Rabindranath Tagore Jayanti 2022: मानवता का संदेश देते रबीन्द्रनाथ टैगोर

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Rabindranath Tagore Jayanti in Hindi [2022] | भारतवर्ष में गुरुदेव नाम से प्रसिद्ध रबीन्द्रनाथ ठाकुर जी का जन्म 07 मई 1861, (बंगाली पंचाग के बोईसाख माह के 25वें दिन), में कलकत्ता  (वर्तमान के कोलकाता) में हुआ था । इस वर्ष रबीन्द्रनाथ ठाकुर जी की 161वीं जयंती है। 

Rabindranath Tagore Jayanti in Hindi [2022] के मुख्य बिंदु

● रबीन्द्रनाथ टैगोर की जीवनी 

● मानवता का संदेश देते रबीन्द्रनाथ ठाकुर

● रबीन्द्रनाथ ठाकुर का शिक्षा दर्शन

● वर्तमान में मानवता की पुनः स्थापना

● सन्त रामपाल जी ने किया कट्टरवाद खत्म

रबीन्द्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) का प्रारम्भिक जीवन

रबीन्द्रनाथ  जी (Rabindranath Tagore Jayanti in Hindi) अपनी माता श्री शारदा देवी और पिता श्री देवेंद्रनाथ ठाकुर जी की सबसे छोटी संतान थे। इन्हें बचपन में “रबी” नाम से बुलाते थे। रवींद्र जी का जन्म कलकत्ता (वर्तमान के कोलकाता) के उच्च ब्राह्मण परिवार में हुआ था। रवींद्र ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सेंट जेवियर विद्यालय में शुरू की। रवींद्रनाथ जी के पिता श्री देवेंद्रनाथ ठाकुर जी की इच्छा थी कि रवींद्र जी बैरिस्टर बने। 

जिसके लिए उन्होंने उच्च शिक्षा के उद्देश्य से रवींद्र जी को इंग्लैंड भेजा। रवींद्र जी ने ब्रिजटोन (पूर्वी ससेक्स) के एक पब्लिक स्कूल में सन 1861 में प्रवेश पाया। बैरिस्टर की पढ़ाई के लिए इन्होंने लंदन विश्वविद्यालय में भी दाखिला लिया परंतु अरुचि होने के कारण उन्होंने कुछ समय बाद बैरिस्टर की पढ़ाई छोड़कर, शेक्सपीयर के द्वारा लिखे कई लेख खुद से ही पढ़ने शुरू किए।

रबीन्द्रनाथ टैगोर का वैवाहिक जीवन (Marriage Life of Rabindranath Tagore in Hindi)

इंग्लैंड से लौटकर रबीन्द्रनाथ जी का विवाह ब्राह्मण समाज की रीति रिवाज के अनुसार बेनिमाधोब रॉय चौधरी की 9 वर्षीय पुत्री मृणालिनी जी से 9 दिसंबर 1883 को हुआ। हालाकि इनका वैवाहिक जीवन इतना सुखमय नही था। मृणालिनी जी से रबीन्द्रनाथ ठाकुर की पांच संताने थी जिनमें की दो पुत्र रथींद्रनाथ ठाकुर, शमींद्र नाथ ठाकुर और तीन पुत्रियां मधुरिका देवी, रेणुका देवी और मीरा देवी ठाकुर जी थी । विवाह के 19 वर्ष पश्चात , मात्र 28 वर्ष की उम्र में मृणालिनी जी की मृत्यु हो गई। मृणालिनी जी की मृत्यु के बाद रबीन्द्रनाथ जी ने कोई विवाह नहीं किया।

साहित्यकार रबीन्द्रनाथ ठाकुर

रबीन्द्रनाथ ठाकुर बचपन से ही कविताओं और कथाओं के प्रति रुझान  रखते थे। इन्होंने आठ वर्ष की उम्र में ही कविता लिखना प्रारंभ कर दिया था। इसके बाद इन्होंने अनेक कविताएं लिखीं, जिनमें से सबसे प्रथम प्रकाशित कविता ‘अग्रहायण’ थी जो 1874 में प्रकाशित की गई थी। इनके द्वारा 50 से अधिक कविताएं भी लिखी गईं, इनमें प्रसिद्ध कविता ‘गीतांजली’ भी थी । रबीन्द्रनाथ जी के द्वारा कई अनेक उपन्यास भी लिखे गए थे, जिनमें सर्व प्रथम ‘उपन्यास वाल्मीकि’ प्रतिभा था ।

■ Read in English | Rabindranath Tagore Jayanti: On 161st Birth Anniversary Know About the Actual ‘Gurudev’

इन्होंने और भी अनेक उपन्यास लिखे जिनमे मुख्यतः ‘गोरा’, ‘चोखर बाली’, ‘चार अध्याय’ हैं । रबीन्द्रनाथ ठाकुर जी मुख्य रूप से बंगला में रचनाएं लिखते थे परंतु उन्होंने हिंदी और संस्कृत भाषा में भी रचनाएं की। इन्होंने कई लेखों का अंग्रेजी अनुवाद भी किया था। 

राष्ट्रगान के रचयिता रबीन्द्रनाथ ठाकुर

साहित्य के अलावा रबीन्द्रनाथ जी संगीत में भी विशेष रुचि रखते थे। यही कारण था कि इन्होंने विभिन्न संगीत नाटक लिखे थे। कवि होने के साथ साथ रवींद्र नाथ ठाकुर जी उपन्यासकार, निबंधकार, नाटककार, कहानी लेखक,समाज सेवक और लघु कथा लेखक भी थे । रवींद्र नाथ ठाकुर जी चित्रकला में भी निपुण थे । भारत के राष्ट्रगान जन-गण-मन और बांग्लादेश के राष्ट्रगान आमार-शोनार-बांग्ला की रचना का महान कार्य भी इन्होंने ही किया था ।

Rabindranath Tagore Jayanti [Hindi]: नोबल पुरस्कार पाने वाले एशिया के प्रथम कवि

गीतांजलि के 1912 में प्रकाशित होने पर रबीन्द्रनाथ जी को सन 1913 में  नोबल पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया था। रवींद्र नाथ ठाकुर जी एशिया में सबसे प्रथम नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कवि के नाम से भी जाने जाते हैं। रबीन्द्रनाथ ठाकुर को 1915 में जॉर्ज पंचम की ओर से नाइटहुड यानी ‘सर’ की उपाधि से नवाजा गया था। उन्होंने 1919 में हुए जलियाँ वाला बाग कांड से आहत होकर ब्रिटिश सरकार को यह उपाधि लौटा दी थी। 

रबीन्द्रनाथ ठाकुर के समाजोपयोगी कार्य (Social Works of Rabindranath Tagore Jayanti in Hindi)

रबीन्द्रनाथ ठाकुर की शिक्षा नीति अब तक उल्लेखनीय है। वे शिक्षा को प्रकृति एवं रुचि के अनुरूप बनाना चाहते थे। उन्होंने इसी प्रकार प्रकृति की गोद में शिक्षा के लिए शांतिनिकेतन की स्थापना की। उन्हें मानव की क्षमता पर विश्वास था। रबीन्द्रनाथ ठाकुर कट्टर राष्ट्रवाद के विरोधी थे। वे ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ पर आधारित समाज के पक्षधर थे। रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने शांतिनिकेतन, श्रीनिकेतन, शिक्षा सत्र जैसी संस्थाओं की स्थापना की थी। रबीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित धर्म शिक्षा, स्त्री शिक्षा, आइडियल्स ऑफ एजुकेशन, शिक्षा सार कथा, माई एजुकेशन मिशन, टू द स्टूडेंट्स, शिक्षा और संस्कृति रचनाएँ उल्लेखनीय हैं।

मानवता को सर्वोपरि रखते थे रबीन्द्रनाथ 

रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने कट्टर राष्ट्रवाद का सदा ही विरोध किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से यह कहा था कि वे मानवता के ऊपर देशभक्ति की जीत हावी नहीं होने देंगे। आज से सौ बरस पहले ही वे खुलकर स्पष्ट कहने की ताक़त रखते थे। अपने निबंध नेशनलिज़्म इन इंडिया में रवींद्र राष्ट्रवाद की आलोचना करते हैं क्योंकि इससे उत्पन साम्राज्यवाद अंततः मानवता का संहार करता है। रबीन्द्रनाथ पूरे विश्व को एकसाथ देखने वाले विश्व नागरिक थे। इस पर रबीन्द्रनाथ टैगोर ने अपने निबंध नेशनलिज़्म इन इंडिया में भी निशाना साधा है। भारत में जातिवाद खत्म करने की कड़ी में उन्होंने परम आदरणीय सन्त कबीर साहेब एवं नानक, चैतन्य आदि संतों का नाम लिया है।

“….जब तक मैं जिंदा हूँ मानवता के ऊपर देशभक्ति की जीत नहीं होने दूंगा।” – रबीन्द्रनाथ टैगोर

वर्तमान में मानवता की पुनः स्थापना

आज के समय में मानवता की पुनः स्थापना सन्त रामपाल जी महाराज ने की है। संत रामपाल जी महाराज इतिहास से अब तक में एकमात्र पहले ऐसे सन्त हैं जिन्होंने धर्म को सही मायनों में समाज के सामने स्पष्ट किया। धर्म वास्तव में केवल आस्तिकता भर नहीं है बल्कि एक जीवन पद्धति है जिसे सन्त रामपाल जी महाराज ने लोगों के जीवन में उतारा है। सन्त रामपाल जी ने सर्व धर्मों के ऊपर मानवता के धर्म का नारा दिया और सभी धर्मों के आधार पर वास्तविक तत्वज्ञान प्रदान किया है। यही सनातन है, यही सत्य है। 

सन्त रामपाल जी महाराज ने सभी भौगोलिक सीमाओं से परे सार्वदेशिक स्तर पर तत्वज्ञान की स्थापना की है। यही कारण है कि देशविदेश से लोग तत्वज्ञान सुनकर सन्त रामपाल जी से नामदीक्षा ले रहे हैं। रबीन्द्रनाथ टैगोर गुरुदेव कहलाए पर वास्तव में पूर्ण गुरु जो आध्यात्मिक ज्ञान से पूर्ण परिचित है वो संत रामपालजी महाराज है, जो विश्व को परम शांति और मोक्ष प्रदान करने के लिए अवतरित हुए हैं।

जीव हमारी जाति है, मानव धर्म हमारा |

हिन्दु मुस्लिम सिक्ख ईसाई, धर्म नहीं कोई न्यारा ||

सन्त रामपाल जी महाराज के समाज सुधार

सन्त रामपाल जी ने मात्र वैश्विक स्तर पर तत्वज्ञान की नींव नहीं रखी बल्कि समाज में व्याप्त विविध प्रकार की बुराइयों को अपने तत्वज्ञान के माध्यम से दूर किया है। समाज को नशामुक्ति, दहेजमुक्ति, भ्रष्ट आचरण से मुक्ति की ओर ले जाने वाले पहले और एकमात्र सन्त रामपाल जी महाराज हैं। उन्होंने लाखों की संख्या में युवाओं को सत्य मार्ग पर लाकर समाज पर बड़ा उपकार किया है। 

सन्त रामपाल जी महाराज ने जातिवाद खत्म किया है। जातिवाद समाज की बड़ी समस्या रही है जिसने अस्पृश्यता को जन्म दिया। संत रामपाल जी महाराज ने अपने तत्वज्ञान के माध्यम से वह सब समाज के लिए किया है जो पूर्व में अनेकों समाज सुधारकों द्वारा नहीं किया जा सका। सन्त रामपाल की महाराज के तत्वज्ञान को समझने के लिए पढ़ें मुफ़्त पुस्तक ज्ञान गंगा, अथवा डाउनलोड करें सन्त रामपाल जी महाराज एप्प। देखें सतलोक आश्रम यूट्यूब चैनल।

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