विश्व पर्यावरण दिवस 2020: कैसे हुई World Environment Day की शुरुआत?

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मानव और पर्यावरण एक दूसरे को प्रभावित करने वाले कारक हैं। पर्यावरण के प्रति जागरूकता और राजनीतिक चेतना विकसित करने के लिए पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। प्रत्येक देश में विभिन्न संस्थाओं द्वारा इसे मनाया जाता है साथ ही प्रति वर्ष किसी एक देश द्वारा आयोजित किया जाता है। जानिए विश्व पर्यावरण दिवस 2020 थीम के बारे में.

मुख्य बिंदु

  • पर्यावरण दिवस आज 5 जून 2020 को।
  • Environment Day 2020 की थीम है- जैव विविधता।
  • 1972 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में सबसे पहली बार मनाया गया।
  • संयुक्त राष्ट्र द्वारा किया गया आयोजित।
  • 1974 से देश विशेष में मनाया जाता है पर्यावरण दिवस।

World Environment Day की शुरुआत

वर्ष 1972 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा पर्यावरण दिवस सम्मेलन स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में हुआ। सम्मेलन के दौरान भारत की ओर से इंदिरा गांधी ने पर्यावरण की बिगड़ी स्थिति और उसके विश्व पर प्रभाव के विषय में व्याख्यान दिया था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण की ओर यह भारत का पहला कदम माना गया।

1974 से संयुक्त राष्ट्र संघ ने इसे प्रतिवर्ष मनाने की घोषणा की जिसमें पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं और उनके समाधान की ओर ध्यान आकर्षित किया जा सके। 1987 से हर बार अलग देश को सम्मेलन का केंद्र बनाने पर विचार हुआ और प्रत्येक वर्ष अलग देश इस सम्मेलन की मेजबानी करता है। प्रति वर्ष लगभग 143 देश इसमें हिस्सा लेते हैं।

अधिक जानकारी के लिए देखें पिछला ब्लॉग: विश्व पर्यावरण दिवस पर जानिए पर्यावरण बचाने में हम क्या कर सकते हैं?

पर्यावरण दिवस 2020 पर थीम

विश्व पर्यावरण दिवस 2020 थीम: वर्तमान में पर्यावरण में अनेकों समस्याएं मौजूद हैं अतः प्रत्येक वर्ष अलग अलग थीमों के तहत इसे आयोजित किया जाता है। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी थीम के तहत पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है। इस वर्ष की थीम जैव विविधता है जिसका आयोजन जर्मनी की साझेदारी में कोलंबिया में हो रहा है।

जैव विविधता क्या है?

जैव विविधता या Biodiversity दो शब्दों से मिलकर बना है- जैव और विविधता इसका अर्थ पृथ्वी पर जीवों व वनस्पति प्रजातियों में पाई जाने वाली विभिन्नता से है। जैव विविधता का संरक्षण और संतुलन होना मानव जीवन के लिए बहुत ही आवश्यक है। जैव विविधता का अर्थ पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीवों की विविधता है यानी एक स्थान विशेष में पाई जाने वाली जीवों और वनस्पतियों की संख्या और उनके प्रकारों से है। परिस्थितिकीविदों के अनुसार यदि इसी तरह मानव गतिविधियां प्रकृति की ओर क्रूर रहीं तो 100 वर्षों के भीतर लगभग आधी प्रजातियों का सफाया हो सकता है।

जैव विविधता की समस्या

मानव ने अपने क्रियाकलापों से पारिस्थितिकी तंत्र को बहुत हद तक प्रभावित किया है जिससे जैव विविधता खतरे में आई है। जीवों और वनस्पतियों की बहुत सी प्रजातियों को मानव ने खतरे में डाल दिया है। 2019 में जारी यू एन रिपोर्ट के मुताबिक करीब 10 लाख प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। प्रमुख समस्याओं पर सरसरी नज़र हम डालें तो देखते हैं कि मृदा का निम्नीकरण पहले से अधिक हो गया है। वन्यजीवों का शिकार उनकी बाजार में मांग, सजावट और महंगी खाल के कारण अत्यधिक किया जाता है जो कि ecosystem के लिए बहुत बड़ा खतरा है।

सन्त रामपाल जी का महत्वपूर्ण कदम पर्यावरण की ओर

सन्त रामपाल जी महाराज और उनके अनुयायी रक्तदान, देहदान, नशामुक्ति और दहेजरहित विवाहों के चलते अक्सर चर्चा में रहते हैं, लेकिन पर्यावरण की ओर उनके क्या योगदान हैं? वर्तमान में विश्व मे एकमात्र तत्वदर्शी सन्त की भूमिका निभा रहे सन्त रामपाल जी महाराज ने केवल शास्त्रों को खोलकर सही भक्तिमार्ग बताकर न केवल नकली गुरुओं के छक्के छुड़ाए हैं बल्कि लाखों लोगों के जीवन अपने द्वारा बताए नियमो से संवार दिए हैं।

  • अगरबत्ती और हवन आदि से होने वाले वायु प्रदूषण की ओर अगाह करते हुए, सन्त रामपाल जी, अनुयायियों को ज्योतियज्ञ अर्थात दीपक लगाने के आदेश देते हैं।
  • सन्त रामपाल जी द्वारा बताए गए नियमों में मांसाहार करना पूरी तरह वर्जित है। उनके अनुसार प्रत्येक जीव ईश्वर को प्यारा है किसी को भी मारकर खाना मानवीय कर्म नहीं है।
  • मानवता का धर्म विश्व में फैलाने वाले सन्त रामपाल जी महाराज ने अपने अनुयायियों को चमड़े या जानवरों से बने किसी भी पदार्थ का प्रयोग बंद करवा रखा है।
  • सन्त जी के अनुसार चमड़े, खाल, हाथीदांत या अन्य सामग्री जो जानवरों से मिलती है उसके लिए कई बेजुबान जानवरो को मारा जाता है। सभी जीवों का प्रकृति में अपना महत्व है तथा वे पारिस्थिकी तंत्र यानी इकोसिस्टम में अपना योगदान देते हैं तथा सभी को परमात्मा के बनाये संसार में जीने का पूरा अधिकार है।
  • लाखों की संख्या में उनके अनुयायी हैं जो दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं सभी शाकाहारी हैं तथा जानवरों के चमड़े, खाल आदि के प्रयोग से दूर हैं तथा पारिस्थिकी तंत्र में गुरुवचन पर चलकर अपना योगदान दे रहे हैं।

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1 COMMENT

  1. अच्छी बात है। हवन ही तो करना है वो तो रूई की ज्योत से भी ही सकता है।
    लकड़ियां बचेगी वन बचेंगे बचेगा पर्यावरण।

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