जब सरकारी तंत्र थका, तब ‘मसीहा’ बनकर आए संत रामपाल जी महाराज: नंगला खारी की भावुक कहानी

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ब्रज की पावन धरा, जहाँ कभी कान्हा की मुरली गूंजती थी, पिछले कुछ वर्षों से वहां एक अजीब सा सन्नाटा और मायूसी पसरी हुई थी। उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले की गोवर्धन तहसील का गांव नंगला खारी और उसके आसपास के करीब 20 गांव कुदरत की मार और प्रशासनिक उपेक्षा के दोहरे दंश झेल रहे थे। खेतों में लबालब भरा पानी किसानों की उम्मीदों को हर साल डुबो देता था। बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे थे, पशुओं के लिए चारा नहीं था और घरों में चूल्हा जलना मुश्किल हो गया था।

जब नेताओं के खोखले वादे और दफ्तरों की धूल फांकते-फांकते पीढ़ियां थक गईं, तब एक ऐसी शक्ति ने हाथ थामा, जिसे आज ग्रामीण ‘किसानों का मसीहा’ और ‘मानव रूप में ईश्वर’ कह रहे हैं। यह कहानी है संत रामपाल जी महाराज के उस परोपकार की, जिसने मरते हुए अरमानों में फिर से जान फूंक दी।

बेबसी का मंजर: जब उपजाऊ जमीन ही बन गई बोझ

नंगला खारी के हालात ऐसे थे कि किसान अपनी ही उपजाऊ जमीन पर खड़ा होकर बेबस आंसू बहाता था। गांव के प्रतिनिधि मेहताब कुंतल और समाजसेवी दीपक चौधरी बताते हैं कि प्रशासन के चक्कर काटते-काटते लोग हार चुके थे। नेता आते, फोटो खिंचवाते और आश्वासन देकर चले जाते, लेकिन जमीन पर पानी जस का तस खड़ा रहता।

आलम यह था कि किसानों के पास बच्चों की स्कूल फीस भरने तक के पैसे नहीं बचे थे। 10 किलोमीटर का पूरा घेरा जलभराव की समस्या से जूझ रहा था, जिससे न केवल फसलें बर्बाद हुईं, बल्कि पशुधन पर भी संकट आ गया। ग्रामीणों का कहना है कि वे इस समस्या के कारण “जीते जी मर रहे थे।”

यह भी पढ़ें: भटगांव डूंगरान में बाढ़ के बाद लौटी उम्मीद: संत रामपाल जी महाराज द्वारा खेतों से निकला पानी (सोनीपत, हरियाणा)

उम्मीद की एक अर्जी और 3 दिन में संत रामपाल जी महाराज ने किया चमत्कार

जब चारों तरफ अंधेरा दिखा, तब ग्रामीणों ने संत रामपाल जी महाराज के चरणों में एक उम्मीद की अर्जी लगाई। ग्रामीण पहले दिल्ली के मुंडका आश्रम गए और फिर भरतपुर में अपनी पीड़ा बताई। यहाँ कोई सरकारी फाइलों वाली लंबी प्रक्रिया नहीं चली। संत जी ने तुरंत उनकी व्यथा सुनी और मात्र तीन-चार दिनों के भीतर राहत का एक विशाल काफिला नंगला खारी की गलियों में खड़ा था।

ग्रामीणों के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था कि जिस समस्या का समाधान सालों से नहीं हुआ, वह एक संत की दया से चंद दिनों में सुलझने की राह पर था।

सेवा की पराकाष्ठा: कील से लेकर पाइप तक संत रामपाल जी महाराज ने सब कुछ दिया निःशुल्क

नंगला खारी में जलभराव से राहत: संत रामपाल जी महाराज की अन्नपूर्णा मुहिम से लौटी उम्मीद

संत रामपाल जी महाराज की सेवा की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने पंचायत पर एक पैसे का बोझ नहीं आने दिया। सेवादारों ने स्पष्ट कर दिया कि ट्रकों के भाड़े से लेकर पाइप चिपकाने वाले फेविकोल और नट-बोल्ट तक का सारा खर्च संत जी ने खुद उठाया है। यहाँ तक कि जिन क्षेत्रों में बिजली नहीं है, वहां संत जी अपने खर्च पर प्रतिदिन 4-5 लाख रुपये का डीजल जलाकर जनरेटर के माध्यम से पानी निकलवा रहे हैं।

राहत सामग्री का विवरण (नंगला खारी पंचायत)

क्रम संख्यासामग्रीविवरण
1पाइप900 फुट मजबूत (8 इंची)
2मोटर15 हॉर्स पावर (HP) क्षमता की
3बिजली की तार820 फुट लंबी कॉपर केबल
4अतिरिक्त फिटिंगबैंड, असेंबली, निपल, फुटबॉल
5इंस्टॉलेशन किटस्टार्टर, पाइप चिपकाने वाला एसआर (फेविकोल), 20 फुट फ्लेक्सिबल पाइप

‘मरते हुए जिंद हो रहे हैं साहब’: संत की सेवा देख ग्रामीणों के आंसु झलके

जैसे ही संत रामपाल जी महाराज के सेवादारों का काफिला गांव में दाखिल हुआ, ऐतिहासिक दृश्य देखने को मिला। मकानों की छतों से माताओं-बहनों ने फूलों की बारिश की। बुजुर्गों ने संत जी की प्रतिमा पर पगड़ी भेंट की, जो कि किसान की इज्जत का प्रतीक मानी जाती है। ग्रामीणों ने कहा, “हमने तो सिर्फ नाम सुना था, आज काम भी देख लिया।

ये मानव रूप में ईश्वर हैं।” गांव में होली-दिवाली जैसा माहौल था। लोगों का मानना है कि संत जी ने केवल फसलें ही नहीं, बल्कि उनकी नस्लें भी बचा ली हैं, क्योंकि अब उनके बच्चे फिर से स्कूल जा सकेंगे।

संत की सेवा, समर्पण और संवेदना से नंगला खारी में लौटी मुस्कान

नंगला खारी की यह कहानी साबित करती है कि जहाँ सरकारी तंत्र और बड़े-बड़े कथावाचक विफल हो जाते हैं, वहाँ एक सच्चा संत ही ढाल बनकर खड़ा होता है। संत रामपाल जी महाराज का स्पष्ट आदेश है कि “दिखावा नहीं, जमीनी स्तर पर काम होना चाहिए।” उन्होंने न केवल सामग्री दी, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि खेतों से पानी निकले और फसलें लहलहाएं। संत जी स्वयं एक किसान परिवार से हैं, इसलिए वे किसान का दर्द बखूबी समझते हैं।

आज नंगला खारी के खेतों में सन्नाटा नहीं, बल्कि खुशहाली की नई उम्मीद है। जैसा कि वहां के ग्रामीणों ने कहा—ऐसी निस्वार्थ सेवा केवल एक पूर्ण संत ही कर सकता है, जो बिना किसी राजनीतिक स्वार्थ या वोट की लालसा के दिन-रात मानव कल्याण में लगा है। वास्तव में, औरों के काम आना ही जीना है।

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