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मदर्स डे एक वार्षिक कार्यक्रम है जो हर साल मां को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है। उत्तरी अमेरिका में माताओं के सम्मान के लिए मदर्स डे मनाना शुरू हुआ था। यह दिवस बच्चों द्वारा मातृ को सम्मान देने केे लिए मनाया जाता है।

एना जार्विस को अमेरिका में मदर्स डे की संस्थापक (मदर्स डे के रूप में भी प्रसिद्ध) के रूप में जाना जाता है, हालांकि वह एक अविवाहित महिला थीं। वह अपनी मां (श्रीमती अन्ना मैरी रीव्स जार्विस) के प्यार और उसकी देखभाल से बहुत प्रेरित थी और उसने सभी माताओं का सम्मान करने और उनके सच्चे प्यार का प्रतीक होने के लिए एक दिन का सुझाव देने का फैसला किया। मदर्स डे को ईसाईयों द्वारा चौथे रविवार को वर्जिन मैरी (मसीह की माँ) का सम्मान करने के लिए भी मनाया जाता है।

इस वर्ष भारत में मातृ दिवस, मदर्स डे 12 मई रविवार को मनाया जाएगा। यह हर साल मई महीने के दूसरे रविवार को पड़ता है। यह दुनिया के लगभग 46 देशों में अलग-अलग तिथियों पर मनाया जा रहा है।

मां और उसकी ममता

मां बच्चे को दूध पिला कर पालने में सुला कर रसोई का काम करने चली गई। रसोई का काम निबटा कर बच्चे के पास आई तो देखा बच्चा टट्टी (Potty) से सना हुआ है। मां ने बच्चे को पालने से उठाया, उसे नहलाया, स्वच्छ कपड़े पहनाए, पाउडर लगाया और फिर सीने से लगाकर चूमने लगी। मां, मम्मी, अम्मा, अम्मी, आई, मदर किसी भी नाम से पुकारो मां हमेशा मां ही रहती है। मां शब्द से ममता, प्रेम, अपनापन, दोस्ती झलकती है।
मां बच्चे को जन्म देने के साथ हर वो अच्छी बात सिखाती है जो उसके लिए ज़रूरी और व्यावहारिक है। मां ही प्रथम अध्यापक है जो अपने बच्चे को खाना, पीना, चलना, बोलना, उठना, बैठना व अन्य तमीज़ सिखाती है। आज की मांएं घर भी देखती हैं और ऑफिस का काम भी। मां को बच्चों की हर ज़रूरत को पूरा करने की क्षमता भी परमात्मा देता है।

मां बच्चों के लिए जीती है

बहन रानो का लड़का अभी छोटा ही था कि उसके पति की अकस्मात मृत्यु हो गई। बहन रानो ने दूसरा ब्याह यह सोच कर नहीं करवाया कि न जाने दूसरा व्यक्ति (पति) उसके बेटे के साथ कैसा व्यवहार करेगा।
रानो ने बेटे को मां और पिता दोनों का प्यार दिया। जब बेटा कॉलेज जाने लायक हो गया तो उसने मां से ज़िद्द करी की मां मोटर साइकिल लूंगा। रानो ने बेटे की ज़िद्द यह सोच कर पूरी कर दी कि कहीं बेटे के मन में ये बात न आए कि काश मेरा पिता होता तो ज़रूर लेकर देता।
रानो ने बेटे को मोटरबाइक दिला दी।
बेटा रोज़ मोटरसाइकिल से अपने दोस्त को पीछे बैठाकर कॉलेज जाने लगा। उस दिन भी वह अपने दोस्त को पीछे बैठाकर कालेज के लिए जा रहा था कि अचानक कार से टक्कर हो गई और रानो के लड़के की घटना स्थल पर ही मौत हो गई।
रानो अभी नाश्ता करने बैठी ही थी कि बेटे का दोस्त दौड़ता हुआ आया और बोला आंटी रास्ते में मोटरसाइकिल की टक्कर अचानक सामने से आई कार से हो गई और हमारा एक्सीडेंट हो गया। यह सुनकर रानो नंगे पैर ही, बेटे के दोस्त के साथ घटनास्थल की ओर दौड़ पड़ी।
रानो अपने बेटे की लंबी आयु के लिए सोमवार, वीरवार के व्रत रखा करती थी।
कबीर साहेब जी अपनी वाणी के माध्यम से कहते हैं,

एक माई का पति मरा था
वो दुख में माथा फोड़े थी
मेरे बेटे की तू खैर राखिए
हाथ तेरे तै जोड़े थी
उस दुखिया का एक ही बेटा
हाथ तेरे तै जोड़े थी
मेरे बेटे की तू खैर राखिए
तेरे देवीधाम पे दौड़ेे़ थी
उस दुखिया का एक ही बेटा
उसके आगे वो भी खा लिया काल तने
कति करी न टाल तने …

हम जिसे भगवान मानकर पूजा करते हैं वही हमारे जन्म और मृत्यु का कारण है। यदि हम पूर्ण परमात्मा की भक्ति करेंगे तो वह जल, थल में हमारी रक्षा करता है।

मां, परिवार का मुख्य सदस्य होती है। बच्चे स्कूल से आकर मां के घर में न दिखाई देने पर सबसे पहले पूछते हैं, “मां कहां है, कहां गई, कब आएगी। पति घर आकर पूछता है बच्चों से, कहां गई तुम्हारी मां!

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सृष्टि रचना संक्षिप्त में:-
हम सब पहले उस परमेश्वर (सतपुरूष) के पास रहते थे। वहाँ हमने गलती की थी। हमने अपने परम सुखदाई परमात्मा (सतपुरूष) की अपेक्षा काल ब्रह्म (ज्योति निरंजन) में आस्था बना ली थी। यह सतलोक में तपस्या कर रहा था। हम इसे अच्छा व्यक्ति जानकर दिल से चाहने लगे। यही गलती प्रकृति देवी ने की थी। वह भी इसे अच्छा व्यक्ति मानकर आसक्त हुई थी। जिस कारण से परमात्मा यानि सतपुरूष जी ने हमको त्याग दिया। इस काल ब्रह्म ने तपस्या के प्रतिफल में सतपुरूष से इक्कीस ब्रह्माण्ड प्राप्त किए हैं।

काल ने दुर्गा के साथ दुष्कर्म करने की कोशिश की थी।

इसने सतलोक में युवती प्रकृति देवी (दुर्गा) के साथ दुष्कर्म करने की कोशिश की थी। प्रकृति देवी (दुर्गा) अपनी इज्जत की रक्षा के लिए सूक्ष्म रूप बनाकर काल ब्रह्म के खुले मुख द्वार से उसके पेट में चली गई थी। परम अक्षर ब्रह्म ने देवी को ब्रह्म के उदर से निकालकर देवी सहित हम सबको काल ब्रह्म के साथ सत्यलोक से सोलह (16) संख कोस (48 शंख कि.मी.) दूर यहाँ भेज दिया। परम अक्षर ब्रह्म ने प्रकृति देवी के साथ किए दुर्व्यवहार के कारण काल ब्रह्म को इक्कीस ब्रह्माण्डों सहित सतलोक से निकाल दिया था।

काल और दुर्गा के संयोग से जीवों की उत्पत्ति होती है।

दुर्गा (प्रकृति देवी) और काल (ब्रह्म) के पति-पत्नी व्यवहार से तीनों पुत्रों रजगुण युक्त श्री ब्रह्मा जी, सतगुण युक्त श्री विष्णु जी, तमगुण युक्त श्री शिव जी को उत्पन्न करती है।

गीता अध्याय 7 श्लोक 4 से 6 में स्पष्ट किया है कि मेरी आठ प्रकार की माया जो आठ भाग में विभाजित है पाँच तत्व तथा तीन (मन, बुद्धि, अहंकार) ये आठ भाग हैं। यह तो जड़ प्रकृति है। सर्व प्राणियों को उत्पन्न करने में सहयोगी हैं, यही दुर्गा (प्रकृति) ही अन्य तीन रूप महालक्ष्मी – महासावित्री – महागौरी आदि बनाकर काल (ब्रह्म) के साथ पति-पत्नी व्यवहार से तीनों पुत्रों रजगुण युक्त श्री ब्रह्मा जी, सतगुण युक्त श्री विष्णु जी, तमगुण युक्त श्री शिव जी को उत्पन्न करती है। फिर यही दुर्गा अन्य तीन स्त्री रूप सावित्री, लक्ष्मी तथा गौरी बनाकर तीनों देवताओं (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी, श्री शिव जी) से विवाह करके काल के लिए जीव उत्पन्न करती है। जो चेतन प्रकृति (शेराँवाली) है। इसके सहयोग से काल सर्व प्राणियों की उत्पत्ति करता है।

दुर्गा और काल जीव को कभी मुक्त नहीं होने देते।

गीता अध्याय 14 श्लोक 3 में कहा है कि (मम ब्रह्म) मुझ ब्रह्म की (महत्) प्रकृति यानि दुर्गा की योनि है। मैं (तस्मिन) उस (योनिः) योनि में गर्भ स्थापित करता हूँ। उससे सर्व प्राणियों की उत्पत्ति होती है।

वास्तविकता तो यह है कि सबसे बड़े परमात्मा कबीर परमेश्वर हैं। जिन्होंने काल और दुर्गा की उत्पत्ति की।
काल और दुर्गा के संयोग से ब्रहमा, विष्णु और शिव की उत्पत्ति हुई और हमारी उत्पत्ति इनके कारण हुई।
परंतु काल का यह परिवार जीवों को सदा भ्रमित रखता है मृत्यु और जन्म में बांधे रखना इनका मुख्य कार्य है।
ब्रह्मा जीव को रजोगुण युक्त कर उत्पत्ति करवाता है।
विष्णु मोह में उलझाए रखता है और शिव द्वेष, अंहकार, तमोगुण के प्रभाव से विनाश करवाता है।
काल के अंतर्गत 21 ब्रह्मांड आते हैं जिसमें आने वाले जीवों का यह पिता है और दुर्गा माता है। परंतु इनको जीवों से कोई लगाव नहीं है कोई ममता, प्रेम और मोह नहीं है।

काल को दुर्गा के साथ बदव्यवहार (बलात्कार) करने के कारण रोज़ एक लाख मानव शरीर धारी प्राणियों को खाने का और सवा लाख उत्पन्न करने का श्राप लगा हुआ है और दुर्गा इसके वश है। जैसे एक दुराचारी और शराबी पति को उस पर आश्रित पत्नी न सुधार पाती है, न छोड़ सकती है वही दशा दुर्गा की है। दुर्गा काल के वश है। वह भी कबीर परमेश्वर के साथ धोखा करने की सज़ा भुगत रही है।

परमात्मा ने मां क्यों बनाई?

परमात्मा अपनी सभी आत्माओं के जनक हैं।
हम सभी जीव जो आज यहां फंसे हैं कबीर परमेश्वर के साथ सतलोक में रहती थीं। परमात्मा ही हमारी मां और पिता दोनों हैं। सतलोक में हम सभी के अतिसुंदर शरीर थे। हम कोई काम नहीं करते थे। वहां दूध की नदियां बहती हैं। फलों के सुंदर बाग बगीचे हैं। वहां न छाया है न धूप है। सदा सदाबहार मौसम रहता है। परमात्मा वहां अपनी प्रत्येक आत्मा के साथ रहता है। वहां हमारे बड़े बड़े मकान हैं।
परंतु हमने अपने पैर पर स्वयं कुल्हाड़ी मारी और परमात्मा के साथ धोखा किया जिस कारण हम आज इस पृथ्वी पर महान कष्ट सहते हुए भी काल को भगवान मानते हैं और दुर्गा की वास्तविकता को अनदेखा करके मां मानकर उसकी पूजा करते हैं। जबकि वह जीवों की मृत्यु का कारण है। परमात्मा जो हमारी आत्मा के जनक हैं हमसे बहुत ही अधिक प्रेम करते हैं। अपनी प्रत्येक आत्मा के दुख में परमात्मा रोते हैं। उनकी आत्मा को यहां पृथ्वी लोक पर भी मां का प्यार मिले, संभाल मिले, समय पर पका-पकाया भोजन, साफ वस्त्र और सभी सुख जो मां दे सकती है मिलें। इसके लिए परमात्मा ने अपनी ही छवि मां को दी।
प्रत्येक मां अपने बच्चे को जिसे उसने नौ माह गर्भ में रखा आजीवन लाड देती है। परंतु मां एक मनुष्य है वह परमात्मा वाले काम नहीं कर सकती। मृत्यु होने पर बच्चे के शरीर में दोबारा प्राण नहीं फूंक सकती परंतु परमात्मा अपने सच्चे साधक की आयु भी बढ़ा देते हैं और यम के दूतों से भी पल पल रक्षा करते हैं।

हम मां को परमात्मा का रूप मानते हैं क्योंकि हमारी अंतरात्मा जानती है कि परमात्मा ममतामयी, दयालु और जीवन रक्षक है और वही प्रेम हमें मां से मिलता है। परंतु इस काल लोक की मां नाशवान है यानी उसकी भी मृत्यु होती है। यहां मां, बच्चे और अन्य रिश्तेदार संस्कार वश जुड़े हैं। समय और संस्कार पूरा होते ही जीवन की डोर टूट जाती है। कभी मां की मौत पहले हो जाती है तो कभी बच्चे की। इस लोक में मृत्यु निश्चित है। मां और बच्चे दोनों को अपना जीवन जन्म सफल बनाने के लिए संत जो तत्वदर्शी हो उसकी खोज कर उनसे सतभक्ति प्राप्त करके सच्चे संत द्वारा बताई भक्ति कर अपने असली परमात्मा (मां) से मिलना चाहिए क्योंकि
मात पिता मिल जायेंगे, लख चौरासी माही। सतगुरू सेवा और बंदगी, फेर मिलन की नाही।”

मां है तो मैं बेफिक्र हूं।
और परमात्मा है तो मैं सदा निश्चिंत हूं।
जिसके सिर पर परमात्मा है वह आत्मा काल के जाल में कभी नहीं आता और सदा के लिए जन्म मृत्यु के चक्कर से मुक्त हो जाता है। जिस दिन आपकी सतगुरू से भेंट हो जाएगी आपको सभी रिश्तों की परख हो जाएगी। संत रामपाल जी महाराज जी स्वयं परमात्मा हैं। संत रामपाल जी महाराज जी द्वारा दिए जा रहे आध्यात्मिक ज्ञान को प्राप्त कर हर व्यक्ति परमात्मा रूपी मात पिता का स्नेह प्रति क्षण प्राप्त करता है और यह सच्चा प्रेम मनुष्य की आत्मा की भूख है।

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