Jhulelal Jayanti 2021 date in hindi

Cheti Chand (Jhulelal Jayanti) 2021: जानिए शास्त्र सम्मत पूजा अर्चना विधि और लाभ

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Cheti Chand (Jhulelal Jayanti) 2021: चेटी चंड भारतवर्ष और पाकिस्तान सहित पूरे विश्व के सिंधी समुदाय के लोगों का एक सबसे लोकप्रिय त्यौहार है। हिंदू पंचांग के अनुसार सिंधी नववर्ष चेटी चंड उगादी, गुड़ी पड़वा और नवरात्रि शुरू होनें के अगले दिन चैत्र शुक्ल द्वितीया को मनाते हैं जो इस वर्ष 2021 में 13 अप्रैल को है। यह सिंधी समाज के इष्टदेवता श्री झूलेलाल की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर पाठकगण शास्त्र सम्मत पूजा अर्चना विधि और उससे होने वाले लाभ भी जानेंगे।  

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Cheti Chand (Jhulelal Jayanti) 2021: क्या है यह त्यौहार?

चेटी चंड भारतवर्ष और पाकिस्तान सहित पूरे विश्व के सिंधी समुदाय के लोगों का एक सबसे लोकप्रिय त्यौहार है। हिंदू पंचांग के अनुसार सिंधी नववर्ष चेटी चंड उगादी, गुड़ी पड़वा और नवरात्रि शुरू होनें के अगले दिन चैत्र शुक्ल द्वितीया को मनाते हैं जो इस वर्ष 2021 में 13 अप्रैल को है। यह सिंधी समाज के इष्टदेवता श्री झूलेलाल की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। बाबा झूलेलाल को अनेकों नामों से पुकारा जाता है जैसे लाल साईं, वरुण देव, उदेरो लाल, दरिया लाल, दुल्ला लाल, और ज़िंदा पीर। सिंधी हिंदु उन्हें वरुण देवता का अवतार मानते हैं और वे सिंधी लोगों के आराध्य देव हैं।

Cheti Chand 2021 (Jhulelal Jayanti) Date:  चेटी चंड की तारीख व मुहूर्त

आइए जानते हैं 2021 में चेटी चंड की तारीख व मुहूर्त। चेटी चंड का त्यौहार चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की द्वितीया को मनाया जाता है। इस वर्ष 2021 में शुक्ल पक्ष की द्वितीया  13 अप्रैल को है। झूलेलाल जयंती यानि सिंधी नववर्ष की शुरूआत अमावस्या के बाद द्वितीया पर चैत्र मास में चाँद के प्रथम दर्शन होने पर होती है इसी कारण इसका नाम चेटी चंड पड़ा है। चैत्र मास को सिंधी में चेट कहा जाता है और चांद को चण्डु, इसलिए चेटीचंड का अर्थ हुआ चैत्र का चांद। 

चेटी चंड का इतिहास (Cheti Chand History in Hindi)

 सिंधी समुदाय के अधिकांश लोग व्यापारी वर्ग से थे अतः समुद्र पार देशों में यात्राओं पर जाया करते थे। समुद्र में उनके भीषण संकटों को दूर कराने तथा लूटपाट से बचने के लिए वरुण देवता की पूजा की जाती थी। पाठकों को स्मरण होगा कि विश्व की अनेकों सभ्यताएं जो समुद्र या जल में यात्राएं करती हैं जल के देवता की पूजा अर्चना करती हैं। विभिन्न परंपराओं में, तत्वदर्शी संतों को एक दूत, नबी, वली, या देवदूत के रूप में वर्णित किया गया है, जो समुद्र यात्रा में रक्षा करते  है, गुप्त ज्ञान सिखाते है और संकट में सहायता करते हैं । उनका रूप समय के साथ-साथ कई अन्य आकृतियों के साथ समरूप हो गया है। यह ईरान में डोरोसा और सोरश, एशिया माइनर में सेंट सार्किस द वारियर और सेंट जॉर्ज और यहूदी धर्म में लेवांत, समेल (दैवीय अभियोजक)। जॉन आर्मेनिया में बैपटिस्ट, और दक्षिण एशिया के सिंध और पंजाब में झूलेलाल।

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पूर्ण परमात्मा किस रूप में कब और कहाँ हुए प्रकट ?

सतयुग में सतसुकृत, त्रेता युग में मुनीन्द्र, द्वापर युग में करुणामय, कलयुग में कबीर और लंबे काले चोगे में जिंदा महात्मा नाम से समय समय पर प्रकट हुए हैं । पश्चिम एशिया और दक्षिण पूर्वी यूरोप में हरे रंग के वस्त्रों में हरे महात्मा और वनस्पति देवता के रूप में अवतरित हुए हैं । विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों एवं कालखंडों में अनेकों नाम से जाने जाने गए हैं । उदाहरणतः पवित्र कुरान में खबीरा, कबीरन , खबीरन; पवित्र फ़जले अमल में कबीर; यहूदियों की यदिस भाषा में हुद्र, हिन्दी में कबीर, कबीरा, पवित्र वेदों और संस्कृत में कविर्देव, कविरदेव; पवित्र ऑर्थडाक्स जूइश बाइबल में कबीर; पवित्र गुरुग्रंथसाहिब में कबीर; मध्य पूर्व और ग्रीस में एल्लियाह , इलियास;  दक्षिण पूर्वी यूरोप के बाल्कन पेनिनसुला क्षेत्र के राज्यों में ग्रीन जॉर्ज; अमेरिका और यूरोप सहित विश्व में रूमी प्रसिद्ध हैं ।

Jhulelal Jayanti पर जाने सच्चे संकट मोचन पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब के बारे में 

सूफी मान्यता के अनुसार वो अपने जीवन काल में एक बार तत्वदर्शी संत  से अवश्य मिलते हैं । श्री लंका में कतरगामा में भारत और अन्य देशों से भक्तगण वर्ष में एक बार उनकी खोज में आते हैं ।  पूर्ण परमात्मा तत्वदर्शी के रूप में किसी बंजर भूमि पर बैठते है तो वह भूमि हरी भरी और उपजाऊ हो जाती है । इस कारण किसान, पशु चरवाह उन्हें हरे महात्मा या वनस्पति के देवता के रूप में भी पूजते हैं । जब अकाल पड़ता है तो जल संकट से बचाते है तब उन्हें वरुण देवता भी कहा जाता है। ये बाबा अनेक लोगों को दर्शन देते हैं । वास्तव में पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब (कविरदेव) स्वयं सतलोक से चलकर जिंदा बाबा या हरे महात्मा के रूप में प्रकट होते हैं। 

Jhulelal Jayanti: झूलेलाल जी का जन्म कैसे हुआ?

ऐसी मान्यता है कि लगभग 1070 वर्ष पूर्व सन 951 ईस्वी विक्रम संवत 1007 में सिंध प्रांत के एक नगर नरसपुर में भगवान झूलेलाल का जन्म हुआ था। उनकी माँ का नाम देवकी और पिता का नाम रतन लाल लुहाना था। ऐसे काल में जब सिंध सुमरस शासकों के अंतर्गत आया जो सभी धर्मों के प्रति सहिष्णु थे। उसी समय मिरक शाह नामक तानाशाह ने सिन्धी हिंदुओं को इस्लाम धर्म को अपनाने के लिए प्रताड़ित करना प्रारंभ कर दिया । अन्याय से बचने के लिए सिन्धी हिंदुओं ने जल के देवता की आराधना की। चालीस दिनों की पूजा अर्चना के बाद झूलेलाल प्रकट हुए और भक्तों से वादा किया कि नसरपुर में एक दिव्य बालक जन्म लेगा और उनकी मदद करेगा।

Jhulelal Jayanti: झूले लाल ने परमात्मा की भक्ति करने के लिए किया प्रेरित

जन कल्याण के लिए अवतरित भगवान झूले लाल ने धर्म और समाज की रक्षा के लिए बड़े साहसिक कार्यों को निर्भीकता के साथ निभाया । भगवान झूलेलाल ने समाज के सभी वर्गों को एक समान माना और हिंदू-मुस्लिम एकता को प्रमुखता दी । भगवान झूले लाल ने परमात्मा की भक्ति का ज्ञान दिया । उन्होंने संदेश दिया कि पूर्ण परमात्मा एक है और समाज के सभी वर्गों को मिलकर एक साथ रहना चाहिए। यही कारण है कि हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय भगवान झूले लाल की वंदना करते हैं ।

क्या है चेटी चंड पूजा शास्त्र सम्मत विधि?

पूर्ण परमेश्वर कबीर साहेब ही एकमात्र अविनाशी, अजन्मा, अलेख, अविगत, दयालु और सर्व सृष्टिकर्ता है। वे सर्वोच्च सत्ता है जिनके ऊपर कोई नहीं। श्रीमद्भगवाद गीता 7:14-15 के अनुसार तीन गुणों ब्रह्मा, विष्णु, महेश की साधना में लीन रहने वाले मूढ़ और नीच होते हैं।  श्रीमद्भगवाद गीता 18:62,66 के अनुसार उन्हीं पूर्ण अविगत अविनाशी समर्थ परमेश्वर कबीर की शरण में जाने के लिए कहा है जो अविनाशी लोक सतलोक में निवास करते हैं ।

“कबीर, सुमिरण से सुख होत है, सुमिरण से दुःख जाए।

कहैं कबीर सुमिरण किए, सांई माहिं समाय।।”

तत्वदर्शी संत ही करते हैं सारे बंधन खत्म

मोक्ष केवल तत्वदर्शी संत दिला सकते हैं उनके अतिरिक्त इस पूरे ब्रह्मांड में कोई नहीं है जो मोक्ष दिला सके। अन्य सभी साधनाएं व्यर्थ हैं यहाँ तक कि कई सिद्धि युक्त ऋषि मुनि भी इसी काल लोक में रह गए। श्रीमद्भगवद गीता 4:34 में तत्वदर्शी संत की शरण में जाने का निर्देश किया है।

कबीर, गुरु बिन माला फेरते, गुरु बिन देते दान।

गुरु बिन दोनों निष्फल हैं, पूछो वेद पुराण।।

तीन मंत्रों से दीक्षित साधक ही पूर्ण मोक्ष प्राप्त कर सकता है

तत्वदर्शी संत भी स्वयं परमेश्वर या परमात्मा के अवतार होते हैं । तत्वदर्शी संत द्वारा दी गई सत्य साधना से पृथ्वी लोक में सभी सुख प्राप्त होते हैं और पूर्ण मोक्ष प्राप्त होता है और साधक सनातन परम् धाम सतलोक को प्राप्त होता है जहां जाकर फिर वापस नहीं आना पड़ता । श्रीमद्भागवत गीता 17:23 के अनुसार तत्वदर्शी संत तीन सांकेतिक मन्त्रों “ओम-तत-सत” के अनुसार नामदीक्षा देते हैं । तीनों मंत्र दीक्षित साधक ही पूर्ण मोक्ष प्राप्त कर सकता है। सतगुरु अर्थात तत्वदर्शी संत तीसरी बार में सारनाम देते हैं जो कि पूर्ण रूप से गुप्त है।

कबीर, कोटि नाम संसार में , इनसे मुक्ति न हो।

सार नाम मुक्ति का दाता, वाको जाने न कोए।।

वर्तमान में हैं एकमात्र तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज 

वर्तमान में पूरे ब्रह्मांड में एकमात्र तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज हैं जो शास्त्र सम्मत सतज्ञान देते हैं । बिना विलंब किए तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज से नाम दीक्षा लें और सतगुरु के निर्देशों का पालन करते हुए सत साधना करके अपना कल्याण करवाएं।

कबीर, गुरु बड़े हैं गोविन्द से, मन में देख विचार। 

हरि सुमरे सो रह गए, गुरु भजे होय पार।।

 तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज  पूर्ण रूप से समर्थ हैं

कष्टकर समय में भक्त की करुणाभरी पुकार सुनते ही परमात्मा प्रकट होकर निदान करते हैं । यात्रा में भटके हुए यात्रियों को संकट से उबारने वाले संकटमोचक देवता है और भक्तों की पुकार पर तुरंत प्रकट होकर समस्या निदान करते हैं । संत रामपाल जी महाराज भवसागर में भटके भक्तों को पार करके सुखसागर में भेजते हैं। यथार्थ साधना पूर्ण संत से प्राप्त करके सतनाम का स्मरण हृदय से करने से सर्व पाप (संचित तथा प्रारब्ध के पाप) ऐसे नष्ट हो जाते हैं जैसे पुराने सूखे घास को अग्नि की एक चिंगारी जलाकर भस्म कर देती है। 

कबीर, जब ही सत्यनाम हृदय धरो, भयो पाप को नाश।

जैसे  चिंगारी  अग्नि  की,   पड़ी  पुराणे  घास।।  

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