और ज्ञान सब ज्ञानडी, कबीर ज्ञान सो ज्ञान।
जैसे गोला तोप का, करता चले मैदान।।

जब दुनिया मे इंटरनेट, टीवी, फोन, मीडिया आदि साधन उपलब्ध नहीं थे, उस समय अर्थात् 600 सौ वर्ष पहले इन साधनों के अभाव में भी कबीर साहेब के 64 लाख शिष्य हो जाना किसी चमत्कार से कम ना था। उनकी प्रसिद्धि तब आसमान छूने लगी और वे धीरे धीरे यह रहस्य भी उजागर करने लगे कि वे केवल सद्गुरु ही नहीं बल्कि स्वयं पूर्ण परमात्मा भी हैं जो स्वयं ही एक सच्चे संत की भूमिका निभाने इस मृत लोक में आये हैं। उस समय दिल्ली का राजा सिकंदर लोधी भी कबीर परमेश्वर जी का अनुयायी बन गया था। लेकिन शेखतकी जो दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोधी का

धार्मिक पीर होने के साथ-साथ समस्त मुसलमानों का भी पीर था, वह नहीं चाहता था कि सिकंदर लोधी की नजरों में उससे अधिक महिमा किसी और की बने इसलिए वह आये दिन कबीर जी को बदनाम करने के या जान से मारने के षड़यंत्र रचता रहता था। उस समय के नकली पंडितों को भी कबीर परमात्मा ने अपने सतज्ञान से पछाड़ा था और जनता को उनके पाखण्ड से अवगत कराया था जिसकी ईर्ष्या में वह पंडित, कथाकार, नकली संत-महंत और नकली धार्मिक गुरु भी कबीर परमात्मा से द्वेष रखने लगे थे। शेखतकी कबीर परमेश्वर के अस्तित्व को मिटाने के सारे प्रयास कर चुका था। लेकिन पूर्ण परमात्मा कबीर जी की शक्ति और चमत्कारों के आगे उसे बार-बार विफलता ही मिल रही थी। उसकी ऐसी ही एक कोशिश को असफल करने के लिए कबीर साहेब ने अब तक का सबसे अद्भुत भंडारा दिया था। जिसका उदाहरण सदा सदा लिया जाएगा।

शेखतकी का षडयंत्र – झूठा प्रचार करा दिया कि कबीर जी विशाल भण्डारा दे रहे हैं।

शेखतकी ने काशी के सारे हिन्दू, मुसलमान, पीर पैगम्बर, मुल्ला काजी और पंडितो को इकट्ठा करके कबीर परमेश्वर के खिलाफ षडयंत्र रचा। सोचा कबीर निर्धन व्यक्ति है। इसके नाम से पत्र भेज दो की कबीर जी काशी में बहुत बड़े सेठ हैं। वह काशी शहर में तीन दिन का धर्म भोजन-भण्डारा करेंगे। सर्व साधु संत आमंत्रित हैं। पूरे हिंदुस्तान में झूठी चिट्ठियां भेजकर खूब प्रचार करवा दिया की प्रतिदिन प्रत्येक भोजन करने वाले को एक दोहर (कीमती कम्बल) और एक सोने की मोहर दक्षिणा में देगें। एक महीने पहले ही प्रचार शुरू कर दिया और देखते ही देखते पूरे हिंदुस्तान से 18 लाख भक्त तथा संत व अन्य व्यक्ति लंगर खाने काशी में चौपड़ के बाजार में आकर इकट्ठे हो गए। जब संत रविदास जी को यह खबर लगी तो कबीर जी से पूरा हाल बयां किया। परमात्मा कबीर जी तो जानीजान थे। फिर भी अभिनय कर रहे थे। रविदास जी से कहा कि रविदास जी झोपड़ी के भीतर आ जाओ और कुंडी लगा लो हम सुबह होते ही यहां से निकल लेंगें इस बार तो हमारे ऊपर बड़ा जुल्म कर दिया है इन लोगों ने।

18 लाख व्यक्तियों के लिए सतलोक से आए अनेकों पकवान भोजन-भंडारे के रूप में

एक तरफ तो कबीर जी अपनी झोपड़ी में बैठे थे और दूसरी तरफ परमेश्वर कबीर जी अपनी राजधानी सतलोक में पहुँचे। वहां से केशव नाम के बंजारे का रूप धारण करके कबीर परमात्मा 9 लाख बैलों के ऊपर बोरे (थैले) रखकर उनमें पका-पकाया भोजन (खीर, पूड़ी, हलुवा, लड्डू, जलेबी, कचौरी, पकोडी, समोसे, रोटी दाल, चावल, सब्जी आदि) भरकर सतलोक से काशी नगर की ओर चल पड़े। सतलोक की हंस आत्माएं ही 9 लाख बैल बनकर आए थे। केशव रूप में कबीर परमात्मा एक तंबू में डेरा देकर बैठ गए और भंडारा शुरू हुआ। बेईमान संत तो दिन में चार-चार बार भोजन करके चारों बार दोहर तथा मोहर ले रहे थे। कुछ सूखा सीधा (चावल, खाण्ड, घी, दाल, आटा) भी ले रहे थे। यह सब देखकर शेखतकी ने तो रोने जैसी शक्ल बना ली।

उधर भण्डारा सुचारू रूप से चल रहा था। जब सिकंदर लोधी वहां पहुँचा तो उसने केशव बंजारे से पूछा कि आप कौन हैं? तो केशव रूप में कबीर साहेब ने कहा कि वे कबीर जी के मित्र हैं। केशव ने बताया कि कबीरजी ने कहा था कि काशी में एक छोटा सा भंडारा करना है। इसलिए मैं यहां आया हूं। शेखतकी ये बातें सुनकर कलेजा पकड़कर जमीन पर बैठ गया की इतने बड़े भण्डारे को छोटा-सा भण्डारा कह रहे हैं। परंतु शेखतकी के मन में ईर्ष्या अभी भी बरकरार थी। सिकंदर लोधी पूरा नजारा देखकर दंग रह गया और केशव से पूछा कबीर जी क्यों नहीं आए? केशव ने उत्तर दिया कि जब तक उनका गुलाम हाजिर है उनको तकलीफ उठाने की क्या आवश्यकता? यह भण्डारा तो तीन दिन चलना है। उनकी जब इच्छा होगी, आ जाएंगे।

यह लीला देखकर दिल्ली का राजा सिकंदर लोधी कबीर जी के चरणों में नतमस्तक हुआ।

सिकंदर लोधी कबीर जी की झोंपड़ी पर गए। दस्तक देकर कहा की है परवरदिगार! दरवाज़ा खोलिए! आपका बच्चा सिकंदर आया है। कबीर परमेश्वर जी ने कहा, हे राजन! कुछ व्यक्ति मेरे पीछे पड़े हैं। प्रतिदिन कोई न कोई नया षड़यंत्र रचकर परेशान करते हैं। मेरे पास भोजन-भण्डारा (लंगर) करवाने तथा दक्षिणा देने के लिए धन नहीं है। मैं रात्रि में परिवार सहित काशी नगर को त्यागकर कहीं दूर स्थान पर चला जाऊँगा। मैं दरवाज़ा नहीं खोलूँगा। सिकंदर सम्राट बोला, हे कादिर अल्लाह (समर्थ परमात्मा) आप मुझे नहीं बहका सकते। आपने चौपड़ के खुले स्थान पर कैसे भण्डारा लगाया है। आपका मित्र केशव आया है। अपार खाद्य सामग्री लाया है। लाखों लोग भोजन करके आपकी जय-जयकार कर रहे हैं। आपका दर्शन करना चाहते हैं। कबीर जी ने संत रविदास जी से कहा कि खोल दो किवाड़। दरवाजा खुलते ही सिकंदर राजा ने जूती उतारकर मुकुट सहित दण्डवत् प्रणाम किया।

फिर काशी में चल रहे भोजन-भण्डारे में चलने की विनय की। जब कबीर परमात्मा झोंपड़ी से बाहर निकले तो आसमान से सुगंधित फूल बरसने लगे तथा आकाश से सुंदर मुकुट आया और परमात्मा कबीर जी के सिर पर सुशोभित हुआ। सिकन्दर बादशाह ने कबीर परमेश्वर को अपने हाथी पर बिठाया और चंवर करने लगे। मेले में पहुँचे। कबीर परमेश्वर जी की जय जयकार होने लगी। कबीर परमेश्वर जी ने इस दौरान सत्संग सुनाया जो 8 पहर यानी 24 घण्टे तक चला। एक रूप में केशव प्रश्न करते और दूसरे रूप में कबीर साहेब उत्तर देते। केशव लोगों के सामने पूछते हैं, परमात्मा आप अपने नूरी प्रदेश सतलोक को जहां कोई कमी नहीं वहां से इस मलीन लोक में क्यों आये? यहां हर चीज की कमी है। यहां पैर रखने से भी पाप लगता है क्योंकि करोडों जीव मर जाते हैं।

केशव कहे कबीर से, पूछे बाता बीन।
गरीब दास क्यों उतरे, ऐसे मुल्क मलीन।।

कबीर साहेब उत्तर देते की मैं अपने बच्चों के लिए आया हूं। ये भटक गए हैं। इन्हें सत साधना बताकर इनको भी सतलोक लेकर जाऊंगा।

कबीर, गोता मारूं स्वर्ग में, जा पैठूं पाताल।
गरीब दास ढूंढता फिरूं अपने हीरे मोती लाल।।

ये अद्भुत सत्संग सुन कई लाख सन्तों ने अपनी गलत भक्ति त्यागकर कबीर जी से दीक्षा ली और अपना कल्याण कराया।

कबीर परमात्मा की भक्ति करने से ऐसे टलते हैं संकट।

जब भंडारा खत्म होने का समय आया तब सिकंदर लोधी राजा तथा शेखतकी, केशव तथा कबीर जी एक ही स्थान पर खड़े थे, उस समय सब बैल तथा साथ लाए सेवक जो बनजारों की वेशभूषा में थे, गंगा पार करके वापस जाने लगे। जो सेवादार व बैल सतलोक से आये थे उनके पैर जमीन से 6 इंच ऊपर थे। ये भी सिर्फ कुछ पुण्यात्माओं को नजर आ रहा था जिनके पास पुराने पुण्य थे। जाते समय गंगा का जल घुटनों रह गया जो कि पहले बहुत गहरा व तीव्र गति से बह रहा था। कुछ ही देर के बाद सिकंदर लोधी राजा ने केशव से कहा आप जाइये, आपके बैल तथा साथी जा रहे हैं। जिस ओर बैल तथा बनजारे गए थे, उधर राजा ने देखा तो कोई भी नहीं था। आश्चर्यचकित होकर राजा ने पूछा कबीर जी! वे बैल तथा बनजारे इतनी शीघ्र कहाँ चले गए? कबीर जी ने कहा कि ये सब सतलोक से आये थे और वापस सतलोक चले गए। उसी समय देखते-देखते केशव भी परमेश्वर कबीर जी के शरीर में समा गए। अकेले कबीर जी खड़े थे। सारा माजरा (रहस्य) समझकर सिकंदर लोधी राजा ने कहा कि कबीर जी! यह सब लीला आपकी ही थी। आप स्वयं परमात्मा हो।

शेखतकी के तो तन-मन में ईर्ष्या से आग लग गई। कबीर जी ने भक्तों को कहा कि यदि आप मेरी तरह सच्चे मन से भक्ति करोगे तथा ईमानदारी से निर्वाह करोगे तो परमात्मा आपकी ऐसे ही सहायता करेगा। कबीर साहेब अनन्त कोटि ब्रह्मांडों के स्वामी हैं। पर फिर भी उन्होंने काशी में जुलाहे का काम किया। ये सबसे मुश्किल कामों में से एक था। बड़ी मुश्किल से धागा बुनते थे। यदि गलती से धागे में गाँठ लगानी पड़ती तो कोई धागा नहीं खरीदता। ये काम करके कबीर जी को जो पैसे मिलते उससे कबीरजी अपना, अपने मुंह बोले माता पिता, व मुंह बोले बच्चों कमाल व कमाली का निर्वाह करते। बाकी बचे पैसों से भंडारा कर देते थे। उन्होंने बताया कि यदि आप इतने गरीब भी हैं और आप सत साधना करते हैं तो समय पड़ने पर परमात्मा आपकी ऐसे ही मदद करेगा जैसे कबीर साहेब के साथ हुआ। खुद के पास अगले दिन खाने के लिए आटा नहीं था लेकिन फिर भी 18 लाख लोगों को 3 दिन तक दोनों समय कई स्वादिष्ट पकवान खिला दिए व मुफ्त में दोहर व मोहर भी दे दिए।

अब 600 वर्षों बाद- वर्तमान में कौन है कबीर जी स्वरूप तत्वदर्शी संत?

वर्तमान में संत रामपाल जी महाराज ही कबीर साहेब जी के स्वरूप हैं जो शास्त्र अनुकूल साधना विधि देकर अपनी पुण्यात्माओं को काल के जाल से बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जो फायदे किसी भगत को कबीर साहेब से नाम उपदेश लेकर हो सकते हैं वही लाभ आज संतरामपालजी से नामदीक्षा लेकर भक्ति करने से हो रहे हैं। पर जिस तरह शेखतकी ने कबीर जी को प्रताड़ित किया था लेकिन कबीर परमेश्वर ने कभी भी किसी से द्वेष भाव नहीं रखा क्योंकि वह कहते थे कि मुझे प्रताड़ित करने वाले भी तो मेरे ही बच्चे हैं। उसी तरह वर्तमान में संत रामपाल जी महाराज को भी विरोधियों द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा है लेकिन सच्चाई के प्रति उनका संघर्ष जारी है।