Teja Dashmi 2020 (तेजादशमी): तेजादशमी का त्यौहार आज है जिसे लोकनायक तेजाजी महाराज को मिले वरदान के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। पाठकगण आज हम Teja Dashmi के अवसर पर काल दंश से बचने के लिए सतभक्ति के मार्ग के बारे में जानेंगे।

Teja Dashmi 2020 के मुख्य बिंदु

  • तेजादशमी आज, भाद्रपद शुक्ल की दशमी को मनाया जाता है तेजादशमी का त्यौहार
  • तेजाजी थे एक सत्यवादी और वीर लोकनायक जिन्हें सर्पराज नाग से मिला था सर्प दंश के जहर न लगने का वरदान
  • सालों से लगता आ रहा है मध्य प्रदेश के मालवा, निमाड़ के तलून, साततलाई, सुंद्रेल, जेतपुरा, कोटड़ा, टलवाई खुर्द और राजस्थान के लगभग हर जिलेे में मेला।
  • तत्वज्ञान के अभाव में लोग भूले बैठे हैं मानव जन्म का वास्तविक उद्देश्य
  • काल के दंश से बचने का एकमात्र उपाय सतभक्ति है

Teja Dashmi 2020 पर जानिए कौन थे तेजाजी?

Teja Dashmi 2020: तेजाजी एक लोकनायक थे जो अपनी बाल्यावस्था से ही साहसी प्रवृत्ति के थे। तेजाजी का जीवन परोपकार के कार्यों में ही बीता एवं लोग उन्हें अवतारी पुरुष मानने लगे थे। ऐसी मान्यता है कि तेजाजी के मातापिता शंकर जी के उपासक थे जिनकी कृपा से उन्हें यह पुत्र प्राप्त हुआ था।

Teja Dashmi (तेजादशमी) की पौराणिक कथा

तेजादशमी को लेकर लोकनायक तेजाजी की एक कथा प्रसिद्ध है कि एक बार तेजाजी अपनी बहन को लेने गए। उन्हें पता चला कि कुछ डाकू सारी गायों को लूटकर ले गये हैं। वे गायों को छुड़ाने जाते हैं किंतु रास्ते में उन्हें भाषक सर्प ने रोक लिया। तब उन्होंने सर्प को वचन दिया कि मैं गायों को छुड़ाने के बाद आपके पास आऊंगा। सर्प ने उन्हें जाने दिया किन्तु जब तेजाजी वापस आये तो उनका शरीर डाकुओं से झगड़े के कारण लहूलुहान था।

सर्प ने उन्हें अपवित्र कहा और डसने के लिए कोई स्थान खाली न देखा तब उन्होंने अपनी जीभ आगे कर दी और कहा कि आप इस पर डस लें। तेजाजी के सत्यवाद और वचनबद्धता को देखकर सर्प ने उन्हें वरदान दिया कि आज के दिन (भाद्रपद शुक्ल की दशमी को) जो भी सर्पदंश से पीड़ित होगा उसे तुम्हारे नाम की तांती (धागा) बांधने पर ज़हर का असर नहीं होगा। तब से यह दिन तेजादशमी त्यौहार के रूप में लोग मनाने लगे। लेकिन आज काफी लोग इसी वजह से अपनी जान भी गंवा देते है क्योंकि व्यक्ति के स्वास निर्धारित है।

Teja Dashmi 2020: क्या होता है तेजादशमी को?

  • Teja Dashmi 2020 (तेजादशमी) के दिन तेजा जी के मंदिरों के आसपास मेलों का आयोजन होता है।
  • यह आयोजन नवमी से ही प्रारम्भ हो जाता है। साथ ही इन मंदिरों में वर्षभर सर्पदंश से अन्य ज़हरीले कीड़ों की तांती छोड़ी जाती है।
  • लोग मन्नतों के लिए भी तेजाजी के मंदिरों में जाते हैं। शोभायात्रा व भण्डारों का आयोजन करते हैं।
  • हालांकि ये साधनाएं शास्त्रानुकूल नहीं हैं। इनसे सर्पदंश से भी नहीं बचेंगे और काल दंश से भी नहीं बचेंगे?
  • भाग्य में मृत्यु है तो तेजाजी ही नहीं ब्रह्मा-विष्णु-महेश भी नहीं बचा सकते केवल पूर्ण सतगुरु ही बचा सकता है।

Teja Dashmi पर जानिए तीर्थ स्थान क्या हैं?

वास्तव में तीर्थ स्थान वे स्थान हैं जहाँ किसी महापुरुष ने साधना की थी, किसी का जन्म या मृत्यु हुआ था। ये स्थान मात्र यादगार हैं। उन स्थानों पर जाने से कुछ हासिल नहीं होता। इससे न तो कोई पुण्य प्राप्त होता है और न ही कोई सुख। तीर्थ स्थानों में जाकर सुख पाने का भी शास्त्रों में भी कोई वर्णन नहीं है। अर्थात ये शास्त्रविरुद्ध साधनाएं हैं। जिनसे कोई लाभ तो नहीं किन्तु पाप कर्म अवश्य बन सकते हैं।

जीवन में लाभ कैसे प्राप्त हो सकते हैं?

जीवन में लाभ प्राप्त करने का एक ही उपाय है शास्त्रों में वर्णित विधि से आचरण करना और शास्त्रों में सर्वप्रथम कहा गया है कि दान, धर्म, भक्ति केवल पूर्ण तत्वदर्शी सन्त यानी पूरे गुरु से नाम लेकर ही हो सकती है। वही केवल मोक्ष दे सकता है और वही सभी लाभ आदि भी देता है। कबीर साहेब कहते हैं,

कबीर तीर्थ करि-करि जग मुआ, उड़ै पानी नहाय |
सतनाम जपा नहीं, काल घसीटें जाय ||

अर्थात तीर्थ जानें, नदियों में स्नान आदि करने से मुक्ति की आशा व्यर्थ है। जो पूर्ण गुरु से नाम दीक्षा नहीं लेते उन पर काल का दांव लगता है। अतः तीर्थ स्थानों पर भटकने वाला व्यक्ति कभी सुख और मोक्ष नहीं पाता है। पूर्ण लाभ तो केवल तत्वदर्शी की शरण में जाने और उसके द्वारा बताई गई भक्ति विधि को करने से मिलते हैं। क्योंकि तत्वदर्शी सन्त पूर्ण परमेश्वर की भक्ति बताता है। भाग्य से अधिक, विधि के विधान से भी हटकर पूर्ण लाभ केवल पूर्ण परमेश्वर की भक्ति ही देती है। सूक्ष्मवेद में लिखा है-

अड़सठ तीर्थ भ्रम-भ्रम आवै | सो फल सतगुरु के चरणों पावै ||
गंगा, यमुना, बद्री समेते | जगन्नाथ धाम है जेते ||

शास्त्रविरुद्ध आचरण से लगेगा काल दंश

शास्त्र विरुद्ध आचरण श्रीमद्भगवद गीता में वर्जित हैं। गीता अध्याय 16 के श्लोक 24 में बताया है कि शास्त्रों के अनुसार ही भक्ति करनी चाहिए और श्लोक 23 में बताया है कि जो शास्त्र विरुद्ध आचरण करते हैं उनकी न तो गति होती है और न ही कोई सुख प्राप्त होता है। जबकि गीता अध्याय 4 के श्लोक 34 में तत्वदर्शी सन्त को ढूंढने और तत्वज्ञान समझने को कहा है। तत्वज्ञान समझने के पश्चात व्यक्ति में विवेक जाग्रत होता है और वह समझ जाता है कि बिना गुरु के उसकी दुर्गति निश्चित है।

Satlok Ashram

किन्तु पूर्ण गुरु उसे अर्थ लाभ, स्वास्थ्य लाभ के साथ अन्य लाभ देते हैं और मोक्ष तो देते ही हैं। गीता अध्याय 17 के श्लोक 23 में बताए सांकेतिक मन्त्रों के सही जाप तत्वदर्शी सन्त देता है जिससे साधक को लाभ होता है और मोक्ष प्राप्ति होती है। सूक्ष्मवेद में पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब ने सतगुरु को कामधेनु और कल्पवृक्ष की तरह बताया है जो सब कुछ दे सकता है।

पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी द्वारा सतगुरु की महिमा

कोटिक तीर्थ सब कर आवै | गुरु चरणां फल तुरन्त ही पावै ||
सतगुरु मिले तो अगम बतावै | जम की आंच ताहि नहीं आवै ||
भक्ति मुक्ति का पन्थ बतावै | बुरो होन को पन्थ छुड़ावै ||
सतगुरु भक्ति मुक्ति के दानी | सतगुरु बिना न छूटे खानी ||

सरलार्थ: पूर्ण परमात्मा द्वारा दिये तत्वज्ञान यानि सूक्ष्मवेद में कहा है कि तीर्थों और धामों पर जाने से कोई पुण्य लाभ नहीं। असली तीर्थ सतगुरु (तत्वदर्शी सन्त) का सत्संग सुनने जाना है। जहां तत्वदर्शी सन्त का सत्संग होता है, वह स्थान श्रेष्ठ तीर्थ धाम है। इसी कथन का साक्षी संक्षिप्त श्रीमद्देवीभागवत महापुराण भी है। उसमें छठे स्कंद के अध्याय 10 में लिखा है कि सर्व श्रेष्ठ तीर्थ तो चित्त शुद्ध तीर्थ है। जहां तत्वदर्शी सन्त का सत्संग चल रहा है। उसके अध्यात्म ज्ञान से चित्त की शुद्धि होती है। शास्त्रोक्त अध्यात्म ज्ञान तथा शास्त्रोक्त भक्ति विधि का ज्ञान होता है जिससे जीव का कल्याण होता है। अन्य तीर्थ मात्र भ्रम हैं। इसी पुराण में लिखा है कि सतगुरु रूप तीर्थ मिलना अति दुर्लभ है।

तत्वदर्शी सन्त रामपाल जी महाराज से नाम दीक्षा लेकर कल्याण कराएं

इस प्रकार पूर्ण सतगुरु से नाम दीक्षा लेकर केवल सर्पदंश से नहीं बल्कि काल के दंश से भी बचा जा सकता है। पूर्ण सतगुरु से नाम दीक्षा लें एवं सभी लाभों के साथ आध्यात्मिक लाभ भी प्राप्त करें। वर्तमान में पूरे ब्रह्मांड में एकमात्र तत्वदर्शी सन्त रामपाल जी महाराज हैं जिनकी शरण में अविलंब आएं और अपना जीवन सफल बनायें। सन्त रामपाल जी द्वारा लिखित पुस्तक “अंध श्रद्धा भक्ति खतरा-ए-जान” पढ़ें और “सतलोक आश्रम यूट्यूब चैनल” पर सत्संग सुनें।