हरियाणा के झज्जर जिले की बहादुरगढ़ तहसील का गांव कानौंदा पिछले कई वर्षों से जलभराव की गंभीर समस्या से जूझ रहा था। यह केवल एक मौसमी परेशानी नहीं थी, बल्कि एक स्थायी संकट बन चुकी थी जिसने खेती, आजीविका और गांव के सामाजिक ढांचे को गहराई से प्रभावित किया। इस ग्राउंड रिपोर्ट में हम उस पूरी स्थिति को समझते हैं—कैसे बाढ़ ने गांव को तबाह किया, किसानों की हालत क्या रही, और कैसे एक संगठित राहत प्रयास ने हालात बदल दिए।
वर्षों से जलभराव: 300–400 एकड़ जमीन बेकार
कानौंदा गांव के लगभग 300 से 400 एकड़ खेत लगातार 3 से 4 वर्षों तक पानी में डूबे रहे। कई हिस्सों में पानी की गहराई 4 से 5 फुट तक पहुंच गई थी। यह पानी सिर्फ बारिश का नहीं था, बल्कि निकासी के अभाव में जमा होकर सड़ने लगा था, जिससे जमीन की उपजाऊ क्षमता भी प्रभावित हो रही थी।
ग्रामीणों के अनुसार, खेतों में खड़े इस पानी ने पूरी कृषि प्रणाली को ठप कर दिया। धान की फसलें सड़ गईं, गेहूं की बुवाई नहीं हो पाई, और कई खेत पूरी तरह बंजर जैसे दिखने लगे।
प्रशासनिक स्तर पर विफलता: शिकायतें, लेकिन समाधान नहीं
गांव के लोगों ने इस समस्या को लेकर कई बार प्रशासन से संपर्क किया। लिखित शिकायतें दी गईं, विभागों के चक्कर लगाए गए, लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं मिला।
स्थानीय किसानों का कहना है कि उन्हें अलग-अलग अधिकारियों के पास भेजा जाता रहा—कभी एसडीओ, कभी अन्य विभाग—लेकिन महीनों तक प्रयास करने के बावजूद न तो जल निकासी की व्यवस्था हुई और न ही कोई ठोस योजना सामने आई। यह स्थिति किसानों के लिए और भी निराशाजनक हो गई, क्योंकि हर साल नुकसान बढ़ता जा रहा था।
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किसानों पर आर्थिक मार: 90% तक नुकसान
जलभराव का सीधा असर किसानों की आय पर पड़ा।
- कई किसानों की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई
- कुछ किसानों ने कर्ज लेकर खेती की थी, जो डूब गया
- डीजल खर्च कर पानी निकालने की कोशिश भी असफल रही
एक किसान के अनुसार, “पिछले साल एक दाना भी नहीं हुआ। पूरा खेत खाली पड़ा रहा।”
दूसरे किसान ने बताया कि लगभग 90% तक नुकसान हो रहा था, जिससे परिवार चलाना मुश्किल हो गया था।
जमीनी हालात: खेती छोड़ने को मजबूर किसान
स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि कई किसानों ने अपनी जमीन पर खेती करना ही छोड़ दिया। कुछ ने जमीन ठेके पर दे दी, जबकि कुछ ने उसे यूं ही खाली छोड़ दिया।
ग्रामीण बताते हैं कि लगातार नुकसान और अनिश्चितता के कारण लोगों का खेती से भरोसा उठने लगा था। गांव की अर्थव्यवस्था, जो पूरी तरह कृषि पर आधारित थी, धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही थी।
राहत की शुरुआत: स्थानीय स्तर पर पहल
जब प्रशासनिक स्तर पर समाधान नहीं मिला, तब गांव के कुछ लोगों ने वैकल्पिक रास्ता अपनाया और संत रामपाल जी महाराज से संपर्क किया।
ग्रामीणों के अनुसार, वहां से प्रतिक्रिया तुरंत मिली। समस्या को समझने के बाद राहत सामग्री भेजने का निर्णय लिया गया और बहुत कम समय में इसकी व्यवस्था कर दी गई।
राहत सामग्री और तकनीकी व्यवस्था
गांव में जो सहायता पहुंचाई गई, वह केवल प्रतीकात्मक नहीं थी बल्कि पूरी तरह तकनीकी समाधान पर आधारित थी।

मुख्य रूप से उपलब्ध कराए गए संसाधन:
- 310 एचपी क्षमता की मोटरें
- लगभग 7500 फुट लंबी 8 इंच व्यास की पाइपलाइन
- स्टार्टर, नट-बोल्ट और अन्य आवश्यक उपकरण
इन संसाधनों को इस तरह व्यवस्थित किया गया कि पानी को सबसे निचले हिस्से से बाहर निकाला जा सके।
लगातार काम और तेज परिणाम, 150–200 एकड़ जमीन फिर उपयोग में
मोटरों को स्थापित कर लगातार चलाया गया। दिन-रात चले इस अभियान के कारण वर्षों से जमा पानी कुछ ही समय में बाहर निकाल दिया गया। ग्राउंड विजिट के दौरान देखा गया कि जिन खेतों में पहले 4–5 फुट पानी भरा था, वहां अब ट्रैक्टर चल रहे हैं और जुताई हो रही है।
राहत कार्य के बाद लगभग 150 से 200 एकड़ जमीन दोबारा खेती योग्य बन गई।
- लगभग 80% क्षेत्र में गेहूं की बुवाई हो चुकी है
- कुछ जगहों पर फसल उगने लगी है
- किसानों ने अगली फसल के लिए तैयारी शुरू कर दी है
यह बदलाव गांव के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ है।
किसानों की आवाज: जमीनी हकीकत से निकली प्रतिक्रियाएं
ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान गांव कानौंदा के किसानों से बात करने पर साफ महसूस हुआ कि यह बदलाव उनके लिए केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि जीवन की दिशा बदलने जैसा है। अलग-अलग किसानों ने अपने अनुभव साझा करते हुए पिछले वर्षों के दर्द और वर्तमान राहत—दोनों को खुलकर रखा।
गांव के किसान नरेंद्र बताते हैं कि बीते साल हालात इतने खराब थे कि खेतों से एक दाना तक नहीं निकला। पूरी जमीन बेकार पड़ी रही। लेकिन अब जब पानी पूरी तरह निकल चुका है, तो वही जमीन दोबारा खेती के लायक बन गई है। उनके अनुसार, इस बार गांव को सीधा आर्थिक फायदा होगा और खेती फिर से पटरी पर लौटेगी।
श्याम, प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि उन्होंने महीनों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाए, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई। हर बार उन्हें एक नए अधिकारी या विभाग के पास भेज दिया जाता था। इसके विपरीत, जब उन्होंने मदद के लिए दूसरे माध्यम का सहारा लिया, तो महज एक दिन के भीतर समाधान सामने आ गया। उनके शब्दों में, यह फर्क ही सबसे बड़ा अनुभव रहा।
कुलवंत का कहना है कि इस बार सिर्फ अस्थायी तौर पर पानी नहीं निकाला गया, बल्कि पाइपलाइन की ऐसी व्यवस्था की गई है जो आगे भी जलभराव को रोकेगी। यानी आने वाले समय में किसानों को हर साल इस समस्या से नहीं जूझना पड़ेगा।
मंजीत बताते हैं कि पहले हालात ऐसे थे कि जो फसल बोई जाती थी, वह पानी में सड़ जाती थी और कटाई तक पहुंच ही नहीं पाती थी। लेकिन अब जब खेत सूखे हैं, तो गेहूं की फसल अच्छी होने की पूरी उम्मीद है। उनके अनुसार, इस बार उत्पादन भी बेहतर रहेगा और नुकसान की जगह फायदा दिखाई देगा।
सामाजिक और आर्थिक प्रभाव
इस पूरे घटनाक्रम का प्रभाव केवल कृषि तक सीमित नहीं रहा।
- गांव की आर्थिक गतिविधियां फिर से शुरू हुईं
- किसानों में आत्मविश्वास लौटा
- कर्ज चुकाने की उम्मीद बनी
- गांव में सकारात्मक माहौल बना
एक स्थानीय स्कूल संचालक के अनुसार, कुछ किसान इतने परेशान थे कि जीवन संकट में था, लेकिन अब उनकी स्थिति में सुधार हुआ है।
सेवा और समर्थन का दृष्टिकोण
ग्रामीणों ने इस सहायता को महत्वपूर्ण इसलिए भी माना क्योंकि यह बिना किसी भेदभाव के दी गई। उनका कहना है कि सभी किसानों—चाहे वे किसी भी जाति या वर्ग के हों—को समान रूप से मदद मिली। इससे गांव में सामाजिक एकता भी मजबूत हुई है।
संकट से समाधान तक संत रामपाल जी महाराज जी का साथ
कानौंदा गांव की यह स्थिति दर्शाती है कि जलभराव जैसी समस्याएं केवल प्राकृतिक नहीं होतीं, बल्कि प्रबंधन और व्यवस्था से भी जुड़ी होती हैं। हालांकि प्रारंभिक स्तर पर प्रशासनिक समाधान नहीं मिल पाया, लेकिन बाद में किए गए संगठित प्रयासों ने यह साबित किया कि सही संसाधन और योजना के साथ समस्या का समाधान संभव है। आज गांव में फिर से खेती शुरू हो चुकी है, किसान भविष्य के प्रति आश्वस्त हैं, और एक लंबे समय से चला आ रहा संकट काफी हद तक खत्म हो गया है।
इस पूरे घटनाक्रम में ग्रामीणों ने एक और महत्वपूर्ण बात बार-बार कही—कि संत रामपाल जी महाराज की सेवा भावना किसी भेदभाव में बंधी हुई नहीं है। गांव के लोगों के अनुसार, उन्होंने बिना जात-पात, ऊंच-नीच या किसी सामाजिक विभाजन के हर जरूरतमंद के साथ खड़े होकर मदद पहुंचाई। जहां कई तथाकथित संतों पर लोगों से धन लेने के आरोप लगते हैं, वहीं ग्रामीणों का कहना है कि यहां सहायता उलटी दिशा में जाती दिखी—गरीब, असहाय और जरूरतमंद लोगों के लिए इलाज, घर निर्माण, शिक्षा और भोजन जैसी मूलभूत जरूरतों में सहयोग दिया गया, साथ ही किसानों के संकट के समय आर्थिक और तकनीकी मदद भी उपलब्ध कराई गई।
ग्रामीणों के शब्दों में, यह केवल धार्मिक या आध्यात्मिक भूमिका तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यवहारिक स्तर पर समाज के कमजोर वर्गों के लिए सहारा बनकर सामने आया—एक ऐसा योगदान जिसे वे असाधारण और सामान्य व्यक्तियों की क्षमता से परे मानते हैं।



