने कहा था, “सत्यपाल मलिक ने हिम्मत से पुलवामा का सच उजागर किया। किसान उनकी ढाल हैं।”

किसानों के मुद्दे पर सरकार की खुली आलोचना और फौजी शहादत को चुनावी फायदे के लिए इस्तेमाल करने वाली बात ने उन्हें अपनी आखिरी सांसों में भाजपा के खिलाफ एक मुखर आवाज बना दिया।

कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने मलिक के आरोपों का समर्थन किया। कांग्रेस ने प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाया कि उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले अपनी छवि बचाने के लिए पुलवामा की घटना को दबाया। राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं से उनकी बातचीत ने सत्ताधारी पार्टी के साथ रिश्ते और खराब कर दिए।

किडनी की बीमारी की वजह से मलिक की सेहत लगातार बिगड़ती जा रही थी। इसी वजह से उन्हें दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में काफी समय तक भर्ती रहना पड़ा। 5 अगस्त 2025 को उनकी मौत से पहले के महीनों में उनकी तबीयत परिवार और दोस्तों के लिए चिंता की वजह बनी हुई थी।

राज्यपाल के तौर पर मलिक ने अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक माहौल वाले राज्यों में बड़ी जिम्मेदारियां संभालीं। धारा 370 हटाते वक्त उनकी भूमिका में जम्मू-कश्मीर में प्रशासनिक बदलाव को संभालना और केंद्र सरकार के साथ तालमेल बिठाना शामिल था।

सत्यपाल मलिक की मौत उस राजनीतिक करियर का अंत है जिसने भारतीय राजनीति के बड़े संवैधानिक बदलावों को देखा। धारा 370 हटाने के वक्त उनकी भूमिका हमेशा उनकी प्रशासनिक विरासत का हिस्सा रहेगी। बाद में अपनी ही पार्टी की नीतियों की आलोचना और किसान आंदोलन का साथ देना उनकी बदलती राजनीतिक सोच को दिखाता है।

उनका करियर कई पार्टियों में फैला रहा और कांग्रेस से भाजपा तक में अहम भूमिकाएं निभाईं। तीन राज्यों में राज्यपाल और संसदीय अनुभव दशकों की सार्वजनिक सेवा को दर्शाता है।

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