खैरमपुर की बाढ़, किसानों की बेबसी और एक उम्मीद की दस्तक

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हरियाणा के हिसार जिले की मंडी आदमपुर तहसील में स्थित छोटा-सा गांव खैरमपुर पिछले कई महीनों से एक अजीब सन्नाटे में डूबा हुआ था। खेतों की मेड़ों पर खड़े किसान दूर-दूर तक नजरें दौड़ाते तो उन्हें अपनी मेहनत का हरा-भरा सपना नहीं, बल्कि पानी का अथाह समंदर दिखाई देता था। कपास और बाजरे की फसलें, जिनमें किसानों ने पूरे साल की उम्मीद बोई थी, उसी पानी में धीरे-धीरे गल चुकी थीं।

गांव के रास्तों पर कीचड़ था, खेतों में बदबूदार पानी भरा था और किसानों के चेहरों पर गहरी चिंता की लकीरें थीं। दो-ढाई महीने से यही हाल था। खेतों में जाना भी मुश्किल हो गया था। कई जगह मच्छरों का ऐसा प्रकोप था कि बीमारी का डर अलग से मंडरा रहा था।

गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि “इतना पानी हमने पहले कभी नहीं देखा।” जिन खेतों में कभी सुनहरी फसलें लहलहाती थीं, वहां अब सिर्फ ठहरा हुआ पानी और टूटती उम्मीदें दिखाई दे रही थीं।

लेकिन जिस गांव में महीनों से निराशा पसरी हुई थी, उसी गांव में एक दिन ऐसा आया जब ढोल-नगाड़ों की आवाज गूंजने लगी, लोग घरों से बाहर निकल आए और सड़कों पर फूल बरसाए जाने लगे। कारण था — एक ऐसी राहत जो गांव की कल्पना से भी कहीं बड़ी थी।

जब खेतों में फसल नहीं, सिर्फ पानी दिखाई देता था

खैरमपुर के किसानों के लिए यह आपदा अचानक आई थी। लगातार हुई बारिश और जलभराव ने पूरे इलाके को बाढ़ जैसी स्थिति में धकेल दिया। खेतों में पानी भरता गया और निकासी का कोई रास्ता नहीं था।

खैरमपुर में बाढ़ से जूझते किसानों को मिली बड़ी राहत, 33000 फुट पाइप से निकलेगा पानी

कपास की फसल पूरी तरह खराब हो गई, बाजरे की बालियां पानी में गल गईं और कई जगह धान भी बर्बाद हो गया। पशुओं के लिए चारा खत्म हो गया। कई परिवारों को अपने पशु रिश्तेदारों के यहां भेजने पड़े।

गांव के एक बुजुर्ग किसान बताते हैं:

“ढाई महीना हो गया, खेत में जाने का मन ही नहीं करता। इतना पानी और कीचड़ है कि लगता है बीमारी का घर बन गया है। फसल तो गई ही, पशुओं के लिए चारा भी नहीं बचा।”

दैनिक मजदूरी करने वाले लोगों की स्थिति और भी खराब थी। जब खेतों में काम ही नहीं बचा तो मजदूरी भी बंद हो गई। कई घरों में चूल्हा जलाना भी मुश्किल हो गया।

स्कूलों में पानी भर जाने के कारण बच्चों की पढ़ाई रुक गई। डिस्पेंसरी बंद पड़ी थी और लोग छोटी-छोटी बीमारियों के लिए भी परेशान थे।

प्रशासन के चक्कर और खाली हाथ लौटते किसान

जब हालात बिगड़ने लगे तो गांव के लोगों ने प्रशासन के दरवाजे खटखटाए। पंचायत के प्रतिनिधि कई बार अधिकारियों से मिले। एमपी और एमएलए तक अपनी बात पहुंचाई।

लेकिन हर जगह से सिर्फ आश्वासन मिला, समाधान नहीं।

गांव के सरपंच विक्रम अग्रवाल बताते हैं:

“हमने प्रशासन के इतने चक्कर लगाए कि गिनती भूल गए। कहीं से मोटर मिल गई, लेकिन असली समस्या का समाधान नहीं हुआ। खेतों का पानी निकालने के लिए बड़े स्तर पर व्यवस्था चाहिए थी, जो हमें नहीं मिल रही थी।”

किसानों के मन में धीरे-धीरे निराशा घर करने लगी थी। कई लोग सोचने लगे थे कि शायद इस साल खेती पूरी तरह खत्म हो जाएगी।

पंचायत की आखिरी उम्मीद — संत रामपाल जी महाराज के दरबार में अर्जी

जब हर दरवाजा बंद नजर आने लगा तो गांव की पंचायत ने एक आखिरी उम्मीद के साथ संत रामपाल जी महाराज के दरबार में प्रार्थना भेजी। पंचायत ने अपनी समस्या स्पष्ट लिखकर भेजी —
गांव में पानी भरा है, फसलें बर्बाद हो चुकी हैं, और पानी निकालने के लिए बड़ी पाइपलाइन और मोटरों की जरूरत है। गांव वालों को उम्मीद थी कि शायद कोई सलाह या छोटी-मोटी मदद मिल जाएगी। लेकिन जो हुआ, उसने पूरे गांव को हैरान कर दिया।

राहत का काफिला — जैसे गांव में पाइपों की फैक्ट्री खुल गई हो

कुछ ही दिनों बाद खैरमपुर के लोगों ने गांव के बाहर एक अनोखा नजारा देखा। ट्रकों, ट्रैक्टर-ट्रॉलियों और लोडिंग गाड़ियों का लंबा काफिला गांव की ओर बढ़ रहा था। इन गाड़ियों में हजारों फुट लंबी मोटी पाइपें भरी हुई थीं।

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यह कोई सामान्य मदद नहीं थी।

  • 33,000 फुट लंबी 8-इंच की मजबूत पाइपलाइन
  • दो विशाल 20 हॉर्स पावर की क्रॉम्पटन मोटरें
  • स्टार्टर, सुंडिया, फिटिंग का पूरा सामान
  • पाइप जोड़ने के लिए गोंद और अन्य उपकरण

करीब 15 से ज्यादा गाड़ियों में यह सामग्री गांव में पहुंची। ग्रामीणों ने अनुमान लगाया कि इसकी कीमत करीब 40 लाख रुपये के आसपास होगी। एक किसान ने हंसते हुए कहा: “लग रहा था जैसे हमारे गांव में पाइप बनाने की फैक्ट्री खुल गई हो। जहां नजर घुमाओ, पाइप ही पाइप दिखाई दे रहे थे।”

यह भी पढ़ें: चूली कलां (हिसार, हरियाणा) में संत रामपाल जी महाराज ने मोटर और पाइप देकर बचाई फसल

स्वागत का अद्भुत दृश्य

जब राहत का काफिला गांव में पहुंचा तो खैरमपुर का माहौल बदल गया। गांव के बाहर मंगलाचरण हुआ। लोग ढोल-नगाड़ों के साथ खड़े थे। महिलाओं ने फूलों की वर्षा की और सेवादारों का स्वागत किया गया। गांव के बुजुर्गों की आंखों में खुशी के आंसू थे। सरपंच विक्रम अग्रवाल ने भावुक होकर कहा: “हमारे पास धन्यवाद देने के लिए शब्द नहीं हैं। हमने सिर्फ एक आवेदन दिया था और इतना बड़ा काफिला हमारे गांव पहुंच गया। अगर हमें पहले पता होता तो हम प्रशासन के चक्कर लगाने के बजाय पहले ही यहां आते।”

किसानों की जुबानी दर्द और राहत

गांव के कई किसानों ने अपनी पीड़ा और राहत दोनों साझा की। एक बुजुर्ग किसान बोले: “ढाई महीने से खेत पानी में डूबे थे। पशुओं का चारा खत्म हो गया। अब अगर पानी निकल गया तो फिर से फसल बो पाएंगे।”

एक अन्य किसान ने कहा: “इतनी बड़ी मदद तो सरकार भी नहीं कर पाई। अब उम्मीद है कि 15-20 दिन में पानी निकल जाएगा और हम फिर से खेती शुरू कर पाएंगे।”

दैनिक मजदूरों के लिए भी यह राहत थी। क्योंकि खेतों में काम शुरू होने का मतलब था — गांव में फिर से रोजगार लौटना।

संत रामपाल जी महाराज — सेवा और करुणा का संदेश

खैरमपुर के लोगों के लिए यह सिर्फ राहत सामग्री नहीं थी, बल्कि उम्मीद का संदेश था।

संत रामपाल जी महाराज लंबे समय से समाज सेवा के अनेक कार्यों से जुड़े रहे हैं। बाढ़, सूखा या अन्य आपदाओं के समय उनके अनुयायी राहत कार्यों में सक्रिय रहते हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि यह सेवा किसी प्रचार या दिखावे के लिए नहीं की गई, बल्कि मानवता के भाव से की गई है।

गांव के एक बुजुर्ग ने कहा:

“दुनिया में बहुत से धर्मगुरु हैं, लेकिन ऐसे समय में जो लोगों के काम आए वही सच्चा संत है। आज हमारे गांव के लोग उनकी सेवा को जीवन भर याद रखेंगे।”

पारदर्शिता और जिम्मेदारी — पंचायत को दिया गया पत्र

राहत सामग्री सौंपते समय ग्राम पंचायत को एक महत्वपूर्ण पत्र भी दिया गया।

इस पत्र में साफ कहा गया कि:

  • दिए गए पाइप और मोटरों का सही उपयोग किया जाए।
  • निर्धारित समय में गांव का पानी निकाला जाए।
  • अगली फसल की बुवाई होनी चाहिए।

इसके लिए ड्रोन से गांव की वीडियो रिकॉर्डिंग भी की गई। पहली वीडियो पानी भरे गांव की, दूसरी पानी निकलने के बाद, और तीसरी फसल लहलहाने के समय बनाई जाएगी। इसका उद्देश्य था —
दान में मिली सामग्री का पारदर्शी उपयोग सुनिश्चित करना। खैरमपुर अकेला गांव नहीं है। जानकारी के अनुसार संत रामपाल जी महाराज के सेवा अभियान के तहत देशभर के 400 से अधिक गांवों में राहत पहुंचाई जा चुकी है। इन सेवाओं का उद्देश्य है कि किसी भी आपदा में किसान और गरीब परिवार अकेले न रह जाएं।

गांव की सहमति और सामूहिक संकल्प

ग्राम पंचायत ने राहत सामग्री प्राप्त करने के बाद एक लिखित आश्वासन दिया कि गांव के सभी किसान मिलकर पाइपलाइन का उपयोग करेंगे और जल्द से जल्द पानी निकालेंगे। पंचायत के सभी सदस्यों ने दस्तखत कर यह जिम्मेदारी स्वीकार की।

सरपंच ने कहा: “हम पूरी जिम्मेदारी से इस सामान का उपयोग करेंगे और जल्द ही खेतों से पानी निकालेंगे ताकि अगली फसल की बुवाई हो सके।”

इस घटना का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहा। गांव में जो निराशा और डर का माहौल था, उसकी जगह अब उम्मीद और भरोसा लौट आया है।

लोग कहते हैं कि जब संकट के समय कोई हाथ थाम लेता है, तो वह मदद सिर्फ आर्थिक नहीं होती — वह मनोबल भी देती है।

संत रामपाल जी महाराज ने थामा हाथ असहाय का 

खैरमपुर की कहानी सिर्फ 33,000 फुट पाइप की कहानी नहीं है। यह उस भरोसे की कहानी है जो संकट के समय जन्म लेता है। यह कहानी बताती है कि जब किसान टूटने लगता है, जब गांव का मनोबल डगमगाने लगता है, और जब समाज चुप हो जाता है — तब भगवान का हाथ जरूर आगे आता है। आज खैरमपुर के खेतों में अभी भी पानी भरा है, लेकिन किसानों की आंखों में अब डर नहीं है।

उन्हें विश्वास है कि जल्द ही यह पानी निकल जाएगा, और उसी जमीन पर फिर से नई फसल लहलहाएगी। संत रामपाल जी महाराज जी ने अन्नपूर्णा मुहिम के तहत जो मदद सबके लिए की है वह किसी साधारण संत के वश की बात नहीं है। संत रामपाल जी महाराज स्वयं कबीर परमेश्वर के साक्षात अवतार हैं जिन्होंने हर भूखे, जरूरतमंद और बेसहारा की पुकार सुनी है।

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