Supreme God and Jesus v/s Santa Claus

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मेरी क्रिसमस संदेश 2018 Merry Christmas Wishes and essay in Hindi

On this merry Christmas day 2018 let’s know what Bible says about supreme God.

।।न रहेगा ईसा, न रहेगा मूसा, राज करेगा केवल जगदीशा।।

कलयुग का यह वह चरम समय है जहां परमात्मा सशरीर पृथ्वी पर मौजूद हैं अपने ज्ञान से ,विज्ञान से और विधान से परिचित करवाने के लिए।
धन्य हैं वह सभी पुण्य आत्माएं जो परमात्मा को ईसा के और हम सब आत्माओं के पिता को पहचान कर सतभक्ति आरंभ कर चुके हैं। ईसा मसीह (Jesus) नेक दिल, पुण्य व दयालु आत्मा थे। वह परमात्मा की संतान (Son of God) थे परंतु भगवान नहीं थे। (Jesus was son of God but he was not God.)
क्योंकि परमात्मा (God) का न तो जन्म होता है न मृत्यु और ईसा (यीशु) जी का जन्म माता के गर्भ से हुआ और उन्हें ईर्ष्यावश मृत्यु के घाट सूली पर लटका कर मारा गया। ईसा जी ने आत्मविश्वास के साथ कहा था God is One and we should worship one Supreme God. उन्होंने कभी नहीं कहा कि मैं भगवान हूं।
हमें उस परमात्मा (God) कि भक्ति करनी है जिसके बारे में Holy Bible में लिखा है वो परमात्मा कबीर है जिसने छ: दिन में सृष्टि रची और सातवें दिन अपने तख्त पर जा विराजा। ईसा जी का सृष्टि रचना में और जीवों को जन्म-मृत्यु (Birth and Death) से मुक्ति दिलाने में कोई रोल नहीं है। वह केवल भक्ति युक्त आत्मा थे। (Genesis’ in the beginning of Bible, in the creation of seven days in 1:20-2:5.)

आइए जानते हैं ईसा जी का जीवन परिचय-

ईसा (Jesus) जी की माता जी का नाम मरियम तथा पिता जी का नाम यूसुफ था। परन्तु मरियम को गर्भ एक देवता से रहा था। इस पर यूसुफ ने आपत्ति की तथा मरियम को त्यागना चाहा तो स्वपन में (फरिश्ते) (Angel) देवदूत ने ऐसा न करने को कहा तथा यूसुफ ने डर के मारे मरियम का त्याग न करके उसके साथ पति-पत्नी रूप में रहना स्वीकार किया। देवता से गर्भवती हुई मरियम ने ईसा को जन्म दिया। मरियम को एक फरिश्ते से गर्भ रहा था। जब हजरत (hazrat Muhammad) ईसा जी का जन्म हुआ तब समाज की दृष्टि में ईसा (Jesus) जी के पिता युसूफ थे। हजरत ईसा से पवित्र ईसाई धर्म की स्थापना हुई। ईसा मसीह के नियमों पर चलने वाले भक्त आत्मा ईसाई कहलाए तथा पवित्र ईसाई धर्म का उत्थान हुआ।

ईसा जी को पूर्ण परमात्मा मिले थे तभी से वह कहते थे God is one.

हजरत ईसा जी को भी पूर्ण परमात्मा सत्यलोक से आकर मिले तथा एक परमेश्वर का मार्ग समझाया। इसके बाद ईसा जी लोगों को एक ईश्वर की भक्ति समझाने लगे। लोगों ने उनका बहुत विरोध किया। फिर भी वे अपने मार्ग से विचलित नहीं हुए। परन्तु बीच-बीच में ब्रह्म (काल/ज्योति निरंजन) के फरिश्ते हजरत ईसा जी को विचलित करते रहे तथा वास्तविक ज्ञान को दूर रखा। हजरत यीशु का जन्म तथा मृत्यु व जो भी चमत्कार किए वे पहले ब्रह्म(ज्योति निरंजन) के द्वारा निर्धारित थे। यह प्रमाण पवित्र बाईबल (Bible) में है कि एक व्यक्ति जन्म से अंधा था। वह हजरत यीशु मसीह के पास आया। हजरत जी के आशीर्वाद (blessing) से उस व्यक्ति की आँखें ठीक हो गई। शिष्यों ने पूछा हे मसीह जी इस व्यक्ति ने या इसके माता-पिता ने कौन-सा ऐसा पाप किया था जिस कारण यह अंधा हुआ तथा माता-पिता को अंधा पुत्र प्राप्त हुआ। यीशु जी ने कहा कि इसका कोई पाप नहीं है जिसके कारण यह अंधा हुआ है तथा न ही इसके माता-पिता का कोई पाप है जिस कारण उन्हें अंधा पुत्र प्राप्त हुआ। यह तो इसलिए हुआ है कि प्रभु की महिमा प्रकट करनी है। भावार्थ यह है कि यदि पाप होता तो हजरत यीशु आँखे ठीक नहीं कर सकते थे। यह सब काल ज्योति निरंजन (ब्रह्म) (Devil) का सुनियोजित जाल है। जिस कारण उसके द्वारा भेजे अवतारों की महिमा बन जाए तथा आस पास के सभी प्राणी उस पर आसक्त होकर उसके द्वारा बताई ब्रह्म साधना पर अटल हो जाऐं। जब परमेश्वर (God) का संदेशवाहक आए तो कोई भी विश्वास न करे जैसा कि अब के समय में हो रहा है जब परमात्मा संत रामपाल जी (Spiritual Leader Saint Rampal Ji) के रूप में स्वयं धरती पर विद्यमान हैं। जैसा कि ईसा मसीह के चमत्कारों में लिखा है कि उन्होंने एक प्रेतात्मा से पीड़ित व्यक्ति को ठीक कर दिया। यह काल स्वयं ही किसी प्रेत तथा पितर को प्रेरित करके किसी के शरीर में प्रवेश करवा देता है। फिर उसको किसी के माध्यम से अपने भेजे दूत के पास भेजकर प्रेत को भगा देता है। उसके अवतार की महिमा बन जाती है। या कोई साधक पहले का भक्ति युक्त होता है। उससे भी ऐसे चमत्कार उसी की कमाई से करवा देता है तथा उस साधक की महिमा करवा कर हजारों को उसका अनुयाई बनवा कर काल जाल में फंसा देता है तथा उस पूर्व भक्ति कमाई युक्त साधक की कमाई को समाप्त करवा कर नरक में डाल देता है।

पूर्णपरमात्मा की जन्म मृत्यु नहीं होती

हजरत ईसा मसीह की मृत्यु 30 वर्ष की आयु में हुई जो पूर्व ही निर्धारित थी। स्वयं ईसा जी ने कहा कि मेरी मृत्यु निकट है तथा तुम (मेरे बारह शिष्यों) में से ही एक मुझे विरोधियों को पकड़वाएगा। उसी रात्रि सर्व शिष्यों सहित ईसा जी एक पर्वत पर चले गए। वहाँ उनका दिल घबराने लगा। अपने शिष्यों से कहा कि आप जागते रहना। मेरा दिल घबरा रहा है। मेरा जी निकला जा रहा है। मुझे सहयोग देना। ऐसा कह कर कुछ दूरी पर जाकर मुंह के बल पृथ्वी (Earth) पर गिरकर प्रार्थना की (38,39), वापिस चेलों के पास लौटे तो वे सो रहे थे। यीशु (Jesus) ने कहा क्या तुम मेरे साथ एक पल भी नहीं जाग सकते। जागते रहो, प्रार्थना करते रहो, ताकि तुम परीक्षा में फैल न हो जाओ। मेरी आत्मा तो मरने को तैयार है, परन्तु शरीर दुर्बल है। इसी प्रकार यीशु मसीह ने तीन बार कुछ दूर जाकर प्रार्थना की तथा फिर वापिस आए तो सभी शिष्यों को तीनों बार सोते पाया। ईसा मसीह के प्राण जाने को थे, परन्तु चेले राम मस्ती में सोए पड़े थे। उन्हें गुरु जी की आपत्ति का कोई गम नहीं था।
तीसरी बार भी सोए पाया तब कहा मेरा समय आ गया है, तुम अब भी सोए पड़े हो। इतने में तलवार (sword) तथा लाठी लेकर बहुत बड़ी भीड़ आई तथा उनके साथ एक ईसा मसीह का खास यहूंदा इकसरौती नामक शिष्य था, जिसने तीस रूपये के लालच में अपने गुरु जी को विरोधियों के हवाले कर दिया।(मत्ती 26: 24-55 पृष्ठ 42-44)
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि पुण्यात्मा ईसा मसीह जी को केवल अपना पूर्व का निर्धारित जीवन काल प्राप्त हुआ जो उनके विषय में पहले ही पूर्व धर्म शास्त्रों में लिखा था।
(मत्ती 1:1-18) तीस (30) वर्ष की आयु में ईसा मसीह जी को शुक्रवार के दिन सलीब मौत (दीवार) के साथ एक आकार के लकड़ के ऊपर ईसा को खड़ा करके हाथों व पैरों में मेख (मोटी कील) गाड़ दी। जिस कारण अति पीड़ा से ईसा जी की मृत्यु हुई।

परमात्मा पृथ्वी पर भक्ति में आस्था बनाए रखने के लिए स्वयं आते हैं

तीसरे दिन रविवार (Sunday) को ईसा जी फिर से दिखाई देने लगे। 40 दिन तक (चालीस) कई जगह अपने शिष्यों को दिखाई दिए। जिस कारण भक्तों में परमात्मा के प्रति आस्था दृढ़ हुई। वास्तव में पूर्ण परमात्मा (Supreme and almighty God) ने ही ईसा जी के रूप में प्रकट होकर प्रभु भक्ति को जीवित रखा था। काल तो चाहता है यह संसार नास्तिक हो जाए। परन्तु पूर्ण परमात्मा ने यह भक्ति वर्तमान समय तक जीवित रखनी थी। अब यह पूर्ण रूप से फैलेगी। उस समय के शासक(गवर्नर) पिलातुस को पता था कि ईसा जी निर्दोष हैं परन्तु फरीसियों अर्थात् मूसा के अनुयाईयों के दबाव में आकर उसने सजा सुना दी थी।

आइए अब बात करते हैं क्रिसमस डे की

क्रिसमस से पहले ईस्टर का पर्व ईसाई (Christen) समुदाय का प्रमुख त्योहार माना जाता है। द न्यू इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका के अनुसार, सर्दियों में सूर्य की रोशनी (Sun Light) कम हो जाती है, गैर-ईसाई इस समय पूजा पाठ किया करते थे ताकि सूर्य लंबी यात्रा से वापस आकर उन्हें ऊर्जा और रोशनी दे और इसी कारण से इसे बड़ा दिन भी कहा जाता है। सच्चाई यह है कि जीसस का जन्म 25 दिसंबर को नहीं हुआ था। ईसाई समुदाय के मानने वालों ने इस दिन को यीशू के जन्मदिन के रुप में स्वयं चुना और इस दिन सूर्य के लंबी यात्रा से लौट कर आने की खुशी मनाते हैं।

सूर्य 25 दिसंबर से उत्तरायण होना शुरू होता है और इसे ईसाइयों ने अंग्रेज़ी में क्रिसमस-डे नाम दिया । क्रिसमस के मौके पर क्रिसमस ट्री को सजाने की शुरूआत पहली बार 10वीं शताब्दी में जर्मनी में हुई। ऐसा करने वाला पहला व्यक्ति एक अंग्रेज धर्म प्रचारक बोनिफेंस टुयो था।

आइए जानते हैं कि सेंटा क्लॉज़ कौन है और क्यों प्रतिवर्ष असली भगवान को भूलकर विश्वभर में इनका जन्मदिन मनाया जाता है।

Saint_Nicholas चौथी शताब्दी के ईसाई संत थे। सेंट निकोलास प्राचीन ग्रीक शहर माइरा के प्रारंभिक ईसाई बिशप थे ( आधुनिक साम्राज्य डेमरे, तुर्की) रोमन साम्राज्य के समय के दौरान उन्हें कई संतों द्वारा संत के रूप में भी सम्मानित किया गया। कई चमत्कारों के कारण, उन्हें निकोलास द वंडरवर्कर के रूप में भी जाना जाता है। सेंट निकोलास नाविकों, व्यापारियों, तीरंदाजों, पश्चाताप करने वाले चोरों, बच्चों, ब्रीवर, पनडुब्बियों और विभिन्न शहरों और देशों के छात्रों के संरक्षक संत थे।
सेंट निकोलस जो जीसस की मौत के 280 साल बाद मायरा में जन्मे थे। सेंट निकोलास का एशिया माइनर के पटिया में अमीर ईसाई माता-पिता के यहां जन्म हुआ था। बचपन में ही उनके माता-पिता की मौत हो गई थी और सेंट को सिर्फ जीसस पर ही विश्वास था। बड़े होने पर उन्होंने अपनी जिंदगी जीसस को समर्पित कर दी। पहले वह पादरी बने और फिर बिशप। वह आधी रात को गुप्त रूप से बच्चों को गिफ्ट दिया करते थे । यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है और खासकर बच्चों को सेंटा का इंतजार रहता है ।सेंट निकोलास के गुप्त उपहार देने की आदत ने सेंटा क्लॉस (Santa Claus ) (“सेंट निक”) के काल्पनिक मॉडल को जन्म दिया। पर एक सर्वे के मुताबिक यह भी साफ हो चुका है कि आठ वर्ष का होने पर बच्चों को सेंटा के अस्तित्व पर से भरोसा उठ जाता है और उन्हें समझ आ जाता है कि यह केवल काल्पनिक व्यक्तित्व है।

सेंट निकोलास बहुत ही दयालु और मददगार थे। उनकी जीवनी से पता चलता है कि एक बार तीन लड़कियों को उनका पिता गरीबी के कारण दहेज देने में असमर्थ होने के कारण वैश्यावृत्ति में झौंकना चाहता था परंतु सेंट निकोलास ने तीन दिन तक रात के समय उनके घर की खिड़की से सोने के सिक्कों की एक बोरी छोड़कर उन्हें वैश्यावृत्ति से बचाया। अन्य शुरुआती कहानियों ने उसे समुद्र में एक तूफान शांत करने, तीन निर्दोष सैनिकों को गलत निष्पादन से बचाने और मृत बच्चों को जीवित करने आदि से संबंधित विवरण मिलते हैं।

उपरोक्त विवरण से भक्त समाज निर्णय कर सकता है कि जिस परमात्मा और Saint की हमें तलाश है वह Jesus and Santa Claus नहीं हैं। यह दोनों संत थे परंतु पूर्ण परमात्मा के अवतार संत नहीं । यह दोनों समय और काल के आधीन थे। पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी हैं जो सभी मनुष्यों के पिता हैं जो सतभक्ति देकर सदग्रंथों द्वारा अपने बारे में पूर्ण जानकारी देते हैं और जन्म मृत्यु से सदा के लिए मुक्त कर देते हैं।

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