झज्जर के लोहारहेड़ी की ग्राउंड रिपोर्ट: पानी में डूबे खेतों से फिर लहलहाती फसल तक का सफर

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हरियाणा के झज्जर जिले के बहादुरगढ़ तहसील का छोटा सा गांव लोहारहेड़ी पिछले कुछ महीनों से एक ऐसी त्रासदी से गुजर रहा था, जिसने यहां के किसानों की कमर तोड़ दी थी। यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा की कहानी नहीं है, बल्कि उस संघर्ष, उम्मीद और बदलाव की कहानी है जिसे यहां के लोगों ने अपनी आंखों से देखा और जिया है।

यह रिपोर्ट उसी गांव की जमीन से तैयार की गई है, जहां कुछ समय पहले तक चार से पांच फुट तक सड़ा हुआ पानी भरा था और आज वहीं गेहूं की हरी-भरी फसल लहलहा रही है।

महीनों तक पानी में डूबा रहा गांव

लोहारहेड़ी के किसानों के लिए बीते सात-आठ महीने किसी बुरे सपने से कम नहीं थे। खेतों में पानी इस कदर भर गया था कि न केवल खेती ठप हो गई, बल्कि पशुओं को रखने तक की जगह नहीं बची थी। गांव के कई हिस्सों में हालात इतने खराब हो गए थे कि लोग रोजमर्रा की जिंदगी भी ठीक से नहीं जी पा रहे थे।

झज्जर लोहारहेड़ी में बाढ़ से राहत, संत रामपाल जी महाराज के आशीर्वाद से बदली तस्वीर

गांव के पंचायत सदस्य कर्मवीर बताते हैं, “तीन-चार फुट तक पानी भरा हुआ था। पूरे गांव के लगभग 350-400 किले जमीन पानी में डूब गई थी। धान की फसल पूरी तरह खराब हो गई थी और आगे गेहूं बोने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही थी।”

यह सिर्फ एक मौसम की मार नहीं थी, बल्कि लगातार बने रहे जलभराव ने जमीन की गुणवत्ता तक को प्रभावित करना शुरू कर दिया था। खेतों में सड़ा हुआ पानी खड़ा रहने से मिट्टी की उर्वरता पर भी खतरा मंडराने लगा था।

किसानों की आर्थिक स्थिति पर गहरा असर

लोहारहेड़ी की लगभग 60–65% आबादी खेती पर निर्भर है। ऐसे में फसल का नष्ट होना सीधे तौर पर उनकी आय और जीवन पर असर डालता है। किसानों के लिए यह सिर्फ नुकसान नहीं, बल्कि अस्तित्व का संकट बन गया था।

गांव के किसान दीपक बताते हैं, “अगर पानी नहीं निकलता तो 20–30% जमीन ही खेती के लायक बचती। बाकी सब ऐसे ही खाली रह जाती। हम पूरी तरह घाटे में चले जाते।”

धान की फसल का लगभग 80–90% नुकसान हो चुका था। कई किसानों ने कर्ज लेकर खेती की थी, लेकिन फसल बर्बाद होने से उनके सामने कर्ज चुकाने का संकट खड़ा हो गया। कुछ किसानों ने तो यह तक कहा कि अगर हालात ऐसे ही रहते, तो खेती छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।

प्रशासनिक उदासीनता से बढ़ी परेशानी

जब हालात बिगड़ने लगे, तो गांव के लोग प्रशासन के पास भी पहुंचे। लेकिन किसानों के अनुसार, उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिले।

कर्मवीर बताते हैं, “हम कई बार सरकारी दफ्तरों में गए, लेकिन हर बार टाल-मटोल ही हुआ। कोई ठोस मदद नहीं मिली। सरकार ने हमारी हालत की सुध तक नहीं ली।” यह आरोप सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे गांव के लोगों का साझा अनुभव है। किसानों का कहना है कि अगर समय पर सरकारी स्तर पर कोई ठोस कदम उठाया जाता, तो नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता था।

राहत की शुरुआत: जब गांव में पहुंची मदद

ऐसे निराशाजनक माहौल में गांव में एक नई उम्मीद तब जगी, जब संत रामपाल जी महाराज की ओर से सहायता पहुंची।

गांव में राहत सामग्री के साथ जो काफिला पहुंचा, उसका स्वागत किसी उत्सव से कम नहीं था। ट्रैक्टरों पर सवार ग्रामीण, ढोल-नगाड़ों की आवाज और फूलों की बारिश—यह सब उस राहत की खुशी को दर्शा रहा था, जिसका गांव को लंबे समय से इंतजार था। राहत कार्य के तहत लगभग 14,000 फुट लंबी 8 इंच की पाइपलाइन और दो 15 एचपी की मोटरें गांव को दी गईं। इसके साथ ही स्टार्टर, वाल्व और अन्य जरूरी उपकरण भी उपलब्ध कराए गए।

झज्जर लोहारहेड़ी में बाढ़ से राहत, संत रामपाल जी महाराज के आशीर्वाद से बदली तस्वीर

यह भी पढ़ें: संत रामपाल जी महाराज ने विशाल राहत सामग्री भेजकर लोहारहेड़ी गांव में 8 महीने से जारी जलभराव के संकट को किया समाप्त

 तकनीकी समाधान: कैसे निकला पानी

यह राहत सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं थी, बल्कि पूरी तरह तकनीकी और योजनाबद्ध थी। पाइपलाइन को इस तरह बिछाया गया कि खेतों में जमा पानी को दूर तक निकाला जा सके। गांव के एक किसान बताते हैं, “पाइप और मोटर लगाकर लगातार पानी बाहर निकाला गया। कुछ ही दिनों में खेतों से सारा पानी हट गया। फिर हमने दोबारा बुवाई की।” लगातार दिन-रात काम करके सेवादारों और गांववालों ने मिलकर उस जिद्दी पानी को गांव से बाहर निकाला, जो महीनों से किसानों के लिए अभिशाप बना हुआ था।

जमीनी बदलाव: बर्बादी से खुशहाली तक

आज जब लोहारहेड़ी के खेतों में खड़े होते हैं, तो यकीन करना मुश्किल होता है कि यही जगह कुछ समय पहले पानी में डूबी हुई थी। जहां पहले सन्नाटा और निराशा थी, वहीं अब ट्रैक्टरों की आवाज और किसानों की मुस्कान दिखाई देती है। खेतों में गेहूं की फसल लहलहा रही है और सिंचाई का पानी अब जीवनदायी बन चुका है।

राजवीर नाम के एक बुजुर्ग किसान कहते हैं, “पहले यही पानी दुश्मन था, अब यही पानी फसल को जीवन दे रहा है। करीब 90% राहत मिल चुकी है।”

किसानों की आवाज: सीधे खेतों से

लोहारहेड़ी के किसानों की बातों में राहत और संतोष साफ झलकता है।

एक किसान कहते हैं, “हम तो खत्म हो गए थे। कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। लेकिन जब मदद मिली, तो जैसे नई जिंदगी मिल गई।” दूसरे किसान जोड़ते हैं, “अगर यह मदद नहीं मिलती, तो हम खेती नहीं कर पाते। अब 90% जमीन पर बुवाई हो चुकी है।” किसानों का यह भी कहना है कि यह मदद बिना किसी भेदभाव के दी गई और इसमें किसी प्रकार का आर्थिक बोझ उन पर नहीं डाला गया।

सामाजिक असर: गांव में लौटी उम्मीद

इस पूरी घटना का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे गांव के सामाजिक ढांचे पर भी पड़ा है। जहां पहले लोग निराश और हताश थे, वहीं अब गांव में एक नई ऊर्जा दिखाई देती है। युवा और बुजुर्ग दोनों ही इस बदलाव को अपने जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ मानते हैं। गांव के एक बुजुर्ग कहते हैं, “सर छोटूराम के बाद अगर किसी ने किसानों का दर्द समझा है, तो वह यही हैं। आज गांव का हर व्यक्ति खुश है।”

एक मिसाल बनता लोहारहेड़ी संत रामपाल जी महाराज के आशीर्वाद से 

लोहारहेड़ी की यह कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं है, बल्कि यह दिखाती है कि समय पर की गई सही मदद और तकनीकी समाधान किस तरह हालात बदल सकते हैं। महीनों तक पानी में डूबे रहने के बाद आज यह गांव फिर से खड़ा हो गया है। किसानों ने अपनी जमीन को फिर से जिंदा किया है और आने वाले समय के लिए उम्मीद भी जगाई है।

यह घटना यह भी सवाल खड़ा करती है कि क्या ऐसी परिस्थितियों में प्रशासन को और सक्रिय नहीं होना चाहिए था। संत रामपाल जी महाराज का सहयोग सिर्फ इस एक संकट तक सीमित नहीं है, बल्कि वे हर जरूरतमंद के साथ बिना किसी जात-पात या भेदभाव के खड़े होते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि उन्होंने कभी किसी से यह नहीं पूछा कि वह किस वर्ग या समुदाय से है, बल्कि हर व्यक्ति को समान रूप से अपनाया।

आज के समय में जहां कई तथाकथित संत सेवा के नाम पर पैसे लेते हैं, वहीं महाराज जी बिना किसी स्वार्थ के मदद करते हैं। गरीब, असहाय और बेसहारा लोगों के इलाज से लेकर घर बनाने, शिक्षा और भोजन तक की व्यवस्था करते हैं, और किसानों के लिए भी खुलकर आर्थिक सहयोग देते हैं। वे असाधारण संत हैं आज हर कोई उनके समक्ष नतमस्तक है वे साक्षात कबीर परमेश्वर के अवतार हैं।

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