Eid al-Fitr 2022 [Hindi] | ईद–उल–फितर पर जानिए कौन है वह कादिर अल्लाह जिसकी इबादत से सभी गुनाह नष्ट हो जाते है?

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Last Updated on 29 April 2022, 11:17 PM IST | ईद–उल–फितर 2022 (Eid al-Fitr in Hindi) | भारत एक ऐसा देश है जहां साल भर त्योहार चलते रहते हैं चाहे वह किसी भी धर्म का हो। इसी कड़ी में हम आपको ले चलते हैं मुस्लिम धर्म में मनाए जाने वाले त्योहार (उत्सव) ईद-उल-फितर की ओर तो चलिए जानते हैं ईद-उल-फितर और अल्लाह ताला की सही जानकारी।

इस्लाम में ईद क्या है? (What is Eid in Islam) 

ईद का अनुवाद यदि हम आम भाषा में करें तो इसका सरल अर्थ होता है दावत या उत्सव या छुट्टी। रमजान के अंत में ईद उल फितर (Eid al-Fitr in Hindi) आती है, जो की उपवास तोड़ने के लिए जानी जाती है। सुन्नी में प्रति वर्ष केवल 2 बड़ी ईद होती है। 

ईद का पूरा नाम क्या है?

हर साल करीबन 2 ईद के पर्व को मुसलमान समाज द्वारा मनाया जाता है। ईद–उल–फितर और ईद–उल–जुहा (Eid ul Adha) यह ईद के पूरे नाम कहे गए है।

मुसलमान ईद कैसे मनाते है?

ईद-उल-फितर पर लोग एक दूसरे से गले मिलकर ईद की मुबारकबाद देकर इस त्योहार को मानते है। इस पर्व पर खासतौर से सेंवई बनाई जाती हैं। यह पर्व भाईचारे का संदेश देने के साथ साथ आपस में मिलजुलकर प्यार से रहना भी सिखाता है। रमजान के पूरे महीने रोजा रखने की ताकत देने के बदले इस मौके पर अल्लाह का शुक्रिया अदा किया जाता है। इसके अलावा इस पर्व पर जकात यानी अपनी कमाई की एक खास रकम जरूरतमंदों और गरीबों के लिए निकाली जाती है।

ईद-उल-फितर क्या है?

यह इस्लामिक त्योहार ईद उल फितर (Eid al-Fitr in Hindi) मीठी ईद के नाम से भी जाना जाता है। रोजे़ पूरे होने पर ईद का त्योहार मनाया जाता है। इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक, रमजान के बाद 10वें शव्वाल की पहली तारीख को ईद-उल-फितर मनाई जाती है। एक महीने के रोजे़ पूरे होने की खुशी में लोग एक दूसरे से गले मिलते हैं और ईद मनाते हैं। ईद एक महत्वपूर्ण त्योहार है इसलिए इसकी छुट्टी होती है।

ईद–उल–फितर कौनसी ईद है?

ईद उल फितर (Eid al-Fitr in Hindi) | को मीठी ईद भी कहा जाता है। जिसे चांद रात मुबारक के बाद मनाया जाता है। यह रमजान के अंत का प्रतीक भी माना जाता है।

ईद-उल-फितर 2022 में कब है? (Eid al-Fitr Date in India )

इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार, रमजान के रोजे़ (उपवास) पूरे होने के बाद 10वें महीने शव्वाल की पहली तारीख को ईद-उल-फितर मनाई जाती है। इस वर्ष ईद का त्योहार कब मनाया जाएगा यह तय नहीं है क्योंकि ईद-उल-फितर का त्योहार ईद का चांद दिखने पर ही तय होता है। अगर इस वर्ष चांद 2 मई को दिखाई दिया तो ईद 3 मई को मनाई जाएगी यदि चांद 3 मई को दिखाई दिया तो 4 मई को ईद उल फितर मनाई जाएगी। 

ईद-उल-फितर का अर्थ क्या है? (Meaning of Eid al-Fitr in Hindi)

आइए अब जानते हैं इस्लाम धर्म में मनाए जाने वाले त्योहार ईद-उल-फितर के बारे में कि आखिर क्या है इसका अर्थ। ईद का मतलब जश्न (ख़ुशी) होता है तथा फितर का अर्थ दान होता है। इसलिए इस दिन लोग खुशी के साथ गरीबों में मिठाई, कपड़े एवं उपहार आदि दान करते हैं और आपस के मतभेद भुलाकर गले मिलते हैं। यह ईद-उल-फितर खुशी मानने का दिन है तथा दिल खोलकर गरीबों में दान करने का दिन माना जाता है लेकिन हमारे शास्त्र बताते है कि दान भी तभी सफल होता है जब उसे बाखबर यानी तत्वदर्शी संत के कहे अनुसार किया जाए।

ईद-उल-फितर की जानकारी

रमजान में ईद-उल-फितर का त्योहार रमजान का चांद डूबने और ईद का चांद नजर आने पर मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसी महीने में ही कुरान-ए-पाक का अवतरण हुआ था।

ईद-उल-फितर का इतिहास (History of Eid al-Fitr in Hindi)

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि किसी न किसी वस्तु का अपना एक इतिहास होता है। जिस प्रकार रामायण का इतिहास श्री रामचंद्र जी से जुड़ा हुआ है और महाभारत का इतिहास पांडवों से जुड़ा हुआ है इसी प्रकार ईद-उल-फितर का भी एक अपना इतिहास है और यह इतिहास “जंग-ए-बदर” से जुड़ा है।

मुस्लिम राष्ट्र सऊदी अरब में मदीना शहर से लगभग 200 किमी दूर स्थित एक कुआं था जिसका नाम बदर था। यह कुएं वाली वही जगह है जहां सन 624 ईस्वी में “जंग-ए-बदर” हुआ था। इसलिए इस जगह का नाम भी इतिहास में “जंग-ए-बदर” के नाम से विख्यात है। पैगम्बर मोहम्मद और अबु जहल के बीच जंग (युद्ध) हुई थी। इस जंग में पैगम्बर हजरत मुहम्मद के साथ मात्र 313 सैनिक ही थे और अबु जहल के साथ 1300 से भी ज्यादा सैनिक थे। लेकिन फिर भी जीत पैगम्बर हजरत मोहम्मद ने ही हासिल की थी।

पैगंबर मोहम्मद ने अपने सभी सैनिकों का तहे दिल से शुक्रिया अदा किया और “जंग-ए-बदर” की जंग (युद्ध) जीतने की खुशी में उन्होंने एक दूसरे को गले मिलकर खुशी के आँसू बहाते हुए खुशियां मनाई और गरीबों में मिठाइयां, सेवइयां, कपड़े एवं उपहार आदि फितरा (दान) अदा किया। तब से ईद-उल-फितर मनाई जाने लगी। पहली ईद-उल-फितर इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार हिजरी संवत 2 यानी 624 ईस्वी में पहली बार (करीब 1400 साल पहले) मनाई गई थी। जब पैगम्बर मोहम्मद और अबु जहल के बीच जंग हुई थी “जंग-ए-बदर”। मोहम्मद जी ने जंग (युद्ध) जीतने की खुशी में पहली मीठी ईद या ईद-उल-फितर मनाई थी। तभी से इस्लामिक राष्ट्र इसे सबसे बड़े त्योहार के रूप में मानने लगे।

ईद उल फितर क्यों मनाई जाती हैं?

इस्लाम में ईद-उल-फितर को सबसे बड़ा पाक पर्व (त्यौहार) मना कर इस्लामिक लोगों के द्वारा “जंग-ए-बदर” को याद किया जाता है जिसमें पैगम्बर मुहम्मद युद्ध में विजयी हुए थे। इसी खुशी में ईद-उल-फितर को त्योहार के रूप में मनाते हैं।

मुसलमान ईद-उल-फितर पर क्या खाते हैं?

सेवईया (सिवैया) इस त्योहार (ईद) का सबसे महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थ है जिसे सभी लोग बड़े ही शौक से खाते हैं। इसी के साथ कई तरह की मिठाइयां बनाते हैं और एक दूसरे के साथ मिठाई खाते और खिलाते है।

ईद-उल-फितर 2022 (Eid al-Fitr in Hindi) पर जानिए ईद का महत्व

मुस्लिम समुदाय में यह में बताया जाता हैं कि पैगम्बर हजरत मुहम्मद ने “जंग-ए-बदर” यानी बदर की लड़ाई में जीत हासिल की थी। इस जीत की खुशी में हज़रत मोहम्मद ने सबका मुंह मीठा करवाया था। मीठे पकवान जैसे कि सेवई, मिठाई जैसे बहुत तरह पकवान बनाए। इसी दिन को मीठी ईद या ईद-उल-फितर के रूप में मनाया जाने लगा था।

किसने करी बदर के युद्ध में हज़रत मुहम्मद की मदद?

बदर का युद्ध जो हज़रत मुहम्मद और विरोधियों के बीच हुआ था उसमें हज़रत मुहम्मद का साथ अली नामक युवक ने भी दिया था। वास्तव में अली को कबीर परमात्मा अल खिद्र के रूप में मिले थे और उन्होंने अली को 1 मंत्र दिया था तथा कहा था कि इस मंत्र के जाप से पाप कर्म नाश होते है। अली ने अल खिद्र जी से युद्ध के लिए आशीर्वाद मांगा था। तब कबीर साहेब ने अल खिद्र के रूप में अली को एक शब्द बताया। उसका जाप करके अली ने युद्ध जीता जो मुहम्मद और विरोधियों के बीच हुआ था।

बाद में जब अली ने हजरत मोहम्मद को बताया कि उसे अल खिद्र ने एक मंत्र दिया है तब हजरत मोहम्मद ने अली से कहा कि आपको अल्लाह ने बहुत बड़ा नाम सिखाया है अली ने कहा कि मैं युद्ध के समय में भी उस नाम का जाप कर रहा था। 

गरीब अली अलहका शेर है, सीना स्वाफ शरीर। 

कृष्ण अली एकै कली, न्यारी कला कबीर।।

संत गरीबदास जी महाराज ने बताया है कि अली अल्लाह का शेर है वह सदा हजरत मोहम्मद का साथ देने के लिए तैयार रहा। जब अली तलवार ऊंची करता था तो उसकी तलवार तारों के पार निकल जाती थी। वास्तव में यह शक्ति अल खिद्र यानी अल्लाह कबीर की थी जिसके माध्यम से वे धार्मिक आत्माओं की मदद करते हैं। पृथ्वी पर मौजूद सभी जीव परमात्मा कबीर की संताने हैं।

ईद-उल-फितर पर जानिए ,आख़िर कौन हैं अल्लाह ताला?

आपने परमात्मा के अनेकों नाम सुने होंगे जैसे कि राम, रब, खुदा, गॉड आदि। मुसलमानों में उसी को अल्लाह कबीर, अल्लाह हु अकबर के नाम से जाना जाता है, जिसका प्रमाण पवित्र कुरान शरीफ में भी है। तो चलिए अब आपको कुरान शरीफ से रूबरू कराते हैं और जानते हैं आख़िर कौन हैं अल्लाह। 

पवित्र “कुरान शरीफ” सुरत फुर्कानि 25, आयत 52, 58, 59 में कबीर नामक अल्लाह की महिमा का गुणगान किया है वह पूर्ण परमात्मा है जिसे अल्लाहु अकबर (कबीर) कहते हैं। उस अल्लाह का वास्तविक नाम कविर्देव हैं। 

  • पवित्र “कुरान शरीफ” सूरत फुर्कानी 25 आयत 52:-

आयत 52:- फला तुतिअल् – काफिरन् व जहिद्हुम बिही जिहादन् कबीरा (कबीरन्)।।

भावार्थ:- “कुरान शरीफ़ की सूरत फुर्कानी 25 आयत 52 में हज़रत मोहम्मद का खुदा स्वयं कह रहा है कि हे पैगम्बर! आप उन काफिरों (एक प्रभु की भक्ति त्याग अन्य की पूजा करने वाले।) का कहा न मानना क्योंकि वे लोग कबीर को पूर्ण परमात्मा नहीं मानते। इसलिए आप कुरान के ज्ञान आधार पर दृढ़ रहना और यह विश्वास रखना कि कबीर ही अल्लाहु अकबर है

  • पवित्र “कुरान शरीफ” सूरत फुर्कानी 25 आयत 58:

आयत 58:- व तवक्कल् अलल् – हरिूल्लजी ला यमूतु व सब्बिह् बिहम्दिही व कफा बिही बिजुनूबि अिबादिही खबीरा (कबीरा)।।

भावार्थ:- कुरान शरीफ़ की सूरत फुर्कानी 25 आयत 58 में हज़रत मोहम्मद का खुदा (प्रभु) अपने से अन्य किसी अल्लाह की ओर इशारा कर रहा है कि तू उस जिंदा पर भरोसा रख जो तुझे जिंदा महात्मा के रूप में मिला था। वह वास्तव में अविनाशी है यानी वह कभी मरने वाला नहीं है। उसकी पवित्र महिमा का गुणगान किए जा। वह पूजा (इबादत) करने योग्य है। पापनाशक है यानी अपने बन्दों के सर्व गुनाहों को माफ़ करने वाला है।

  • पवित्र “कुरान शरीफ” , सूरत फुर्कानी 25 आयत 59

आयत 59:- अल्ल्जी खलकस्समावाति वल्अर्ज व मा बैनहुमा फी सित्तति अय्यामिन् सुम्मस्तवा अलल्अर्शि अर्रह्मानु फस्अल् बिही खबीरन्(कबीरन्)।।

भावार्थ:- कुरान शरीफ़ की सूरत फुर्कानी 25 आयत 59 में कुरान शरीफ़ का ज्ञान देने वाला अल्लाह (प्रभु) कह रहा है कि यह कबीर वहीं अल्लाह है जिसमें ज़मीं (जमीन) से लेकर अर्श (आसमान) तक जो भी विद्यमान है सब की छः दिन में सृष्टि रची और सातवें दिन सतलोक में सिंहासन पर विराजमान हुए। उस अल्लाह की ख़बर (जानकारी) तो कोई बाखबर (इल्मवाले) ही दे सकता है कि अल्लाह की प्राप्ति कैसे होगी। कुरान शरीफ़ ज्ञान दाता कह रहा है कि मैंं उस अल्लाह के बारे में नही जानता जो अविनाशी है सत्यलोक में विराजमान हैं उसकी वास्तविक जानकारी तत्वदर्शी (बाखबर) संत से पूछो। मैं नहीं जानता।

ईद उल फितर पर जानिए हज़रत मोहम्मद को मिले कबीर परमात्मा

पूर्ण परमात्मा कविर्देव (कबीर साहिब) चारों युगों में आते हैं और अच्छी आत्माओं को मिलते हैं उन्हें तत्वज्ञान समझाते हैं। उन्हीं अच्छी आत्माओं में से हज़रत मोहम्मद भी एक है जिन्हें कबीर साहिब (अल्लाहु अकबर) मिले उन्हें तत्वज्ञान समझाया और सतलोक दिखाया।

कबीर परमात्मा ने कहा –

हम मुहम्मद को सतलोक ले गया। इच्छा रूप वहाँ नहीं रहयो।।

उल्ट मुहम्मद महल पठाया। गुज बीरज एक कलमा लाया।।

भावार्थ:- कबीर परमात्मा मुस्लिम समुदाय के नबी मुहम्मद को सतलोक ले गए थे लेकिन हज़रत मुहम्मद के 1 लाख 80 हज़ार शिष्य होने के कारण उनका बहुत सम्मान हो रहा था। उनकी प्रभुता नही छूटी इस वजह से सतलोक में रहने की इच्छा प्रकट नहीं की, तो परमात्मा ने हज़रत मोहम्मद को वापिस नीचे शरीर में भेज दिया था।

फिर नबी मोहम्मद ने अपने एक लाख अस्सी हजार शिष्यों को शिष्यों को समझाया कि परमात्मा ने उसे सतलोक से आदेश देकर भेजा है। नबी मोहम्मद जब सतलोक से आ गए उसके बाद जो परमात्मा कबीर जी ने उन्हे सतलोक में आदेश दिया था। वहीं आदेश उन्होंने अपने शिष्यों को समझाया।

नबी मुहम्मद जी को रोजा(व्रत), बंग (ऊँची आवाज में प्रभु स्तुति करना) तथा पांच समय की नमाज करने का तो आदेश कहा था परन्तु गाय काटने मुर्गे को काटने का आदेश नहीं दिया था। मुस्लिम समुदाय में मांस को प्रसाद रूप में खाते हैं जबकि मांस खाना मांस हराम है इसे खाने का आदेश उस अल्लाह का नहीं है वह तो बहुत दयालु है, नेक है। वह मांस खाने का ऐसा आदेश नहीं दे सकता।

वर्तमान में अल्लाह का संदेशवाहक

हमारे शास्त्रों में प्रमाण है कि केवल पूर्ण संत ही पूर्ण परमात्मा से मिला सकता है और विश्व में इस वक्त पूर्ण संत अगर कोई है तो वह है संत रामपाल जी महाराज जो सभी शास्त्रों से पूर्ण ज्ञान देते हैं। संत रामपाल जी महाराज सिर्फ ज्ञान ही नहीं समझाते बल्कि उन मंत्रों की नाम दीक्षा भी देते हैं जिनकी साधना महापुरुषों ने की उनमें से आदरणीय नानक साहेब जी, आदरणीय गरीब दास जी, आदरणीय घीसा दास जी, आदरणीय नबी मोहम्मद जी आदि है। वर्तमान में संत रामपाल जी के अलावा उन मंत्रों के बारे में कोई नहीं जानता। सतज्ञान जानने के लिए Satlok Ashram Youtube Channel पर सत्संग सुने।

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