हरियाणा के जींद जिले की जुलाना तहसील का छोटा सा गांव मालवी पिछले तीन महीनों से एक ऐसी आपदा का सामना कर रहा था, जिसने यहां के सामान्य जीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया। गांव की गलियों में रास्ते नहीं, बल्कि दूर-दूर तक फैला पानी दिखाई दे रहा था। ऐसा लग रहा था मानो पूरा गांव किसी सफेद समंदर में तब्दील हो गया हो। घरों के बीच पानी भर जाने से कई मकान टापू की तरह नजर आने लगे थे। खेत, जिनसे किसानों की जिंदगी चलती है, पूरी तरह जलमग्न थे और धान की फसल बर्बाद हो चुकी थी। यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं थी, बल्कि किसानों के लिए आर्थिक और मानसिक संकट का दौर भी था।
बाढ़ का असर: खेत से लेकर घर तक तबाही
गांव में बाढ़ की स्थिति इतनी भयावह थी कि खेतों में चार से छह फुट तक सड़ा हुआ पानी खड़ा था। किसानों के अनुसार, इस पानी ने जमीन की उर्वरता को भी प्रभावित किया। धान की फसल पूरी तरह खत्म हो चुकी थी और कई किसानों को कटाई तक का मौका नहीं मिला। जो फसल बची भी थी, उसमें दाना खराब हो चुका था।

गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि हालात इतने खराब हो गए थे कि खेतों तक जाना भी मुश्किल था। रास्ते पूरी तरह बंद थे और लोगों का घर से बाहर निकलना भी एक चुनौती बन गया था। कई घरों में पानी घुसने लगा था, जिससे परिवारों को सुरक्षित स्थानों की तलाश करनी पड़ी।
किसानों की आर्थिक स्थिति: कर्ज और अनिश्चितता का दबाव
मालवी गांव के किसान पहले ही खेती पर निर्भर थे, और बाढ़ ने उनकी आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर दिया। धान की फसल के नुकसान के बाद सबसे बड़ी चिंता गेहूं की अगली बुवाई को लेकर थी। अगर समय पर पानी नहीं निकलता, तो अगली फसल भी प्रभावित होती और किसानों के सामने कर्ज का संकट और गहरा जाता।
एक किसान सत्यवान बताते हैं, “हम तो पूरी तरह खत्म हो चुके थे। खेत में खड़ा पानी देख-देखकर ऐसा लगता था जैसे सब कुछ हाथ से निकल गया हो। अगर इसी तरह पानी रहता, तो हम गेहूं की बुवाई भी नहीं कर पाते।”
दूसरे किसान मोनू शर्मा कहते हैं, “700–800 किले तक पानी भरा हुआ था। हमें समझ नहीं आ रहा था कि आगे क्या होगा। कई लोगों के घर का खर्च भी चलाना मुश्किल हो गया था।”
प्रशासन की भूमिका: आश्वासन ज्यादा, समाधान कम
गांव के सरपंच और अन्य ग्रामीणों ने इस समस्या को लेकर प्रशासन से कई बार संपर्क किया। विधायक और मंत्रियों तक भी बात पहुंचाई गई, लेकिन जमीन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं दिखी। लोगों को सिर्फ तारीखें और आश्वासन मिलते रहे। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासनिक स्तर पर कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। न तो समय पर मशीनें उपलब्ध करवाई गईं और न ही पानी निकालने की कोई ठोस योजना बनी। इस लापरवाही ने गांव की परेशानी को और बढ़ा दिया।
एक ग्रामीण बताते हैं, “हमने हर जगह गुहार लगाई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। हमें लगा कि अब हमें खुद ही कुछ करना पड़ेगा, नहीं तो गांव बर्बाद हो जाएगा।”
राहत की शुरुआत: संत रामपाल जी महाराज का सहयोग
जब सभी प्रयास विफल हो गए, तब गांव की पंचायत ने संत रामपाल जी महाराज के पास मदद के लिए अर्जी लगाई। ग्रामीणों के अनुसार, इस अर्जी पर तुरंत कार्रवाई हुई और एक सप्ताह के भीतर गांव में राहत कार्य शुरू हो गया।

गांव में करीब 18,000 फुट लंबी पाइपलाइन और पांच 20 हॉर्स पावर की मोटरें भेजी गईं। इसके साथ ही जरूरी उपकरण जैसे केबल, स्टार्टर और अन्य सामान भी उपलब्ध कराया गया। खास बात यह रही कि इस पूरे काम के लिए गांव से एक भी रुपये की मांग नहीं की गई।
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तकनीकी समाधान: पाइपलाइन और मोटरों से निकला पानी
राहत कार्य के तहत गांव से करीब 17–18 किलोमीटर दूर नहर तक पाइपलाइन बिछाई गई। यह एक बड़ा तकनीकी समाधान था, जिसने लगातार जमा हो रहे पानी को बाहर निकालने में मदद की।
सेवादारों और गांव के लोगों ने मिलकर दिन-रात काम किया। मोटरों के जरिए पानी को खेतों से निकालकर नहर में डाला गया। यह काम लगातार कई दिनों तक चलता रहा, जिससे धीरे-धीरे खेत सूखने लगे।
एक किसान बताते हैं, “चार-पांच फुट पानी था, लेकिन मशीनें लगने के बाद कुछ ही दिनों में काफी पानी निकल गया। अब खेतों में काम शुरू हो गया है।”
जमीनी बदलाव: बंजर जमीन से फिर हरियाली तक
जहां पहले खेतों में सन्नाटा था, वहां अब ट्रैक्टरों की आवाज सुनाई दे रही है। पानी निकलने के बाद किसानों ने तेजी से गेहूं की बुवाई शुरू कर दी। लगभग पूरे गांव में खेती का काम फिर से शुरू हो चुका है। मोनू शर्मा बताते हैं, “अब लगभग पूरा पानी निकल चुका है। सिर्फ 10–15 किले जमीन में थोड़ा पानी बचा है, जो कुछ दिनों में खत्म हो जाएगा। समय पर बुवाई हो गई, यही सबसे बड़ी राहत है।” बाढ़ ने जहां गांव को निराशा में धकेल दिया था, वहीं इस राहत कार्य ने लोगों में नई उम्मीद जगा दी है। गांव के रास्ते फिर से खुल गए हैं और लोग सामान्य जीवन की ओर लौट रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि अब भविष्य के लिए भी एक स्थायी समाधान तैयार किया जा रहा है। पाइपलाइन को जमीन के नीचे दबाने की योजना है, ताकि भविष्य में ऐसी समस्या दोबारा न आए।
किसानों की आवाज: सीधे उनके शब्दों में
सत्यवान कहते हैं, “पहले हालात इतने खराब थे कि गांव में चलना भी मुश्किल था। अब सब कुछ बदल गया है। रास्ते खुल गए हैं, खेत सूख गए हैं और काम शुरू हो गया है।”
मोनू शर्मा बताते हैं, “हमारे गांव में जो मदद आई, उससे हमें बहुत राहत मिली। बिना किसी पैसे के इतना बड़ा काम हुआ, यह हमारे लिए बहुत बड़ी बात है।” एक अन्य किसान कहते हैं, “अगर यह मदद समय पर नहीं मिलती, तो हमारा पूरा साल खराब हो जाता। अब हमें उम्मीद है कि हमारी फसल अच्छी होगी।”
संत रामपाल जी महाराज का योगदान: समय पर और बिना भेदभाव के मदद
ग्रामीणों का मानना है कि इस पूरे संकट के समय संत रामपाल जी महाराज का सहयोग निर्णायक साबित हुआ। मदद न सिर्फ समय पर मिली, बल्कि पूरी तरह व्यवस्थित और तकनीकी रूप से प्रभावी भी थी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इस सहायता में किसी तरह का भेदभाव नहीं किया गया। हर किसान और हर परिवार को बराबर लाभ मिला।
संकट से उबरता मालवी गांव संत रामपाल जी महाराज जी की दया से
मालवी गांव की यह कहानी सिर्फ एक बाढ़ से राहत की नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयास और समय पर सहायता की ताकत की कहानी है। जहां प्रशासनिक व्यवस्था कमजोर साबित हुई, वहीं एक वैकल्पिक सहयोग ने गांव को नई दिशा दी। आज गांव के खेतों में फिर से हरियाली लौट रही है और किसानों के चेहरे पर उम्मीद दिखाई दे रही है। यह घटना बताती है कि सही समय पर लिया गया निर्णय और सही संसाधनों का उपयोग किसी भी बड़े संकट को टाल सकता है। संत रामपाल जी महाराज हर जरूरतमंद के साथ बिना किसी जात-पात या भेदभाव के खड़े रहते हैं।
वे सभी को समान रूप से अपनाते हैं और जहां कई जगह नक़ली धर्मगुरु जनता का पैसा ऐंठते हैं और अपनी पेटी भरते हैं, वहीं संत रामपाल जी महाराज जी ने गरीब, असहाय और जरूरतमंद लोगों के इलाज, घर निर्माण, शिक्षा और भोजन के लिए दोनों हाथों से धन लुटाया है। किसानों के लिए भी उन्होंने दिल खोलकर सहयोग किया है। ऐसा कार्य करना किसी सामान्य व्यक्ति के बस की बात नहीं है, इसलिए वे सिर्फ एक संत नहीं, बल्कि भगवान हैं।



