संत रामपाल जी महाराज का विशेष साक्षात्कार: शास्त्रों के प्रमाण, सामाजिक सुधार, मुकदमों और समकालीन धार्मिक मुद्दों पर विस्तृत पड़ताल

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संत रामपाल जी महाराज का विशेष साक्षात्कार:हरियाणा के 90 विधानसभा क्षेत्रों के कवरेज अभियान के तहत वरिष्ठ पत्रकारों की टीम ने संत रामपाल जी महाराज से उनके आश्रम में एक विस्तृत एवं गहन साक्षात्कार किया। इस साक्षात्कार में उन्होंने अपने शुरुआती जीवन, जूनियर इंजीनियर (JE) के पद से संत बनने की यात्रा, विभिन्न धर्मग्रंथों की व्याख्याओं, आर्य समाज द्वारा दी गई शास्त्रार्थ की चुनौती, समकालीन संतों के मतभेदों, आश्रम के वित्तीय प्रबंधन, 2014 के बरवाला आश्रम घटनाक्रम और सामाजिक अभियानों पर विस्तार से जवाब दिए।

Table of Contents

प्रारंभिक जीवन, पारिवारिक पृष्ठभूमि और संत बनने की यात्रा

साक्षात्कार के आरंभ में संत रामपाल जी महाराज ने अपने पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में बताया कि उनका जन्म एक साधारण जाट परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनकी गहरी रुचि ईश्वर भक्ति में थी और वे घंटों एकांत में प्रार्थना करते थे। औपचारिक तकनीकी शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत उन्होंने सिंचाई एवं जनस्वास्थ्य विभाग में कनिष्ठ अभियंता (जूनियर इंजीनियर – JE) के पद पर कार्यभार संभाला।

वर्ष 1988 में, जब वे अपनी सरकारी सेवा के 11 वर्ष पूर्ण कर चुके थे, उनके एक रिश्तेदार ने उन्हें वास्तविक गुरु की शरण में जाने का परामर्श दिया। इसके बाद वे चरखी दादरी के गांव पैंतावास कलां निवासी स्वामी रामदेवानंद जी महाराज के संपर्क में आए, जो जाति से ब्राह्मण थे और कबीर पंथ से जुड़े हुए थे। संत रामपाल जी महाराज ने बताया कि स्वामी रामदेवानंद जी ने उन्हें वेदों, श्रीमद्भगवद्गीता और पुराणों के वास्तविक मर्म से परिचित कराया। वर्ष 1988 में उन्होंने विधिवत नाम-दीक्षा ग्रहण की।

वर्ष 1995 में उनके गुरु ने उन्हें दीक्षा देने का आदेश और उत्तराधिकार सौंपा। सरकारी नौकरी और आध्यात्मिक प्रचार के दायित्वों के बीच सामंजस्य बिठाना कठिन होने पर उन्होंने 18 वर्ष की सेवा के बाद जेई के पद से त्यागपत्र दे दिया। उनके परिवार में दो पुत्र और दो पुत्रियां हैं।

हिंदू धर्मग्रंथों का आधार और धर्मगुरुओं की पद्धतियों पर दृष्टिकोण

संत रामपाल जी महाराज ने अपने ऊपर लगने वाले ‘हिंदू विरोधी’ आरोपों का दृढ़तापूर्वक खंडन किया। उन्होंने कहा कि उनका संपूर्ण ज्ञान श्रीमद्भगवद्गीता, चारों वेदों और पुराणों पर आधारित है। यदि इन पवित्र ग्रंथों में लिखित ज्ञान को प्रचारित करना हिंदू विरोधी माना जाता है, तो फिर इन मूल ग्रंथों को क्या कहा जाएगा?

उन्होंने धर्मगुरुओं की तुलना विद्यालय के अध्यापकों से करते हुए कहा कि जो शिक्षक पाठ्यक्रम (सिलेबस) से बाहर की निरर्थक बातें पढ़ाता है, वह विद्यार्थियों के भविष्य को नुकसान पहुंचाता है। इसी प्रकार जो धर्मगुरु धर्मग्रंथों को छोड़कर दंतकथाओं के आधार पर साधना करवाते हैं, वे पाखंड को बढ़ावा देते हैं।

आध्यात्मिक चरणसाधना की विधि एवं इष्ट देवशास्त्र सम्मत प्रमाण
प्रथम चरणब्रह्मा-सावित्री, विष्णु-लक्ष्मी, शिव-पार्वती, गणेश जी और दुर्गा जी के 5 गुप्त मंत्र (प्रतिदिन 108 जाप)देवी भागवत, शिव पुराण
द्वितीय चरण – सतनाम क्षर- अक्षर पुरुष तक की साधना (जिसमें ‘ॐ’ शामिल है)गीता एवं वेद
तृतीय चरण – सारनाम (पूर्ण मोक्ष साधना)परम अक्षर पुरुष (पूर्ण ब्रह्म तक की साधना ‘ॐ-तत्-सत्’)श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 23

उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 15 श्लोक 1 का उल्लेख करते हुए उल्टे लटके संसार रूपी वृक्ष की व्याख्या की, जिसमें मूल (जड़) पूर्ण परमात्मा (कबीर साहिब) हैं, तना अक्षर पुरुष, डार ज्योति निरंजन और तीनों देवता (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) शाखा रूप में स्थित हैं। उन्होंने गीता अध्याय 3 श्लोक 10 से 15 का संदर्भ देकर स्पष्ट किया कि यज्ञों और विधिवत साधना द्वारा इन देवताओं का सम्मान करते हुए केवल मूल परमात्मा की पूजा करनी चाहिए।

आर्य समाज की चुनौती और ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पर आपत्तियां

आर्य समाज द्वारा शास्त्रार्थ की चुनौती दिए जाने के सवाल पर संत रामपाल जी महाराज ने कहा कि उन्हें शास्त्रार्थ से कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने महर्षि दयानंद सरस्वती के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए कहा कि उनका विरोध व्यक्ति से नहीं बल्कि उनकी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में वर्णित कुछ सामाजिक और वैवाहिक नियमों से है।

उन्होंने “सत्यार्थ प्रकाश” से निम्नलिखित बिंदुओं पर गंभीर सैद्धांतिक आपत्तियां दर्ज कराईं:

  1. विवाह योग्य आयु: पुस्तक में 24 वर्ष की कन्या और 48 वर्ष के पुरुष के विवाह को उत्तम समय बताया गया है, जो व्यावहारिक और सामाजिक दृष्टि से अनुचित है।
  1. शिशु पोषण व्यवस्था: चौथे समुल्लास में उल्लेख है कि माता शिशु को केवल 6 दिन स्तनपान कराए और फिर औषधि से दूध सुखाकर दाई को पोषण सौंप दे, जो मातृ-शिशु स्वास्थ्य के सिद्धांतों के विपरीत है।
  1. नियोग प्रथा संबंधी नियम: पति के 3 वर्ष विदेश में रहने की स्थिति में अन्य पुरुष से नियोग द्वारा संतानोत्पत्ति के संदर्भ पर उन्होंने कड़ा एतराज जताया।

सामाजिक सुधार अभियान, अन्नपूर्णा मुहिम और कृषि कल्याण

संत रामपाल जी महाराज द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न जनकल्याणकारी कार्यक्रमों की पृष्ठभूमि पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि जेल में रहते हुए उन्होंने एक समाचार पढ़ा था, जिसमें तपेदिक (टीबी) से पीड़ित एक पिता ने आर्थिक तंगी और बच्चों के पालन-पोषण में असमर्थता के चलते अपनी तीन मासूम बेटियों को जहर देकर खुद नहर में छलांग लगा दी थी।

इस घटना से द्रवित होकर उन्होंने मार्च 2025 से व्यापक ‘अन्नपूर्णा मुहिम’ शुरू की। इस अभियान का उद्देश्य समाज के वंचित वर्ग को रोटी, कपड़ा, मकान, निशुल्क चिकित्सा और शिक्षा उपलब्ध कराना है।

सामाजिक पहलविवरण एवं क्रियान्वयनउद्देश्य
अन्नपूर्णा योजना (मार्च 2025)असहाय परिवारों को भोजन, वस्त्र, आवास और चिकित्सा सहायताभूख और अभाव के कारण होने वाली आत्महत्याओं को रोकना
लघु कृषक सहायताढाई एकड़ तक भूमि वाले किसानों को निशुल्क खाद (डीएपी/यूरिया) व बीजछोटे किसानों को आत्मनिर्भर बनाना और कर्जमुक्ति
दहेज मुक्त विवाह (रमैणी)बिना किसी दान-दहेज के 17 मिनट में सादगीपूर्ण अंतरजातीय विवाहसामाजिक समानता एवं फिजूलखर्ची पर पूर्ण रोक
नशा मुक्ति अभियानअनुयायियों द्वारा बीड़ी, शराब, मांस और तंबाकू का पूर्ण त्यागपारिवारिक सुख-शांति एवं स्वास्थ्य संवर्धन

जब उनसे पूछा गया कि किसानों को डीएपी और यूरिया खाद कैसे उपलब्ध कराई जाती है, तो उन्होंने बताया कि आश्रम अधिकृत कृषि एजेंटों के माध्यम से कानूनी अनुमति और अग्रिम भुगतान देकर खाद की व्यवस्था करता है।

वित्तीय स्रोत, आश्रम व्यवस्था और दान पर स्थिति स्पष्टीकरण

आश्रम की फंडिंग और विदेशी स्रोतों के आरोपों पर संत रामपाल जी महाराज ने स्पष्ट किया कि उनके देश-विदेश में करोड़ों अनुयायी हैं। नशा और दहेज छोड़ने से अनुयायियों के घरेलू खर्चों में भारी बचत होती है और वे अपनी स्वेच्छा से आश्रम को दान समर्पित करते हैं।

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उन्होंने नाम-दीक्षा और पाठ के लिए शुल्क लेने के आरोपों को खारिज करते हुए कहा:

“हमारे 14 बड़े आश्रम और 600 से अधिक नाम-दान केंद्र हैं। कोई भी व्यक्ति जाकर देख सकता है कि नाम-दीक्षा पूरी तरह निशुल्क है। किसी भी भक्त से ₹25,000 की पर्ची काटने जैसी कोई बाध्यता नहीं है। गीता के अध्याय 3 के अनुसार दान केवल स्वेच्छा और क्षमता पर आधारित होता है। हमारी 80% संगत सामान्य व गरीब पृष्ठभूमि से है। आश्रम में आने वाला पाई-पाई का दान लोक कल्याण में लगा दिया जाता है।”

समकालीन धार्मिक मान्यताएं: प्रेमानंद जी महाराज, व्रत और मूर्ति पूजा

साक्षात्कार में समकालीन संत प्रेमानंद जी महाराज के साथ मतभेदों, करवा चौथ व्रत और मूर्ति पूजा पर तीखे सवाल पूछे गए।

1. प्रेमानंद जी महाराज के प्रारब्ध सिद्धांत का खंडन

संत रामपाल जी महाराज ने कहा कि प्रेमानंद जी का यह दावा शास्त्र-विरुद्ध है कि ‘प्रारब्ध कर्म भोगना ही पड़ेगा और भजन से पाप नहीं कटते’। उन्होंने यजुर्वेद अध्याय 8 मंत्र 13 का हवाला देते हुए बताया कि वेदों में स्पष्ट लिखा है कि पूर्ण परमात्मा घोर से घोर पापों का नाश कर सकता है। इसके अतिरिक्त ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त 161 मंत्र 2 का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि सच्ची भक्ति से असाध्य रोग नष्ट हो सकते हैं और 100 वर्ष की पूर्ण आयु प्राप्त हो सकती है।

2. करवा चौथ एवं उपवास (व्रत)

उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 6 श्लोक 16 का संदर्भ देते हुए कहा कि जो साधक न तो अत्यधिक खाता है और न ही बिल्कुल भूखा (उपवास) रहता है, उसी की योग साधना सफल होती है। मनमाने व्रतों से मोक्ष या आध्यात्मिक लाभ संभव नहीं है।

3. मूर्ति पूजा और स्वयं को भगवान मानने का प्रश्न

मूर्ति पूजा के संबंध में उन्होंने दृष्टांत दिया कि किसी कुशल वैद्य की मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करने से रोग का उपचार नहीं होता, बल्कि वैद्य द्वारा दी गई औषधि का सेवन करना पड़ता है। उन्होंने स्वयं को भगवान कहे जाने के दावे का खंडन करते हुए कहा कि उन्होंने कभी स्वयं को ईश्वर घोषित नहीं किया; वे केवल सद्ग्रंथों के अनुसार साधना का मार्ग बताते हैं।

वैश्विक धर्मग्रंथों में परमात्मा के स्वरूप का विश्लेषण

संत रामपाल जी महाराज ने हिंदू, ईसाई और इस्लाम धर्म के मूल ग्रंथों का तुलनात्मक संदर्भ देते हुए कहा कि ईश्वर निराकार नहीं बल्कि साकार और सिंहासन पर विराजमान है:

  1. वेद प्रमाण: ऋग्वेद मंडल 9 सूक्त 82 मंत्र 1 तथा मंडल 9 सूक्त 86 मंत्र 27 में वर्णित है कि परमात्मा राजा के समान तीसरे मुक्तिधाम में सिंहासन पर विराजमान है।
  1. बाइबिल प्रमाण: उत्पत्ति ग्रंथ (बुक ऑफ जेनेसिस) के अनुसार ईश्वर ने छह दिनों में सृष्टि की रचना की और मनुष्य को अपने ही स्वरूप (छवि) में बनाया, जिससे सिद्ध होता है कि परमात्मा साकार है।
  1. कुरान में प्रमाण: पवित्र कुरान की सूरह अल-फुरकान (25) आयत 52 से 59 में उल्लेख है कि जिस कादिर खुदा ने छह दिनों में सृष्टि रची और सातवें दिन तख्त पर जा बैठा, उसका नाम ‘कबीर’ है।

2014 बरवाला आश्रम घटना, न्यायिक प्रक्रिया और मुकदमों की स्थिति

वर्ष 2014 में सतलोक आश्रम बरवाला में हुए पुलिस-प्रशासनिक टकराव और उसके बाद की कानूनी स्थिति पर संत रामपाल जी महाराज ने अपना पक्ष रखा।

उन्होंने बताया कि न्यायालय में पेशी के दौरान वे अस्वस्थ थे और सरकारी डॉक्टरों के मेडिकल पैनल ने उन्हें 19 तारीख तक विश्राम की सलाह दी थी। किंतु प्रशासन ने समयावधि समाप्त होने से पूर्व 17-18 तारीख को ही आश्रम पर बल प्रयोग शुरू कर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि आश्रम में कोई निजी ‘कमांडो दस्ता’ नहीं बनाया गया था; समर्थकों ने अपनी व्यक्तिगत भावनाओं के तहत प्रतिरोध किया था।

कानूनी मुकदमों की वर्तमान स्थिति स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा:

  • उनके विरुद्ध कुल 15 मुख्य मामले दर्ज किए गए थे।
  • इनमें से 12 मामलों में वे दोषमुक्त हो चुके हैं और 2 मामलों में उनकी सजा निरस्त हो चुकी है।
  • केवल एक मामले ही वर्तमान में उच्च न्यायिक प्रक्रिया के अधीन विचाराधीन हैं।
  • उन्होंने कभी बार-बार पैरोल लेने के बजाय न्यायिक प्रक्रिया के पूर्ण निस्तारण को प्राथमिकता दी।

भारत को पुनः सोने की चिड़िया बनाने की ओर कदम 

साक्षात्कार के समापन पर संत रामपाल जी महाराज ने कहा कि उनका एकमात्र उद्देश्य भारत को आध्यात्मिक और नैतिक दृष्टि से पुनः “सोने की चिड़िया” बनाना है। जब प्रशासनिक स्तर पर भ्रष्टाचार समाप्त होगा, किसान आर्थिक रूप से संपन्न होंगे और समाज नशा, दहेज व अंधविश्वास से मुक्त होकर शास्त्र सम्मत भक्ति करेगा, तभी राष्ट्र का वास्तविक कल्याण संभव होगा।

साक्षात्कार के अंत में पत्रकार दल द्वारा उन्हें भेंट स्वरूप एक डायरी प्रदान की गई, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार करते हुए उनको धन्यवाद दिया। 

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