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Jagannath Puri Rath Yatra 2020 Hindi: आज पाठक गण जानेंगे “जगन्नाथ धाम रथ यात्रा विशेष 2020” के बारे में। साथ में जानेंगे जगन्नाथ धाम से जुड़ी बहुत सी ऐतिहासिक घटनाओं के बारे में।

जगन्नाथ धाम रथ यात्रा विशेष 2020: मुख्य बिंदु

  • आज से प्रारंभ जगन्नाथ रथयात्रा।
  • कालांतर से चले आ रहे प्रचलन का सीधा प्रसारण।
  • रथ पर सवार कृष्ण, बलराम और सुभद्रा करेंगे भ्रमण।
  • प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति द्वारा ट्विटर के माध्यम से शुभ कामना सन्देश प्रेषित।
  • जगन्नाथ रथ यात्रा पर इतिहास के पृष्ठों से विशेष विवेचन।

Jagannath Puri Rath Yatra 2020-जगन्नाथ रथ यात्रा का प्रयोजन

यह यात्रा भारत के उड़ीसा राज्य के पुरी क्षेत्र जिसे पुरुषोत्तम पुरी, शंख क्षेत्र, श्रीक्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है, में निकाली जाती है। हिंदी पञ्चाङ्ग के अनुरूप आषाढ़ माह, शुक्ल पक्ष, द्वितीया (23 जून) से प्रारंभ होकर जगन्नाथ रथ यात्रा देवशयनी एकादशी (1 जुलाई) को समाप्त होगी।

सोने की झाड़ू से आरंभ होती है यात्रा की तैयारी

Jagannath Puri Rath Yatra 2020 Hindi: पुरी के राजा गजपति महाराज दिब्यासिंहा देब ने जगन्नाथ मंदिर की रथयात्रा में झाड़ू लगायी। इसे ‘छेरा पहानरा’ अनुष्ठान भी कहते हैं, जिसमें भगवान जगन्नाथ के रथ के रास्ते को सोने जड़ित झाड़ू से साफ करते हैं। 2500 सालों से इस अनुष्ठान को पुरी के राजसी परिवार के लोग ही करते आये है । पुरी भगवान श्री जगन्नाथ जी की प्रधान लीला-भूमि मानी जाती है। उत्कल प्रदेश के प्रधान देवता श्री जगन्नाथ जी माने जाते हैं।

Jagannath Puri Rath Yatra 2020-कोरोना महामारी का भी पड़ा असर

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार, कड़ी शर्तों के साथ पुरी में जगन्नाथ यात्रा शुरू हो गई है। पर यात्रा में अधिकतम 500 लोगों को ही रथ खींचने के आदेश हैं। दूसरी ओर नगर में कर्फ्यू की स्थिति है एवं जनता अपने निवास स्थान से सीधा प्रसारण देखेंगे।

जगन्नाथ धाम रथ यात्रा विशेष 2020: जगन्नाथपुरी मान्यता

वैष्णव धर्म के मत के अनुसार यह मान्यता है कि श्री जगन्नाथ जी स्वयं राधा और श्रीकृष्ण की युगल मूर्ति के प्रतीक हैं। इसी प्रतीक के रूप श्री जगन्नाथ से सम्पूर्ण जगत का उद्भव हुआ है। श्री जगन्नाथ जी पूर्ण भगवान है और श्रीकृष्ण उनकी कला का एक रूप है।श्री जगन्नाथ जी भगवान की रथयात्रा जगन्नाथपुरी में आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को आरम्भ होती है। यह रथयात्रा पुरी का प्रधान पर्व भी है। इसमें भाग लेने के लिए, इसके दर्शन लाभ के लिए हज़ारों, लाखों की संख्या में बाल, वृद्ध, युवा, नारी देश के सुदूर प्रांतों से आते हैं।

जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा

वर्तमान समय में जगन्नाथ रथ यात्रा बहुत जोरों शोरों से निकाली जाती है जिसमें हजारों लोग शामिल भी होते है लेकिन इस बार जगन्नाथ रथ यात्रा में कोरोना महामारी के कारण अल्प संख्या में ही जनगण शामिल हो सकेंगे।

प्रशासन सतर्क एवं तैयार

राज्य के पुलिस महानिदेशक के अनुसार पुलिस बलों की 50 से भी अधिक पल्टन तैयार की जा रही है। प्रत्येक पल्टन में 30 पुलिसकर्मी सेवा देते हैं। प्रदेश के मुख्य द्वार बंद किये गए हैं। मुख्य सचिव, महानिदेशक एवं अन्य विभागों के वरिष्ठ अधिकारी स्थितियों पर ध्यान देंगे।

Jagannath Puri Rath Yatra 2020-जगन्नाथ सर्जन की Hindi कथा

Jagannath Puri Rath Yatra 2020 Hindi: उड़ीसा प्रान्त में नृप इन्द्रदमन का राज्य था। वे श्री कृष्ण के एकमेव अनुरागी थे। राजा ने कृष्ण जी से स्वप्न में साक्षात्कार किया और एक मंदिर बनाने और उसमें गीता उपदेश की वांछा व्यक्त की। राजा इन्द्रदमन ने आदेश अनुसार मंदिर बनाया लेकिन समुद्र ने मंदिर तोड़ने की प्रक्रिया अनवरत रखी। इस प्रकार 5 बार तक देव सदन टूट गया। राजा हताश होकर बैठ गए और पुनः मंदिर न बनवाने का निर्णय लिया। कोष रिक्त हो चला था। कबीर परमेश्वर ने ज्योति निरंजन को मंदिर निर्माण के लिए वचन दिया था। वचनानुसार कविर्देव राजा इन्द्रदमन के समक्ष प्रकट हुए एवं मंदिर बनाने का आग्रह किया किन्तु राजा कृष्णजी को सर्वोपरि कहते हुए मना किया कि जब कृष्ण जी ही अम्बुज को नहीं रोक पाए तो कौन रोक सकता है भला।

Read in English: The secret of Jagannath Temple

यह सुनकर कविर्देव अपने रहने का स्थान बताकर वहां से प्रस्थान कर गए। राजा ने स्वप्न में पुनः श्री कृष्ण का साक्षात्कार किया और श्री कृष्ण ने कहा कि वे सन्त साधारण सन्त नहीं हैं तथा अनन्य भक्ति के स्वामी हैं। आदेश पाकर राजा इन्द्रदमन ने कविर्देव से पुनः प्रार्थना की। कविर्देव आये और एक चबूतरे का निर्माण करवाया जिस पर बैठकर उन्होंने भक्ति की। मंदिर बनते ही पुनः समुद्र का आगमन हुआ किंतु कबीर परमेश्वर ने उसे हाथ उठाकर रोक दिया।

समुद्र क्यों नहीं बनने देना चाहता था देवालय?

कबीर साहेब से समुद्र ने आगे बढ़ने की विनती की किन्तु कबीर साहेब ने उसे वहीं रोका और दूर जाने के लिए कहा। समुद्र अपमान से तप्त था क्योंकि श्रीराम ने धनुष उठाकर त्रेतायुग में उसे हटने के लिए कहा था। मंदिर निर्माण कार्य के समय एक नाथपंथी सिद्ध वहां आये और मंदिर में मूर्ति की स्थापना का आदेश दिया। राजा इन्द्रदमन ने प्रार्थना की और उन्हें अपने स्वप्न के आदेश से अवगत कराया। सिद्ध ने स्वप्न को नकारते हुए मूर्ति रखने का आदेश दिया। राजा ने श्राप के भयवश मूर्तियों के निर्माण का आदेश दिया। किन्तु जैसे ही मूर्ति बनकर तैयार होतीं स्वतः ही खंडित होकर गिरने लगतीं।

राजा पुनः संकट में निराश हो चले। तब कविर्देव पुनः एक जीर्ण शरीर धारी मूर्तिकार के रूप में राजा के समक्ष प्रकट हुए। राजा से अनुमति लेकर एक बंद कमरे में मूर्तियों का निर्माण करने लगे। बारह दिवस के पश्चात नाथपंथी सिद्ध महात्मा पुनः आये और मूर्तियों के विषय मे पूछा। बंद कमरे में बारह दिनों से मूर्ति का निर्माण जानकर उन्होंने पट खुलवाए और वहां तीन मूर्तियां, जैसे निर्णय लिया गया था कृष्ण, बलराम, सुभद्रा की, पाई गईं। लेकिन उनके हाथ और पैर के पंजे नहीं थे। और वृद्ध रूप में कविर्देव भी अंतर्ध्यान हो गए थे। कृष्ण की वांछा जानकर और नाथपंथी सिद्ध की हठ से मूर्तियों की ज्यों की त्यों स्थापना कर दी गई।

यह भी पढें: जगन्नाथ मन्दिर का अनसुना रहस्य 

आज भी मंदिर जाने वाले श्रद्धालु और पंडित इस सत्य से अनजान हैं वे हर प्रश्न को जगन्नाथ की लीला वाक्यांश से उत्तर देते हैं। वहाँ पर ऐसे प्रमाण आज भी हैं, जिस पत्थर (चैरा) पर बैठ कर कबीर परमेश्वर जी ने मन्दिर को बचाने के लिए समुद्र को रोका था वह आज भी विद्यमान है। उसके ऊपर एक यादगार रूप में गुमज बना रखा है। वहाँ पर बहुत पुरातन महन्त (रखवाला) परम्परा से एक आश्रम भी विद्यमान है।

श्री जगन्नाथ के मन्दिर में छुआछूत है या नहीं?

जी सत्य है इसके पृष्ठ में एक कथा की भूमिका है। श्री जगन्नाथ पुरी में एक पांडे ने कबीर साहेब को शूद्र मानकर धक्का मार दिया। कुछ समय बाद उस पांडे को कुष्ठ रोग के लक्षण दिखाई दिए। उपचार करने पर भी रोग बढ़ता गया। पांडे ने श्री जगन्नाथ जी समेत समस्त पूजा अर्चना कीं लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। एक रात स्वप्न में श्री कृष्ण जी ने दर्शन देकर पांडे को एक संत को धक्का देने की घटना की याद दिलाकर उन संत के चरण धोकर चरणामृत ग्रहण करने का निर्देश देकर कहा संत के क्षमा करने पर ही कुष्ठ रोग ठीक हो सकता है।

Jagannath Temple in Hindi

पांडे प्रातः काल ही अपने सहयोगियों के साथ शूद्र रूप में विराजमान कबीर साहेब के पास पहुंचा तो प्रभु ऐसा कह कर कि मैँ अछूत हूँ, मुझसे दूर रहना अन्यथा अपवित्र हो जाओगे उठकर चल दिए। पांडे दौड़ कर पास पहुंचा तो परमेश्वर कबीर और आगे चले गए। पांडे ने रोकर करुणा के साथ क्षमा याचना करते हुए पुकार लगाई। प्रभु द्रवित होकर रुक गए। पांडे ने एक पृथ्वी पर आसान बिछाकर परमात्मा से आदरपूर्वक बैठने का निवेदन किया। प्रभु विराजमान हुए और पांडे ने प्रभु कबीर के चरण धोकर चरणामृत को पात्र में श्रद्धा पूर्वक लिया।

परमेश्वर कबीर साहेब ने चालीस दिन तक चरणामृत को पीने और जल में मिलाकर नहाने का निर्देश देकर चालीसवें दिन पूर्ण रूप से रोग रहित होने का आशीर्वाद दिया। परमात्मा कबीर ने पांडे और अन्य उपस्थित लोगों को छुआछूत से बचने के लिए आगाह किया। सभी ने भविष्य में ऐसा न करने का वचन दिया। पांडे ने श्रद्धा पूर्वक चालीस दिनों तक चरणामृत पान किया और जल स्नान किया और वह पूर्ण रूप से कुष्ठ रोग मुक्त हो गया। श्री जगन्नाथ जी के मंदिर में आज तक छुआछूत की कुप्रथा नहीं है। विचार करें कि यह कुप्रथा पूरे समाज से क्यों नहीं मिटनी चाहिए ।

जगन्नाथ धाम रथ यात्रा विशेष 2020-कबीर साहेब के परम शिष्य की समाधि जगन्नाथ पुरी में

गीता अध्याय 17, श्लोक 23 में तीन नामों का उद्धरण है यथा ओम, तत, सत (सांकेतिक)। प्रथम नाम , सतनाम और सारनाम। कबीर साहेब ने सारनाम गुप्त रखने के आदेश अपने शिष्य धर्मदास जी को दिए थे। किंतु पुत्रमोह में धर्मदास जी सारनाम अपने पुत्र को बताना चाहते थे और तब उन्होंने स्वयं कबीर साहेब से स्थिति के वश से बाहर होने की प्रार्थना की। कबीर साहेब ने परम शिष्य की वांछानुरूप धर्मदास जी को जिंदा समाधि दी। श्री धर्मदास साहेब व उनकी पत्नी भक्तमति आमनी देवी ने जहाँ शरीर त्यागा था वहाँ आज भी दोनों की समाधियाँ साथ-साथ बनी हुई हैं।

जगन्नाथ पुरी में पुजारी की अग्नि ज्वलन से रक्षा

एक समय दिल्ली के राजा सिकन्दर लोधी काशी नरेश वीर सिंह बघेल के राजभवन आये। कविर्देव रैदास जी के साथ स्वाभाविक रूप से राजभवन में प्रकट हुए। कविर्देव ने आग्रह पर आसन ग्रहण किया एवं अपने कमंडल से जल लेकर अपने चरणों पर डालने लगे। तब उत्सुकता वश दोनों राजन इसका कारण पूछ बैठे और कबीर साहेब ने बताया कि जगन्नाथपुरी में रामसहाय पुजारी के पैर गर्म खिचड़ी से जल गए हैं और उसके पैर की ज्वलन को शांत करने के लिए ऐसा किया। विश्वास न होने पर ऊंटों पर तुरन्त सवार भेजे गए। रामसहाय ने तथ्य की पुष्टि की और बताया कि कबीर साहेब तो प्रतिदिन यहां सत्संग भी करते हैं। इस प्रकार समाचार की पुष्टि होने पर दोनों राजाओं ने कबीर परमात्मा के चरणों में शरण ग्रहण की तथा अविश्वास के लिए क्षमा याचना की।

मूर्तिपूजा उत्तम या अनुत्तम?

मूर्तिपूजा शास्त्रानुसार विचार करने पर अनुत्तम ही मानी जायेगी। वेदों का सार कही जाने वाली भागवत गीता में किसी भी स्थान पर मूर्तिपूजा, तीर्थ भ्रमण या रथ यात्रा जैसी भक्ति विधि का उल्लेख नहीं है। कुतर्क ये दिया जाता है कि यदि उल्लेख नहीं है तो वर्जित भी नहीं है। इसका उत्तर गीता अध्याय 16 श्लोक 23 और 24 में है जिसमें कहा गया है कि कर्तव्य और अकर्तव्य की दशा में शास्त्रों द्वारा मार्ग दर्शित पथ का अनुसरण करना श्रेयस्कर है तथा शास्त्र विरुद्ध साधना करने वाले किसी गति को प्राप्त नहीं होते। मूर्तिपूजा या रथयात्रा काल्पनिक और मनगढ़ंत उपासना की विधियां हैं जिनका भक्ति और मोक्ष से कोई तारतम्य नहीं है।

क्या कृष्ण बाध्य हैं कि जब तक उन्हें घुमाया न जाये वे स्वयं भ्रमण नहीं कर सकते? नहीं। ना तो कृष्ण बाध्य हैं और न ही इस तरह की भक्ति विधि के समर्थन में हैं क्योंकि उन्होंने स्वयं राजा इन्द्रदमन से मंदिर में कोई मूर्ति न रखने एवं ज्ञान उपदेश के लिए गीता पाठ का प्रस्ताव रखा और आदेश दिया था। अतएव उचित है कि गीता अध्याय 4 के श्लोक 34 में तत्वदर्शी सन्त की खोज करने और उनसे ज्ञान उपदेश लेने का मार्ग प्रशस्त किया है।

तत्वदर्शी सन्त की पहचान भगवत गीता अध्याय 15 श्लोक 1 में होती है जिसमें उल्टे लटके संसार रूपी वृक्ष के जड़, तना, शाखा, टहनियां और पत्तों के भेद हैं जो क्रमशः जड़ परम् अक्षर ब्रह्म कविर्देव, तना अक्षर ब्रह्म, शाखा क्षर ब्रह्म/ ज्योति निरंजन, तीन सह शाखाएं ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा पूर्णरूप संसार का प्रतीक हैं। ऐसी स्थिति में विलंब न करते हुए तत्वदर्शी सन्त की शरण ग्रहण करनी चाहिए जो गीता अध्याय 17 के श्लोक 23 के अनुसार तीन बार में नाम दीक्षा प्रक्रिया पूर्ण करेगा। ज्ञान होने के पश्चात भी तत्वदर्शी सन्त की शरण ग्रहण न करना अतिशय पाप का भागी बनाएगा।

Jagannath Puri Rath Yatra 2020-कैसे पाए भवसागर से पार?

पूर्ण परमेश्वर कविर्देव (कबीर साहेब) के प्रतिनिधि पूर्ण तत्वदर्शी सन्त रामपाल जी महाराज से नाम दीक्षा लेकर अपने पाप कर्म कटवाकर मोक्ष प्राप्त कीजिए। पूर्ण संतजी से ज्ञान समझिए सत्संग देखिए एवं ज्ञान और शास्त्रों से प्रमाण आधारित पुस्तकें डाउनलोड कर अध्ययन कीजिये।

मानुष जन्म दुर्लभ है, मिले न बारम्बार |

जैसे तरुवर से पत्ता टूट गिरे, बहुर न लगता डार ||