कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra 2021) पर सुप्रीम कोर्ट की रोक: क्या कांवड़ यात्रा शास्त्र सम्मत है?

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हिन्दू धर्म में प्रचलित मान्यताओं के अनुसार श्रावण (सावन) का महीना शिव जी को बहुत पसंद है, परन्तु इस बात का शास्त्रों में कोई प्रमाण नहीं है। श्रावण का महीना आते ही प्रतिवर्ष हजारों की तादाद में शिव भक्त कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra 2021) करते नजर आते हैं। सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने कोरोना की तीसरी लहर की आशंका के चलते इस वर्ष कांवड़ यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया है। पाठकों को यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि क्या कांवड़ यात्रा रूपी साधना शास्त्र सम्मत है और इसे करने से कोई लाभ होता है या नहीं?

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लगाया कावड़ यात्रा (Kanwar Yatra 2021) पर प्रतिबंध?

कोविड संकट को मद्देनजर रखते हुए कोरोना वायरस की तीसरी लहर की आशंका के बीच भारतीय सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) के आदेशानुसार इस वर्ष की वार्षिक “कावड़ यात्रा (Kanwar Yatra 2021)” पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि कांवड़ यात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण लोगों का जीवन है, जिसे सुरक्षित रखना सरकार की जिम्मेदारी है। सर्वोच्च न्यायालय का आदेश आते ही पुलिस विभाग ने सक्रिय होकर उत्तराखंड की धर्मनगरी हरिद्वार में कांवड़ियों का आना प्रतिबंधित कर दिया तथा जो प्रवेश कर रहे थे उन्हें वापस लौटा दिया गया।

COVID के प्रोटोकॉल का पालन न करने वालों पर हुई कार्रवाई

बीते सात दिनों के भीतर पुलिस ने उचित दूरी के नियमों का पालन न करने वाले 1161 लोगों पर कोविड प्रोटोकॉल का पालन न करने के तहत कार्रवाई करते हुए 111600 रुपये का जुर्माना वसूला है। वहीं मास्क न पहनने पर 33 लोगों पर कार्रवाई करते हुए 15500 रुपये का जुर्माना वसूला।

पुलिस ने दिखाई सख्ती कांवड़ियों को वाहन सहित वापस लौटाया

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक सेंथिल अवूदई कृष्णराज एस के मुुताबिक श्यामपुर के चिड़ियापुर सीमा से एक अगस्त की रात तक 581 कांवड़ियों के साथ ही 130 वाहनों को वापस भेजा गया। मंगलौर के नारसन सीमा से 11139 कांवड़ियों व 1901 वाहनों को लौटाया गया है। 

भगवानपुर के मंडावर सीमा से 1398 कांवड़ियों 298 वाहनों को वापस किया। जबकि काली नदी सीमा से 1436 कांवडियों व 141 वाहनों को लौटाया गया है। खानपुर के पुरकाजी से 216 कांवड़ियों व 54 वाहनों को बालावाली से 32 कांवड़ियों चार वाहनों और दल्लावाला से 50 कांवड़ियों व 11 वाहनों को लौटाया गया है। झबरेड़ा के गोकुलपुर बॉर्डर से 100 कांविड़यों को व बीरपुर से 34 कांवड़ियों और दो वाहनों को वापस भेजा।

कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra 2021) एक नजर में 

  • कांवड़ यात्रा 2021 पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाया प्रतिबंध
  • कोरोना संक्रमण की तीसरी लहर की आशंका के चलते कांवड़ यात्रा प्रतिबंधित की गई है
  • प्रतिबंध के बावजूद धर्मनगरी (हरिद्वार) की सीमा पार कर रहे दस कांवड़ यात्रियों पर मुकदमा दर्ज कर किया गया गिरफ्तार
  • 25 जुलाई से एक अगस्त तक पुलिस ने 15391 कांवडियों को वापस भेजा
  • पुलिस ने गंगाजल लेकर जाने वाले 15 कांवड़ियों को क्वारंटीन किया है
  • शास्त्रानुकूल साधना नहीं है ‘कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra 2021)
  • शास्त्रविरुद्ध साधना से लाभ के स्थान पर होती है हानि

कांवड़ यात्रा क्यों निकाली जाती है ? 

लोक मान्यता हैं कि यदि आप भगवान शिव को प्रसन्न करके उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं तो कांवड़ यात्रा जरूर करनी चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि शिवलिंग पर गंगा का पवित्र जल चढ़ाने से भगवान शिव अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं, परन्तु ये विधि शास्त्रविधि के विरुद्ध है और शास्त्रों में प्रमाण है कि जो भी साधक शास्त्रों में बताई गयी साधना को न करके मनमाना आचरण करता है उसे कोई भी लाभ नही होता है अपितु हानि होती है।

कांवड़ यात्रा का इतिहास (History of Kanwar Yatra)

मान्यता के अनुसार सागर मंथन के समय 14 रत्नों में एक विष निकला तो भगवान शिव ने विष को पीकर सृष्टि की रक्षा की। लेकिन विष पीने से उनका कंठ नीला पड़ गया और उसी के कारण उन्हें नीलकंठ भी कहा जाता है। 

Read in English: Kanwar Yatra 2021 Banned By Order Of Supreme Court Of India

कहते हैं कि विष के प्रभाव को समाप्त करने के लिए भगवान शिव का जलाभिषेक किया था। कांवड़ यात्रा की परंपरा यहीं से प्रारंभ हुई। दूसरी मान्यता के अनुसार विष प्रभाव को समाप्त करने के लिए देवताओ ने श्रावण के महीने में शिव जी पर गंगा जल चढ़ाया था और कांवड़ यात्रा की शुरुआत तभी से हुई।

अब प्रश्न यह उठता है कि कांवड़ यात्रा करने से क्या लाभ होता है?

यदि मान्यता के अनुसार कहें तो कांवड़ यात्रा करने से अश्व मेघ यज्ञ का फल मिलता है। परंतु हिन्दू धर्म के पवित्र सद्ग्रन्थों में इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। 

  • कांवड़ यात्रा सावन के महीने में की जाती है और सावन के महीने में बहुत से जीवों की उत्पत्ति होती है जो हमारे यात्रा करने से पैरों तले कुचलकर मर जाते हैं। 
  • सन्तों  का कहना है सावन के महीने में तो घर से बाहर भी कम ही निकलना चाहिए ताकि जीव हत्या के पाप से बच सकें।
  • क्योंकि जितने जीव प्रतिदिन हमसे मरते हैं उससे कई गुना अधिक जीव सावन के महीने में यात्रा के दौरान एक ही दिन में मारे जाते हैं जिसका पाप यात्री को लगता है। 
  • तो कांवड़ यात्रा करना बिल्कुल व्यर्थ है क्योंकि इससे हमें लाभ की बजाय उल्टा हानि ही होती है और यदि यह मान भी लें कि कांवड़ यात्रा करने से अश्व मेघ यज्ञ का पुण्य मिलता है तो पुण्य तो एक हुआ पर करोड़ो जीवों की हत्या का पाप अलग से लग गया। 

तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज काँवड़ यात्रा के भेद से पर्दा उठाते हैं  

तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज काँवड़ यात्रा के भेद को उजागर करते हुए बताते हैं कि हिन्दू धर्म के पवित्र चारों वेद व पवित्र गीता जी मे कहीं भी कांवड़ यात्रा करने का जिक्र व आदेश नहीं है जिस कारण यह मनमाना आचरण हुआ। और गीता जी में यह स्पष्ट किया गया है कि मनमाना आचरण करने वालों को कोई लाभ नहीं मिलता और न ही उनकी गति ( अर्थात् मोक्ष ) होती हैं तो इससे स्पष्ट होता है कि कांवड़ यात्रा निकालना व्यर्थ है, शास्त्र विरुद्ध है और अंध श्रद्धा भक्ति के तहत आता है।

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