हरियाणा के सोनीपत स्थित गोहाना के धनाना धाम आश्रम से जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ने हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व करने वाले सभी शीर्ष धर्मगुरुओं, मठाधीशों और आचार्यों को शास्त्रों के आधार पर खुली ज्ञान चर्चा (शास्त्रार्थ) का खुला निमंत्रण दिया है। 3 और 4 अक्टूबर 2026 से शुरू होने वाली इस शृंखला में पवित्र सूक्ष्म वेद, चारों वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद), श्रीमद्भगवद्गीता, पुराणों, रामायण और महाभारत को मुख्य आधार बनाया जाएगा। उन्होंने घोषणा की है कि यदि कोई भी धर्मगुरु शास्त्र-प्रमाण से उनके ज्ञान को गलत सिद्ध करता है, तो उसे ₹50 लाख का नकद इनाम दिया जाएगा।
जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज की शास्त्रार्थ पहल के मुख्य बिंदु
- समय और प्रसारण: 3 और 4 अक्टूबर 2026 से प्रत्येक शनिवार और रविवार को शाम 7:30 से 9:30 बजे तक साधना टीवी पर सीधा प्रसारण।
- संबोधन स्थल: गोहाना (सोनीपत) स्थित धनाना गांव आश्रम से श्रद्धालुओं के समक्ष घोषणा।
- चर्चा का आधार: पवित्र सूक्ष्मवेद, चारों वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद), श्रीमद्भगवद्गीता, 18 पुराण, वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस, महाभारत और श्रीमद्भागवत (सुधा सागर)।
- ₹50 लाख का नकद इनाम: शास्त्रों के आधार पर ज्ञान में त्रुटि सिद्ध करने वाले विद्वान को ₹50 लाख की नकद पुरस्कार राशि।
- एकतरफा शर्त (कोई पेनल्टी नहीं): विपरीत पक्ष के विद्वानों पर किसी प्रकार की आर्थिक शर्त, जुर्माने का कोई नियम लागू नहीं होगा।
- पहला विषय: सृष्टि रचना और सृष्टि की उत्पत्ति का प्रामाणिक इतिहास।
- जनता की अदालत: चर्चा में किसी अलग मध्यस्थ या जज के बजाय निर्णय का अधिकार सीधे जनता के विवेक पर छोड़ा गया है।
- वैकल्पिक माध्यम: यदि कोई धर्मगुरु टीवी चैनल स्लॉट बुक नहीं कर सकते, तो वे YouTube या Instagram के जरिए अपना शास्त्र-प्रमाणित पक्ष रख सकते हैं।
- डिबेट प्रत्येक शनिवार और रविवार को तब तक जारी रखने की बात है, जब तक चर्चा पूरी नहीं हो जाती।
शास्त्रार्थ का उद्देश्य: हार-जीत नहीं, भक्त समाज को शास्त्रानुकूल दिशा
जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ने विश्व भर के धर्मगुरुओं और विद्वानों से आध्यात्मिक ज्ञान चर्चा (शास्त्रार्थ) में भाग लेने का विनम्र आह्वान किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस शास्त्रार्थ का उद्देश्य किसी को छोटा या बड़ा सिद्ध करना अथवा केवल हार-जीत तय करना नहीं है, बल्कि भ्रांतियों में उलझे भक्त समाज को प्रमाणित सद्ग्रंथों के आधार पर सही व शास्त्रानुकूल आध्यात्मिक दिशा प्रदान करना है।
उन्होंने सनातन धर्म को मानने वाले लोगों के एक साथ आने की आवश्यकता पर भी बात रखी। उनका कहना है कि सनातन परंपरा में अनेक मत और मतांतर बन जाने से समाज की शक्ति प्रभावित होती है। इसी संदर्भ में उन्होंने सभी धर्मगुरुओं से सद्भावना पूर्वक एक मंच पर आकर शास्त्रों के आधार पर चर्चा करने का निवेदन किया।
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विशेष रूप से सनातनी धर्मगुरुओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि सभी हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ एक हैं और इन्हीं ग्रंथों के आधार पर आध्यात्मिक विषयों पर विचार होना चाहिए।
वेद, गीता, पुराण और रामायण होंगे शास्त्रार्थ का आधार

जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ने डिबेट के लिए पवित्र ग्रंथों की विस्तृत सूची रखी। इनमें पवित्र सूक्ष्म वेद, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद, श्रीमद्भगवद्गीता, 18 पुराण, रामचरितमानस यानी रामायण, वाल्मीकि रामायण, महाभारत और श्रीमद्भागवत यानी सुधा सागर शामिल हैं।
उनके अनुसार आध्यात्मिक चर्चा का आधार इन्हीं ग्रंथों में मौजूद प्रमाण होने चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्मगुरु अपने-अपने पक्ष को इन्हीं पवित्र ग्रंथों के आधार पर रखें और ग्रंथों से बाहर के तर्क को इस शास्त्रार्थ में मान्य न माना जाए। जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ने अपने पक्ष को आदि सनातन धर्म के एक अधिवक्ता की तरह रखने का उदाहरण दिया। उन्होंने न्यायालय की प्रक्रिया समझाते हुए कहा कि जैसे पक्ष और विपक्ष के अधिवक्ता संविधान के आधार पर अपना-अपना पक्ष न्यायाधीश के सामने रखते हैं, वैसे ही इस आध्यात्मिक चर्चा में दोनों पक्ष पवित्र ग्रंथों के प्रमाणों के आधार पर अपनी बात रखें।
जमीन की सीमा के उदाहरण से समझाया शास्त्रों का महत्व
शास्त्रों को आधार बनाने की बात समझाते हुए जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ने जमीन के विवाद का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि जब दो पक्ष अपनी-अपनी जमीन की सीमा अलग-अलग बताते हैं, तो वास्तविक सीमा निर्धारित करने के लिए पुराने सीमा-पत्थर को आधार बनाया जाता है। उनके अनुसार यदि दोनों पक्ष उस सीमा-पत्थर को स्वीकार करते हैं, तो उसी के आधार पर जमीन की माप होती है और दोनों पक्ष निर्धारित सीमा को स्वीकार करते हैं।
इसी प्रकार उन्होंने पवित्र ग्रंथों को आध्यात्मिक विषयों का प्रमाणिक आधार बताया और कहा कि देवी-देवताओं तथा आध्यात्मिक मान्यताओं की तुलना भी उन्हीं ग्रंथों के आधार पर होनी चाहिए।
यहाँ इस अंश का परिष्कृत, प्रवाहमयी और पत्रकारिता शैली में सुधारा गया प्रारूप है:
₹50 लाख का नकद इनाम: “शास्त्र प्रमाण से गलत सिद्ध करें”
इस शास्त्रार्थ की सबसे चर्चित घोषणा ₹50 लाख का नकद इनाम है। जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ने स्पष्ट किया कि यदि कोई भी धर्मगुरु, मठाधीश, शास्त्री या आचार्य पवित्र वेदों, श्रीमद्भगवद्गीता और प्रमाणित शास्त्रों के आधार पर उनके ज्ञान को गलत सिद्ध कर देता है, तो उसे तत्काल ₹50 लाख की नकद धनराशि स्वरूप दी जाएगी।
उन्होंने इस निमंत्रण को पूरी तरह एकतरफा और निष्पक्ष बताते हुए कहा कि दूसरे पक्ष पर किसी भी प्रकार की वित्तीय शर्त या जुर्माने का नियम लागू नहीं होगा। विद्वान केवल शास्त्रों के प्रमाण के आधार पर अपना पक्ष रखें। इसके साथ ही उन्होंने मंच की बाध्यता को भी समाप्त करते हुए स्पष्ट किया कि यदि कोई धर्मगुरु टीवी चैनल स्लॉट बुक करने में असमर्थ है, तो वह YouTube या Instagram जैसे डिजिटल माध्यमों से भी अपना प्रमाणित पक्ष जनता के समक्ष रख सकता है।
किसी मध्यस्थ के बजाय जनता की अदालत में होगा निर्णय
संत रामपाल जी महाराज ने इस संवाद के लिए किसी विशेष पैनल या अलग जज की व्यवस्था को सिरे से खारिज करते हुए अंतिम निर्णय का अधिकार पूरी तरह जनता के विवेक पर छोड़ा है। उनका कहना है कि आज का समाज प्रबुद्ध और शिक्षित है, जो स्वयं सत्य और असत्य का आकलन करने में सक्षम है।
उन्होंने अपील की कि देश और दुनिया की जनता टीवी व सोशल मीडिया पर होने वाली इस शास्त्र-चर्चा को ध्यानपूर्वक देखे, दोनों पक्षों के प्रमाणों का मिलान मूल सद्ग्रंथों से करे और अपने विवेक से यह तय करे कि कौन-सा मार्ग वास्तव में शास्त्रानुकूल है।
पहला मुद्दा होगा सृष्टि रचना और सृष्टि की उत्पत्ति
जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ने कहा कि डिबेट में सबसे पहले सृष्टि रचना का विषय रखा जाएगा। उनका सवाल है कि सृष्टि की उत्पत्ति किसने की और उसका सही इतिहास कौन बता सकता है।
इस विषय को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने व्यास और नारद के प्रसंग का उल्लेख किया। उनके अनुसार व्यास ने नारद से सृष्टि के रचयिता के बारे में प्रश्न किया था। नारद ने बताया कि यही प्रश्न उनके मन में भी आया था और उन्होंने अपने पिता ब्रह्मा से यही सवाल पूछा था। उनके अनुसार ब्रह्मा ने भी इस प्रश्न को जटिल बताया और अपनी उत्पत्ति को लेकर प्रश्न किया।
इसके बाद उन्होंने शिव महापुराण की विद्वेष संहिता के एक प्रसंग का उल्लेख किया, जिसमें ब्रह्मा और विष्णु के बीच इस बात को लेकर संवाद होता है कि दोनों में से किसकी उत्पत्ति किससे हुई। जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ने इन्हीं प्रसंगों के आधार पर सृष्टि के वास्तविक उत्पत्तिकर्ता के विषय को शास्त्र प्रमाणों से रखने की बात कही।
“30 साल से शास्त्रों के आधार पर ज्ञान बता रहा हूं”
जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ने अपने संबोधन में कहा कि वह करीब 30 वर्षों से सत्संग के माध्यम से शास्त्रों के आधार पर आध्यात्मिक ज्ञान बताते आ रहे हैं।
उन्होंने अपने ऊपर लगाए जाने वाले उन आरोपों का भी उल्लेख किया, जिनमें देवी-देवताओं के संबंध में गलत बोलने, उनका अपमान करने या उनकी भक्ति को रोकने की बात कही जाती है। उन्होंने कहा कि उनका ज्ञान यदि किसी पवित्र ग्रंथ के विरुद्ध सिद्ध हो जाए तो वह सौ-सौ बार माफी मांगने के लिए तैयार हैं।
उनका कहना है कि उनके सत्संग में बताए गए ज्ञान का आधार पवित्र सूक्ष्मवेद, चारों वेद, श्रीमद्भगवद्गीता, 18 पुराण, रामचरितमानस, वाल्मीकि रामायण, महाभारत और श्रीमद्भागवत है।
इस विश्व में संत रामपाल जी महाराज एकमात्र से संत हैं जो शास्त्रों के अनुसार भक्ति विधि बताते हैं और आध्यात्मिक ज्ञान के साथ सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध लोगों को जागरूक करते हैं।
2009 में भी शंकराचार्यों के साथ शास्त्रार्थ की पहल
2009 में भी जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज की ओर से प्रमुख शंकराचार्यों को शास्त्रार्थ का निमंत्रण/प्रस्ताव भेजा गया था, हालांकि किसी पीठ की ओर से इस चुनौती को आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया था।
“आध्यात्मिक ज्ञान चर्चा – संत रामपाल जी महाराज और मुख्य शंकराचार्य 2009”
इस इकतरफ़ा चर्चा में जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ने शंकराचार्यों के मत, परमात्मा के स्वरूप, ब्रह्मा-विष्णु-महेश और देवी-देवताओं की भक्ति सहित कई विषयों पर शास्त्रों के प्रमाणों से चर्चा का विवरण दिया गया है।
3 और 4 अक्टूबर को साधना टीवी पर शास्त्रार्थ
जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ने 3 अक्टूबर (शनिवार) और 4 अक्टूबर (रविवार) 2026 शाम 7:30 से 9:30 बजे तक साधना टीवी पर इस विशेष शास्त्रार्थ का समय निर्धारित किया है।
इसके बाद प्रत्येक शनिवार और रविवार को चर्चा जारी रखने की बात है, जब तक शास्त्रार्थ पूरा नहीं हो जाता। धर्मगुरुओं को अपने-अपने माध्यम से जनता के सामने अपना पक्ष रखने का निमंत्रण भी दिया गया है।
शास्त्रार्थ के केंद्र में रहेगा प्रमाण, पक्ष और जनता का निर्णय
3 और 4 अक्टूबर का प्रस्तावित शास्त्रार्थ शास्त्रों के प्रमाण पर केंद्रित है। जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ने धर्मगुरुओं को अपने-अपने पक्ष को पवित्र ग्रंथों के आधार पर रखने का आह्वान किया है। शुरुआत सृष्टि रचना के विषय से होगी और ₹50 लाख की चुनौती के साथ इस चर्चा का फैसला जनता के हाथों में रखने की बात है।
धर्मगुरुओं ने दी अलग-अलग प्रतिक्रिया, किसी ने चुनौती को बताया अनुचित तो किसी ने चर्चा की बात कही

जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज के शास्त्रार्थ के आह्वान पर दैनिक भास्कर की प्रकाशित खबर में कई धर्मगुरुओं की प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं। कुरुक्षेत्र की जयराम संस्थाओं के प्रभारी ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी महाराज ने कहा, “अहंकार की भावना से ऐसे चैलेंज को वे उचित नहीं मानते।” वहीं महंत बंसीपुरी महाराज ने कहा, “ऐसे चैलेंज बकवास हैं। जो भी शास्त्रों के ज्ञाता होते हैं, विद्वान हैं, वे कभी ऐसे चैलेंज स्वीकार नहीं करते, न विचलित होते हैं। हमारे सनातन को नीचा दिखाने के प्रयास कभी सफल नहीं हुए।” भद्रकाली शक्तिपीठ के पीठाधीश पंडित सतपाल महाराज ने कहा, “संत रामपाल का यह चैलेंज ही बेतुका है।” गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद महाराज का कहना है, “सनातन धर्म तो कभी किसी का विरोध नहीं सिखाता। वे देश के प्रमुख संतों और धर्म-गुरुओं से जरूर इस विषय में बात करेंगे, तभी कुछ बताएंगे।” इस्कॉन प्रदेश प्रभारी साक्षी गोपाल प्रभु ने कहा, “सत्य को प्रमाणित करने की जरूरत नहीं होती, वह खुद सामने आ जाता है।”
स्रोत: दैनिक भास्कर (न्यूज़पेपर कटिंग)
किसी को नीचा दिखाना नहीं, शास्त्रों के आधार पर सत्य ज्ञान और भक्ति बताना उद्देश्य
जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि यह पहल किसी धर्मगुरु को बड़ा या छोटा साबित करने और केवल हार-जीत का विषय बनाने के लिए नहीं है। उनके अनुसार उद्देश्य भ्रमित भक्त समाज को शास्त्रों के अनुकूल दिशा देना है। उनका कहना है कि जब आध्यात्मिक ज्ञान का आधार पवित्र सद्ग्रंथ हैं, तो सत्य की पहचान भी उन्हीं ग्रंथों के प्रमाण से होनी चाहिए।
इसी कारण उन्होंने चारों वेद, श्रीमद्भगवद्गीता, 18 पुराण, रामचरितमानस, वाल्मीकि रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत यानी सुधा सागर और सूक्ष्मवेद को शास्त्रार्थ का आधार रखा है। उनके आधिकारिक आध्यात्मिक साहित्य में भी शास्त्रानुकूल भक्ति और मोक्ष को प्रमुख विषयों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस पहल का उद्देश्य उनके अनुसार लोगों को यह समझाना है कि मनुष्य जीवन को भ्रम में न गंवाकर शास्त्रों में बताए गए सत्य ज्ञान और सत्भक्ति को समझा जाए। जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज की शिक्षाओं में परमात्मा की प्राप्ति और शास्त्रानुकूल भक्ति को केंद्रीय विषय के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
FAQs on जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज का शास्त्रार्थ
3 और 4 अक्टूबर 2026 को शाम 7:30 से 9:30 बजे तक साधना टीवी पर शास्त्रार्थ होगा।
चारों वेद, सूक्ष्मवेद, श्रीमद्भगवद्गीता, 18 पुराण, रामचरितमानस, वाल्मीकि रामायण, महाभारत और श्रीमद्भागवत आधार होंगे।
शास्त्र प्रमाण से जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज के ज्ञान को गलत सिद्ध करने पर ₹50 लाख देने की चुनौती है।
पहला विषय सृष्टि रचना और सृष्टि की उत्पत्ति है। इस पर शास्त्रों के प्रमाणों से चर्चा शुरू होगी।
हाँ। 2009 में मुख्य शंकराचार्यों के साथ आध्यात्मिक ज्ञान चर्चा का रिकॉर्ड उपलब्ध है।
नहीं, संत रामपाल जी महाराज की ओर से स्पष्ट किया गया है कि दूसरे पक्ष से किसी प्रकार की कोई शर्त, दक्षिणा या आर्थिक जुर्माना नहीं लिया जाएगा।



