हरियाणा के हिसार जिले के देपल गांव में कुछ महीने पहले तक जहां नजर जाती थी, वहां सिर्फ पानी ही पानी दिखाई देता था। खेत तालाब बन चुके थे। ज्वार, बाजरा और कपास जैसी फसलें बर्बाद हो चुकी थीं। किसानों की मेहनत पानी में बह गई थी और मजदूरों के सामने भी रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया था। गांव के लोग बताते हैं कि हालात इतने खराब थे कि उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आने वाले दिनों में खेती कैसे होगी और परिवार का गुजारा कैसे चलेगा।
गांव के कई हिस्सों में दो से पांच फुट तक पानी जमा था। खेतों में जाना तक मुश्किल हो गया था। लोग रोज सुबह खेत देखने जाते, लेकिन हर दिन वही मंजर उनका हौसला तोड़ देता। गांव में सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की होती थी कि आखिर यह पानी निकलेगा कैसे।
ग्रामीणों के अनुसार, इसी कठिन समय में गांव की पंचायत ने संत रामपाल जी महाराज से सहायता का अनुरोध किया। इसके बाद गांव में राहत सामग्री पहुंचाई गई, जिससे खेतों से पानी निकालने का काम शुरू हुआ। ग्रामीणों का कहना है कि इस सहायता के बाद हालात तेजी से बदलने लगे और धीरे-धीरे खेत खेती योग्य बनने लगे।
जब हर खेत बना तालाब, तब किसानों की सबसे बड़ी चिंता थी—अब अगली फसल कैसे होगी?
देपल गांव के किसानों के लिए यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं थी, बल्कि उनके पूरे साल की कमाई पर संकट था। पिछली फसल पहले ही नुकसान झेल चुकी थी और लगातार भरे पानी ने अगली बुवाई की उम्मीद भी लगभग खत्म कर दी थी।
गांव के सरपंच प्रतिनिधि भूपेंद्र सिंह मलिक बताते हैं कि करीब 400 से 500 एकड़ क्षेत्र में पानी जमा था। उनके अनुसार,
“उस समय हमें यही लग रहा था कि शायद इस बार बुवाई ही नहीं हो पाएगी। खेतों में पानी था और निकलने का कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था।”
ग्रामीणों का कहना है कि पानी दूसरे गांवों की तरफ मोड़ने पर भी विवाद की स्थिति बनने लगी थी, क्योंकि हर गांव अपनी जमीन और फसलों को बचाना चाहता था। ऐसे हालात में सामाजिक तनाव बढ़ने की आशंका भी दिखाई देने लगी थी।
गांव वालों के शब्दों में—’हमारे खेतों में जाने का मन तक नहीं करता था’
देपल गांव के किसान रामपाल सिंह बताते हैं कि पानी इतना अधिक था कि खेतों तक पहुंचना भी संभव नहीं था।
उनके अनुसार,
“हमें कोई उम्मीद नहीं दिखाई दे रही थी कि यह पानी कब निकलेगा। गांव में हर परिवार यही सोच रहा था कि अब खेती कैसे होगी।”
एक अन्य किसान कृष्णा बताते हैं,
“तीन-चार फुट तक पानी था। खेतों में जाने की इच्छा भी नहीं होती थी। हर तरफ निराशा थी।”
कई किसानों का कहना था कि अगर समय रहते पानी नहीं निकलता तो अगली गेहूं की बुवाई भी संभव नहीं होती और नुकसान कई गुना बढ़ जाता।
ग्रामीणों के अनुसार राहत कार्य कैसे शुरू हुआ और गांव तक क्या-क्या सहायता पहुंची
ग्रामीणों ने बताया कि गांव की ओर से सहायता का अनुरोध किए जाने के बाद संत रामपाल जी महाराज की ओर से पानी निकासी के लिए पाइप और मोटरें उपलब्ध कराई गईं।
ग्रामीणों ने बताया कि गांव में लगभग 7,400 से 7,500 फुट लंबी 8 इंच की पाइप तथा उच्च क्षमता वाली मोटरें भेजी गईं, जिनकी मदद से लगातार पानी निकालने का कार्य किया गया। ग्रामीणों का कहना है कि यह काम दिन-रात चलता रहा। खेतों से पानी धीरे-धीरे बाहर निकाला गया और कुछ ही समय बाद अधिकांश भूमि खेती योग्य बन गई।
कृष्ण कुमार बताते हैं,
“हमने जितनी जरूरत बताई थी, उससे भी कम नहीं भेजा गया। सर्वे के आधार पर पूरा सामान मिला और उसी से पानी निकालने का काम पूरा हुआ।”
जब खेतों में फिर हरियाली लौटी तो गांव के चेहरों पर भी लौट आई मुस्कान
आज देपल गांव के जिन खेतों में कुछ महीने पहले तक सड़ा हुआ पानी खड़ा था, वहीं अब गेहूं की फसल लहलहाती दिखाई देती है। ग्रामीण बताते हैं कि यह बदलाव उनके लिए किसी नई शुरुआत से कम नहीं है।
संदीप मलिक कहते हैं,
“आज खेतों में हरियाली देखकर अच्छा लगता है। कुछ महीने पहले ऐसा लग ही नहीं रहा था कि इतनी जल्दी हालात बदल जाएंगे।”
रामपाल सिंह भी कहते हैं,
“पहले निराशा थी, अब पूरे गांव में खुशी है। समय पर बुवाई हो गई, यही सबसे बड़ी राहत है।”
ग्रामीणों का कहना है कि खेती दोबारा शुरू होने से मजदूरों को भी काम मिलने लगा और गांव की आर्थिक गतिविधियां फिर से चल पड़ीं।
‘गांव में फिर भाईचारा मजबूत हुआ’—ग्रामीणों ने सामाजिक बदलाव का भी किया जिक्र
गांव के लोगों का कहना है कि पानी निकासी को लेकर आसपास के गांवों के बीच तनाव बढ़ने लगा था, क्योंकि हर कोई अपने खेतों को बचाना चाहता था।
भूपेंद्र सिंह मलिक बताते हैं कि जब पर्याप्त पाइप और व्यवस्था उपलब्ध हुई तो पानी निकालने का व्यवस्थित समाधान मिला और दूसरे गांवों के साथ विवाद की स्थिति भी कम हो गई। ग्रामीणों का मानना है कि इससे केवल खेती ही नहीं बची, बल्कि आपसी रिश्तों में भी सुधार आया।
ग्रामीणों ने संत रामपाल जी महाराज के सेवा कार्य की खुलकर सराहना की
देपल गांव में जिन लोगों से बातचीत की गई, उनमें से अधिकांश ने संत रामपाल जी महाराज द्वारा उपलब्ध कराई गई सहायता की सराहना की।
ग्रामीणों का कहना है कि कठिन समय में समय पर मिली मदद ने उन्हें बड़ा सहारा दिया। कई लोगों ने कहा कि जब उन्हें कहीं और से तत्काल समाधान नहीं मिल रहा था, तब यह सहायता उनके लिए महत्वपूर्ण साबित हुई।
कुछ ग्रामीणों ने भावुक होकर अपनी आस्था भी व्यक्त की और संत रामपाल जी महाराज को अपने जीवन का बड़ा सहारा बताया। यह उनके व्यक्तिगत धार्मिक और आध्यात्मिक विचार हैं, जिन्हें उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर साझा किया। ग्रामीणों के अनुसार, राहत कार्य केवल सामग्री उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं था, बल्कि लगातार सहयोग और व्यवस्था बनाए रखने का प्रयास भी किया गया, जिससे पानी निकासी का काम पूरा हो सका।
ग्रामीणों की उम्मीद—जरूरत पड़ने पर फिर मिलेगा साथ
देपल गांव के कई किसानों ने कहा कि इस अनुभव के बाद उनके मन में यह विश्वास बढ़ा है कि संकट की घड़ी में सामाजिक सहयोग सबसे बड़ी ताकत बन सकता है। उनका कहना है कि भविष्य में भी यदि ऐसी कोई प्राकृतिक आपदा आती है, तो गांव मिलकर उसका सामना करेगा और जहां से भी सहयोग मिलेगा, उसका स्वागत करेगा। ग्रामीणों ने यह भी कहा कि समय पर मिली मदद ने उन्हें यह सिखाया कि किसी भी संकट में सामूहिक प्रयास सबसे प्रभावी रास्ता होता है।
आज देपल की पहचान केवल बाढ़ से नहीं, बल्कि संघर्ष और पुनर्निर्माण से भी जुड़ गई है
देपल गांव की यह कहानी केवल खेतों से पानी निकालने की नहीं है। यह उन किसानों की कहानी है जिन्होंने महीनों तक निराशा झेली, फिर भी उम्मीद नहीं छोड़ी। यह उन परिवारों की कहानी है जिन्होंने अपनी आंखों के सामने फसलें बर्बाद होते देखीं, लेकिन फिर नई फसल के साथ नई शुरुआत की। आज गांव में हरियाली केवल खेतों में नहीं, बल्कि लोगों के चेहरों पर भी दिखाई देती है। किसानों का कहना है कि समय पर मिली सहायता ने उन्हें आर्थिक नुकसान से उबरने का अवसर दिया और आने वाले मौसम के लिए नई उम्मीद जगाई।
जब उम्मीद टूटने लगे, तब समय पर किया गया निस्वार्थ सहयोग किसी संजीवनी से कम नहीं होता।
देपल गांव के लोग मानते हैं कि कठिन समय में मिला सहयोग उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ। उनका कहना है कि जब हालात निराशाजनक लग रहे थे, तब समाज से मिली मदद ने उन्हें संभलने का अवसर दिया। गांव के लोगों की नजर में सच्ची सेवा वही है जो बिना किसी स्वार्थ के, सबसे कठिन समय में जरूरतमंद तक पहुंचे। उनके अनुभव में यही सहयोग उनके गांव को दोबारा खड़ा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बना।



