Mahavir Jayanti 2022 [Hindi]: महावीर जयंती पर जानिए जैन धर्म और महावीर जैन के तीन सौ तरेसठ पाखंड मतों की सच्चाई

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Last Updated on 14 April 2022, 4:32 PM IST | Mahavir Jayanti in Hindi: प्रत्येक व्यक्ति परमात्मा को प्राप्त करना चाहता है। उस परमात्मा की प्राप्ति के लिए वो अपनी पारंपरिक साधना से ही शुरुआत करता है। बाल्यकाल से ही किसी न किसी धर्म का अनुयायी हो जाता है उसी के अनुसार देखा-देखी भक्ति भी प्रारंभ कर देता है। हर धर्म की शुरुआत किसी विशेष महापुरुष से होती है। उन्हीं की लीला और शिक्षा उस धर्म की नींव होती है। बहुत से प्रचलित धर्मों में से एक विशेष धर्म है जैन धर्म और जैन धर्म की नींव है महावीर जैन अर्थात भगवान महावीर।

जैन धर्म के तीर्थंकर महावीर जैन का जन्म

Mahavir Jayanti in Hindi: महावीर जी के जन्म और मृत्यु का सही समय बता पाना मुश्किल है। एक परम्परा के अनुसार, महावीर जी का जन्म 540 ई. पू. में वैशाली नगर के कुंडलग्राम में इक्ष्वाकु वंश के राजा पिता सिद्धार्थ के घर माता त्रिशला, (लिच्छवी शासक चेतक की बहन) की कोख से चैत्र शुक्ल तेरस को हुआ था। उनका पूरा नाम वर्धमान था। जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकर माने गए है भगवान महावीर जैन धर्म के चौबीसवें और अन्तिम तीर्थंकर थे। तीस वर्ष की आयु में महावीर ने संसार से विरक्त होकर राज वैभव त्याग दिया और संन्यास धारण कर आत्मकल्याण के पथ पर निकल गये। 12 वर्षों की कठिन तपस्या के बाद उन्हें कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ जिसके पश्चात उन्होंने समवशरण में ज्ञान प्रसारित किया। 468 ई. पू. 72 वर्ष की आयु में उन्होंने आधुनिक राजगीर के निकट पावापुरी में अपना शरीर छोड़ा। 

महावीर स्वामी जी की शिक्षाएं (Teachings of Mahavir Jain in Hindi)

  • महावीर स्वामी ने दुनिया को सत्य, अहिंसा का पाठ पढ़ाया। तीर्थंकर महावीर स्वामी ने अहिंसा को सबसे उच्चतम नैतिक गुण बताया। उन्होंने दुनिया को जैन धर्म के पंचशील सिद्धांत बताए, जो है– अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य (अस्तेय) और ब्रह्मचर्य। 
  • जैन ग्रंथ उत्तरपुराण में वर्धमान, वीर, अतिवीर, महावीर और सन्मति ऐसे पांच नामों का उल्लेख है। इन सब नामों के साथ कोई न कोई कथा जुड़ी है। जैन ग्रंथों के अनुसार, २३वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ जी की मृत्यु के 188 वर्ष बाद इनका जन्म हुआ था।
  • महावीर का साधना काल १२ वर्ष का था। महावीर जैन ने दिगम्बर साधु की कठिन दिनचर्या को अंगीकार किया और निर्वस्त्र रहे और उन्होंने केवल ज्ञान की प्राप्ति भी दिगम्बर अवस्था में ही की। अपने पूरे साधना काल के दौरान महावीर ने कठिन तपस्या की और मौन रहे। 

Mahavir Jayanti in Hindi: जैन धर्म की शुरुआत कैसे हुई ?

पवित्र जैन धर्म की शुरुआत प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव जी ने की उन्हीं को जैन धर्म का संस्थापक माना जाता है। ऋषभदेव जी के बारे में जैन ग्रंथों में विवरण है कि श्री ऋषभदेव जी के पूज्य पिताजी श्री नाभिराज अयोध्या के राजा थे, जो इक्ष्वाकुवंशी थे। माता जी का नाम मरूदेवी था। श्री ऋषभदेव जी ने दो शादियां की। ऋषभदेव जी के घर में 100 पुत्र तथा दो पुत्री संतान रूप में प्राप्त हुई।

Mahavir Jayanti in Hindi: श्री ऋषभदेव जी के पुत्र भरत और उनका पुत्र अर्थात श्री ऋषभदेव जी का पौत्र मारीचि था। श्री ऋषभदेव जी को परमात्मा प्राप्ति की तड़प हुई तो अपने पुत्रों को राज्य सौंप कर घर त्याग कर दीक्षा लेकर साधना में लीन हो गए। एक वर्ष तक निराहार रहे।  कुछ भी खाया पिया नहीं तथा एक हजार वर्ष तक लगातार तपस्या करके सबसे पहले अपने पौत्र (भरत के पुत्र) श्री मारीचि को दीक्षा दी। यह मारीचि वाला जीव ही चौबीसवें तीर्थंकर महावीर जैन के रूप में जन्मे थे।

Mahavir Jayanti In Hindi: श्रीमद् सुधासागर में ऋषभदेव जी का वर्णन

श्री ऋषभदेव के विषय में श्रीमद् भागवत सुधासागर में भी बताया गया है। श्रीमद् सुधासागर के पांचवें स्कंद, अध्याय तीन से छ:, पृष्ठ 254 से 260 तक उनका वर्णन है। जिसमें सर्व विवरण “जैन ग्रंथों से मिलता है। परन्तु श्री ऋषभदेव जी की मृत्यु का विवरण जैन धर्म की पुस्तकों में नहीं है। श्री ऋषभदेव जी की मृत्यु के विषय में श्रीमद् भागवत सुधासागर, पृष्ठ 260 पर अध्याय छ: में लिखा है कि श्री ऋषभदेव जी को भगवान विष्णु का अवतार माना गया है, उनके विषय में बताया है कि एक बार वे वैराग्य धारण करके निर्वस्त्र विचरते हुए दैववश कोक, येङ्क और दक्षिण आदि कुटक कर्नाटक के देश में गए और मुँह में पत्थर का टुकड़ा डाले हुए था तथा बाल बिखरे उन्मत्त के समान दिगम्बर रूप से ‘कुटका चल’ के वन में घुम रहे थे। 

Read in English | Mahavir Jayanti: Know Why Mahavir Jain Suffered Painful Rebirths In The Absence Of Tatvagyan

अचानक वहाँ पर बांसों के घर्षण से दावानल (वन की आग) ने भयंकर रूप धारण कर लिया तथा श्री ऋषभदेव जी की भस्म होकर अकाल मृत्यु हो गई। (श्लोक संख्या 6 से 8)

स्वयं ऋषभदेव से दीक्षा प्राप्त करने पर भी कैसे हुई महावीर जैन के जीव की दुर्गति

निम्न विवरण पुस्तक “आओ जैन धर्म को जाने“, लेखक – प्रवीण चन्द्र जैन (एम.ए. शास्त्री), प्रकाशक – श्रीमति सुनीता जैन, जम्बूद्वीप हस्तिनापुर, मेरठ, (उत्तर प्रदेश) तथा “जैन संस्कृति कोश” तीनों भागों से मिला कर निष्कर्ष रूप से लिया है। जैन धर्म के पवित्र ग्रंथों के अनुसार श्री ऋषभदेव के पौत्र (भरत के पुत्र) श्री मारीचि (महावीर जैन) के जीव के पहले के कुछ जन्मों की जानकारी –

  • मारीचि अर्थात् महावीर जैन बाला जीव पहले एक नगरी में भीलों का राजा था, जिसका नाम पुरुरवा था, जो अगले मानव जन्म में मारीचि हुआ।
  • मारीचि (महावीर जैन) वाले जीव ने श्री ऋषभदेव से जैन धर्म वाली पद्धति से दीक्षा लेकर साधना की थी, उसके आधार से उसे क्या-क्या लाभ व हानि हुई
  • श्री महावीर जैन का जीव ब्रह्म स्वर्ग में देव हुआ, फिर मनुष्य हुआ, फिर देव हुआ, फिर मनुष्य हुआ, फिर स्वर्ग गया, फिर मनुष्य हुआ, फिर स्वर्ग गया, फिर भारद्वाज नामक व्यक्ति हुआ। फिर महेन्द्र वर्ग में देव हुआ। फिर नगोदिया जीव हुआ, फिर महावीर जैन वाला अर्थात् मारीचि वाला जीव निम्न योनियों को प्राप्त हुआ । 
  • एक हजार बार आक का वृक्ष बना, अस्सी हजार बार सीप बना, बीस हजार बार चन्दन का वृक्ष, पाँच करोड़ बार कनेर का वृक्ष, साठ हजार बार वैश्या, पाँच करोड़ बार शिकारी, बीस करोड़ बार हाथी, साठ करोड़ बार गधा, तीस करोड़ बार कुत्ता, साठ करोड़ बार नपुंसक (हिजड़ा), बीस करोड़ बार स्त्री, नब्बे लाख बार धोबी, आठ करोड़ बार घोड़ा, बीस करोड़ बार बिल्ली तथा साठ लाख बार गर्भपात से मरण तथा अस्सी लाख बार देव पर्याय को भी प्राप्त हुआ।
  • उपरोक्त पाप तथा पुण्य का भोग प्राप्त करके मारीचि अर्थात महावीर वर्धमान (जैन) वाला जीव एक व्यक्ति बना, फिर महेन्द्र स्वर्ग में देव बना, फिर एक व्यक्ति बना, फिर महाशुक्र स्वर्ग में देव हुआ। फिर त्रिपृष्ठ नामक नारायण हुआ। इसके पश्चात सातवें नरक में गया। नरक भोग कर फिर एक सिंह (शेर) हुआ, फिर प्रथम नरक में गया। 
  • नरक भोग कर फिर सिंह (शेर) बना। नरक भोग कर फिर सिंह (शेर) बना, फिर उस सिंह को एक मुनि ने ज्ञान दिया। फिर यह सिंह अर्थात् महावीर जैन का जीव सौधर्म स्वर्ग में सिंह केतु नामक देव हुआ। फिर एक व्यक्ति हुआ। फिर सातवें स्वर्ग में देव हुआ, फिर एक व्यक्ति हुआ। फिर महाशुक्र स्वर्ग में देव हुआ। फिर व्यक्ति हुआ जो चक्रवर्ती राजा बना, फिर सहस्रार स्वर्ग में देव हुआ। फिर जम्बूद्वीप के छत्रपुर नगर में राजा का पुत्र हुआ। फिर पुष्पोतर विमान में देव हुआ। 
  • इसके पश्चात वह मारीचि वाला जीव चौबीसवां तीर्थंकर श्री महावीर भगवान हुआ।

Mahavir Jayanti In Hindi: महावीर भगवान अर्थात महावीर जैन ने तीन सौ तिरसठ पाखंड मत चलाये। उपरोक्त विवरण पुस्तक “आओ जैन धर्म को जानें” पृष्ठ 294 से 296 तक लिखा है तथा जैन संस्कृति कोश प्रथम भाग पृष्ठ 189 से 192, 207 से 209 तक। विचार करें जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव से उपदेश प्राप्त करके पवित्र जैन धर्म वाली भक्ति विधि से साधना करके श्री मारीचि के जीव को (जो आगे चलकर श्री महावीर जैन बना) क्या मिला?

Mahavir Jayanti in Hindi: वर्धमान का नाम महावीर कैसे पड़ा? 

जैन धर्म के इतिहास में लिखा है कि एक बहुत बड़े सर्प को बालक वर्धमान ने खेलते-खेलते पूंछ पकड़ कर दूर फेंक दिया, जिस कारण से उन्हें ‘महावीर’ कहा जाने लगा। बाद में बालक वर्धमान इसी महावीर नाम से विख्यात हुए। वर्धमान के युवा होने पर उनकी शादी समरवीर राजा की पुत्री यशोदा से हुई, जिससे उनके घर एक प्रिय दर्शना नाम की पुत्री का जन्म हुआ। प्रियदर्शना का विवाह जमाली के साथ हुआ। 

महावीर जी का गृह त्याग, तपस्या और कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति 

महावीर जी को परमात्मा प्राप्ति की तड़फ थी जिस कारण लोक वेद के आधार पर गृह त्याग कर बिना किसी गुरु से दीक्षा लिए भावुकता वश होकर श्री महावीर जैन जी ने बारह वर्ष घोर तप किया। फिर नगर-नगर में पैदल भ्रमण किया। अंत में ऋजुपालिका नदी के तट पर शाल वृक्ष के नीचे तपस्या करके कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति की।

Also Read: जैन धर्म की सच्चाई, किसी को समझ नही आई 

जैन धर्म और महावीर जी के तीन सौ तरेसठ पाखंड मत 

उसके बाद स्वानुभूति से प्राप्त ज्ञान को (गुरु से भक्ति मार्ग न लेकर मनमाना आचरण अर्थात स्वयं साधना करके जो ज्ञान प्राप्त हुआ उसको) अपने शिष्यों द्वारा (जिन्हें ‘गणधर’ कहा जाता था) तथा स्वयं देश-विदेश में तीन सौ तिरसठ पाखंड मत चलाये। 

कैसे हुई महावीर जी की मृत्यु?

महावीर जैन ने अपने तीस वर्ष के धर्म प्रचार काल में बहत्तर वर्ष की आयु तक पैदल भ्रमण अधिक किया। श्री महावीर जैन की मृत्यु 468 ई.पू. हुई। एक अन्य परम्परा के अनुसार उनका निधन 527 ई.पू. में हुआ। लेकिन पुरातत्व ई.पू. छठी शताब्दी में उनके अस्तित्व की पुष्टि नही करता है। उनसे सम्बंधित कस्बे औऱ बस्तियां 500 ई.पू. तक अस्तित्व में नही आये थे।

महावीर जी के अनुयायियों का दो भागों में बटवारा 

आगे चल कर उनके द्वारा चलाये मत जिन्हें जैन ग्रंथों में  पाखंड मत लिखा है दो भागों में बंट गए। एक दिगम्बर, दूसरे श्वेताम्बर कहे जाते हैं। दिगम्बर मत पूर्ण मोक्ष नग्न  अवस्था में मानता है तथा श्वेताम्बर सम्प्रदाय सवस्त्र अवस्था में मुक्ति मानता है। उपरोक्त विवरण पुस्तक “जैन संस्कृति कोश” प्रथम खण्ड, पृष्ठ 188 से 192, 208, 209 तक तथा “आओ जैन धर्म को जानें” पृष्ठ 294 से 296 तक से यथार्थ सार रूप से लिया गया है।  

क्यों हुई महावीर स्वामी के जीव की दुर्गति?

“जैन संस्कृति कोश” प्रथम खण्ड पृष्ठ 15 पर लिखा है कि जैन धर्म की साधना से जीव को शाश्वत सुख रूपी मोक्ष प्राप्त होता है।

जरा सोचें – शाश्वत सुख रूपी मोक्ष का भावार्थ है कि जो सुख कभी समाप्त न हो उसे शाश्वत सुख अर्थात् पूर्ण मोक्ष कहा जाता है। परन्तु जैन धर्म की साधना अनुसार साधक श्री मारीचि उर्फ महावीर जैन की दुर्गति पढ़कर कलेजा मुंह को आता है। ऐसे नेक साधक के करोड़ों जन्म कुत्ते के हुए, करोड़ों जन्म गधे करोड़ों बिल्ली के जन्म, करोड़ों घोड़े के जन्म, करोड़ों बार वैश्या के जन्म, करोड़ों बार वृक्षों के जीवन, लाखों बार गर्भपात में मृत्यु कष्ट भोगे, केवल अस्सी लाख वार स्वर्ग में देव के जीवन भोगे। 

क्या इसी का नाम “शाश्वत सुख रूपी मोक्ष’ है ? यह दुर्गति तो उस साधक (मारीचि) के जीव की हुई है जो श्री ऋषभदेव जी को गुरु बनाकर वेदों अनुसार साधना करता था, ॐ (ओ३म्) नाम का जाप करता था। इसलिए विचारणीय विषय है कि श्री महावीर जैन जी का क्या हाल हुआ होगा जो शास्त्र विधि त्यागकर मनमाना आचरण (पूजा/साधना) करता था तथा वर्तमान के रीसले (नकलची) जैन मुनियों तथा अनुयायियों का क्या होगा?

क्या है वास्तविक मोक्ष मार्ग?

मोक्ष मार्ग के विषय में गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में वर्णन है कि जो साधक शास्त्र विधि त्यागकर मनमाना आचरण करता करता है, उसे न कोई सिद्धि तथा न उसकी गति होती है अर्थात व्यर्थ है। इसके अनुसार कपड़े त्यागकर या सन्यास धारण करने से मोक्ष नही होता बल्कि अपने कर्तव्य कर्म करते हुए भक्ति करने से ही मोक्ष होता है। आज सर्व पवित्र शास्त्रों का ज्ञान संत रामपाल जी महाराज बता रहे हैं। अगर हम वास्तविक मोक्ष अर्थात निर्वाण चाहते हैं तो हमें संत रामपाल जी महाराज द्वारा दी शास्त्र अनुसार साधना करनी होगी।

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