Last Updated on 21 July 2026 IST | भारत के सैन्य इतिहास में कारगिल युद्ध एक ऐसा अध्याय है जिसने पूरे देश को यह दिखाया कि राष्ट्र की रक्षा के लिए भारतीय सैनिक किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम हैं। वर्ष 1999 में लड़ा गया यह युद्ध केवल सीमाओं की रक्षा का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह भारत के धैर्य, सैन्य कौशल, कूटनीतिक मज़बूती और अदम्य साहस की परीक्षा भी था।
कारगिल युद्ध लगभग 84 दिनों तक चला। इसकी शुरुआत मई 1999 में हुई और 26 जुलाई 1999 को भारत ने विजय की घोषणा की। तभी से प्रत्येक वर्ष 26 जुलाई को “कारगिल विजय दिवस” मनाया जाता है। यह दिन उन वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि देने का अवसर है जिन्होंने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया।
Kargil Vijay Diwas in Hindi (कारगिल विजय दिवस) के मुख्य बिंदु
- 26 साल पहले हुई थी कारगिल की लड़ाई
- भारत के सैनिकों के सम्मान में मनाते हैं कारगिल विजय दिवस
- भारत ने कभी नहीं की किसी युद्ध की पहल
- पाकिस्तान को मिली कारगिल के युद्ध में करारी हार
- इस युद्ध को जीत कर भी बहुत कुछ खोना पड़ा भारत को
- मानव जीवन में युद्ध करना बिल्कुल उचित नहीं
- 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी लद्दाख के द्रास का दौरा करेंगे
- पूरा विश्व केवल सत्य ज्ञान से ही परिवर्तित हो सकता है
- कबीर साहेब के ज्ञान से होता है अंधकार का नाश
कारगिल क्षेत्र का सामरिक महत्व
कारगिल लद्दाख क्षेत्र में स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्वतीय इलाका है। यह श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-1) के निकट स्थित होने के कारण रणनीतिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यह मार्ग भारतीय सेना के लिए लद्दाख और सियाचिन तक रसद, हथियार और सैनिक पहुँचाने का प्रमुख माध्यम है।
यदि इस क्षेत्र की ऊँची चोटियों पर दुश्मन का नियंत्रण हो जाए, तो वह राजमार्ग पर निगरानी रख सकता है और सेना की आपूर्ति को बाधित कर सकता है। यही कारण था कि पाकिस्तान ने इस क्षेत्र को अपने अभियान के लिए चुना।
युद्ध की पृष्ठभूमि
1972 के शिमला समझौते के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा (LoC) निर्धारित की गई थी। अत्यधिक ऊँचाई और भीषण ठंड के कारण दोनों देशों की सेनाएँ सर्दियों में कुछ अग्रिम चौकियाँ खाली कर देती थीं और गर्मियों में वापस लौटती थीं।
1999 की सर्दियों में पाकिस्तान की सेना की नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री तथा प्रशिक्षित घुसपैठियों ने भारतीय सीमा के भीतर कई ऊँची चोटियों पर गुप्त रूप से कब्ज़ा कर लिया। उनका उद्देश्य था—
- श्रीनगर-लेह मार्ग को बाधित करना।
- सियाचिन क्षेत्र पर भारत का दबाव कम करना।
- कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उभारना।
- भारत को सामरिक रूप से कमज़ोर करना।
घुसपैठ का पता कैसे चला?
मई 1999 की शुरुआत में कारगिल क्षेत्र के स्थानीय चरवाहे ताशी नामग्याल ने कुछ संदिग्ध गतिविधियाँ देखीं और इसकी सूचना भारतीय सेना को दी। प्रारंभिक गश्ती दल जब जाँच के लिए पहुँचा तो उस पर हमला हुआ।
इसके बाद सेना ने व्यापक स्तर पर जाँच की और पाया कि कई ऊँची चोटियों पर बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिक मौजूद हैं। शुरुआत में उन्हें आतंकवादी समझा गया, लेकिन बाद में स्पष्ट हुआ कि वे पाकिस्तान की नियमित सेना के सैनिक थे।
ऑपरेशन विजय की शुरुआत
स्थिति स्पष्ट होने के बाद भारतीय सेना ने “ऑपरेशन विजय” शुरू किया।
इस अभियान का उद्देश्य था—
- सभी घुसपैठियों को भारतीय सीमा से बाहर निकालना।
- प्रत्येक कब्जाई गई चोटी को पुनः प्राप्त करना।
- नियंत्रण रेखा की सुरक्षा बहाल करना।
यह अभियान अत्यंत कठिन था क्योंकि दुश्मन ऊँची चोटियों पर बैठा था जबकि भारतीय सैनिकों को नीचे से ऊपर चढ़कर हमला करना पड़ रहा था।
भारतीय वायुसेना का ऑपरेशन सफेद सागर
26 मई 1999 को भारतीय वायुसेना ने “ऑपरेशन सफेद सागर” प्रारंभ किया।
इस अभियान के अंतर्गत—
- दुश्मन के बंकरों पर हवाई हमले किए गए।
- रसद आपूर्ति बाधित की गई।
- सेना को हवाई सहायता प्रदान की गई।
- कठिन पर्वतीय क्षेत्रों में सटीक बमबारी की गई।
यह पहली बार था जब इतनी ऊँचाई वाले क्षेत्र में भारतीय वायुसेना ने इतने बड़े स्तर पर अभियान चलाया।
कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ
कारगिल युद्ध आधुनिक इतिहास के सबसे कठिन पर्वतीय युद्धों में गिना जाता है।
भारतीय सैनिकों को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा, उनमें शामिल थे—
- 16,000 से 18,000 फीट तक की ऊँचाई।
- ऑक्सीजन की कमी।
- शून्य से कई डिग्री नीचे तापमान।
- खड़ी चट्टानों पर रात के समय चढ़ाई।
- दुश्मन का ऊँचाई से सीधा हमला।
- सीमित आवागमन और रसद।
इन परिस्थितियों में युद्ध लड़ना किसी भी सेना के लिए अत्यंत कठिन माना जाता है।
प्रमुख युद्ध क्षेत्र
कारगिल संघर्ष कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में लड़ा गया।
टोलोलिंग
टोलोलिंग पर विजय भारतीय सेना की पहली बड़ी सफलता थी। इस जीत ने सैनिकों का मनोबल बढ़ाया और आगे के अभियानों का मार्ग प्रशस्त किया।
टाइगर हिल
टाइगर हिल कारगिल युद्ध की सबसे प्रसिद्ध लड़ाइयों में से एक थी। ऊँचाई और कठिन भूभाग के बावजूद भारतीय सैनिकों ने साहसपूर्वक हमला कर इस महत्वपूर्ण चोटी पर पुनः कब्जा किया।
प्वाइंट 4875
यह क्षेत्र अत्यंत रणनीतिक था। यहाँ हुई लड़ाई में भारतीय सैनिकों ने असाधारण वीरता दिखाई। बाद में इस क्षेत्र को “बत्रा टॉप” भी कहा जाने लगा।
द्रास और बटालिक
इन क्षेत्रों में भी भीषण संघर्ष हुआ जहाँ भारतीय सेना ने अनेक चोटियों को पुनः अपने नियंत्रण में लिया।
भारतीय सैनिकों की वीरता
कारगिल युद्ध अनेक वीर सैनिकों की अद्भुत बहादुरी का प्रतीक है।
इस युद्ध में कई सैनिकों ने असंभव परिस्थितियों में भी अपने मिशन पूरे किए।
कुछ प्रमुख वीरों में शामिल हैं—
- कैप्टन विक्रम बत्रा (परम वीर चक्र)
- लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे (परम वीर चक्र)
- ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव (परम वीर चक्र)
- राइफलमैन संजय कुमार (परम वीर चक्र)
इनके अतिरिक्त सैकड़ों अधिकारियों और जवानों ने अद्वितीय साहस का परिचय दिया।
भारत की सैन्य रणनीति
भारतीय सेना ने इस युद्ध में कई महत्वपूर्ण रणनीतियाँ अपनाईं—
- ऊँचाइयों पर चरणबद्ध कब्ज़ा।
- तोपखाने का प्रभावी उपयोग।
- वायुसेना और थलसेना का संयुक्त अभियान।
- रात्रि में विशेष अभियान।
- सटीक खुफिया जानकारी के आधार पर कार्रवाई।
- सीमित युद्ध की नीति अपनाते हुए नियंत्रण रेखा पार न करना।
भारत ने अंतरराष्ट्रीय सीमा का सम्मान करते हुए अपनी सैन्य कार्रवाई केवल भारतीय क्षेत्र तक सीमित रखी।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
- कारगिल युद्ध के दौरान अधिकांश प्रमुख देशों ने भारत के संयम की सराहना की।
- अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने स्पष्ट किया कि नियंत्रण रेखा का सम्मान किया जाना चाहिए।
- बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण पाकिस्तान को अपने सैनिकों को वापस बुलाने की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी।
युद्ध का समापन
- लगातार सैन्य अभियानों के बाद भारतीय सेना ने अधिकांश महत्वपूर्ण चोटियों पर पुनः नियंत्रण स्थापित कर लिया।
- 26 जुलाई 1999 को भारत ने आधिकारिक रूप से ऑपरेशन विजय की सफलता की घोषणा की।
- इसी दिन को आज पूरे देश में कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है।
युद्ध में भारत का बलिदान
कारगिल युद्ध में भारत ने अनेक वीर सैनिकों को खोया।
आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार—
- 527 भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए।
- 1300 से अधिक सैनिक घायल हुए।
इनका बलिदान भारत के इतिहास में सदैव अमर रहेगा।
कारगिल युद्ध से मिली सीख
कारगिल युद्ध ने भारत को अनेक महत्वपूर्ण सबक दिए—
- सीमावर्ती क्षेत्रों में निरंतर निगरानी आवश्यक है।
- आधुनिक खुफिया प्रणाली का महत्व अत्यधिक है।
- ऊँचाई वाले क्षेत्रों में विशेष प्रशिक्षण अनिवार्य है।
- तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।
- आधुनिक हथियार और तकनीक राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं।
युद्ध के बाद भारत ने सीमा सुरक्षा, निगरानी व्यवस्था और रक्षा आधुनिकीकरण पर विशेष ध्यान दिया।
भारतीय समाज पर प्रभाव
कारगिल युद्ध ने पूरे देश को एकजुट कर दिया।
- लाखों लोगों ने सैनिकों के लिए प्रार्थनाएं कीं।
- युवाओं में सेना में भर्ती होने का उत्साह बढ़ा।
- सैनिकों के प्रति सम्मान और बढ़ा।
- देशभक्ति की भावना पूरे राष्ट्र में दिखाई दी।
आज भी कारगिल युद्ध पर आधारित पुस्तकें, वृत्तचित्र और फिल्में नई पीढ़ी को प्रेरित करती हैं।
कारगिल विजय दिवस क्यों मनाया जाता है? (Why is Kargil Vijay Diwas Celebrated)
कारगिल विजय दिवस युद्ध में शहीद हुए भारतीय जवानों को सम्मान देने हेतु मनाया जाता है। 1999 में 26 जुलाई (Kargil Vijay Diwas Hindi) के दिन भारतीय जवानों ने पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ते हुए कारगिल की पहाड़ियों पर तिरंगा लहराया था। हमारे जवानों ने अपना तेज, बल और साहस दिखाया और जांबाजी से युद्ध लड़ते हुए दुश्मन को भागने पर मजबूर कर दिया। जिससे भारत देश विजयी हुआ था।
करगिल विजय दिवस (kargil Vijay Diwas in Hindi) कब मनाया जाता है?
भारत में कारगिल विजय दिवस प्रत्येक वर्ष 26 जुलाई के दिन मनाया जाता है। यह दिन उस दिन की याद दिलाता है जब भारत और पाकिस्तान की सेनाओं के बीच वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध लगभग 60 दिनों तक चला, जिसमें हमारे बहुत से देश रक्षक जवान शहीद हुए थे और 26 जुलाई के दिन इस युद्ध का अंत हुआ और इसमें हमारे देश भारत को विजय प्राप्त हुई थी।
युद्ध स्मारकों पर कार्यक्रम, और सैनिक परिवारों के सम्मान के साथ 26वें विजय दिवस की तैयारियाँ चरम पर
Kargil Vijay Diwas 2026: कारगिल विजय दिवस हर साल 26 जुलाई को मनाया जाता है ताकि 1999 के कारगिल युद्ध में भारत की जीत को याद किया जा सके। यह दिन ऑपरेशन विजय के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों के साहस और बलिदानों का जश्न मनाता है, जिसने कारगिल की ऊंचाइयों से पाकिस्तानी घुसपैठियों को सफलतापूर्वक हटाया।
2026 के लिए प्रमुख घटनाएँ:
- समर्पण कार्यक्रम: भारतीय सेना ने 26वें कारगिल विजय दिवस के लिए एक श्रृंखला की घटनाओं की शुरुआत की है, जो उन नायकों की बहादुरी और बलिदानों को उजागर करती है जिन्होंने देश की सीमाओं की रक्षा की।
- कारगिल युद्ध स्मारक: 26 जुलाई 2026 को मुख्य कार्यक्रम में द्रास में कारगिल युद्ध स्मारक पर एक पुष्पांजलि समारोह होने की संभावना है। यह स्मारक शहीद हुए सैनिकों के प्रति सम्मान का प्रतीक है।
- परिवारों के प्रति सम्मान: भारतीय सेना युद्ध नायकों के परिवारों को सम्मानित करने के लिए एक विशेष आउटरीच कार्यक्रम चला रही है। इस पहल में 25 राज्यों, दो संघ शासित प्रदेशों और नेपाल में 545 परिवारों के घरों का दौरा करना शामिल है, जिसमें भारतीय सेना की ओर से प्रशंसा पत्र वितरित किए जा रहे हैं।
- सैनिकों को सम्मानित करना: कारगिल विजय दिवस एक ऐसा दिन है जो उन सैनिकों को सम्मानित करने के लिए समर्पित है जिन्होंने भारत की सीमाओं और नागरिकों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। देशभर में विभिन्न कार्यक्रम और पुष्पांजलि समारोह आयोजित किए जाते हैं ताकि भारतीय सशस्त्र बलों के योगदान को मान्यता दी जा सके।
- राष्ट्रीय अवलोकन: भारत के प्रधानमंत्री आमतौर पर कारगिल विजय दिवस पर नई दिल्ली में अमर जवान ज्योति पर सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी करेंगे लद्दाख के द्रास का दौरा
26वें कारगिल विजय दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी भी लद्दाख के द्रास में शहीद हुए भारतीय जवानों को श्रद्धांजलि भेट करेंगे। उसके बाद मोदी जी द्रास में कारगिल वार म्यूजियम व वाल आफ फेम भी जाएंगे।इसके अलावा वह वीर नारियों से भी मुलाकात करेंगे।
कैसे हुआ था यह घमासान युद्ध?
मुश्किलें बहुत सी थीं लेकिन हमारे जवान अटल रहे। पाकिस्तानी सैनिक ऊंची पहाड़ियों पर चौकी बनाकर बैठे थे। भारतीय जवान क्या कम थे, उन्होंने भी हार नहीं मानी। दो महीने भारतीय जवान भूखे-प्यासे सर्द मौसम की मुश्किलों को झेलते हुए डटे रहे। कारगिल की ऊंची पहाड़ियों पर करीब 60 दिनों तक बहुत ही भयानक युद्ध चला जिसमें भारतीय सैनिकों ने आखिरकार पाक सैनिकों को मजबूर कर दिया और उन्हें भारतीय सेना के आगे झुकना ही पड़ा।
■ Read in English: Kargil Vijay Diwas: A Day to Remember the Martyrdom of Brave Soldiers
Kargil Vijay Diwas in Hindi: इस युद्ध में थल सेना के साथ भारतीय वायु सेना ने भी पाक चौकियों पर जमकर हमले किए थे। जिससे उनको बहुत क्षति पहुंची थी। इस युद्ध के बारे में सुनने वाले के रोम रोम खड़े हो जाते हैं। क्योंकि हमारे सैनिक डरे नहीं, आगे मौत खड़ी दिखाई दे रही थी फिर भी आगे बढ़ते रहे और जीत हासिल की।
हर जीत के पीछे बड़ी क्षति छिपी होती है
जीत तो मिल गई थी भारत को लेकिन दुःख था कि देश ने अपने बहुत से लाल खो दिए थे। पाकिस्तान के अचानक पीठ में छुरा घोंपने के कारण कारगिल में देश के 527 जांबाज जवानों ने बलिदान देकर यह विजय दिलाई।
ऑपरेशन विजय के जरिए भारतीय सेना ने पुनः लहराया था तिरंगा, आज भी याद है टोलोलिंग, टाइगर हिल की वीरगाथा
1999 में कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना ने “ऑपरेशन विजय” शुरू किया ताकि नियंत्रण रेखा के पास कारगिल जिले में घुसे पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ा जा सके। इन घुसपैठियों ने आतंकवादियों के रूप में भारत की जरूरी आपूर्ति मार्गों को खतरे में डालते हुए ऊंची चोटियों पर कब्जा कर लिया था। कठिन और ऊंचाई वाले इलाकों में 18,000 फीट तक भारतीय सैनिकों ने साहसपूर्वक लड़ाई लड़ी। टोलोलिंग, टाइगर हिल और पॉइंट 5140 जैसी अहम चोटियों को पुनः प्राप्त किया गया। 26 जुलाई 1999 को यह ऑपरेशन समाप्त हुआ और भारत ने सभी क्षेत्रों पर फिर से नियंत्रण स्थापित किया। कारगिल विजय दिवस हर साल 26 जुलाई को उन वीर सैनिकों के बलिदान की स्मृति में मनाया जाता है।
करगिल विजय दिवस कैसे मनाया जाए? (How to Celebrate Kargil Vijay Diwas)
- आज दिन-भर कारगिल विजय से जुड़े हमारे जाबाजों की कहानियाँ, वीर-माताओं के त्याग के बारे में, एक-दूसरे को बताएँ, साझा करें।
- आज सभी देशवासियों की तरफ से हमारे इन वीर जवानों के साथ-साथ, उनकी माताओं को भी नमन करता चाहिए, जिन्होंने, माँ-भारती के सच्चे सपूतों को जन्म दिया।
- कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले, हम ये सोचें, कि, क्या हमारा ये कदम, उस सैनिक के सम्मान के अनुरूप है जिसने उन दुर्गम पहाड़ियों में अपने प्राणों की आहुति दी थी।
- हमारा भी यह फर्ज बनता है कि हम जिम्मेदार नागरिक बनें चोरी, नशे जैसी चीजों से दूर रहें। क्योंकि हमें सुरक्षित करने के लिए हमारे भारतीय जवानों ने अपनी जान तक की परवाह नहीं की।
कारगिल विजय दिवस का महत्व
हर वर्ष 26 जुलाई को पूरे देश में कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है।
इस अवसर पर—
- शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है।
- युद्ध स्मारकों पर कार्यक्रम आयोजित होते हैं।
- सेना के वीर जवानों का सम्मान किया जाता है।
- विद्यालयों और महाविद्यालयों में देशभक्ति कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
- युवाओं को राष्ट्रीय सुरक्षा के महत्व से परिचित कराया जाता है।
कारगिल युद्ध भारतीय इतिहास में साहस, अनुशासन, त्याग और राष्ट्रभक्ति का अद्वितीय उदाहरण है। यह संघर्ष हमें याद दिलाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी भारतीय सैनिक अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटते। 84 दिनों तक चले इस युद्ध में भारत ने न केवल अपनी भूमि की रक्षा की, बल्कि विश्व के सामने यह भी सिद्ध किया कि वह संयम, अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान और दृढ़ सैन्य क्षमता, तीनों का संतुलित परिचय दे सकता है।
कारगिल के वीर सैनिकों का बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए सदा प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा। उनका साहस हमें यह संदेश देता है कि राष्ट्र की सुरक्षा और सम्मान सर्वोपरि है। 26 जुलाई का दिन केवल विजय का उत्सव नहीं, बल्कि उन अमर शहीदों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का भी दिन है जिनके कारण भारत की सीमाएँ सुरक्षित हैं और देशवासी गर्व के साथ स्वतंत्र जीवन जी रहे हैं।
क्या है युद्ध का वास्तविक कारण
अहंकार, महत्वाकांक्षा, विस्तारवाद इत्यादि वृत्तियों के कारण दो देशों या दो व्यक्तियों के बीच में युद्ध होते हैं। यदि सभी को यह समझ आ जाए कि सभी काल और माया के बंदी है और इन्हीं की कपटी योजनाओं के कारण आपस में वैमनस्य पैदा होता है तो भला कौन बैर करेगा।
तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज द्वारा बताया गया रावण का वृतांत
जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी द्वारा लिखित पुस्तक “आध्यात्मिक ज्ञान गंगा” से उद्धृत त्रेता युग की एक घटना पाठकों को आज बताना चाहेंगे। कलयुग में अवतरित पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब के बारे में सभी जानते हैं। पूर्ण ब्रह्म कविर्देव कष्टों को दूर करने और सतभक्ति समझाने के लिए सभी युगों में धरती पर कमल पुष्प पर प्रकट होते हैं। त्रेता युग में भी परमेश्वर मुनीन्द्र के नाम से अवतरित हुए थे। लंका के राजा रावण की पत्नी मन्दोदरी और भाई विभीषण ने उन्हें अपना गुरु बनाया और सतभक्ति की नाम दीक्षा ग्रहण की। मन्दोदरी के लाख समझाने पर भी परम शिव भक्त रावण परमेश्वर मुनीन्द्र को न गुरु मानने को और न सतज्ञान स्वीकारने को तैयार हुआ।
कबीर, अहंकार में तीनों गए- धन, वैभव और वंश।
न मानो तो देखलो – रावण, कौरव और कंस ॥
संत रामपाल जी महाराज इस वाणी के द्वारा कह रहे हैं कि अहंकार के कारण हानि ही होती है, रावण, दुर्योधन और कंस जैसे ताकतवर राजा युद्ध करते-करते समाप्त हो गए।
अभिमान करता है नाश-संत रामपाल जी
रावण को बल, बुद्धि, धन, वैभव की कोई कमी नहीं थी। वह भगवान शिव का परम भक्त था और कई सिद्धियों का ज्ञानी था। यह सब होने के कारण उसके मन में घोर अहंकार था। घमंड में इतना चूर था कि वह कहता था कि मैं मौत को भी हरा सकता हूँ। यमराज भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं। संत रामपाल जी महाराज इस वृतांत में बताते हैं कि रावण की पत्नी मंदोदरी परमेश्वर मुनीन्द्र (कबीर साहेब) का सत्संग नित्य सुनती थी और सतभक्ति करती थी। मंदोदरी के बार बार प्रार्थना करने पर एक बार परमेश्वर मुनीन्द्र जी रावण को समझाने उसके दरबार में गए। द्वारपालों के मना करने और राज दरबार में न जाने देने पर परमेश्वर मुनीन्द्र ऋषि रावण के दरबार में अचानक प्रकट हो गए।
रावण के पूछने पर कि दरबार में कैसे घुसे, प्रभु मुनीन्द्र एक बार अदृश्य होकर पुनः प्रकट हुए। परमेश्वर मुनीन्द्र ने रावण को बहुत समझाया कि राम की पत्नी सीता को वापिस करके विष्णु अवतार राम से जीवन की भिक्षा मांग लो। रावण मानने के बजाय नंगी तलवार से परमेश्वर मुनीन्द्र को मारने को दौड़ा। परमेश्वर मुनीन्द्र ने झाड़ू की सींक को ढाल बना कर आगे कर दिया। रावण के सत्तर वार उस नाजुक सींक पर लगे। बहुत जोर की आवाजें होती रही लेकिन रावण सींक को टस से मस न कर पाया। रावण को यह तो ज्ञात हो गया ये कोई साधारण ऋषि नहीं हैं लेकिन अहंकार वश एक नहीं सुनी। मंदोदरी को अब आगे जो भी होगा उसका गम नहीं रहा। आगे पाठकगण जानते हैं रावण का पूरे परिवार सहित क्या हश्र हुआ। यही हश्र किसी न किसी रूप में हर युद्ध का होता है।
आज के वृतांत से सीख: सतभक्ति करके पूर्ण मोक्ष को प्राप्त करें
संत रामपाल जी महाराज गरीब दास जी के माध्यम से चेता रहे हैं
गरीब, साहिब के दरबार में, गाहक कोटि अनंत।
चार चीज चाहें हैं, ऋद्धि सिद्धि मान महंत।।
ब्रह्म रन्द्र के घाट को, खोलत है कोई एक ।
द्वारे से फिर जाते हैं, ऐसे बहुत अनेक ।।
सतगुरु रामपाल जी महाराज आज विश्वभर के मनुष्यों से आव्हान करते हैं कि आप सभी त्रेता, द्वापर और कलियुग की घटनाओं से सबक लेकर अपने मानव जीवन को व्यर्थ में बर्बाद नहीं करें। अपितु सतभक्ति ग्रहण करें और निशुल्क नाम दान दीक्षा लेकर सतभक्ति करके अपने पाप कर्म कटवाकर सांसारिक सुखों को भोगकर पूर्ण मोक्ष को प्राप्त करें।
FAQ About Kargil Vijay Diwas in Hindi
उत्तर – कारगिल विजय दिवस 26 जुलाई को मनाया जाता है।
उत्तर – कारगिल युद्ध भारत एवं पाकिस्तान के मध्य हुआ था।
उत्तर – कारगिल युद्ध कश्मीर के कारगिल के लिए लड़ा गया था। वर्तमान में कारगिल केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख का एक स्थान है।
उत्तर – कारगिल का युद्ध 1999 में लड़ा गया था।
उत्तर – कारगिल का युद्ध 60 दिनों तक चला।



