संत रामपाल जी महाराज से ज्ञानपुरा को नई जीवनधारा, 20 दिनों की जल त्रासदी से जूझता ज्ञानपुरा

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हरियाणा के हिसार जिले की बरवाला तहसील स्थित ज्ञानपुरा गांव हाल ही में भीषण जलभराव की समस्या से जूझ रहा था। लगातार हुई प्राकृतिक वर्षा और जल निकासी की व्यवस्था ठप होने के कारण गांव के लगभग 1500 एकड़ क्षेत्र में पानी भर गया था। इनमें से 800 से 900 एकड़ भूमि पर छह से सात फीट तक पानी खड़ा था। खेत तालाब बन चुके थे और खड़ी फसल पूरी तरह नष्ट हो गई थी। ग्रामीणों के अनुसार स्थिति इतनी गंभीर थी कि अगली फसल की बुवाई की कोई संभावना नजर नहीं आ रही थी।

किसानों की आजीविका पूरी तरह कृषि पर निर्भर है। पशुओं के चारे से लेकर परिवारों के पालन-पोषण तक का आधार खेत ही हैं। जलभराव के कारण न केवल अनाज की फसलें चौपट हुईं, बल्कि हरे चारे की कमी से पशुपालन भी प्रभावित हुआ। गांव के सरपंच मनजीत सिंह ने बताया कि इस संकट की घड़ी में ग्रामीणों ने प्रशासनिक अधिकारियों—डीसी, एडीसी और एसडीएम—से गुहार लगाई, किंतु त्वरित राहत नहीं मिल सकी। निराशा का माहौल गहराने लगा था।

आखिरी उम्मीद बनी अन्नपूर्णा मुहिम

हिसार के ज्ञानपुरा गांव में संत रामपाल जी महाराज ने जलभराव हटवाकर गेहूं बुवाई कराई

इसी बीच सरपंच मनजीत सिंह को संत रामपाल जी महाराज द्वारा संचालित अन्नपूर्णा मुहिम की जानकारी मिली। वे अपनी मांगों का लिखित विवरण लेकर बरवाला पहुंचे। ग्रामीणों के अनुसार उन्होंने जल निकासी के लिए मोटर, पाइप और अन्य तकनीकी संसाधनों की आवश्यकता स्पष्ट रूप से बताई। गांववासियों को उम्मीद थी कि शायद सहायता मिल जाए, किंतु उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि प्रतिक्रिया इतनी शीघ्र होगी।

ग्रामीणों के बयान के अनुसार संत रामपाल जी महाराज ने अन्नपूर्णा मुहिम के माध्यम से 24 घंटे के भीतर राहत सामग्री उपलब्ध कराने का निर्णय लिया। लगभग 20 घंटे के अंदर ज्ञानपुरा गांव में पांच मोटरें, प्रत्येक 20 हॉर्स पावर क्षमता की, 8 इंच व्यास के लगभग 20 फीट लंबे पाइपों की बड़ी खेप, लगभग 20,000 फुट पाइपलाइन, 600 फुट केबल और संचालन के लिए आवश्यक उपकरण पहुंचा दिए गए। बाद में आवश्यकता अनुसार अतिरिक्त पाइप भी उपलब्ध कराए गए।

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सामूहिक प्रयास से बदली तस्वीर

राहत सामग्री पहुंचने के बाद गांव में सामूहिक श्रम की मिसाल देखने को मिली। स्थानीय लोगों ने दिन-रात मेहनत कर मोटरों को स्थापित किया और लगातार पानी निकासी का कार्य शुरू किया। ग्रामीण समाजसेवी ओमप्रकाश ने बताया कि मोटर संचालन और पाइपलाइन बिछाने में तकनीकी अनुभव रखने वाले युवाओं और कर्मचारियों ने सक्रिय भूमिका निभाई। लगातार पंपिंग के परिणामस्वरूप कुछ ही दिनों में जलभराव कम होने लगा।

लगभग पंद्रह दिनों के अथक प्रयास के बाद अधिकांश खेतों से पानी पूरी तरह निकल गया। जहां कुछ सप्ताह पहले तक पानी का सफेद विस्तार दिखाई देता था, वहां अब मिट्टी सूख चुकी थी। गांव के किसानों ने तुरंत गेहूं की बुवाई शुरू की। सरपंच के अनुसार करीब 700 एकड़ क्षेत्र में बुवाई पूर्ण हो चुकी है और शेष भूमि पर भी बुवाई प्रक्रिया जारी है। ग्रामीणों को विश्वास है कि शेष खेतों में भी शीघ्र ही फसल बो दी जाएगी।

किसानों के चेहरे पर लौटी मुस्कान

ज्ञानपुरा में अब हरियाली का दृश्य साफ दिखाई देता है। गेहूं के नन्हे पौधे खेतों में उग आए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते जल निकासी न होती तो कम से कम एक वर्ष तक खेती ठप रहती। कई किसानों ने बताया कि उनकी कपास, बाजरा और अन्य फसलें पूरी तरह नष्ट हो चुकी थीं। ऐसे में अगली बुवाई भी असंभव हो जाती तो परिवारों के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो जाता।

गांव के बुजुर्ग किसानों ने स्वीकार किया कि यह राहत उनके लिए जीवनदान समान है। उनका कहना है कि खेती से ही दूध, दही और अनाज की आपूर्ति होती है, जो हरियाणा की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। जलभराव से पशुपालन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा था, किंतु अब स्थिति सामान्य होने लगी है।

प्रशासनिक प्रयासों की पृष्ठभूमि

ग्रामीणों ने बताया कि संकट के दौरान प्रशासनिक स्तर पर भी कुछ प्रयास हुए, किंतु संसाधनों की उपलब्धता सीमित रही। मुख्यमंत्री के संभावित दौरे से पूर्व कुछ मोटरें लगाई गईं, परंतु स्थायी समाधान नहीं मिल पाया। इसके विपरीत संत रामपाल जी महाराज ने अन्नपूर्णा मुहिम के माध्यम से आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए, जिससे स्थायी जल निकासी संभव हो सकी। ग्रामीणों का मानना है कि त्वरित निर्णय और पर्याप्त उपकरण उपलब्ध होना इस सफलता का प्रमुख कारण रहा।

दीर्घकालिक उपयोग और आत्मनिर्भरता

विशेषज्ञों के अनुसार उच्च क्षमता की मोटरें और लंबी पाइपलाइन केवल आपातकालीन राहत तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि भविष्य में सिंचाई और जल प्रबंधन में भी सहायक सिद्ध हो सकती हैं। ज्ञानपुरा के किसान अब इन्हीं संसाधनों का उपयोग खेतों की सिंचाई के लिए भी कर रहे हैं। इससे न केवल वर्तमान फसल सुरक्षित हुई है, बल्कि भविष्य में जलभराव की स्थिति से निपटने की तैयारी भी मजबूत हुई है।

ग्रामीणों ने बताया कि इस पूरे अभियान में गांव के युवाओं, किसानों और समाजसेवियों ने मिलकर काम किया। सामूहिक श्रम, तकनीकी संसाधन और त्वरित सहायता ने मिलकर आपदा को अवसर में बदलने का कार्य किया।

सामाजिक प्रभाव और संदेश

ज्ञानपुरा की यह घटना ग्रामीण एकजुटता और त्वरित राहत व्यवस्था का उदाहरण बनकर सामने आई है। संकट की घड़ी में जहां निराशा गहराने लगी थी, वहीं समय पर मिली सहायता ने गांव की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित कर दिया। ग्रामीणों ने सार्वजनिक रूप से संत रामपाल जी महाराज का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस पहल से न केवल फसल बची, बल्कि सैकड़ों परिवारों का भविष्य सुरक्षित हुआ।

ज्ञानपुरा की हरी-भरी फसलें इस बात की गवाही दे रही हैं कि पूर्ण संत के आशीर्वाद से किसी भी प्राकृतिक आपदा से बचा जा सकता है। बीते दिनों की जल त्रासदी अब खेतों में लहलहाती गेहूं की फसल में बदल चुकी है, जो गांव की नई शुरुआत का प्रतीक है।

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