Vaisakh Month 2021: वैशाख भारतीय काल गणना के अनुसार वर्ष का दूसरा माह है। आज हम जानेंगे वैशाख मास के पर्व /त्यौहार, व्रत, तिथि और नक्षत्र के बारे में। वैशाख का महीना 28 अप्रैल को शुरू हो रहा है जो 26 मई, 2021 को खत्म होगा । लोकमान्यताओं के अनुसार वैशाख के हिंदू महीने को व्रत, दान, होम और अन्य धार्मिक और महत्वपूर्ण चीजों को करने के लिए सबसे भाग्यशाली महीनों में से एक माना जाता है। 

वैशाख माह (Vaisakh Month 2021) से जुड़ी जानकारी

  • वैशाख मास हिंदू पंचांग में चंद्रमास के नाम नक्षत्रों पर आधारित हैं। जिस मास की पूर्णिमा जिस नक्षत्र में होती है उसी के अनुसार माह का नाम पड़ा है। वैशाख मास की पूर्णिमा विशाखा नक्षत्र में होने के कारण इस मास का नाम वैशाख पड़ा।
  • वैशाख भारतीय काल गणना के अनुसार वर्ष का दूसरा माह है। इस माह को एक पवित्र माह के रूप में माना जाता है। जिनका संबंध देव अवतारों और धार्मिक परंपराओं से है। ऐसा माना जाता है कि इस माह के शुक्ल पक्ष को अक्षय तृतीया के दिन विष्णु अवतारों नर-नारायण, परशुराम, और ह्ययग्रीव का अवतार हुआ जिसके कारण इसकी बहुत अधिक मान्यता है और शुक्ल पक्ष की नवमी को देवी सीता धरती से प्रकट हुई। 
  • कुछ मान्यताओं के अनुसार त्रेतायुग की शुरुआत भी वैशाख माह से हुई। इस माह की पवित्रता और दिव्यता के कारण ही कालान्तर में वैशाख माह की तिथियों का सम्बंध लोक परंपराओं में अनेक देव मंदिरों के पट खोलने और महोत्सवों के मनाने के साथ जोड़ दिया। यही कारण है कि हिन्दू धर्म के चार धाम में से एक बद्रीनाथ धाम के कपाट वैशाख माह की अक्षय तृतीया को खुलते हैं। 
  • इसी वैशाख के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को एक और हिन्दू तीर्थ धाम पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा भी निकलती है। वैशाख कृष्ण पक्ष की अमावस्या को देववृक्ष वट की पूजा की जाती है।
  • इसके अलावा वरुथिनी एकादशी, अक्षय तृतीया, मोहिनी एकादशी एवं वैशाख पूर्णिमा, बुद्ध पूर्णिमा आदि व्रत पर्व मनाएं जाते हैं।

वैशाख माह (Vaisakh Month 2021) में मनाई जाती है बैसाखी (Vaisakhi)

मंगलवार 13 अप्रैल, 2021 को वैशाखी (baisakhi) मनाई जाएगी। वैशाखी को सिख धर्मावलंबियों का नया वर्ष आरंभ होता है। आज हम जानेंगे शास्त्र आधारित भक्ति अनुसार तीर्थ, व्रत और मूर्ति पूजा इन साधनाओं को करने से जीव का मोक्ष संभव है या नहीं ? मोक्ष पाने के लिए कौन सी सही भक्ति विधि अपनानी चाहिए ?  साथ ही उनके प्रमाण भी देखेंगे ! 

कौन है आदि पुरुष नारायण परमात्मा और देखें श्रीमद भगवत गीता में प्रमाण

  • अध्याय 15 का श्लोक 17

उत्तमः, पुरुषः, तु, अन्यः, परमात्मा, इति, उदाहृतः,

यः, लोकत्रयम् आविश्य, बिभर्ति, अव्ययः, ईश्वरः।।

उत्तम भगवान तो उपरोक्त दोनों प्रभुओं क्षर पुरुष तथा अक्षर पुरुष से अन्य ही है जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण पोषण करता है एवं उसी को अविनाशी परमेश्वर/ परमात्मा कहा गया है। 

  • अध्याय 15 का श्लोक 4

ततः, पदम्, तत्, परिमार्गितव्यम्, यस्मिन्, गताः, न, निवर्तन्ति, भूयः,

तम्, एव्, च, आद्यम्, पुरुषम्, प्रपद्ये, यतः, प्रवृत्तिः, प्रसृता, पुराणी।।

जब गीता अध्याय 4 श्लोक 34, अध्याय 15 श्लोक 1 में वर्णित तत्वदर्शी संत मिल जाएं इसके पश्चात् उस परमेश्वर के परम पद अर्थात् सतलोक को भलीभाँति खोजना चाहिए जिसमें गये हुए साधक फिर लौटकर संसार में नहीं आते और जिस परम अक्षर ब्रह्म से आदि रचना-सृष्टि उत्पन्न हुई है । उस आदि पुरुष नारायण (अर्थात पूर्ण ब्रह्म कबीर) की ही मैं शरण में हूँ। पूर्ण निश्चय के साथ उसी परमात्मा का भजन करना चाहिए।

श्रीमद भगवत गीता के इन दोनों श्लोकों ने यह सिद्ध किया के पूर्ण परमेश्वर कोई अन्य है और वह आदि पुरुष नारायण कोई और नहीं कबीर साहिब जी हैं। जल पर अवतरित होने के कारण उनको नारायण कहा जाता है। कबीर साहेब एक शिशु रूप में लहर तारा तालाब पर कमल के फूल अवतरित हुए और जुलाहा दंपति नीरू नीमा को मिले थे।

Vaisakh Month 2021: तीर्थ, व्रत, करने से कोई लाभ है या नहीं, आइए देखें श्रीमद भगवत गीता में प्रमाण

  • अध्याय 6 का श्लोक 16

न, अति, अश्नतः, तु, योगः, अस्ति, न, च, एकान्तम्, अनश्नतः,

न, च, अति, स्वप्नशीलस्य, जाग्रतः, न, एव, च, अर्जुन।।

 हे अर्जुन ! यह योग (भक्ति) न तो अधिक खाने वाले का और न ही बिल्कुल न खाने वाले का अर्थात् यह भक्ति न ही व्रत रखने वाले, न अधिक सोने वाले की तथा न अधिक जागने वाले की सफल होती है। इस श्लोक में व्रत रखना पूर्ण रूप से मना किया गया है।

  • अध्याय 16 का श्लोक 23

यः, शास्त्रविधिम्, उत्सृज्य, वर्तते, कामकारतः,

न, सः, सिद्धिम्, अवाप्नोति, न, सुखम्, न, पराम्, गतिम्।।

जो पुरुष शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है वह न सिद्धि को प्राप्त होता है न परम गति को अर्थात उसे मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती।

  • अध्याय 4 का श्लोक 34

तत्, विद्धि, प्रणिपातेन, परिप्रश्नेन, सेवया,

उपदेक्ष्यन्ति, ते, ज्ञानम्, ज्ञानिनः, तत्त्वदर्शिनः।।

पवित्र गीता बोलने वाला प्रभु कह रहा है कि उपरोक्त नाना प्रकार की साधना तो मनमाना आचरण है। मेरे तक की साधना का अटकल लगाया ज्ञान है, परन्तु पूर्ण परमात्मा के पूर्ण मोक्ष मार्ग का मुझे भी ज्ञान नहीं है। उसके लिए इस मंत्र में कहा है कि उस तत्वज्ञान को समझ उन पूर्ण परमात्मा के वास्तविक ज्ञान व समाधान को जानने वाले संतों को भलीभाँति दण्डवत् प्रणाम करने से उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे पूर्ण ब्रह्म को तत्व से जानने वाले अर्थात् तत्वदर्शी ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्वज्ञान का उपदेश करेंगे। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 2 श्लोक 15-16 में भी है।

श्रीमद भगवत गीता के उपरोक्त श्लोकों से स्वतः: सिद्ध हो रहा है कि तीर्थ व्रत या अन्य देवी देवताओं की पूजा नहीं करनी चाहिए एक पूर्ण परमात्मा ही पूजा के योग्य हैं और उसके लिए तत्वदर्शी संत से नाम दीक्षा लेकर भक्ति करनी चाहिए क्योंकि ऐसा ना करने से ना ही हमें सुख होगा और ना ही हमारा मोक्ष अर्थात जीवन व्यर्थ हो जाएगा इसलिए हमें चाहिए कि हम तत्वदर्शी संत की शरण ग्रहण करें।

कौन है वर्तमान में तत्वदर्शी संत?

सभी सदग्रंथों का संपूर्ण ज्ञान, सभी देवी देवताओं की उत्पत्ति की संपूर्ण जानकारी, और सत मंत्रों की जानकारी होने के कारण, वर्तमान में तत्वदर्शी संत कोई और नहीं विश्व विजेता जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी ही हैं जो शास्त्र अनुकूल साधना बताते हैं।

तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज विश्व के सभी सदग्रंथों का ज्ञान रखते हैं और विश्व विजेता संत हैं। सभी संतों, भविष्यवक्ताओं ने संत रामपाल जी महाराज जी के लिए नाना प्रकार की भविष्यवाणियां की हैं और संदेश दिया है कि वह तत्वदर्शी संत कोई साधारण पुरुष नहीं बल्कि पूर्ण परमात्मा कबीर साहिब जी के ही अवतार होंगे और वह संत रामपाल जी महाराज जी ही हैं। अविलंब संत रामपाल जी महाराज जी से नाम दीक्षा लें और अपना जन्म सफल बनाएं।