हरियाणा के हिसार जिले का मतलोड़ा गांव कुछ महीने पहले तक एक सामान्य ग्रामीण बस्ती था, जहां खेतों में हरियाली और लोगों के चेहरों पर उम्मीद दिखाई देती थी। लेकिन अचानक आई भारी बारिश और बाढ़ ने इस गांव की तस्वीर पूरी तरह बदल दी। गांव के चारों तरफ करीब 2000 एकड़ जमीन 4 से 5 फीट गहरे पानी में डूब गई। हालात इतने खराब हो गए कि करीब 400 घर प्रभावित हुए और सरकारी स्कूल तक पानी से भरकर तालाब में बदल गया।
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि ऐसी स्थिति उन्होंने पहले कभी नहीं देखी। खेतों में खड़ी फसलें पूरी तरह नष्ट हो गईं और जिन जमीनों पर अगली बुवाई होनी थी, वहां महीनों तक पानी भरा रहा। गांव की गलियों में पानी सड़ने लगा, जिससे मच्छरों और बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ गया। लोगों के सामने सिर्फ एक सवाल था — अब आगे क्या?
किसानों की टूटी कमर: फसल, कर्ज और भविष्य पर संकट
इस आपदा का सबसे बड़ा असर किसानों पर पड़ा। जिन खेतों से साल भर की आमदनी होती थी, वे पूरी तरह बर्बाद हो चुके थे। एक किसान रामकेश बताते हैं, “हमारे खेतों में छाती तक पानी था। फसल तो दूर की बात, जमीन पर खड़ा होना भी मुश्किल हो गया था। हम बीमार होने लगे थे, मच्छर और गंदगी से हालत खराब थी।”
एक अन्य किसान विक्रम कहते हैं, “हमारी पूरी फसल खत्म हो गई थी। कई जगह 5 फीट तक पानी था। मकान गिरने लगे थे, पशुओं को भी बचाना मुश्किल हो गया था। ऐसा लग रहा था कि अब गांव छोड़ना पड़ेगा।”
किसानों की आर्थिक स्थिति तेजी से बिगड़ रही थी। कर्ज का दबाव बढ़ रहा था और अगली फसल की कोई उम्मीद नहीं दिख रही थी। मुआवजे की उम्मीद भी बहुत कम थी और जो था, वह नुकसान के मुकाबले नगण्य था।
प्रशासन की सीमाएं और जमीनी हकीकत

ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन की ओर से आश्वासन तो मिले, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस मदद नहीं पहुंची। कई किसानों ने बताया कि अधिकारी और नेता मौके पर आए, हालात देखे, लेकिन समाधान नहीं दे सके।
एक ग्रामीण अनिल बताते हैं, “नेता आए, फोटो खिंचवाए और चले गए। हमें कोई असली मदद नहीं मिली। मुआवजा भी इतना कम था कि उससे कुछ नहीं होता।”
सरपंच प्रतिनिधि जगबीर फौजी बताते हैं कि उनके पास रोज सैकड़ों कॉल आते थे — कोई मकान गिरने की बात करता, कोई पीने के पानी की समस्या बताता, तो कोई फसल के नुकसान से परेशान था। गांव में एक तरह से अफरा-तफरी का माहौल था। कुछ समय बाद ही गांव छोड़ने की नौबत आ जाती।
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मदद की उम्मीद: जब पंचायत ने उठाया बड़ा कदम
जब हर रास्ता बंद होता नजर आया, तब गांव की पंचायत ने एक अलग दिशा में कदम बढ़ाया। सरपंच प्रतिनिधि और ग्रामीणों ने संत रामपाल जी महाराज से मदद की अपील की।
जगबीर फौजी बताते हैं, “हमने शुरुआत में सिर्फ 16,000 फीट पाइप और दो मोटर की मांग रखी थी। लेकिन वहां से हमें उम्मीद से कहीं ज्यादा मिला। हमें 35,000 फीट पाइप और चार मोटरें तुरंत उपलब्ध करवा दी गईं।”
सबसे बड़ी बात यह रही कि यह मदद बेहद कम समय में पहुंच गई। जहां सामान्य परिस्थितियों में ऐसी व्यवस्था करने में कई दिन या हफ्ते लग सकते थे, वहीं यहां एक ही दिन में सामग्री गांव तक पहुंच गई।
राहत कार्य: तकनीक और संसाधनों का तेज इस्तेमाल
गांव में कुल मिलाकर लगभग 42,000 फीट लंबी पाइपलाइन और 15 हॉर्सपावर की सात शक्तिशाली मोटरें लगाई गईं। इसके अलावा स्कूल के लिए अलग से 500 फीट पाइप और दो मोटरें दी गईं।

जैसे ही यह संसाधन पहुंचे, गांव में युद्ध स्तर पर काम शुरू हो गया। अलग-अलग स्थानों पर मोटरें लगाई गईं और पाइपलाइन बिछाकर पानी को बाहर निकाला जाने लगा। ग्रामीण बताते हैं कि यह काम लगातार दिन-रात चला। कुछ ही दिनों में पानी का स्तर तेजी से कम होने लगा और धीरे-धीरे खेतों और गांव से पानी पूरी तरह निकल गया।
स्कूल से खेत तक: जमीन पर दिखने लगा बदलाव
जिस सरकारी स्कूल में पहले 4 से 6 फीट तक पानी भरा हुआ था, वहां अब बच्चे फिर से पढ़ाई करने लगे हैं। स्कूल के मैदान सूख चुके हैं और कक्षाएं दोबारा शुरू हो गई हैं।
एक छात्र ने बताया, “हमारी क्लास एक महीने से बंद थी। अब पानी निकल गया है तो हम फिर से स्कूल आ पा रहे हैं।”
खेतों की स्थिति भी तेजी से सुधरी। जहां पहले पानी भरा था, वहां अब जुताई और बुवाई पूरी हो चुकी है। गेहूं और सरसों की फसल उगने लगी है और खेत फिर से हरे दिखाई देने लगे हैं।
किसानों का मानना है कि इस तकनीकी और आर्थिक सहयोग ने न सिर्फ उनकी फसल बचाने में मदद की, बल्कि पूरे गांव को दोबारा खड़ा होने का मौका दिया। कई किसानों ने इसे “समय पर मिली सबसे बड़ी मदद” बताया, क्योंकि अगर कुछ और दिन पानी खड़ा रहता तो नुकसान और भी ज्यादा बढ़ सकता था। संत रामपाल जी असाधारण संत हैं जिनके आगे हर कोई नतमस्तक है।
सामाजिक असर: भाईचारा और नई उम्मीद
इस पूरी प्रक्रिया का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गांव के सामाजिक ढांचे पर भी पड़ा। पहले पानी को लेकर लोगों के बीच विवाद होने लगे थे, लेकिन पाइप और मोटर मिलने के बाद स्थिति बदल गई।
एक किसान बताते हैं, “पहले लड़ाई होती थी कि पानी किसके खेत में जाएगा। लेकिन जब सबको सुविधा मिल गई, तो झगड़े खत्म हो गए।” गांव में रोजगार भी बढ़ा, क्योंकि बुवाई और खेतों के काम फिर से शुरू हो गए। इससे लोगों को आर्थिक राहत मिली और गांव में सामान्य जीवन लौटने लगा।
सरपंच प्रतिनिधि के अनुसार, इस पूरी मदद से गांव को करोड़ों रुपये का सीधा फायदा हुआ। सिर्फ गेहूं की फसल से ही करीब 8 करोड़ रुपये का लाभ अनुमानित है। इसके अलावा, कई मकान जो गिरने की कगार पर थे, बच गए। पशुओं के लिए चारा उपलब्ध हुआ और गांव की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे पटरी पर लौटने लगी।
आपदा से अवसर तक संत रामपाल जी महाराज जी की दया से
मतलोड़ा गांव की यह कहानी सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा की नहीं, बल्कि उससे उबरने की भी कहानी है। जहां एक तरफ बाढ़ ने पूरे गांव को संकट में डाल दिया था, वहीं समय पर संत रामपाल जी महाराज जी से मिली तकनीकी और संसाधन आधारित मदद ने हालात बदल दिए।
आज गांव के खेतों में फिर से हरियाली है, स्कूलों में बच्चों की आवाजें गूंज रही हैं और किसानों के चेहरे पर उम्मीद लौट आई है। मतलोड़ा गांव की इस पूरी कहानी में संत रामपाल जी महाराज की भूमिका निर्णायक नजर आती है। जब गांव चारों तरफ पानी से घिरा हुआ था और किसानों को कहीं से राहत नहीं मिल रही थी, उस समय पंचायत की एक अपील पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने सहायता उपलब्ध करवाई। ग्रामीणों के अनुसार, बहुत कम समय में हजारों फीट लंबी पाइपलाइन और कई उच्च क्षमता वाली मोटरें गांव तक पहुंचाई गईं, जिससे पानी निकासी का काम तेजी से शुरू हो सका।
महत्वपूर्ण बात यह रही कि यह मदद बिना किसी भेदभाव के और पूरी तरह व्यवस्थित तरीके से दी गई। गांव के अलग-अलग हिस्सों की जरूरत के अनुसार संसाधन उपलब्ध कराए गए, यहां तक कि सरकारी स्कूल के लिए भी अलग से मोटर और पाइप की व्यवस्था की गई। ग्रामीणों का कहना है कि जहां सामान्य तौर पर ऐसी व्यवस्थाओं में समय लग जाता है, वहीं यहां तुरंत कार्रवाई देखने को मिली, जिससे हालात बिगड़ने से पहले ही नियंत्रण में आ गए। आज हर कोई संत रामपाल जी महाराज को भगवान कह रहा है।



