HomeBlogsअंतरराष्ट्रीय योग दिवस

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस

Date:

योग शरीर के लिए और अध्यात्म आत्मा के लिए आवश्यक है।

योग क्या है ?

योग शारीरिक (आसन) और मानसिक (ध्यान केंद्रित) क्रियाओं का समूह है जिसकी उत्पत्ति प्राचीन भारत में हुई थी। योग करने से श्‍वास-नियंत्रण तथा मन प्रफुल्लित रहता है। भगवान शिव को प्राचीन योग का जनक माना जाता है। भले ही शिव ने योग से शरीर को साध लिया था परंतु अपने मन और इंद्रियों पर विजय न पा सके। (अधिक जानकारी के लिए पढ़ें पुस्तक “ज्ञान गंगा” में सृष्टि रचना)।
21 जून 2015 को मनाया गया था पहला योग दिवस

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 21 जून को मनाया जाता है। यह दिन वर्ष का सबसे लंबा दिन होता है। पहली बार यह दिवस 21 जून 2015 को मनाया गया, जिसकी पहल भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 27 सितम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण से की थी जिसमें उन्होंने कहा था:
“योग शारीरिक, मानसिक और आत्मिक प्रक्रिया है जो की भारत से शुरू होकर पश्चिमी देशों में भी प्रचलित हुई।” कई विज्ञानियों द्वारा की गयी खोज से पता लगा की योग से कई बीमारियों का समाधान किया जा सकता है| अगर योग का रोज़ अध्ययन किया जाए तो यह शरीर के लिए लाभकारी साबित होगा। 1 दिसंबर 2016 को यूनेस्को ने योग को सांस्कृतिक विरासत की उपाधि दी।

योगीजन हठ योग से कुण्डलिनी जागृत कर सिद्धि युक्त हो जाते हैं।

योग का विकास आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व उत्तर भारत में हुआ था। इसकी उन्नति ऋषि – मुनियों द्वारा हुई जिन्होंने योग को 200 से ज्यादा धर्म पुस्तकों में प्रकाशित किया। उपनिषद में लिखा है की ज्ञान, कर्म योग और अन्य आसन योग से अहंकार को दूर किया जा सकता है| योग का एक प्रकार हठ योग भी है जिसे ऋषि, मुनियों ने ईश्वर प्राप्ति का प्रबल मार्ग माना परंतु परमेश्वर प्राप्ति योग से नहीं पूर्ण परमात्मा के कृपा पात्र संत द्वारा प्रदान की गई सतभक्ति से होती है। हठ योग से ध्यान को केंद्रित किया जा सकता है परंतु परमात्मा के दर्शन भी इस तरह की साधना से नहीं होते।
हठ योग द्वारा कुछ योगीजन शरीर में मौजूद चक्रों के माध्यम से कुण्डलिनी के उत्थान पर ध्यान केंद्रित करते हैं। कुण्डली जागृत कर योगीजन सिद्धि युक्त हो जाते हैं और स्वयं को भूत और भविष्य के जानकार मान बैठते हैं। जिससे उनकी स्वयं की भक्ति कमाई खर्च होती है।
परंतु यह परमात्मा प्राप्ति और अध्यात्म का मार्ग कदापि नहीं है। योगा से शरीर साधा जा सकता है परंतु इंद्रियों पर विजय प्राप्त नहीं की जा सकती। योगा से स्वास्थ्य प्राप्त किया जा सकता है किंतु मोक्ष नहीं।
हमारे शरीर में कमल /चक्र होते हैं और उनके जागृत होने से ही हमारी पूजा या साधना सफल होती है। जब हम शरीर त्याग कर सच्चखंड अर्थात सतलोक जाएंगे तो हमें इन कमलों में से होकर जाना होगा।
इन कमलों को जागृत करने के लिए सही मंत्रों का जाप करना आवश्यक होता है जो केवल तत्वदर्शी संत के द्वारा दी गई सतभक्ति से संभव है।

अध्यात्म और योग में अंतर है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि आज के जीवन में, धन कमाने के कारण लोग अपने स्वास्थ्य की ओर अधिक ध्यान नहीं दे पा रहे हैं और जिसके परिणामस्वरूप मानव शरीर में कई बीमारियाँ और समस्याएं पैदा हो रही हैं। जिनमें से अधिकांश का कारण उनके दैनिक जीवन में शारीरिक गतिविधियों का अभाव तनाव, अशांति, गलत खान-पान है। अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए वर्तमान जीवन शैली में शारीरिक गतिविधि बहुत महत्वपूर्ण है। स्वस्थ रहने के लिए स्वास्थ्य विशेषज्ञ दैनिक दिनचर्या में व्यायाम, खेल और योग करने की सलाह देते हैं। उसी तरह तत्वदर्शी संत सभी मनुष्यों को सतभक्ति करने के बारे में बताते हैं।
आज योग एक विश्वव्यापी बहु-अरब डॉलर के व्यवसाय रूप में विकसित हो चुका है। इसी बात से आप निर्णय ले सकते हैं कि योग और अध्यात्म दो अलग अलग मार्ग हैं। योग आपको निरोगी काया दे सकता है और अध्यात्म आपको परमात्मा प्राप्ति का मार्ग दिखा कर आपके मनुष्य जीवन का महत्व समझाता है।

सतभक्ति शरीर में रोग उत्पन्न ही नहीं होने देती।

कई अध्ययनों ने आधुनिक योग की प्रभावशीलता को कैंसर, सिज़ोफ्रेनिया, अस्थमा और हृदय रोग के लिए एक पूरक हस्तक्षेप के रूप में निर्धारित करने की कोशिश की है। इन अध्ययनों के परिणाम मिश्रित और अनिर्णायक रहे हैं जबकि ‘‘पूर्ण परमात्मा साधक को भयंकर रोग से मुक्त करके आयु बढ़ा देता है‘‘।
प्रमाण ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त 161 मंत्र 1, 2 तथा 5 जिसमें परमेश्वर कहते हैं कि यदि किसी को प्रत्यक्ष या गुप्त क्षय रोग तपेदिक हो उसे भी ठीक करता हूँ तथा यदि किसी रोगी व्यक्ति की प्राण शक्ति क्षीण हो चुकी हो। जिसकी आयु शेष न रही हो तेरे प्राणों की रक्षा करूं तथा तेरी आयु सौ वर्ष प्रदान कर दूं, सर्व सुख प्रदान करूं। मंत्र 5 में कहा है कि हे पुनर्जीवन प्राप्त प्राणी ! तू सर्व भाव से मेरी शरण ग्रहण कर। यदि पाप कर्म दण्ड के कारण तेरी आँखें भी समाप्त होनी हों तो मैं तुझे पुनर् आजीवन आँखें दान कर दूं। तुझे रोग मुक्त करके सर्व अंग प्रदान करूं तथा तुझे प्राप्त होऊं अर्थात् मिलुं। जम जौरा जासे डरें, मिटें कर्म के लेख।
अदली अदल कबीर हैं, कुल के सतगुरु एक।।

प्रत्येक व्यक्ति केवल सुख चाहता है।

अनादि काल से ही मानव परम शांति, सुख व अमृत्व की खोज में लगा हुआ है। वह अपने सामर्थ्य के अनुसार प्रयत्न करता आ रहा है लेकिन उसकी यह चाहत कभी पूर्ण नहीं हो पा रही है। ऐसा इसलिए है कि उसे इस चाहत को प्राप्त करने के मार्ग का पूर्ण ज्ञान नहीं है। सभी प्राणी चाहते हैं कि कोई कार्य न करना पड़े, खाने को स्वादिष्ट भोजन मिले, पहनने को सुन्दर वस्त्र मिलें, रहने को आलीशान भवन हों, घूमने के लिए सुन्दर पार्क हों, मनोरंजन करने के लिए मधुर संगीत हों, नांचे-गांए, खेलें-कूदें, मौज-मस्ती मनांए और कभी बीमार न हों, कभी बूढ़े न हों और कभी मृत्यु न होवे आदि परंतु जिस संसार में हम रह रहे हैं यहां न तो ऐसा कहीं पर नजर आता है और न ही ऐसा संभव है क्योंकि यह लोक नाशवान है, इस लोक की हर वस्तु भी नाशवान है और इस लोक का राजा ब्रह्म काल है जो एक लाख मानव सूक्ष्म शरीर खाता है। उसने सब प्राणियों को कर्म-भर्म व पाप-पुण्य रूपी जाल में उलझा कर तीन लोक के पिंजरे में कैद किया हुआ है। कबीर साहेब कहते हैं कि :– कबीर, तीन लोक पिंजरा भया, पाप पुण्य दो जाल। सभी जीव भोजन भये, एक खाने वाला काल।। गरीब, एक पापी एक पुन्यी आया, एक है सूम दलेल रे। बिना भजन कोई काम नहीं आवै, सब है जम की जेल रे।।
वह नहीं चाहता कि कोई प्राणी इस पिंजरे रूपी कैद से बाहर निकल जाए। वह यह भी नहीं चाहता कि जीव आत्मा को अपने निज घर सतलोक का पता चले। इसलिए वह अपनी त्रिगुणी माया से हर जीव को भ्रमित किए हुए है। फिर मानव को ये उपरोक्त चाहत कहां से उत्पन्न हुई है ? यहां ऐसा कुछ भी नहीं है। यहां हम सबने मरना है, सब दुःखी व अशांत हैं। जिस स्थिति को हम यहां प्राप्त करना चाहते हैं ऐसी स्थिति में हम अपने निज घर सतलोक में रहते थे। काल ब्रह्म के लोक में स्व इच्छा से आकर फंस गए और अपने निज घर का रास्ता भूल गए। कबीर साहेब कहते हैं कि — इच्छा रूपी खेलन आया, तातैं सुख सागर नहीं पाया।

जब तक मनुष्य का शरीर है वह तब तक इसे निरोगी, जवान, सुडौल बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील रहता है और यह सब उसे पूर्ण संत की शरण में जाने से रूंगे (मुफ्त) में ही मिल सकता है।
पूर्ण संत में परमात्मा का स्वरूप दिखाई देता है। जब कोई साधक तत्वदर्शी संत की खोज कर उनकी शरण में चला जाता है तो उसका दैनिक जीवन स्वत: नियमित हो जाता है। वह न तो अधिक खाता है, न पीता है, न अधिक सोता है, न जागता है और न ही किसी भी प्रकार के व्यसनों का प्रयोग करता है। पूर्ण संत द्वारा बताई गई भक्ति करने के कारण वह अपने मन, कर्म, वचन, ध्यान, आंतरिक और बाहरी शारीरिक क्रियाओं पर नियंत्रण पा लेता है।

पूर्ण परमात्मा पूर्ण संत रूप में धरती पर अवतार ले चुके हैं। जानने के लिए प्रतिदिन देखें साधना चैनल शाम 7:30-8:30 बजे IST।

About the author

Website | + posts

SA News Channel is one of the most popular News channels on social media that provides Factual News updates. Tagline: Truth that you want to know

SA NEWS
SA NEWShttps://news.jagatgururampalji.org
SA News Channel is one of the most popular News channels on social media that provides Factual News updates. Tagline: Truth that you want to know

Share post:

spot_img
spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

JEE Main Result 2023: Know How to Check the Result?

The result for JEE Main Session 1 was declared...

Thousands Killed In The Earthquakes That Hit Turkey-Syria

Turkey Syria Earthquake Live Updates : More than 3700...

Guru Ravidas Jayanti 2023: How Ravidas Ji Performed Miracles With True Worship of Supreme God?

Last Updated on 5 February 2023, 1:38 PM IST:...