हरियाणा के झज्जर जिले का छोटा सा गांव गंगड़वा, कुछ समय पहले तक एक ऐसी त्रासदी से गुजर रहा था जिसने पूरे गांव की रफ्तार ही रोक दी थी। यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं थी, बल्कि एक ऐसी स्थिति थी जिसने लोगों की उम्मीदें, मेहनत और भविष्य सब कुछ डुबो दिया था। गांव के खेत, जो कभी हरी-भरी फसलों से लहलहाते थे, अब 6 से 7 फुट गहरे काले पानी में डूबे पड़े थे। स्कूल, रास्ते, घर—सब कुछ पानी के नीचे था।
करीब 3000 बीघा जमीन पूरी तरह जलमग्न हो चुकी थी। गांव का जीवन जैसे ठहर गया था। खेतों में खड़ी फसलें पूरी तरह नष्ट हो चुकी थीं और किसानों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया था। यह वह समय था जब सरकारी सहायता भी अपर्याप्त साबित हो रही थी और गांव के लोग निराशा के अंधेरे में डूबते जा रहे थे।
डूबती फसलें और बढ़ती मुश्किलें
गंगड़वा गांव के किसानों के लिए यह बाढ़ किसी आपदा से कम नहीं थी। धान की फसल, जो किसानों की साल भर की मेहनत का परिणाम होती है, पूरी तरह खत्म हो गई। खेतों में जमा पानी ने मिट्टी की उर्वरता को भी नुकसान पहुंचाया।
गांव के चारों तरफ पानी ही पानी था। आने-जाने के रास्ते बंद हो चुके थे। पशुओं के लिए चारा नहीं था और लोगों को रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो गया था।
किसानों के अनुसार, “ऐसा लग रहा था जैसे गांव पूरी तरह बेरोजगार हो गया हो।” अगर यह स्थिति लंबे समय तक रहती, तो लोगों को बाहर से अनाज और चारा खरीदना पड़ता, जिससे कर्ज का बोझ और बढ़ जाता।
किसानों की पीड़ा: “भूखे मरने की नौबत आ गई थी”
गांव के किसान नीरज बताते हैं कि पानी इतना ज्यादा था कि पूरे गांव में सिर्फ 20-25 एकड़ जमीन ही बची थी, बाकी सब डूब चुकी थी। एक अन्य किसान सुरेंद्र कहते हैं कि वे “बहुत ज्यादा दुखी थे” और भविष्य पूरी तरह अंधकारमय नजर आ रहा था।
देवराज नाम के किसान ने अपनी पीड़ा बताते हुए कहा कि अगर समय पर मदद नहीं मिलती, तो “एक दाना भी पैदा नहीं होता और गांव में भूखा मरने की स्थिति बन जाती।” गांव के बुजुर्गों का कहना था कि यह सिर्फ फसल का नुकसान नहीं था, बल्कि पूरे गांव के अस्तित्व पर संकट था।
यह भी पढ़े: तालाब बन चुके स्कूल, सड़ चुके खेत — गंगड़वा में संत रामपाल जी महाराज ने लौटाई ज़िंदगी
मदद की उम्मीद: एक प्रार्थना और बड़ा बदलाव
जब हर तरफ से निराशा हाथ लगी, तब गांव के किसानों ने संत रामपाल जी महाराज से मदद मांगने का फैसला किया। वे बरवाला पहुंचे और पानी निकालने के लिए मोटर और पाइप की मांग करते हुए एक प्रार्थना पत्र दिया। किसी को उम्मीद नहीं थी कि इतनी जल्दी और इतने बड़े स्तर पर मदद मिलेगी। लेकिन कुछ ही दिनों में स्थिति बदल गई।
राहत कार्य: मशीनों ने बदली तस्वीर
कुछ ही समय में गांव में मदद का एक बड़ा काफिला पहुंचा। इस सहायता में शामिल थे:

- 8 शक्तिशाली मोटरें
- 5 15 हॉर्स पावर की पनडुब्बी मोटर
- 3 15 हॉर्स पावर की मोनोब्लॉक मोटर
- 8000 फुट लंबे उच्च गुणवत्ता वाले पाइप
- स्टार्टर, केबल और अन्य जरूरी उपकरण
इन मशीनों ने दिन-रात काम करके गांव से पानी बाहर निकालना शुरू किया। यह काम आसान नहीं था, लेकिन लगातार प्रयासों से वह जिद्दी पानी आखिरकार गांव की सीमाओं से बाहर निकाल दिया गया।
बर्बादी से बहार: फिर मुस्कुराए खेत
जहां पहले सन्नाटा था, वहां अब ट्रैक्टरों की आवाज गूंजने लगी। जिन खेतों में पानी भरा था, वहां अब गेहूं की फसल लहलहा रही है। करीब 100 एकड़ जमीन को छोड़कर बाकी लगभग पूरी जमीन पर दोबारा बुवाई हो चुकी है। किसानों के चेहरे पर फिर से मुस्कान लौट आई है। गांव के लोगों का कहना है कि यह सिर्फ पानी निकालने का काम नहीं था, बल्कि यह उनके जीवन को दोबारा पटरी पर लाने जैसा था।
गांव की आवाज: “जीने का सहारा मिल गया”
गांव के लोगों की प्रतिक्रियाएं इस बदलाव की गवाही देती हैं।
- “अब गांव पूरी तरह ठीक हो गया है।”
- “हर घर में खुशी है।”
- “रोटी खाने का काम हो गया।”
सरपंच प्रतिनिधि अनीता ने भी कहा कि अब खेतों में फिर से बुवाई हो चुकी है और गांव में खुशहाली लौट आई है।
बुजुर्गों का कहना है कि अगर यह मदद नहीं मिलती, तो गांव पूरी तरह तबाह हो जाता।
सामाजिक प्रभाव: गांव की ज़िंदगी ने फिर पकड़ी रफ्तार
इस आपदा का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने पूरे गांव के जीवन को झकझोर कर रख दिया था। जब खेत डूबे, तो केवल फसलें ही नहीं, बल्कि लोगों की रोज़ी-रोटी, दिनचर्या और उम्मीदें भी पानी में समा गई थीं। लेकिन जैसे-जैसे पानी निकला और हालात सुधरे, वैसे-वैसे गांव ने खुद को फिर से खड़ा करना शुरू किया।
सबसे पहले असर आर्थिक स्थिति पर पड़ा। जिन किसानों की फसल पूरी तरह नष्ट हो चुकी थी, उनके सामने जीवनयापन का कोई साधन नहीं बचा था। लेकिन दोबारा बुवाई शुरू होने से उन्हें फिर से कमाई का रास्ता मिला। जो लोग कर्ज और उधारी के डर में जी रहे थे, उन्हें एक राहत मिली कि अब वे अपनी मेहनत से हालात सुधार सकते हैं।
इसके साथ ही गांव का सामाजिक जीवन भी धीरे-धीरे पटरी पर लौटने लगा। जहां पहले चारों तरफ पानी और सन्नाटा था, वहां अब लोगों की आवाजाही, खेतों में काम और रोजमर्रा की गतिविधियां फिर से दिखाई देने लगीं। लोग अपने काम पर लौटे, आपसी बातचीत और सहयोग का माहौल फिर से जीवंत हो उठा।
पशुपालन, जो गांव की अर्थव्यवस्था का एक अहम हिस्सा है, वह भी इस आपदा में बुरी तरह प्रभावित हुआ था। चारे की भारी कमी के कारण पशुओं को बचाना मुश्किल हो रहा था। लेकिन हालात सुधरने के बाद फिर से चारे की व्यवस्था संभव हो पाई और पशुधन सुरक्षित रहने लगा।
सबसे महत्वपूर्ण बदलाव लोगों के मनोबल में देखने को मिला। जो लोग कुछ समय पहले तक पूरी तरह निराश और टूट चुके थे, उनके अंदर अब फिर से उम्मीद जाग उठी। चेहरे पर मुस्कान लौटी, और यह विश्वास भी कि मुश्किलें चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, अगर साथ और सहारा मिल जाए तो उनसे बाहर निकला जा सकता है।
सेवा की मिसाल: निस्वार्थ सहायता का प्रभाव
गंगड़वा गांव के लोगों के अनुसार, जब व्यवस्था उन्हें उनके हाल पर छोड़ चुकी थी, तब संत रामपाल जी महाराज की सहायता उनके लिए संजीवनी साबित हुई। ग्रामीणों का कहना है कि यह सिर्फ तकनीकी मदद नहीं थी, बल्कि एक ऐसी सेवा थी जिसने पूरे गांव को डूबने से बचा लिया। उनकी सेवा भावना और समय पर की गई मदद ने यह साबित कर दिया कि सच्ची सहायता वही है जो बिना किसी स्वार्थ के जरूरत के समय दी जाए।
गांव के लोगों के बीच एक बात बार-बार सुनने को मिली कि संत रामपाल जी महाराज ने बिना किसी जात-पात या भेदभाव के हर जरूरतमंद के साथ खड़े होकर इंसानियत की मिसाल पेश की है। ग्रामीणों का कहना है कि जहां कई तथाकथित संत मदद के नाम पर लोगों से धन लेते हैं, वहीं संत रामपाल जी महाराज जरूरत के समय अपने दोनों हाथों से सहायता देते नजर आते हैं। चाहे गरीब और असहाय लोगों का इलाज हो, उनके लिए घर बनवाना हो, बच्चों की शिक्षा का प्रबंध करना हो या भूखे को भोजन देना—हर क्षेत्र में उनकी सेवा भावना दिखाई देती है।
किसानों के लिए भी उन्होंने जिस तरह खुलकर मदद पहुंचाई, उसने गांव के लोगों के दिलों में गहरी छाप छोड़ी है। अब ग्रामीण भावुक होकर यह भी कहते हैं कि इतनी निस्वार्थ सेवा एक सामान्य व्यक्ति के बस की बात नहीं लगती, संत रामपाल जी महाराज जी भगवान हैं।



