Sharad Purnima 2020 (Blue Moon day) शरद पूर्णिमा : हिन्दू मान्यताओं के अनुसार आश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है। इस दिन लोग व्रत रखते हैं तथा इसका धार्मिक महत्‍व माना जाता है। शरद पूर्णिमा की इस रात को कोजागिरी के नाम से भी जाना जाता है। भारत में अलग-अलग स्‍थानों पर इस दिन से जुड़ी परंपराएं भिन्न भिन्न तरीके से मनाई जाती हैं। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ 30 अक्टूबर सांयकाल से आरंभ हो रहा है, जो अगले दिन 31 अक्टूबर को रात्रि तक रहेगा।

शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima 2020) से जुड़ी खास बातें

  • शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima) आश्विन मास की पूर्णिमा को कहा जाता है तथा इस दिन की रात को कोजागिरी भी कहते हैं।
  • शरद पूर्णिमा की रात्रि में लोग खुले आसमान में खीर रखते हैं और ऐसा कहा जाता हैं कि चाँद की किरणों द्वारा वह ऊर्जा अवशोषित करती हैं ।
  • मनुष्य यदि लोक मान्यताओं के पीछे चलता है तो वह पूर्ण परमात्मा से मिलने वाले लाभ प्राप्त करने से वंचित रह जाता है।
  • यदि हम शास्त्र विरूद्ध भक्ति-साधना करते हैं तो हमें घोर नरक में डाला जाता है।
  • किसी भी प्रकार का व्रत, हवन, यज्ञ आदि करना श्री मद्भागवत गीता जी के अनुसार करना उचित नहीं है। गीता अध्याय 9 श्लोक 25 इसका प्रमाण है।
  • केवल तत्वदर्शी संत की शरण में जाने के बाद ही पूर्ण लाभ एवं पूर्ण मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है ।

शरद पूर्णिमा के दिन खुले आसमान के नीचे खीर का कटोरा रखने का कारण?

उत्तर भारत में शरद पूर्णिमा पर खीर बनाकर रात की चांदनी में रखने का प्रचलन बहुत ज़्यादा है। शरद पूर्णिमा की रात को अधिक मात्रा में औषधियों की स्पंदन क्षमता होती है। रसाकर्षण के कारण जब अंदर का पदार्थ सांद्र होने लगता है, तब रिक्तिकाओं से विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती है। रात्रि में खुले आसमान में रखी खीर को खाने से पित्त और मलेरिया का खतरा भी कम हो जाता है। श्वास संबंधी ,हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा कम हो जाता है साथ में लोगों का कहना है कि चर्म रोग और आंखों की रोशनी ठीक होती है।

अन्य मान्यता के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन के बाद से आँवले के पेड़ से आँवले तोड़ना बहुत अच्छा इसलिए मानते हैं क्योंकि उनमें अधिक विटामिन C और अम्ल पाया जाता है जिसको खाने से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं और शरद पूर्णिमा के पहले तोड़े गए आँवले खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।

वैज्ञानिकों द्वारा अध्ययन के अनुसार दूध में लैक्टिक अम्ल और अमृत पाया जाता है। यह तत्व किरणों से अधिक मात्रा में ऊर्जा-शक्ति को अवशोषित करता है। यह भी एक मुख्य बात है कि चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया और भी आसान हो जाती है। ऋषि-मुनियों द्वारा शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आसमान में रखने का विधान बनाया हुआ है। यह परंपरा वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित है ,वेदों-पुराणों में खीर बनाकर चांद की रोशनी में रखनी चाहिए ऐसा कहीं नहीं लिखित है।

Sharad Purnima 2020: शरद पूर्णिमा शास्त्र आधारित क्यों नहीं है?

Sharad Purnima 2020: मान्यता है कि शरद पूर्णिमा के दिन स्त्रियों द्वारा व्रत रखा जाता है। इस दिन लोग रात को जागरण और भजन कीर्तन भी करते हैं। माँ लक्ष्मी को खुश करने के लिए उनसे प्रार्थना करते हैं क्योंकि लोगों का मानना है कि देवी हमारे सारे दुःख दूर कर, कर्ज़ से मुक्ति दिलाती हैं। जबकि ऐसा नहीं है यहां सभी मनुष्य कर्म आधारित फल प्राप्त करने को बाध्य हैं। न ही कर्म से अधिक और न ही कम कोई देवी देवता उन्हें दे सकता है।

मनुष्य यदि पुरानी परंपराओं के पीछे जाता है तो वह सदा दुखी रहता है

यदि हम हमारे वेदों -पुराणों ,सद्ग्रन्थों पर विश्वास न करके केवल मान्यताओं के पीछे चलते हैं तो हमें कोई लाभ प्राप्त नहीं होता है ,केवल उतना ही मिलता है जितना भाग्य में लिखा होता है । हमारे वेदों पुराणों में नहीं लिखा है कि हम इस तरह व्रत ,हवन,यज्ञ आदि कर भगवान की पूजा अर्चना करें। शास्त्रानुकूल भक्ति विधि ही केवल सफल होती है और उसी से पूर्ण लाभ मिलता है । यदि हम मोक्षदायिनी सदभक्ति करते हैं तो हम हमारे मानव जीवन को सफल बनाकर पूर्ण मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। हमें पुरानी परंपराओं को जो वेदों पुराणों से मेल नहीं खाती हैं उन्हें त्याग देना चाहिए क्योंकि यह मनमानी पूजाएं हैं।

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यह हमारे और आपके जैसे लोगों द्वारा ही बनाई गई हैं। यह पूर्ण परमात्मा का आदेश नहीं हैं। यदि हम परमात्मा की आज्ञा के अनुसार नहीं चलते हैं तो हम पापी ,चोर ,बुद्धि हीन प्राणी हैं। फिर ऐसे प्राणी को घोर नरक में डाला जाता है ,इससे बचने के लिए हमें जल्द से जल्द सद्ज्ञान (आध्यात्मिक ज्ञान) से परिचित होना होगा और पूर्ण संत की खोज कर उनकी शरण में जाकर भक्ति प्रारम्भ करनी होगी ।

इस शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima 2020) पर पाठक स्वयं विचार करें

जिस ईश्वर ने इस पूरे ब्रह्मांड की रचना की है हमें उसकी साधना करनी चाहिए या उसके बनाए हुए देवी – देवताओं की पूजा करनी चाहिए ? श्रीमद्भागवत गीता में बिल्कुल नहीं कहा गया है कि पूर्ण परमात्मा के अलावा अन्य देवी -देवताओं की पूजा-साधना करो, फिर हम क्यों अपना समय बर्बाद कर रहे हैं। परमात्मा, हमें यह मानव जन्म केवल सद्भक्ति के लिए प्रदान करते हैं। हमें हमारे वेदों पुराणों को समझ कर, शास्त्रानुकूल भक्ति साधना करना ही हितकारी है । केवल पूर्ण परमात्मा ही मनुष्य को धन,अन्न , रोटी, कपड़ा और मकान दे सकता है अन्य कोई भी देवी देवता बिना पूर्ण परमात्मा की कृपा के हमें कुछ नहीं दे सकते।

श्रीमद्भागवत गीता जी से प्रमाण

  • केवल पूर्ण परमात्मा की भक्ति करने से ही प्राणी पूर्ण मुक्त (जन्म-मरण रहित) हो सकता है, वही परमात्मा वायु की तरह हर जीवात्मा के हृदय में और साथ रहता है। गीता अध्याय 18 के श्लोक 62,66 तथा अध्याय 8 के श्लोक 8,9,10,20,21,22 में गीता ज्ञानदाता ने अर्जुन को कहा है कि मेरी पूजा भी त्याग कर उस एक परमात्मा की शरण में जाने से ही तेरा पूर्ण छुटकारा अर्थात मोक्ष होगा और कहा मेरा भी पूज्य देव वही एक पूर्ण परमात्मा है।
  • गीता अध्याय 8:16 व 9:7 ब्रह्म लोक से लेकर ब्रह्मा ,विष्णु शिव आदि के लोक और ये स्वयं भी जन्म- मरण व प्रलय में है । इसलिए ये अविनाशी नहीं हैं । जिसके फलस्वरूप इनके उपासक (साधक) भी जन्म – मरण में ही हैं ।
  • गीता अध्याय 7:12 से 15 तथा 20 से 23 में उस पूर्ण परमात्मा को छोड़कर अन्य देवी-देवताओं की, भूतों की, पितरों की पूजा मूर्खों की साधना है । इन्हें घोर नरक में डाला जाएगा।
  • व्रत करने से भी भक्ति असफल है । गीता अध्याय 6:16 व 9:25
  • गीता अध्याय 3:12 जो शास्त्रनुकूल यज्ञ -हवन आदि (पूर्ण गुरु के माध्यम से ) नहीं करते हैं वे पापी और चोर प्राणी हैं ।
  • गीता अध्याय 4:34 में तत्व ज्ञान को जानने के लिए तत्वदर्शी संतों की खोज करनी चाहिए।

उपरोक्त प्रमाण सिद्ध करते है कि यदि हम मनमुखी पूजाएं करते हैं,शास्त्रानुकूल भक्ति नहीं करते हैं तो न हमें मोक्ष और न ही अन्य लाभ मिलेंगे। आप स्वयं विचार करें और तत्वदर्शी संत जी की शरण में जाकर अपने जीवन का कल्याण करवाएं क्योंकि बिना तत्वदर्शी संत के पूर्ण मुक्ति नहीं हो सकती है।

कबीर साहेब जी कहते है :-

कलयुग में जीवन थोड़ा है ,कीजे बेग सम्भार ।
योग साधना बने नहीं, केवल नाम आधार ।।

अर्थ:- कबीर जी हम सभी मनुष्यों को समझा रहे हैं कि पूर्व के युगों में मानव की आयु लम्बी होती थी ऋषि व साधक हठयोग करके हजारों वर्षों तक तप साधना करते रहते थे ,अब कलयुग में मनुष्य की औसत आयु लगभग 75 -80 वर्ष रह गई ,इतने कम समय में पूर्व वाली हठयोग साधना नहीं कर सकोगे। इसलिए अतिशीघ्र पूर्ण गुरु जी से नाम दीक्षा लेकर अपने जीवन का शेष समय संभाल ले । सतभक्ति साधना करके इसका सदुपयोग कर लो। यदि कोई व्यक्ति चारों वेदों को पढ़ता रहा और नाम जाप किया नहीं तो वह भक्ति की शक्ति से रहित होकर नरक में गिरेगा और जिसने विधिवत दीक्षा लेकर नाम का जाप किया तो समझ लो उसने सर्व वेदों का रहस्य जान लिया ।

रामायण में भी लिखा है कि

कलयुग केवल नाम आधारा, सुमर -सुमर नर उतरे पारा ।

इसलिए जो सर्व का सृजनहार है ,उस परम पूज्य परमात्मा की सद्भक्ति करके मानव जीवन का कल्याण करवाना ही हितकारी है । सर्व मानव समाज को चाहिए कि वह वेदों पुराणों, गीता इत्यादि को तत्त्वदर्शी संत द्वारा समझें और मोक्षमंत्र प्राप्त करें क्योंकि इसके इतर सर्व मनमुखी पूजाएं व्यर्थ हैं ।

श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार सद्भक्ति केवल तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी के पास है

वर्तमान में पूरे विश्व में एकमात्र केवल तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी ही हैं जो वास्तविक तत्वज्ञान करा कर पूर्ण परमात्मा की पूजा आराधना बताते हैं। समझदार को संकेत ही काफी होता है। वह पूर्ण परमात्मा ही है जो हमारे लिए धनवृद्धि कर सकता है ,सुख शांति दे सकता है व रोगरहित कर मोक्ष दिला सकता है। सर्व सुख और मोक्ष केवल तत्वदर्शी संत की शरण में जाने से सम्भव हैं। तो सत्य को जानें और पहचान कर पूर्ण तत्वदर्शी सन्त रामपाल जी महाराज से मंत्र नामदीक्षा लेकर अपना जीवन कल्याण करवाएं। अधिक जानकारी हेतु सतलोक आश्रम यूट्यूब चैनल पर सत्संग श्रवण करें और ज्ञान गंगा पुस्तक पढ़ें