8 साल से डूबा था मंडनाका गाँव: संत रामपाल जी महाराज ने दिया किसान मज़दूर बचाओ अभियान चरण 2 के तहत नया जीवनदान 

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हरियाणा का किसान अपनी ज़मीन को अपनी माँ मानता है। लेकिन पलवल ज़िले के मंडनाका गाँव के किसानों के लिए उनकी यही ज़मीन पिछले 8 सालों से एक गहरे दुख का कारण बनी हुई थी। मंडनाका गाँव भौगोलिक रूप से एक बहुत निचले इलाके में बसा हुआ है। हर मानसून में आस-पास के कई गाँवों का बारिश और बाढ़ का गंदा पानी ढलान के कारण सीधा मंडनाका के खेतों में आकर जमा हो जाता था।

​पानी निकासी का कोई साधन न होने के कारण यह पानी कभी नहीं सूखा। पिछले 8 सालों से गाँव की 1000 एकड़ से अधिक अत्यंत उपजाऊ कृषि भूमि 5 से 6 फुट गंदे और बदबूदार पानी में पूरी तरह डूबी हुई थी। जो खेत कभी लहलहाती फसलों से भरे रहते थे, वे एक भयंकर दलदल और झील में तब्दील हो चुके थे।

​ज़मींदार से दिहाड़ी मज़दूर बनने का दर्द

इस 8 साल लंबी त्रासदी ने गाँव की आर्थिक कमर पूरी तरह तोड़ दी थी। जो किसान अपने खेतों में काम करने के लिए दर्जनों मज़दूरों को रोज़गार देते थे, उनकी खुद की रोजी-रोटी छिन गई। फसल का एक दाना न पैदा होने के कारण, ये ज़मींदार किसान अपने परिवार और बच्चों का पेट पालने के लिए आस-पास के गाँवों में जाकर दिहाड़ी मज़दूरी करने को मजबूर हो गए। गाँव का युवा बेरोज़गार हो गया और बुजुर्ग अपनी पुश्तैनी ज़मीन को पानी में सड़ता देख खून के आंसू रोते रहे।

​प्रशासन की बेरुखी और बंद दरवाज़े 

मंडनाका के ग्रामीणों ने हार नहीं मानी थी। 8 सालों तक उन्होंने हर मंत्री, हर विधायक, जिला कलेक्टर और सिंचाई विभाग के दरवाजों पर दस्तक दी। लेकिन भारत की लालफीताशाही ने उन्हें केवल खोखले आश्वासनों और सर्वे की तारीखों में उलझाए रखा। प्रशासन ने साफ कह दिया कि इतने विशाल जलभराव को निकालने के लिए उनके पास पर्याप्त बजट और साधन नहीं हैं। सिस्टम ने एक पूरे गाँव को उसके हाल पर मरने के लिए छोड़ दिया था।

​16 घंटे में हुआ चमत्कार: ‘किसान मज़दूर बचाओ अभियान’

जब सरकारी तंत्र पूरी तरह फेल हो गया, तब मंडनाका की पंचायत ने एक आखिरी आस के साथ संत रामपाल जी महाराज के सतलोक आश्रम का रुख किया। उन्होंने अपनी अपनी समस्या संत जी के समक्ष रखी।

​इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे पलवल जिले को अचरज में डाल दिया। जो काम प्रशासन 8 साल में नहीं कर पाया, संत रामपाल जी महाराज की विशेष सर्वे टीम ने चंद घंटों में गाँव पहुँचकर उस जलभराव का मुआयना कर लिया।

​मदद की रफ्तार इतनी तेज़ थी कि अर्ज़ी लगाने के महज 16 घंटे के भीतर ट्रकों का एक विशाल काफिला मंडनाका की चौपाल पर आकर रुक गया। इन ट्रकों में कोई छोटी-मोटी राहत नहीं, बल्कि 20,000 फीट (लगभग 6 किलोमीटर) लंबी 8 इंची हैवी पाइपलाइन लदी हुई थी।

​मुफ्त फिटिंग किट और एक ‘परमानेंट’ समाधान

संत रामपाल जी महाराज की दयालुता केवल पाइपों तक सीमित नहीं थी। उन्होनें पंचायत को पाइप जोड़ने के लिए भारी मात्रा में फेविकोल, एयर वाल्व, क्लैंप और सारा ज़रूरी साजो-सामान बिल्कुल मुफ्त सौंपा। सख्त हिदायत दी गई कि किसी भी किसान को अपनी जेब से एक रुपया भी खर्च नहीं करना है।

​इस असीम उपकार को देखकर गाँव वालों की आँखें छलक उठीं। पंचायत ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया है कि इन पाइपों को ज़मीन के नीचे दबाकर एक ‘परमानेंट’ (स्थायी) अंडरग्राउंड नाला बनाया जाएगा, ताकि भविष्य में कभी भी गाँव का पानी खेतों में न रुके और सीधा दूर नहर में गिर जाए।

​उम्मीदों की नई फसल

आज मंडनाका गाँव का माहौल किसी आपदा ग्रस्त इलाके जैसा नहीं, बल्कि एक बड़े उत्सव जैसा है। ट्रैक्टरों की गड़गड़ाहट और ग्रामीणों के चेहरों की चमक बता रही है कि 8 साल का काला अध्याय अब खत्म हो रहा है। संत रामपाल जी महाराज ने केवल 20,000 फीट प्लास्टिक के पाइप नहीं दिए हैं, बल्कि उन्होंने उस गाँव की रगों में 20,000 फीट लंबी उम्मीद, ज़िंदगी और भविष्य की सांसें फूंकी हैं। मंडनाका आज गवाही दे रहा है कि जब सत्ता मुंह मोड़ लेती है, तब सच्चा संत ही समाज का तारणहार बनता है।

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