आदि सनातन धर्म, शास्त्र प्रमाण और समाज सुधार: जगदीप शर्मा का संत रामपाल जी महाराज से विशेष साक्षात्कार

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वर्तमान समय में धर्म, अध्यात्म और सामाजिक परंपराओं को लेकर समाज में अनेक धारणाएं, मान्यताएं और भ्रांतियां व्याप्त हैं। एक ओर जहां पारंपरिक मान्यताओं और कर्मकांडों का व्यापक प्रचलन है, वहीं दूसरी ओर शास्त्रों के मूल संदेश और सामाजिक कुरीतियों को लेकर लगातार प्रश्न उठते रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार जगदीप शर्मा (Step up J Sir) ने सतलोक आश्रम के संचालक संत रामपाल जी महाराज से एक विस्तृत और सीधा साक्षात्कार लिया।

इस संवाद में न केवल आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों, ईश्वर के स्वरूप और ‘सत साहिब’ की अवधारणा पर चर्चा की गई, बल्कि आम जनमानस में उठने वाले तीखे सवालों – जैसे मूर्ति पूजा, अंधविश्वास, भूत-प्रेत निवारण के दावे, जातिवाद, नशा, 17 मिनट की सादगीपूर्ण शादी (रमैणी), और आश्रम पर लगे विभिन्न आरोपों पर भी खुलकर बात की गई। संत रामपाल जी महाराज ने अपने प्रत्येक उत्तर को श्रीमद्भगवद्गीता, चारों वेदों, उपनिषदों, देवी भागवत तथा कबीर साहेब के सूक्ष्म वेद के प्रमाणों के आधार पर प्रस्तुत किया।

पाठकों की सुगमता, स्पष्टता और विषय की निरंतरता को ध्यान में रखते हुए इस संपूर्ण साक्षात्कार को बिना किसी प्रसंग को छोड़े 6 प्रमुख खंडों में पूर्ण रूप से प्रस्तुत किया जा रहा है।

खंड 1: ईश्वर का स्वरूप और आदि सनातन धर्म

प्रश्न: गुरु जी, जब मैं यहाँ आश्रम में आया तो देखा कि सभी एक-दूसरे को ‘सत साहिब’ कह रहे हैं, जबकि मैं सामान्यतः सबको ‘राम-राम’ बोलता हूँ। यह ‘सत साहिब’ वास्तव में क्या है?

उत्तर: ‘सत्य’ वह तत्व है जो कभी मिटता नहीं – अर्थात पूर्णतः अविनाशी। और ‘साहिब’ का अर्थ होता है स्वामी, प्रभु या भगवान। इसलिए ‘सत साहिब’ का वास्तविक अर्थ है अविनाशी राम, वह परम सत्ता जो शाश्वत है।

प्रश्न: आप भी बातचीत में कई बार ‘राम-राम’ कह देते हैं। तो क्या आपका ‘राम’ वही है जिसे आम समाज मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम (दशरथ पुत्र) के रूप में जानता है, या कोई और?

उत्तर: मेरा इष्ट कबीर परमेश्वर है। जहाँ तक मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का प्रश्न है, वे तीन लोक के भगवान विष्णु जी के अवतार हैं। इस विषय को समझने के लिए शास्त्रों और इतिहास के कालक्रम को देखना होगा। राजा दशरथ के पुत्र भगवान श्री राम त्रेतायुग में अवतरित हुए, परंतु सतयुग में भी ‘राम’ नाम विद्यमान था। महर्षि वाल्मीकि जी को भगवान राम के जन्म से पूर्व ही ‘राम’ मंत्र प्राप्त हुआ था और उन्होंने उसी नाम का जप किया था।

कबीर साहेब की वाणी इस भेद को स्पष्ट करती है:

चार राम को सब कोई धावे, 

एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट-घट में बैठा।

एक राम का सकल पसारा, एक राम इन सब से न्यारा॥ 

चौथा छांडि पंचम ध्यावै, कहै कबीर सो हमरे आवै॥

संसार सामान्यतः इन चार रूपों तक ही सीमित रहता है, परंतु संत उस पाँचवें, परम अक्षर ब्रह्म रूपी राम की ओर संकेत करते हैं जो सर्वोपरि है।

प्रश्न: भगवान, प्रभु, राम और साहिब – इन शब्दों के स्तर और पद में क्या कोई अंतर है?

उत्तर: इसे प्रशासनिक व्यवस्था के उदाहरण से समझें। जैसे एक तहसीलदार साहब होते हैं, उनके ऊपर डीसी साहब, फिर मंत्री साहब, मुख्यमंत्री साहब और अंत में प्रधानमंत्री साहब होते हैं। सभी को ‘साहिब’ कहा जाता है, परंतु सबके अधिकार क्षेत्र और शक्तियाँ भिन्न होती हैं।

उसी प्रकार, श्री रामचंद्र जी (विष्णु स्वरूप) तीन लोक के पालन विभाग के स्वामी (साहिब) हैं, जो सतगुण विभाग संभालते हैं। वे आदरणीय हैं, किंतु वे अपने स्तर के साहिब हैं। उनके ऊपर भी एक सर्वोच्च सत्ता – सर्वशक्तिमान परमात्मा – विद्यमान है, जिसे हम ‘प्रधानमंत्री’ स्वरूप परम साहिब (सत साहिब) कहते हैं।

प्रश्न: श्रीमद्भगवद्गीता में इस सर्वोपरि सत्ता या पूर्ण परमात्मा का क्या प्रमाण मिलता है?

उत्तर: गीता में स्वयं गीता ज्ञान दाता ने उस परम सत्ता का भेद स्पष्ट किया है:

  • गीता अध्याय 8, श्लोक 1 से 3: जब अर्जुन ने पूछा कि “हे भगवान, वह ‘तत् ब्रह्म’ क्या है?”, तब उत्तर मिला कि वह परम अक्षर ब्रह्म है, जो जरा (वृद्धावस्था) और मरण (मृत्यु) से पूर्ण मोक्ष दिलाता है।
  • गीता अध्याय 15, श्लोक 17:
    उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः। यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥”
  • अर्थात उत्तम पुरुष (श्रेष्ठ परमात्मा) तो क्षर और अक्षर दोनों प्रभुओं से अन्य ही है, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका भरण-पोषण करता है और अविनाशी परमेश्वर कहलाता है।
  • गीता अध्याय 2, श्लोक 12 एवं अध्याय 4, श्लोक 5: यहाँ गीता ज्ञान दाता स्पष्ट कहते हैं कि “हे अर्जुन! तेरे और मेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं, आगे भी होंगे।” जबकि गीता अध्याय 2 श्लोक 17 में उस अविनाशी परमात्मा की ओर संकेत किया गया है जिसका कभी नाश नहीं होता।
  • गीता अध्याय 18, श्लोक 62: गीता ज्ञान दाता अर्जुन से कहते हैं कि तू सर्वभाव से उस परमेश्वर की शरण में जा, जिसकी कृपा से तू परम शांति और शाश्वत सनातन परमधाम को प्राप्त होगा।

प्रश्न: गीता में ‘ॐ’ (ओम) मंत्र का भी उल्लेख है। क्या केवल ‘ॐ’ के जाप से पूर्ण मोक्ष संभव नहीं है?

उत्तर: गीता अध्याय 8 के श्लोक 13 में कहा गया है कि “ॐ इति एकाक्षरं ब्रह्म…” अर्थात मुझ ब्रह्म का केवल एक अक्षर ‘ॐ’ ही उच्चारण करने योग्य है। साधक इस जाप से ब्रह्मलोक तक पहुँचता है। देवी भागवत के सातवें स्कंध में भी राजा हिमालय को केवल ब्रह्म के जाप का उपदेश मिलता है।

परंतु गीता अध्याय 8 के श्लोक 16 में यह भी स्पष्ट लिखा है कि ब्रह्मलोक में गए साधकों की भी पुनरावृत्ति (पुनर्जन्म) होती है; वे जन्म-मरण के चक्र से पूरी तरह मुक्त नहीं होते। पूर्ण मोक्ष के लिए गीता अध्याय 17 के श्लोक 23 में तीन सांकेतिक मंत्र बताए गए हैं:

“ॐ तत् सत् इति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।”

सृष्टि के आदि में इसी त्रि-मंत्र विधि से साधना होती थी, जो सच्चिदानंद घन परब्रह्म की प्राप्ति का आदि सनातन मार्ग है।

प्रश्न: क्या चारों वेदों में भी इस सर्वोच्च परमात्मा और उसकी प्राप्ति का कोई प्रमाण मिलता है?

उत्तर: ऋग्वेद में परमात्मा के स्वरूप और लोक की स्थिति स्पष्ट वर्णित है:

  • ऋग्वेद मंडल 9, सूक्त 82 (मंत्र 1–3) एवं सूक्त 86 (मंत्र 26–27): इन मंत्रों में परमात्मा के तेजस्वी स्वरूप और उसकी महिमा का वर्णन है।
  • ऋग्वेद मंडल 9, सूक्त 54, मंत्र 3: इसमें उल्लेख है कि परमात्मा सबसे ऊपरी लोक (सत्यलोक/अमरलोक) में विराजमान हैं। वे वहाँ से गति करके नीचे आते हैं, सुपात्र आत्माओं और दृढ़ भक्तों को मिलते हैं तथा उन्हें यथार्थ तत्वज्ञान प्रदान करते हैं।

कबीर साहेब चारों युगों में इसी प्रकार अवतरित हुए। जब वे संत रूप में आते हैं, तो जीवों को विनम्रता और दीनता की शिक्षा देने के लिए स्वयं को दास रूप में प्रस्तुत करते हैं।

प्रश्न: आप जिस आदि सनातन धर्म की बात करते हैं, उसकी वास्तविक पहचान क्या है और उसकी जानकारी कैसे मिलती है?

उत्तर: गीता अध्याय 4, श्लोक 34 में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि उस यथार्थ ज्ञान को तत्वदर्शी संतों के पास जाकर, उन्हें दंडवत प्रणाम करके और निष्कपट भाव से प्रश्न करके समझो। तत्वदर्शी संत वह है जो वेदों, उपनिषदों और गीता के गूढ़ रहस्यों को सुलझाकर पूर्ण परमात्मा, काल-ब्रह्म और प्रकृति के चक्र का सही भेद प्रमाणित कर सके। आदि सनातन धर्म वही है जो आदि काल से वेदों के अनुसार चला आ रहा है, जहाँ केवल परब्रह्म की शास्त्र-सम्मत सद्भक्ति से जीव का जन्म-मरण का दीर्घ बंधन कटता है।

खंड 2: आध्यात्मिक नियम, गुरु-मर्यादा और कर्म-सिद्धांत

प्रश्न: भक्ति मार्ग में गुरु की क्या अनिवार्यता है? क्या बिना गुरु बनाए किसी व्यक्ति का पूर्ण उद्धार या मोक्ष संभव नहीं है?

उत्तर: बिना गुरु बनाए किसी भी जीव का मोक्ष संभव नहीं है, चाहे वह कितना भी बड़ा ज्ञानी या तपस्वी क्यों न हो। इसे समझने के लिए महर्षि सुखदेव जी की प्रामाणिक कथा देखी जा सकती है।

सुखदेव जी बाल्यावस्था से ही विरक्त, बाल ब्रह्मचारी और उच्च कोटि के संन्यासी थे। भक्ति की शक्ति से उनके पास आकाश में उड़ने तक की सिद्धियाँ थीं। एक बार वे सशरीर स्वर्ग और विष्णु लोक पहुँचे। जब वे मुख्य द्वार पर पहुँचे, तो द्वारपालों ने उनसे पूछा कि आपका गुरु कौन है? सुखदेव जी ने कहा कि मेरा कोई गुरु नहीं है, क्योंकि मुझे लगा कि पृथ्वी पर मेरे समान कोई ज्ञानी है ही नहीं। द्वारपालों ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया और कहा कि बिना गुरु वाले व्यक्ति का यहाँ प्रवेश वर्जित है।

जब वे भगवान विष्णु के समक्ष प्रस्तुत हुए, तो भगवान विष्णु ने भी उन्हें स्पष्ट कह दिया:

“बिना गुरु बनाए यहाँ वास नहीं मिल सकता। तुम बहुत बड़ी गलती कर रहे हो। मिथिला के राजा जनक के पास जाओ, उनके चरण छुओ, उनसे दीक्षा लो और भजन करो; तभी तुम्हारा कल्याण होगा।”

सुखदेव जी के मन में यह सूक्ष्म अहंकार (झिन्नी माया) था कि वे ब्राह्मण और बाल ब्रह्मचारी हैं, जबकि राजा जनक एक गृहस्थ हैं। वे लौटकर अपने पिता वेदव्यास जी के पास आए। व्यास जी ने भी उन्हें फटकार लगाई कि भगवान की आज्ञा का पालन करो और राजा जनक की शरण में जाओ। अंततः सुखदेव जी को अपना वैराग्य और विद्वता का मान छोड़कर गृहस्थ राजा जनक के चरणों में शीश नवाकर दीक्षा लेनी पड़ी, तब जाकर उनका सूक्ष्म अहंकार मिटा और मुक्ति का मार्ग खुला।

प्रश्न: संतों की वाणी में ‘मोटी माया’ और ‘झिन्नी माया’ का उल्लेख आता है। इन दोनों में क्या अंतर है?

उत्तर: संत गरीबदास जी महाराज ने इस भेद को बहुत सुंदर ढंग से स्पष्ट किया है:

  • मोटी माया: यह सांसारिक धन-दौलत, जमीन-जायदाद, स्त्री-पुत्र और भौतिक सुख-सुविधाओं का बाह्य प्रपंच है। बहुत से साधक घर-बार छोड़कर या वानप्रस्थ लेकर इस मोटी माया का त्याग तो आसानी से कर देते हैं।
  • झिन्नी (सूक्ष्म) माया: यह भीतर बैठी काम, क्रोध, लोभ, मोह और विशेष रूप से अहंकार की सूक्ष्म वृत्ति है। अपनी भक्ति, ज्ञान, त्याग या सिद्धि का जो अहंकार साधक के भीतर रह जाता है, वही झिन्नी माया है।

सुखदेव जी ने मोटी माया तो बचपन में ही छोड़ दी थी, किंतु सूक्ष्म अहंकार शेष था जो गुरु के चरणों में शीश झुकाने के बाद ही समाप्त हुआ। जब तक यह सूक्ष्म माया नहीं छूटती, तब तक पूर्ण मोक्ष का द्वार नहीं खुलता।

प्रश्न: आप सामान्य लोगों को एक-दूसरे के या मां-बाप के पैर छूने से रोकते हैं, परंतु सत्संग में आप एक विशेष आसन पर बैठते हैं और लोग आपके चरण स्पर्श करते हैं। 

उत्तर: हम माता-पिता और बड़ों की सेवा या सत्कार करने से कभी मना नहीं करते। यदि सास, ससुर, माता, पिता या बहू के शरीर में कोई कष्ट या दर्द है, तो पैर दबाना, स्नान कराना और उनकी सेवा करना तो गृहस्थ का परम धर्म है। माता-पिता अपनी बेटी-बहू के कष्ट में सेवा कर सकते हैं और संतान बड़ों की।

परंतु आशीर्वाद लेने की दृष्टि से पैर छूने और छुआने का एक आध्यात्मिक ऊर्जा नियम है:

  • इसे ऐसे समझें जैसे एक छोटी कार का पहिया है और दूसरा ट्रक का बड़ा टायर। यदि कार के टायर में हवा कम हो जाए और वह सीधे ट्रक के टायर से पाइप लगाकर हवा लेने की कोशिश करे, तो असंतुलन के कारण दोनों की हवा निकल सकती है।
  • जब कोई अपूर्ण व्यक्ति किसी के चरण छूता है या कोई आशीर्वाद के रूप में अपने पैर छुआता है, तो उसके अपने संचित आध्यात्मिक संस्कार क्षीण होते हैं और लेने वाले को भी कोई वास्तविक लाभ नहीं मिलता। दोनों का नुकसान होता है।
  • इसलिए नियम यह है कि दोनों को ‘कंप्रेसर’ (मुख्य स्रोत) के पास जाना चाहिए। गुरु उस परमात्मा रूपी मुख्य पावर हाउस से सीधे जुड़े होते हैं।

शास्त्रों में भी गुरु के चरण वंदन का विशेष विधान है:

  • श्रीमद्देवी भागवत, सातवां स्कंध (अध्याय 36, श्लोक 23-24): यहाँ स्पष्ट लिखा है कि जो ब्रह्मविद्या का उपदेश देता है, वह साक्षात परमेश्वर स्वरूप है। माता-पिता से प्राप्त शरीर तो एक दिन नष्ट हो जाता है, परंतु गुरु द्वारा दिया गया ‘ब्रह्म जन्म’ कभी नष्ट नहीं होता। गुरु साधक को अमर लोक पहुँचाते हैं, जहाँ जाने के बाद जीव का फिर कभी मरण नहीं होता। इसलिए केवल पूर्ण गुरु के चरणों की पूजा और वंदन का विधान शास्त्रों में सर्वोपरि माना गया है।

प्रश्न: सत्संग के दौरान आप अपने दोनों हाथों की तर्जनी उंगलियों को ऊपर उठाकर एक विशेष इशारा करते हैं। कई लोग इसे गलत नजरिये से देखते हैं, इस इशारे का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर: जो लोग गंदी सोच रखते हैं, वे हर बात को गलत नजरिये से ही देखते हैं। हमारे कबीर साहेब का स्पष्ट सिद्धांत रहा है कि यह पूरा विधान जीव को परमात्मा से मिलाने का है।

जब हम दोनों उंगलियां उठाकर संकेत करते हैं, तो उसका वास्तविक अर्थ यह होता है कि जो साधक हमारे बताए शास्त्र-सम्मत नियमों और मर्यादा में रहेगा, उसकी इस जीवात्मा को उस परमपिता परमात्मा से मिला दिया जाएगा। यह पूरा आध्यात्मिक खेल ही आत्मा और परमात्मा के मिलन का है, किसी लौकिक आडंबर का नहीं।

प्रश्न: ज्योतिष और हस्तरेखा विज्ञान पर आपका क्या दृष्टिकोण है? क्या भक्ति से ग्रहों के प्रभाव या प्रारब्ध के लेख को बदला जा सकता है?

उत्तर: ज्योतिष विद्या अपनी जगह पर सत्य है, वह केवल इतना बता सकती है कि आपके पूर्व संचित कर्मों के अनुसार प्रारब्ध में क्या लिखा है। परंतु ज्योतिष उस संकट को टाल नहीं सकती; वह केवल संकेत देती है। संकट को टालने की शक्ति केवल पूर्ण परमात्मा और सतगुरु की भक्ति में है।

इसे एक प्रत्यक्ष उदाहरण से समझें। हमारे एक परिचित को 20-22 वर्ष की आयु में कई ज्योतिषियों ने हाथ देखकर बताया कि 27वें वर्ष में तुम्हारी मृत्यु निश्चित है। वह इतना भयभीत हो गया कि उसने विवाह करने से मना कर दिया और खाना-पीना छोड़ दिया। उसी दौरान उसने हमारे पूज्य गुरुदेव स्वामी रामदेवानंद जी से नाम दीक्षा ले ली।

वह 25वें वर्ष में नाम लेकर निरंतर सतनाम का सुमिरन करता रहा। 26वां साल बीता और 27वां साल भी बिना किसी बाधा के पार हो गया। जब वह 28वें वर्ष में पहुँचा, तो उसने फिर उन्हीं ज्योतिषियों को अपना हाथ दिखाया। उन सभी ने आश्चर्यचकित होकर कहा कि अब तुम्हारी आयु 70 वर्ष से भी अधिक है।

संत वाणी में कहा गया है:

“मासा घटे न तिल बढ़े, विधना लिखे जो लेख। 

साचा सतगुरु मेट कर, ऊपर मार दे मेख॥”

ज्योतिष का गणित अपनी जगह सही था, परंतु पूर्ण परमात्मा की सद्भक्ति में वह सामर्थ्य है जो प्रारब्ध के कठिन लेख और अकाल मृत्यु को भी टालकर जीवन रक्षा कर देती है।

प्रश्न: समाज में प्रायः देखा जाता है कि जो लोग मांसाहार करते हैं, मदिरा पीते हैं या रिश्वतखोरी करते हैं, वे बड़े-बड़े पदों पर बैठकर ठाठ-बाट से सुखी जीवन बिताते हैं; जबकि धर्म-कर्म करने वाला व्यक्ति अक्सर कष्ट में दिखता है। इसका क्या कारण है?

उत्तर: इसे इन्वर्टर और बैटरी के विज्ञान से समझें। जब इन्वर्टर की बैटरी बिजली से पूरी तरह चार्ज हो जाती है, तो उसके बाद मुख्य बिजली का कनेक्शन कट भी जाए, तब भी पंखे, लाइट और उपकरण निर्बाध रूप से चलते रहते हैं। देखने वाले को लगता है कि बिना बिजली के भी सब ठीक चल रहा है।

लेकिन वह बैटरी कब तक चलेगी? जब तक उसका संचित चार्ज शेष है। जैसे ही वह डिस्चार्ज होगी, तत्काल अंधेरा छा जाएगा।

ठीक यही नियम कर्म-सिद्धांत पर लागू होता है:

  • जो लोग आज अनैतिक कार्य, नशा या मांसाहार करते हुए भी संपन्न और सुखी दिख रहे हैं, वे वास्तव में अपने पिछले जन्मों के संचित पुण्यों की ‘चार्ज बैटरी’ का उपभोग कर रहे हैं।
  • जब तक उनके पूर्व जन्मों के शुभ कर्मों का खाता चल रहा है, तब तक वे मौज में दिखते हैं।
  • परंतु नए कर्म वे पाप के रूप में संचित कर रहे हैं। जैसे ही पूर्व पुण्यों की बैटरी समाप्त होगी, उन्हें अत्यंत दुखद परिणाम भुगतने होंगे और वे घोर कष्टों व नीच योनियों में गिरेंगे।

इसलिए वर्तमान की बाह्य सुख-सुविधा को देखकर किसी के अनैतिक आचरण को सही नहीं माना जा सकता; कर्म का न्याय अटल है।

प्रश्न: बहुत से लोग यह जानना चाहते हैं कि आपसे नाम दीक्षा लेने के बाद शरीर और मन में क्या व्यावहारिक परिवर्तन या शक्ति महसूस होती है?

उत्तर: यह कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे केवल शब्दों में समझा दिया जाए। जैसे यदि मैं कोई स्वादिष्ट हलवा खा रहा हूँ, तो मैं केवल बोलकर उसका वास्तविक स्वाद आपको कैसे समझा सकता हूँ? जब आप स्वयं उस हलवे को खाएंगे, तभी उसके वास्तविक स्वाद का पता चलेगा।

कहा भी गया है कि जैसे गूंगा व्यक्ति गुड़ खाकर उसके स्वाद का वर्णन वाणी से नहीं कर सकता, ठीक उसी प्रकार नाम दीक्षा के बाद आत्मा और अंतःकरण में जो आत्मिक शांति, शक्ति और परिवर्तन घटित होता है, वह केवल स्वयं साधना करके ही अनुभव किया जा सकता है।

खंड 3: पाखंड, पूजा-पद्धति और शास्त्र-सम्मत भक्ति

प्रश्न: आज समाज में हर कोई पाखंड के विरोध की बात करता है। आपकी दृष्टि में ‘पाखंड’ की वास्तविक परिभाषा क्या है? भूत-प्रेत की बाधा और झाड़-फूंक करने वालों की सच्चाई क्या है?

उत्तर: पाखंड वह व्यक्ति नहीं कर रहा जिसे कोई नकारात्मक ऊर्जा या प्रेत परेशान कर रहा है। पाखंड वह व्यक्ति करता है जो झाड़-फूंक, धागे-ताबीज या तंत्र-मंत्र से उसे ठीक करने का झूठा दावा करता है।

भूत-प्रेत का अस्तित्व शास्त्रों में स्पष्ट रूप से माना गया है:

  • गीता अध्याय 9, श्लोक 25: इसमें स्पष्ट विधान है कि देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और परमात्मा के अनन्य भक्त परमात्मा को प्राप्त होते हैं।
  • जो लोग चौराहों पर टोने-टोटके करते हैं, धागे बांधते हैं, फूल या सिंदूर डालते हैं या शास्त्र-विरुद्ध श्राद्ध निकालते हैं, वे मृत्यु के उपरांत प्रेत योनि में जाते हैं।

वेदों या गीता में कहीं भी झाड़-फूंक का कोई विधान नहीं है। कबीर साहेब कहते हैं:

“एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय। 

माली सींचै मूल को, फूलै फलै अघाय॥”

जब साधक पूर्ण परमात्मा का यथार्थ नाम लेकर भक्ति करता है, तो सभी कष्ट और नकारात्मक प्रभाव स्वतः समाप्त हो जाते हैं। हमारे पास ऐसे लाखों प्रमाण हैं जिनका कहीं समाधान नहीं हुआ, किंतु शास्त्र-सम्मत भक्ति से वे पूरी तरह स्वस्थ हुए।

प्रश्न: क्या आप पारंपरिक पूजा-पाठ के विरोधी हैं? आपने स्वयं भी कई वर्षों तक श्री हनुमान जी की पूजा की थी।

उत्तर: हम पूजा-पाठ के विरोधी नहीं हैं, बल्कि शास्त्रों को छोड़कर किए जाने वाले ‘मनमाने आचरण’ के विरोधी हैं। गीता अध्याय 16 के श्लोक 23 में स्पष्ट लिखा है कि जो मनुष्य शास्त्र-विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न तो सिद्धि को प्राप्त होता है, न सुख को और न ही परम गति को।

जहाँ तक मेरी बात है, ज्ञान प्राप्ति से पूर्व मैं भी आम समाज की तरह ही था। हम भी श्री हनुमान जी, श्री राम, श्री कृष्ण और देवी-देवताओं की निष्ठा से पूजा करते थे। आज भी हमारे यहाँ पंचदेवों – श्री गणेश जी, श्री ब्रह्मा-सावित्री, श्री विष्णु-लक्ष्मी, श्री शिव-पार्वती और देवी दुर्गा – की शास्त्र-सम्मत साधना प्रथम चरण में करवाई जाती है।

अंतर केवल इतना है कि पहले यह साधना मनमाने ढंग से होती थी, जबकि अब शास्त्रों में प्रमाणित वास्तविक विधि और मूल मंत्रों के साथ की जाती है।

प्रश्न: क्या यह संभव है कि नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों को जब बख्तियार खिलजी ने जलाया, तो हमारी मूल धार्मिक पुस्तकें और वास्तविक पूजा-पद्धति नष्ट हो गई हों, जिसके कारण बाद में यह भ्रांतियां पैदा हुईं?

उत्तर: यह धारणा सही नहीं है। नालंदा में जो पुस्तकें जलाई गईं, वह मुख्य रूप से बौद्ध धर्म का साहित्य और उनका विस्तार था। हमारे सनातन धर्म के मूल वेद और उपनिषद ऋषि परंपरा और कंठस्थ ज्ञान के माध्यम से पूर्णतः सुरक्षित रहे।

बौद्ध दर्शन में आत्मा और परमात्मा के अस्तित्व को ही नकार दिया गया था। यदि उस समय आदि शंकराचार्य जी का प्रादुर्भाव न हुआ होता, तो देश नास्तिकता की ओर चला जाता और हिंदू धर्म का नामोनिशान मिट जाता। आदि शंकराचार्य जी ने शास्त्रार्थ करके उस नास्तिकता को समाप्त किया और सनातन परंपरा की रक्षा की।

प्रश्न: आदि शंकराचार्य जी के दर्शन ‘अहं ब्रह्मास्मि’ और पंचदेव उपासना पर आपकी क्या राय है?

उत्तर: आदि शंकराचार्य जी ने बौद्ध प्रभाव को तो रोक दिया, परंतु उनके अद्वैत दर्शन में ‘अहं ब्रह्मास्मि’ (मैं ही ब्रह्म हूँ) और ‘अयमात्मा ब्रह्म’ (यह आत्मा ही ब्रह्म है) का जो प्रतिपादन हुआ, उससे एक बड़ा दार्शनिक भ्रम खड़ा हो गया।

यदि प्रत्येक जीव ही साक्षात ब्रह्म (भगवान) है, तो फिर साधना, भक्ति और पाप-पुण्य की क्या आवश्यकता रह जाती है? पशु भी ब्रह्म और मनुष्य भी ब्रह्म – फिर तो सारे बंधन ही व्यर्थ हो गए।

जब विद्वानों और जनता ने यह तर्क किया कि यदि हम स्वयं ब्रह्म हैं तो फिर पूजा किसकी करें, तब उन्होंने जनसाधारण को स्थिर रखने के लिए पंचदेव (ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दुर्गा और गणेश) की साधना का विधान दिया।

प्रश्न: जगन्नाथ पुरी के पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी भी पंचदेवों को एक ही परमात्मा के पाँच रूप बताते हैं। इस पर आपका क्या मत है?

उत्तर: एक प्रवचन सभा में कक्षा 5 के एक छात्र ने शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी से बड़ा सटीक प्रश्न पूछा था कि ‘शिव पुराण में शिव जी को सबसे बड़ा बताया गया है और विष्णु पुराण में विष्णु जी को, तो वास्तव में सबसे बड़ा कौन है?’

उस पर शंकराचार्य जी ने उत्तर दिया कि एक ही परमात्मा सृष्टि के प्रारंभ में पाँच कृत्यों के लिए पाँच रूपों में व्यक्त होते हैं:

  1. उत्पत्ति के लिए हिरण्यगर्भ ब्रह्मा
  2. पालन और रक्षण के लिए विष्णु (श्रीमन्नारायण)
  3. संहार के लिए शिव
  4. निग्रह (शक्ति) के लिए दुर्गा/देवी
  5. अनुग्रह के लिए गणपति/गणेश

शंकराचार्य जी यह तो स्वीकार करते हैं कि यह पंचदेव ही ब्रह्मांड के नियामक हैं, किंतु विडंबना यह है कि आज के वर्तमान शंकराचार्य और धर्मगुरु इन पंचदेवों की जो साधना करवा रहे हैं, वह शास्त्रों के वास्तविक मूल मंत्रों पर आधारित नहीं है बल्कि मनमानी है।

जबकि हमारे यहाँ प्रथम चरण में साधकों को वेदों और सूक्ष्म वेद के अनुसार इन पंचदेवों के वास्तविक गोपनीय मंत्र प्रदान किए जाते हैं, जिससे साधक को इन पाँचों शक्तियों का यथार्थ लाभ मिलता है।

प्रश्न: श्रीमद्देवी भागवत में सृष्टि रचना और ब्रह्मा, विष्णु, महेश की उत्पत्ति के संबंध में क्या प्रमाण मिलता है?

उत्तर: श्रीमद्देवी भागवत के तीसरे और सातवें स्कंध में सृष्टि रचना का स्पष्ट उल्लेख मिलता है:

  • तीसरा स्कंध: महर्षि वेदव्यास जी के पूछने पर देवर्षि नारद जी ने बताया कि उन्होंने स्वयं अपने पिता ब्रह्मा जी से सृष्टि की रचना के बारे में पूछा था। ब्रह्मा जी ने स्पष्ट कहा कि “हे नारद! यह प्रश्न बड़ा गूढ़ है। जब मैं कमल की कर्णिका पर उत्पन्न हुआ, तो चारों ओर केवल जल ही जल था। मुझे स्वयं यह ज्ञात नहीं था कि मेरा रक्षक कौन है और मैं कहाँ से आया हूँ। तब आकाशवाणी हुई कि ‘तप करो’, और मैंने एक हजार वर्ष तक तपस्या की।”
  • विचारणीय तथ्य यह है कि जब स्वयं ब्रह्मा जी को अपनी उत्पत्ति का पूर्ण ज्ञान नहीं था, तो उनसे ज्ञान प्राप्त करने वाले ऋषि-मुनि पूर्ण ब्रह्मविद्या के ज्ञाता कैसे हो सकते थे?
  • सूक्ष्म वेद यानि कबीर सागर: सूक्ष्म वेद में कबीर साहेब ने स्पष्ट प्रमाणित किया है कि पूर्ण परमात्मा (कबीर साहेब) ने अपनी शब्द शक्ति से रचना की। तत्पश्चात क्षर पुरुष (ज्योति निरंजन/काल ब्रह्म) और प्रकृति (दुर्गा/अष्टंगी) के संयोग से तीन पुत्रों – ब्रह्मा, विष्णु और महेश – की उत्पत्ति हुई।

इन्हें क्रमशः रजोगुण (उत्पत्ति), सतगुण (पालन), और तमोगुण (संहार) का कार्य सौंपा गया। इस यथार्थ ज्ञान के अभाव में ही समाज में यह भ्रम बना रहा कि ये तीनों देव सर्वोपरि और अजन्मा हैं।

प्रश्न: आपने किसी वक्तव्य में राम मंदिर में चोरी की घटना का उल्लेख किया था। मंदिरों में मूर्ति पूजा और प्राण-प्रतिष्ठा के विषय पर आपका क्या शास्त्रीय दृष्टिकोण है?

उत्तर: हमारे कथन को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया। हमने किसी आराध्य का अनादर नहीं किया, बल्कि पाषाण प्रतिमा और साक्षात ईश्वर के अंतर को स्पष्ट किया था।

समाज में यह धारणा प्रचारित है कि प्राण-प्रतिष्ठा के उपरांत मूर्ति साक्षात जीवित हो जाती है। हमारा तर्क यह था:

  • प्रतिमा भगवान का एक सम्मानीय और पूजनीय प्रतीक है, जिसके प्रति श्रद्धा व्यक्त की जा सकती है।
  • परंतु यदि यह माना जाए कि प्राण-प्रतिष्ठा के बाद मूर्ति में साक्षात चेतन शक्ति आ गई है, तो फिर एक सामान्य चोर मंदिर में घुसकर उसके आभूषण कैसे उतार ले जाता है?

यदि कोई यह तर्क दे कि त्रेतायुग में भगवान श्री राम की पत्नी माता सीता का हरण हो गया था, तो क्या उनमें शक्ति नहीं थी?

उसका उत्तर यह है कि वह भगवान की एक पूर्व-निर्धारित लीला थी। उसी प्रकार सांसारिक घटनाएं काल और कर्म के चक्र से चलती हैं। पाषाण की मूर्ति आदरणीय प्रतीक मात्र है, जबकि सर्वशक्तिमान परमात्मा अविनाशी रूप से सत्यलोक में विराजमान हैं और अपनी शक्ति से पूरे ब्रह्मांड का संचालन करते हैं।

खंड 4: सामाजिक सुधार और कुप्रथाओं का उन्मूलन

प्रश्न: आप 17 मिनट में बिना दान-दहेज और बिना सात फेरों के विवाह (रमैणी) करवाते हैं, जबकि समाज में घंटों मंत्रोच्चार और फेरों की परंपरा है। इस सादगीपूर्ण विवाह का क्या आधार है?

उत्तर: हमारी विवाह पद्धति को ‘रमैणी’ कहा जाता है, जिसमें किसी भी प्रकार का दान-दहेज, बैंड-बाजा, फिजूलखर्ची, या आडंबर नहीं होता। यह पूरी प्रक्रिया शास्त्रों में वर्णित सात्विक विधान पर आधारित है।

देवी भागवत में सृष्टि के आरंभ का वृत्तांत आता है:

  • जब काल ब्रह्म और प्रकृति (देवी) से उत्पन्न तीनों देव – ब्रह्मा, विष्णु और महेश – बड़े हुए, तो देवी जी ने अपनी शब्द शक्ति से तीन कन्याओं (सावित्री, लक्ष्मी और उमा/पार्वती) की उत्पत्ति की।
  • देवी जी ने ब्रह्मा जी से कहा कि सावित्री तुम्हारी पत्नी हैं, विष्णु जी से कहा कि लक्ष्मी तुम्हारी पत्नी हैं, और शिव जी से कहा कि पार्वती तुम्हारी पत्नी हैं; जाओ और अपना गृहस्थ जीवन बसाओ।
  • उस समय न कोई बारात थी, न बाजे थे, न दहेज था, न सात फेरे थे और न ही लड्डू-जलेबियों का दिखावा था। उस पवित्र संकल्प और मर्यादा से सृष्टि का विस्तार हुआ।

आज विवाह को एक भारी आर्थिक बोझ और दिखावे का व्यापार बना दिया गया है, जिसके कारण गरीब परिवारों की बेटियाँ कष्ट भोगती हैं। हमारे यहाँ संत गरीबदास जी और कबीर साहेब की पवित्र वाणी के 17 मिनट के पाठ (असुर निकंदन रमैणी) के साथ बिना एक रुपया लिए या दिए वर-वधू का विवाह संपन्न कराया जाता है।

प्रश्न: जातिवाद और छुआछूत पर आपका क्या दृष्टिकोण है? क्या आप अंतरजातीय विवाह (Inter-caste Marriage) का समर्थन करते हैं?

उत्तर: हम जातिवाद के घोर विरोधी हैं और हमारे आश्रम में अंतरजातीय विवाह का अनिवार्य नियम है। हमारे हजारों शिष्यों ने बिना किसी जातिगत भेदभाव के आपस में शादियाँ की हैं।

जाति व्यवस्था कभी जन्म के आधार पर नहीं थी, यह कर्म और व्यवसाय के आधार पर बनाई गई थी:

  • प्राचीन काल में औपचारिक शिक्षा या आधुनिक तकनीक नहीं थी। व्यवसाय परिवार से ही सीखा जाता था।
  • कुम्हार का बेटा मिट्टी के बर्तन बनाना सीखता था और किसान का बेटा खेती। विवाह भी उसी व्यवसाय में इसलिए किया जाता था ताकि कन्या उस परिवार के कामकाज और हुनर से पहले से परिचित रहे। यदि किसी अनजान पेशे में विवाह होता, तो कन्या को काम न जानने के कारण कठिनाई होती।
  • समय के साथ इस व्यावसायिक विभाजन को लोगों ने जन्मजात ऊँच-नीच और जातिवाद का रूप दे दिया।

मानव शरीर सबका एक समान है। जब सब में एक ही परमात्मा की आत्मा वास करती है, तो जन्म के आधार पर किसी को छोटा या बड़ा मानना सबसे बड़ा अज्ञान है।

प्रश्न: आप हुक्का और तंबाकू के सेवन का बहुत कड़ा विरोध करते हैं। क्या धर्मग्रंथों में भी तंबाकू और नशा मुक्ति को लेकर कोई कड़े निर्देश हैं?

उत्तर: यह बात केवल मेरी नहीं है, हमारे प्राचीन ग्रंथों और संतों की वाणियों में स्पष्ट लिखा है। सूक्ष्म वेद में प्रमाण आता है:

“कबीर, मांस खांय ते ढेड़ सब, मद पीवैं सो नीच। 

कुल की दुरमति परहरै, राम कहै सो ऊंच॥”

और हुक्के के विषय में लिखा है:

“सौ नारी जारी करै, सुरापान सौ बार। 

एक चिलम हुक्का भरै, डूबै काली धार॥”

अर्थात सौ बार शराब पीने और घोर पाप करने से भी अधिक दोष उस व्यक्ति को लगता है जो स्वयं हुक्का पीता है या दूसरों को भरकर पिलाता है। शास्त्रों में उल्लेख है कि जो लोग ज्ञान सुनने के बाद भी हुक्का या तंबाकू नहीं छोड़ते, वे अगले जन्मों में निकृष्ट योनियों में जाते हैं।

प्रश्न: तंबाकू की उत्पत्ति को लेकर जो पौराणिक कथा शास्त्रों में मिलती है, वह क्या है?

उत्तर: तंबाकू की उत्पत्ति के विषय में सूक्ष्म वेद में एक पौराणिक कथा वर्णित है:

  • एक बार एक राजा अपने साढ़ू (जो एक ऋषि थे) के आश्रम में अपनी सेना सहित पहुँच गया। ऋषि निर्धन थे, किंतु संत होने के कारण उन्होंने अपनी भक्ति की शक्ति से देवराज इंद्र से प्रार्थना की। इंद्र ने ऋषि के पूर्व पुण्यों के बदले ‘कामधेनु गाय’ भेजी।
  • उस कामधेनु की कृपा से राजा और उसकी पूरी सेना को राजसी पकवान और छप्पन भोग प्राप्त हुए। राजा के मन में लोभ आ गया कि ऐसी चमत्कारी गाय किसी निर्धन ऋषि के पास नहीं, बल्कि राजा के पास होनी चाहिए। उसने अपने सैनिकों को कामधेनु को बलपूर्वक पकड़ने का आदेश दिया।
  • ऋषि ने जब देखा कि राजा अधर्म पर उतर आया है, तो उन्होंने हाथ जोड़कर माता से क्षमा माँगी और कहा कि अब यह मेरे वश में नहीं है, आप यहाँ से प्रस्थान करें। जैसे ही कामधेनु आकाश की ओर उड़ने लगी, राजा के सैनिकों ने उन पर बाण चला दिया।
  • वह बाण कामधेनु के खुर में लगा और उनका पवित्र रक्त पृथ्वी पर टपक गया। सूक्ष्म वेद में प्रमाण आता है कि जहाँ-जहां वह रक्त गिरा, वहाँ तंबाकू के पौधे की उत्पत्ति हुई।

इसी कारण इसे फारसी और लोकभाषा में ‘तमा-खू’ कहा गया – ‘तमा’ अर्थात गाय और ‘खू’ अर्थात खून। तंबाकू के पत्तों पर गाय के रोएं जैसे सूक्ष्म बाल होते हैं। इसलिए शास्त्रों में गाय के रक्त स्वरूप इस विषैले तंबाकू का सेवन करना महापाप बताया गया है।

प्रश्न: आपने जो ‘ढेढ़’ शब्द का प्रयोग किया, क्या वह किसी विशेष जाति के लिए था?

उत्तर: बिल्कुल नहीं। ‘ढेढ़’ शब्द किसी जाति का सूचक नहीं है। हमारे लिए जाति से कोई ढेढ़ या नीच नहीं होता। जो व्यक्ति मांस खाता है, शराब पीता है या जीवों पर अत्याचार करता है – चाहे वह जन्म से ब्राह्मण हो, क्षत्रिय हो, मुसलमान हो या किसान – कर्म के आधार पर वह आचरण ही नीच और ‘ढेढ़’ कहलाता है। जो व्यक्ति इन बुराइयों को त्यागकर परमात्मा की सच्ची भक्ति करता है, वही वास्तव में उच्च है।

प्रश्न: आपके आश्रम द्वारा चलाए जा रहे ’13 सूत्रीय समाज सुधार कार्यक्रम’ क्या हैं और उनका मुख्य उद्देश्य क्या है?

उत्तर: हमारा उद्देश्य केवल प्रवचन देना नहीं, बल्कि समाज को धरातल पर बदलना है। हमारे 13 सूत्रीय कार्यक्रम समाज की जड़ों को खोखला करने वाली बुराइयों को समाप्त करने के लिए समर्पित हैं:

  1. दहेज-मुक्त समाज: बिना किसी लेन-देन के 17 मिनट में सादगीपूर्ण रमैणी विवाह।
  2. पूर्ण नशा मुक्ति: अनुयायियों द्वारा बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू, हुक्का, शराब और नशीली दवाओं का पूर्ण बहिष्कार।
  3. मांसाहार निषेध: पूर्णतः शाकाहारी और सात्विक जीवन शैली।
  4. जातिवाद और छुआछूत का समूल नाश: सभी जातियों में परस्पर रोटी-बेटी का संबंध और समानता।
  5. कन्या भ्रूण हत्या का विरोध: बेटियों को बेटों के समान अधिकार और आदर।
  6. अंधविश्वास और पाखंड निवारण: झाड़-फूंक, टोने-टोटके और मनमाने कर्मकांडों पर रोक।
  7. रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार का त्याग: ईमानदारी की कमाई पर जीवन यापन।
  8. चोरी और अनैतिक व्यापार का निषेध।
  9. अश्लीलता और दुराचार पर पूर्ण रोक: चरित्र निर्माण और शुद्ध पारिवारिक मर्यादा।
  10. जीव मात्र पर दया और परोपकार: संकटग्रस्त और असहाय लोगों की निःस्वार्थ सेवा।
  11. मानव मात्र में भाईचारा: धर्म या पंथ के नाम पर नफरत को मिटाकर विश्व शांति की स्थापना।
  12. शास्त्र-सम्मत सद्भक्ति: वेदों और गीता के अनुसार जीवन जीने की प्रेरणा।
  13. पूर्ण मोक्ष की प्राप्ति: जीव को चौरासी लाख योनियों के आवागमन से हमेशा के लिए मुक्त करना।

खंड 5: व्यक्तिगत जीवन, आश्रम और लगे आरोपों पर स्पष्टीकरण

प्रश्न: आप पहले हरियाणा सरकार के सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर (JE) के पद पर कार्यरत थे। आपकी नौकरी छूटने को लेकर समाज में कई तरह की बातें चलती हैं – किसी का कहना है कि आपने समय पूरा होने पर नौकरी छोड़ी, तो किसी का कहना है कि आप सस्पेंड हुए थे। इसकी वास्तविक सच्चाई क्या है?

उत्तर: यह बात पूरी तरह निराधार है कि मुझे कभी सेवा से निलंबित (सस्पेंड) किया गया। मेरे पूरे सेवाकाल में कभी ऐसी कोई स्थिति नहीं आई। इसका पूरा आधिकारिक रिकॉर्ड आज भी सिंचाई विभाग के रोहतक और चंडीगढ़ कार्यालयों में देखा जा सकता है।

वास्तविक घटनाक्रम इस प्रकार रहा:

  • वर्ष 1988 में मेरी भेंट मेरे पूज्य गुरुदेव स्वामी रामदेवानंद जी महाराज से हुई, जो उस समय 104 वर्ष की आयु के एक अत्यंत ओजस्वी संत थे। उनके सत्संग और शास्त्रों के यथार्थ ज्ञान से प्रभावित होकर मैंने उनसे नाम दीक्षा ली।
  • मैं अपनी सरकारी नौकरी भी निष्ठापूर्वक करता रहा और गुरु सेवा व साधना भी साथ-साथ चलती रही। वर्ष 1994 में पूज्य गुरुदेव ने मुझे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया और सत्संग व नाम दीक्षा देने की आज्ञा प्रदान की।
  • 1994 से मई 1995 तक मैंने दोनों जिम्मेदारियां एक साथ निभाईं। परंतु जैसे-जैसे सत्संग और भक्तों की संख्या बढ़ी, विभागीय अधिकारियों को लगा कि मेरा समय सेवा में अधिक जा रहा है और वे असहज होने लगे।
  • जब अधिकारियों ने आपत्ति जताई, तो मैंने बिना किसी विवाद के 1995 में स्वेच्छा से अपने पद से विधिवत त्यागपत्र (Resign) दे दिया। मैंने परमात्मा की भक्ति और जनकल्याण के लिए अपनी सरकारी नौकरी का स्वतः त्याग किया था, कभी सस्पेंड नहीं हुआ।

प्रश्न: समाज और मीडिया में एक बहुत चर्चित आरोप रहा है कि आश्रम में जिस दूध की खीर बनाई जाती है, उसमें पहले आप स्नान करते हैं और फिर उसी दूध से खीर बनती है। इस दावे में कितनी सच्चाई है?

उत्तर: यह पूरी तरह से एक मनगढ़ंत, झूठा और घिनौना दुष्प्रचार है।

आश्रम में होने वाले विशाल समागमों में लाखों श्रद्धालु आते हैं। इतनी बड़ी संख्या के लिए कई क्विंटल दूध की खीर बनती है। क्या कोई विवेकशील व्यक्ति सोच भी सकता है कि इतने दूध में कोई स्नान करे और फिर लाखों लोग उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करें?

यह केवल मीडिया और विरोधी तत्वों द्वारा फैलाया गया एक सुनियोजित प्रोपगैंडा था:

  • क्या किसी के पास इसका कोई एक भी वीडियो फुटेज, फोटोग्राफ या प्रमाण है?
  • इसके विपरीत, पारंपरिक मंदिरों में मूर्तियों या साधुओं को दूध से नहलाने और उस दूध को नालियों में बहा देने के सैकड़ों वीडियो और तस्वीरें सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं।
  • हमारे आश्रम में अन्न और दूध जैसी खाद्य सामग्रियों को व्यर्थ करना या उनका अपमान करना घोर पाप माना जाता है। आश्रम में दूध और घी केवल श्रद्धालुओं के सात्विक भोजन और खीर-प्रसाद के लिए ही उपयोग में लाया जाता है।

प्रश्न: अतीत में आश्रम में हुई कानूनी कार्यवाहियों और टकराव के समय यह प्रचारित किया गया था कि आश्रम परिसर से कई आपत्तिजनक सामग्रियां बरामद हुई थीं। इस पर आपका क्या कहना है?

उत्तर: यह सब उस समय जनता और हमारे अनुयायियों को भ्रमित करने तथा उनके विश्वास को डिगाने के लिए फैलाई गई पूरी तरह बनावटी और झूठी अफवाहें थीं।

अखबारों की रिपोर्ट और बाद में अदालत की कार्यवाहियों से भी यह साफ हो गया कि ऐसा कुछ भी नहीं मिला था जैसा दुष्प्रचार किया गया था। यह केवल एक प्रशासनिक और राजनीतिक षड्यंत्र के तहत रची गई झूठी कहानी थी ताकि सतलोक आश्रम की छवि को जनमानस में धूमिल किया जा सके।

प्रश्न: आरोप यह भी लगाया जाता है कि महिला श्रद्धालु आश्रम में तो बहुत सेवा करती हैं, परंतु अपने घरों में कोई कामकाज नहीं करतीं। इसमें कितनी सच्चाई है?

उत्तर: यह बात भी पूरी तरह बेबुनियाद है। जो व्यक्ति आश्रम में निःस्वार्थ सेवा भाव सीखता है, वह अपने घर-परिवार में और अधिक जिम्मेदार और कर्मठ बन जाता है।

हम सत्संग में स्पष्ट समझाते हैं कि गृहस्थ धर्म और अपने कर्तव्यों का पालन करना ही पहला कर्म है। यदि कोई महिला या पुरुष अपने घर के बुजुर्गों, बच्चों और काम को छोड़कर केवल दिखावा करे, तो उसे भक्ति का कोई फल नहीं मिलता। हमारे भक्त अपने घरों में पहले से कहीं अधिक निष्ठा, प्रेम और समर्पण के साथ काम करते हैं।

प्रश्न: आश्रम द्वारा संकटग्रस्त परिवारों की बहुत बड़ी आर्थिक सहायता करने का एक प्रत्यक्ष मामला सामने आया है, जहाँ एक परिवार के नीलाम हो चुके मकान को छुड़ाया गया। उस परिवार की क्या स्थिति थी और आश्रम ने किस प्रकार उनकी मदद की?

उत्तर: वह परिवार अत्यंत विषम और हृदयविदारक स्थिति में था। उस घर के दोनों कमाऊ पुत्रों की असमय मृत्यु हो चुकी थी। परिवार में केवल दो महिलाएं, छोटे बच्चे और वृद्ध दादाजी बचे थे, जिनकी मानसिक स्थिति भी अत्यंत दयनीय हो चुकी थी। बैंक की किस्तें न भरे जाने के कारण उनका मकान बैंक द्वारा ₹23,47,000 में नीलाम कर दिया गया था और उन्हें मकान खाली करने का अंतिम नोटिस मिल चुका था, जिसमें केवल 5 दिन शेष थे।

उस परिवार ने अपनी व्यथा बताते हुए कहा:

  • वे मदद की आस लेकर चार बार हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री (CM) के पास भी गए और व्यक्तिगत रूप से मिले। परंतु मुख्यमंत्री कार्यालय से केवल इतना कहा गया कि ‘ब्याज माफ कराया जा सकता है, बाकी मूल कर्ज में कोई राहत नहीं मिल सकती।’
  • जब कहीं से कोई उम्मीद नहीं बची और वे पूरी तरह टूट चुके थे, तब वे रोते-बिलखते हमारे पास पहुँचे।
  • उनकी लाचारी देखकर हमने उसी समय अपनी सेवा समिति को निर्देश दिया कि तुरंत जाकर इस परिवार को कर्ज से बाहर निकाला जाए। जिस व्यक्ति ने नीलामी में वह मकान खरीदा था, उसने ₹11 लाख से अधिक का भारी मुनाफा रखकर ₹35,00,000 की मांग की।
  • हमने अपनी टीम से स्पष्ट कहा कि यदि वह व्यक्ति 35 लाख के बजाय 40 लाख रुपये भी मांगेगा, तब भी पूरे पैसे देकर इन बेसहारा बच्चों और बुजुर्गों की छत वापस दिलाई जाए।
  • आश्रम की ओर से पूरे ₹35 लाख का तत्काल भुगतान किया गया और 10-15 दिनों के भीतर सारी कागजी कार्यवाही पूरी करवाकर उस मकान की रजिस्ट्री पुनः उसी परिवार के नाम सुरक्षित करवा दी गई।

प्रश्न: क्या इतनी बड़ी आर्थिक सहायता देने के बदले उस परिवार के सामने ‘नाम दीक्षा’ लेने, आपका शिष्य बनने या घर में आपकी तस्वीर लगाने जैसी कोई शर्त रखी गई थी?

उत्तर: सहायता करने के लिए नाम दीक्षा लेने या शिष्य बनने की कोई शर्त नहीं होती। हमने उनसे स्पष्ट कह दिया था कि ‘इनकी मदद करो, चाहे ये नाम लें या न लें।’ न तो कोई फोटो लगाने का दबाव था और न ही कोई अन्य शर्त।

परोपकार और सेवा का नाम से कोई सौदा नहीं होता। जो व्यक्ति वास्तव में दुखी और लाचार है, उसकी पीड़ा दूर करना ही सच्चा धर्म है। लाखों लोगों ने आश्रम से चिकित्सा और अन्य प्रकार की मानवीय सहायता प्राप्त की है, और किसी के ऊपर कभी कोई पाबंदी नहीं लगाई गई।

प्रश्न: कुछ लोग यह शंका करते हैं कि यदि कोई व्यक्ति आपका नाम छोड़कर किसी अन्य गुरु की शरण में चला जाए, तो क्या उसे कोई पाप या श्राप लगता है?

उत्तर: हमारे यहाँ किसी को श्राप देने या भय दिखाने का कोई विधान नहीं है।

यदि कोई हमारा नाम छोड़ता है, तो उसे हमारी तरफ से कोई पाप नहीं लगता। परंतु आध्यात्मिक दृष्टिकोण से हानि यह होती है कि यदि वह किसी ऐसे स्थान पर चला जाता है जहाँ शास्त्रों के अनुसार यथार्थ भक्ति विधि नहीं है, तो उसकी आध्यात्मिक प्रगति वहीं रुक जाती है।

जैसे मोबाइल का चार्जर यदि मुख्य सॉकेट से हटा दिया जाए, तो फोन में कोई नई ऊर्जा नहीं आती और वह धीरे-धीरे बंद हो जाता है; ठीक उसी प्रकार शास्त्र-विरुद्ध मार्ग पर जाने से जीव की आध्यात्मिक ऊर्जा और पूर्व संचित पुण्यों का लाभ क्षीण हो जाता है।

खंड 6: संत समाज, खुली शास्त्रार्थ की चुनौती और मीडिया की भूमिका

प्रश्न: समाज में प्रेमानंद जी महाराज, अनिरुद्धाचार्य जी या शीर्ष शंकराचार्यों जैसे कई प्रतिष्ठित संत हैं, जिनके प्रति करोड़ों लोगों की गहरी आस्था है। आरोप लगता है कि आपके अनुयायी और मीडिया टीम अन्य संतों की आलोचना या निंदा करते हैं। इस पर आपका क्या दृष्टिकोण है?

उत्तर: यह आलोचना या निंदा नहीं है, बल्कि समाज की बहुत बड़ी गलतफहमी है। किसी को सही मार्ग दिखाना या शास्त्रों के प्रमाण सामने रखना निंदा नहीं कहलाता।

इसे एक व्यावहारिक उदाहरण से समझें:

  • यदि कोई व्यक्ति गधी को गाय मानकर पाल रहा हो और दूध की आस लगाए बैठा हो, तो उसे यह बताना कि ‘यह गाय नहीं, गधी है और इससे तुम्हें दूध नहीं मिलेगा’ – क्या यह निंदा है या उसे सच्चाई से अवगत कराना है?
  • आज स्थिति यह है कि अनेक प्रसिद्ध कथावाचकों और धर्मगुरुओं से जब पूछा जाता है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश के माता-पिता कौन हैं, तो कोई कहता है कि वे अजन्मा हैं, कोई शिव जी के पिता ब्रह्मा जी को बता देता है, तो कोई भगवान विष्णु को ही सबका मूल कह देता है। जब वे स्वयं शास्त्रों में लिखी उत्पत्ति का भेद नहीं जानते, तो भोली-भाली जनता को सही दिशा कैसे दे सकते हैं?
  • हम किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं हैं। हम केवल यह कहते हैं कि जो भी बात कही जाए, वह चारों वेदों, श्रीमद्भगवद्गीता और प्रामाणिक उपनिषदों की कसौटी पर खरी उतरनी चाहिए। शास्त्रों के विपरीत मनगढ़ंत ज्ञान परोसना समाज के साथ बहुत बड़ा धोखा है।

प्रश्न: आप पर यह भी आरोप लगता है कि आपने भगवान शिव या अन्य देवी-देवताओं के संबंध में अशोभनीय टिप्पणियां की हैं या शिवलिंग के स्वरूप पर विवादित बातें कही हैं। इस आक्षेप का क्या आधार है?

उत्तर: हमने अपनी तरफ से कभी कोई अपशब्द नहीं कहे। हम तो केवल वही पंक्तियां और प्रसंग पढ़कर सुनाते हैं जो स्वयं 18 पुराणों और ऐतिहासिक ग्रंथों में दर्ज हैं।

सच्चाई यह है:

  • हम भगवान शिव, माता पार्वती, श्री गणेश, श्री विष्णु और सभी देवी-देवताओं का पूर्ण आदर करते हैं। हमारे साधना विधान के प्रथम चरण में इन सभी पंचदेवों के वास्तविक मंत्र दिए जाते हैं और उनकी विधिवत साधना करवाई जाती है। इस पृथ्वी पर हम ही एकमात्र ऐसे संत हैं जो इन देवी-देवताओं के शास्त्रों में छिपे यथार्थ मंत्रों से जनसाधारण को अवगत कराते हैं।
  • यदि पुराणों में कोई ऐसी कथा या चरित्र-चित्रण लिखा है जो मर्यादा के विपरीत प्रतीत होता है और हम उसे खोलकर जनता के सामने रख देते हैं, तो उसमें हमारा क्या दोष है?
  • यदि विद्वान समाज यह मानता है कि मुगलों या राजा-महाराजाओं के काल में पुराणों में मिलावट हुई है, तो सभी धर्माचार्यों को आगे आकर उन विवादित हिस्सों को हटा देना चाहिए। गीता और वेदों में कोई मिलावट नहीं है, इसलिए हम केवल वेद और गीता को ही सर्वोच्च प्रमाणिक ग्रंथ मानते हैं।

प्रश्न: जब विभिन्न संतों और मतों में शास्त्रों को लेकर इतना भारी विरोधाभास है, तो आप सभी संतों और शंकराचार्यों को एक मंच पर आमंत्रित करके इन भ्रांतियों को दूर क्यों नहीं करते?

उत्तर: हमने यह प्रयास केवल मौखिक रूप से नहीं किया, बल्कि बाकायदा आधिकारिक स्तर पर वर्ष 2009 में किया था।

हमने चारों पीठों के पूज्य शंकराचार्यों और अन्य प्रमुख आचार्यों को विधिवत निमंत्रण पत्र भेजे थे:

  • इस आध्यात्मिक ज्ञान चर्चा का उद्देश्य किसी को नीचा दिखाना, मानहानि करना या अपनी जय-जयकार कराना नहीं था; बल्कि भ्रमित भक्त समाज को शास्त्रों के आधार पर एक निर्णायक और सही मार्ग देना था।
  • यह पत्र श्रृंगेरी मठ के प्रशासक के. एस. नारायण, ज्योतिष मठ के प्रबंधक प्रेमचंद्र उपाध्याय सहित चारों पीठों को रजिस्ट्री और व्यक्तिगत दूतों के माध्यम से भेजे गए थे, जिनकी आधिकारिक रिसीविंग आज भी हमारे पास सुरक्षित है।
  • इस ऐतिहासिक शास्त्रार्थ के लिए 11 अक्टूबर 2009 की तिथि तय की गई थी और इसे सतलोक आश्रम बरवाला में आयोजित किया जाना था।
  • देश की जनता तक यह चर्चा पारदर्शी रूप से पहुँचे, इसके लिए ‘ज़ी जागरण’ और ‘साधना’ जैसे प्रमुख टीवी चैनलों पर शाम 6 बजे से रात 10 बजे तक 4 घंटे का सीधा प्रसारण (लाइव टेलीकास्ट) भी बुक करवा दिया गया था।
  • दुर्भाग्यवश, उस निर्धारित कार्यक्रम में कोई भी शंकराचार्य या बड़ा आचार्य शास्त्रार्थ के लिए उपस्थित नहीं हुआ।

प्रश्न: क्या ऐसा शास्त्रार्थ मीडिया के कैमरों के सामने ही होना आवश्यक है? क्या यह बंद कमरे में बैठकर आपसी सहमति से नहीं सुलझाया जा सकता?

उत्तर: यह मीडिया और जनता के सामने ही होना चाहिए, बंद कमरे में इसका कोई औचित्य नहीं है।

इसे न्याय व्यवस्था के उदाहरण से समझें:

  • अदालत में एक जज बैठता है। एक तरफ वादी का वकील होता है और दूसरी तरफ प्रतिवादी का। दोनों वकील अपने-अपने साक्ष्य और कानूनी धाराएं जज के सामने रखते हैं। वे आपस में व्यक्तिगत झगड़ा नहीं करते, बल्कि साक्ष्यों के आधार पर अपनी दलीलें प्रस्तुत करते हैं। अंत में निष्पक्ष निर्णय सबके सामने आता है।
  • ठीक इसी प्रकार का प्रारूप शास्त्रार्थ का होना चाहिए। सामने विद्वान आचार्य बैठें, एक तरफ हम बैठें। वे अपना पक्ष वेदों और पुराणों के प्रमाणों से रखें कि शास्त्रों में अमुक बात लिखी है; फिर हम गीता और वेदों के मूल श्लोकों से प्रमाणित करें कि यथार्थ अर्थ क्या है।
  • इस पूरी प्रक्रिया में देश और दुनिया की जनता ‘जज’ की भूमिका में हो। जब खुली डिबेट होगी और प्रमाण सबके सामने स्क्रीन पर दिखेंगे, तभी समाज का भ्रम टूटेगा और दूध का दूध व पानी का पानी होगा।

प्रश्न: इस खुली चर्चा और साक्षात्कार के बाद आम जनता और पाठकों के लिए आपका क्या अंतिम संदेश है?

उत्तर: हमारा केवल इतना ही निवेदन है कि सुनी-सुनाई बातों, पूर्वाग्रहों या मीडिया के दुष्प्रचार पर आंख मूंदकर विश्वास न करें।

बिना स्वयं अनुभव किए किसी को भी सही या गलत नहीं ठहराया जा सकता। आप स्वयं आश्रम आएं, किसी निष्पक्ष व्यक्ति को भेजें, अपनी तसल्ली करें और देखें कि यहाँ कितने गलत काम होते हैं और कितने समाज सुधार के कार्य होते हैं। जब आप अपनी आंखों से सत्य देखेंगे और शास्त्रों के प्रमाणों का स्वयं मिलान करेंगे, तभी आपको विश्वास होगा।

हमारा उद्देश्य केवल यह है कि समाज से बुराइयां मिटें, पाखंड और नशा समाप्त हो, और प्रत्येक मानव आत्मा को आदि सनातन धर्म के यथार्थ ज्ञान के माध्यम से पूर्ण मोक्ष की प्राप्ति हो सके।

भक्ति व्यक्तिवादी सोच या लोक-रीतियों के बजाय मूल धर्मग्रंथों के अनुरूप हो 

इस विस्तृत संवाद में पारंपरिक मान्यताओं, आधुनिक सामाजिक प्रश्नों और धर्मग्रंथों के प्रमाणों के बीच एक गहरा वैचारिक मंथन देखने को मिला। साक्षात्कार के दौरान संत रामपाल जी महाराज का पूरा जोर इस बात पर रहा कि भक्ति और जीवन शैली को व्यक्तिवादी सोच या लोक-रीतियों के बजाय मूल धर्मग्रंथों (वेद, गीता और सूक्ष्म वेद) के अनुरूप ढाला जाना चाहिए।

इस पूरे विमर्श का व्यावहारिक पक्ष उनके 13 सूत्रीय समाज कल्याण कार्यक्रमों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है, जिसके अंतर्गत:

  • बिना दान-दहेज और फिजूलखर्ची के सादगीपूर्ण अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन।
  • मदिरा, तंबाकू, हुक्का और मांसाहार का पूर्ण त्याग कराकर नशा-मुक्त समाज का निर्माण।
  • छुआछूत, जातिगत भेदभाव और अंधविश्वास का समूल नाश।
  • संकटग्रस्त और असहाय लोगों की बिना किसी शर्त अथवा धर्म-जाति के भेद के सीधी आर्थिक व सामाजिक सहायता।
  • आध्यात्मिक ज्ञान चर्चा के लिए खुले मंच पर शास्त्र-सम्मत विचार-विमर्श।

साक्षात्कार के अंत में निष्पक्ष शास्त्रार्थ और सार्वजनिक डिबेट का जो प्रस्ताव दोहराया गया, वह यह संदेश देता है कि सत्य की खोज केवल पूर्वाग्रहों या मीडिया की बनाई छवियों से नहीं, बल्कि आमने-सामने बैठकर प्रमाणिक तथ्यों की समीक्षा करने से ही संभव है। अंततः, किसी भी विचार, दर्शन या पद्धति का वास्तविक मूल्यांकन रूढ़िवादिता से परे हटकर उसके सामाजिक प्रभाव, नैतिक आचरण और प्रमाणिकता के आधार पर करना ही विवेकशील समाज का कर्तव्य है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्र. 1. संत रामपाल जी महाराज कौन हैं? 

उत्तर: संत रामपाल जी महाराज सतलोक आश्रम के संचालक और आध्यात्मिक मार्गदर्शक हैं। वे पूर्व में हरियाणा सरकार के सिंचाई विभाग में कनिष्ठ अभियंता (JE) के पद पर सेवारत थे। वर्ष 1988 में स्वामी रामदेवानंद जी महाराज से दीक्षा लेने और 1994 में आध्यात्मिक उत्तराधिकार प्राप्त करने के बाद, उन्होंने 1995 में अपनी सरकारी सेवा से त्यागपत्र दे दिया। वे कबीर साहेब के तत्वज्ञान, वेद-गीता आधारित साधना और नशा मुक्ति, दहेज उन्मूलन व जाति-प्रथा निवारण जैसे सामाजिक सुधार अभियानों के लिए जाने जाते हैं।

प्र. 2. ‘सत साहिब’ का वास्तविक अर्थ क्या है? 

उत्तर: ‘सत्य’ का अर्थ है अविनाशी – जो कभी समाप्त नहीं होता, और ‘साहिब’ का अर्थ है स्वामी, प्रभु या भगवान। इसलिए ‘सत साहिब’ का वास्तविक तात्पर्य उस अविनाशी, शाश्वत और सर्वोपरि परमेश्वर से है।

प्र. 3. संत रामपाल जी महाराज किस ‘राम’ को अपना इष्ट मानते हैं? 

उत्तर: वे कबीर परमेश्वर (परम अक्षर ब्रह्म) को अपना इष्ट मानते हैं। उनके अनुसार, दशरथ पुत्र श्री राम तीन लोक के पालनकर्ता (भगवान विष्णु के अवतार) हैं, जबकि कबीर साहेब उस सर्वशक्तिमान ‘पाँचवें राम’ की ओर संकेत करते हैं जो समस्त सृष्टि के मूल रचयिता और अविनाशी परमेश्वर हैं।

प्र. 4. आश्रम में होने वाले 17 मिनट के ‘रमैणी’ विवाह की क्या विशेषता है? 

उत्तर: रमैणी विवाह पूरी तरह सादगीपूर्ण और आडंबर-मुक्त पद्धति है। इसमें बिना किसी दान-दहेज, बारात, बैंड-बाजे, सात फेरों या फिजूलखर्ची के केवल 17 मिनट में कबीर साहेब और संत गरीबदास जी की पवित्र वाणी (असुर निकंदन रमैणी) के पाठ द्वारा विवाह संपन्न कराया जाता है।

प्र. 5. संत रामपाल जी महाराज के 13 सूत्रीय समाज सुधार कार्यक्रम क्या हैं? 

उत्तर: यह अभियान समाज के व्यावहारिक उत्थान के लिए समर्पित है। इसके मुख्य बिंदु हैं:

  • दहेज-मुक्त सादगीपूर्ण विवाह (रमैणी)।
  • पूर्ण नशा मुक्ति (शराब, तंबाकू, हुक्का, बीड़ी आदि का पूर्ण त्याग)।
  • मांसाहार का पूर्ण निषेध और शुद्ध शाकाहार।
  • जातिवाद व छुआछूत की समाप्ति और अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहन।
  • कन्या भ्रूण हत्या का विरोध और बेटियों का आदर।
  • अंधविश्वास, तंत्र-मंत्र और मनमाने पाखंडों पर रोक।
  • भ्रष्टाचार, चोरी और रिश्वतखोरी का परित्याग।
  • संकटग्रस्त व असहाय लोगों की निःस्वार्थ मानवीय सहायता।
  • शास्त्र-सम्मत सद्भक्ति और विश्व शांति की स्थापना।

प्र. 6. क्या आश्रम से आर्थिक सहायता प्राप्त करने के लिए नाम दीक्षा लेना अनिवार्य है? 

उत्तर: नहीं, संकटग्रस्त और बेसहारा लोगों की सहायता केवल मानवीय आधार पर की जाती है। इसके बदले नाम दीक्षा लेने, अनुयायी बनने या आश्रम की तस्वीर लगाने जैसी कोई शर्त नहीं रखी जाती।

प्र. 7. क्या संत रामपाल जी महाराज अन्य संतों या पूजा-पद्धतियों का विरोध करते हैं? 

उत्तर: वे किसी व्यक्ति विशेष का विरोध नहीं करते, बल्कि शास्त्रों (वेद, श्रीमद्भगवद्गीता) के विपरीत चलने वाले ‘मनमाने आचरण’ और आडंबर का विरोध करते हैं। उनका मत है कि प्रत्येक आध्यात्मिक साधना और पूजा-पद्धति धर्मग्रंथों के प्रमाणों के अनुरूप होनी चाहिए।

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