Govardhan Puja 2021 [Hindi]: गोवर्धन पूजा पर जानिए हमें कौनसी भक्ति करनी चाहिए?

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Last Updated on 2 November 2021, 11: 12 PM IST: Govardhan Puja in Hindi: भारत में सदियों से अनेकों त्योहार तरह-तरह की पूजाओं से जोड़े गए हैं। हर पर्व से घटनाएं भी जुड़ी होती हैं जिनके बाद या जिनके उपलक्ष्य में उन त्योहारों को मनाया जाने लगता है। हिंदू धर्म के प्रमुख पर्वों में से एक पर्व है गोवर्धन पूजा (Govardhan Puja) जो द्वापर युग से मनाया जा रहा है आज हम इस पर्व और इस पर्व से जुड़ी घटना और उसके सार से परिचित होंगे।

गोवर्धन पूजा 2021 (Govardhan Puja Date) की तिथि

Govardhan Puja in Hindi: गोवर्धन पूजा दिवाली (Diwali) के दूसरे दिन यानी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन की जाती है। इस वर्ष यह 5 नवंबर 2021, शुक्रवार के दिन है। गोवर्धन पूजा को प्रकृति की पूजा के साथ जोड़कर देखा जाता है जिसमें गोबर से आकृति बनाकर उसकी पूजा की जाती है। कई लोग इस दिन गाय और बैलों की पूजा भी करते हैं। गोवर्धन पूजा भगवान श्री कृष्ण जी का आशीर्वाद और कृपा प्राप्त करने के उद्देश्य से की जाती है। चूँकि वृंदावन कृष्ण जी से जुड़ा स्थान है अतः वहाँ भी गोर्वधन पूजा जोर-शोर से की जाती है। हालांकि स्वयं मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करने से कुछ हासिल नहीं होता है। कबीर साहेब ने ऐसे ही लोगों के लिए कहा है-

आपे लीपे आपे पोते, आपे बनावे होइ |
उसपर बुढिया पोते मांगे, अकल कहां पर खोई ||

परमेश्वर कबीर जी ने आन उपासना का और अंधश्रद्धा भक्ति का उदाहरण लक्षित करते हुए बताया है। लोकवेद के अनुसार वृद्धा अहोई नामक देवी का चित्र बनाती है उसके लिए दीवार को गोबर और गारा मिलाकर लीपती है और स्वयं उसके सामने बैठकर पूजा करती है कि पुत्रवधू को पुत्र प्राप्ति जो ऐसे अंधश्रद्धा भक्ति करने वाले लोगों की बुद्धि समूल नष्ट हो चुकी है।

श्री कृष्ण जी के भक्तों के लिए गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व है वह इस त्योहार का इंतजार करते हैं और जिस दिन यह त्योहार होता है उस दिन वह ब्रज में गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने के लिए विशेष रूप से वहां पहुंचते हैं। ऐसा करके वह समझते हैं कि उन्हें भगवान श्री कृष्ण की कृपा प्राप्त होगी। ऐसे अंध श्रद्धा वाले लोगों के लिए भी ऊपर लिखित वाणी सही सिद्ध होती है।

गोवर्धन पूजा का पौराणिक महत्व (Significance Of Govardhan Puja)

Govardhan Puja in Hindi: कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन गोवर्धन पूजा का पर्व मनाया जाता है। गोवर्धन पर्वत को भगवान श्री कृष्ण का ही रूप माना जाता है। यह एक छोटा सा पहाड़ है जो गोवर्धन ब्रज में स्थित है, लेकिन भगवान श्री कृष्ण के भक्तों की इस पर्वत में बहुत आस्था है। श्री कृष्ण जी के भक्त गोवर्धन पर्वत को पर्वतों का राजा मानते हैं। यह पर्वत द्वापर युग से ही यहीं पर स्थित है। विचार करें कृष्ण जी ने जब सहायता की तब द्वापरयुग था और गोवर्धन पर्वत भी स्थित था लेकिन उसी एक घटना को याद कर बार-बार गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर उसके सामने हाथ जोड़कर बैठने से क्या होगा? कुछ भी नहीं।

गोवर्धन पूजा की पौराणिक कथा (Govardhan Puja Story in Hindi)

एक पूर्ण परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी की भक्ति से कोई लाभ नहीं होता है। यहाँ तक कि त्रिगुण भक्ति यानी श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी एवं श्री शिव जी की भक्ति करने वाले गीता अध्याय 7 के श्लोक 15 में मनुष्यों में नीच बताए गए हैं। इस दिन लोग इंद्र की पूजा करते थे। इंद्र अंहकारी हो गए थे और उनके इस अहंकार को तोड़ने के लिए जब द्वापर युग में एक बार जब इंद्र की पूजा की जा रही थी। उस समय सत्वगुण भगवान श्री विष्णु जी के पूर्ण अवतार श्री कृष्ण उस पूजा में पहुंचे और पूजा के बारे में पूछने लगे कि हमारे वेद आदि सदग्रंथों में पूर्ण ब्रह्म की पूजा का विधान है फिर आप सब लोग यह मनमाना आचरण यानी इन देवी देवताओं की पूजा क्यों कर रहे हो? 

तब ब्रजवासियों ने बताया कि यह देवराज इंद्र की पूजा की जा रही है यह पूजा यहां की परंपरा है और वर्षा के लिए हमेशा इंद्र की पूजा की जाती है क्योंकि ब्रजवासी गोधन से अपनी आजीविका चलाते थे और उसके लिए वर्षा के ऊपर निर्भर थे और वर्षा के देवता इंद्र है इसलिए इंद्र की पूजा कर रहे हैं।

■ Read in English: Govardhan Puja | Date & Story | Why Lord krishna lifted Govardhan Mountain

Govardhan Puja Story in Hindi: इस पर भगवान श्री कृष्ण ने सभी नगरवासियों से कहा कि हमें इंद्र की पूजा करके कोई लाभ नही होता। वर्षा करना तो उनका कर्म और दायित्व है और वह सिर्फ अपना कर्म कर रहे हैं। सभी देवी-देवता भगवान के बनाए हुए विधान के अनुसार ही कर्म करते हैं और उस विधान के अनुसार ही वह हमें फल देते हैं जैसा हमारा कर्म होता है उसी कर्म के आधार पर। अपनी तरफ से कुछ भी कम या ज्यादा नहीं कर सकते इसलिए हमें इनकी पूजा नहीं करनी चाहिए। इंद्र के अहंकार का दमन करने के लिए ही कृष्ण ने कहा कि हमें इंद्र की पूजा नहीं करनी चाहिए।

देवराज इंद्र का क्रोधित होना

अपनी पूजा नहीं होने से इंद्र क्रोधित हो उठे और मेघों को आदेश दिया कि गोकुल का विनाश कर दो। इसके बाद गोकुल में भारी बारिश होने लगी और गोकुल वासी भयभीत हो उठे। यहां पर एक विचारणीय विषय है कि इंद्र जो देवताओं के राजा हैं वह किस स्वार्थ भाव से क्रिया कर रहे हैं अगर उनकी पूजा हो तो वह खुश हैं अगर उनकी पूजा नहीं हो रही तो साधक जो इतने सालों से उनकी पूजा कर रहे थे उन्हें मारने की कोशिश कर रहे हैं, परंतु भगवान श्री कृष्ण ने सभी गोकुल वासियों को गोवर्धन पर्वत के संरक्षण में चलने के लिए कहा। जिसके बाद श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा ऊँगली पर उठा लिया और सभी ब्रजवासियों की इंद्र के प्रकोप से रक्षा की।

इंद्र को अपनी गलती का एहसास होना

Govardhan Puja Story in Hindi: इंद्र ने अपने पूरे बल का प्रयोग किया लेकिन उनकी एक न चली। इसके बाद जब इंद्र को यह पता चला कि भगवान श्री कृष्ण विष्णु भगवान का ही अवतार हैं उनके सामने इंद्र की शक्ति बहुत कम है क्योंकि इंद्र सिर्फ स्वर्ग का राजा है परंतु विष्णु भगवान तीन लोक के भगवान हैं जो पालन का कार्य करते हैं तो इंद्र को अपनी भूल का अहसास हुआ और वह भगवान श्री कृष्ण से क्षमा मांगने लगे। तब ही से गोवर्धन पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है। अब इस घटना से निष्कर्ष निकलता है कि जिन देवी-देवताओं की आज हम पूजा करके सुख चाहते हैं उनकी पूजा के लिए भगवान श्री कृष्ण जी ने द्वापर युग में ही मना कर दिया था।

इंद्र का कार्य है वर्षा करना और वह तब भी वर्षा करेगा जब उसकी पूजा न की जाए और तब भी करेगा जब उसकी पूजा की जाए। सभी देवी देवता कार्य करने के लिए पूर्ण परमेश्वर द्वारा निहित किये गए हैं और वे अपना कर्म कर रहे हैं। हमें सिर्फ पूर्ण परमात्मा की पूजा करनी चाहिए। केवल एक मालिक की आराधना से हमें सब मिल जाता है।

परमेश्वर कबीर साहेब कहते हैं-

कबीर, एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय |

माली सींचै मूल को, फलै-फूलै अघाय ||

कबीर, गोवर्धन कृष्ण जी उठाया, द्रोणागिरि हनुमंत। 

शेष नाग सब सृष्टी उठाई, इनमें को भगवंत।।

गोवर्धन पूजा (Govardhan Puja) का आरम्भ द्वापर से है, उससे पहले किसकी की जाती थी पूजा?

गोवर्धन पूजा का आरम्भ द्वापर युग से माना जाता है, विचार करने योग्य बात यह है कि द्वापर युग से पहले किसकी पूजा की जाती होगी ठीक इसी प्रकार कृष्ण जी का जन्म द्वापर युग में तथा राम जी का जन्म त्रेता में माना जाता है तो फिर सतयुग में साधक समाज द्वारा किसकी पूजा की जाती होगी?

सतयुग में राम कृष्ण नहीं थे, तब किसका धरते ध्यान ।|

पूर्ण परमेश्वर कबीर साहेब जी धर्मदास जी को समझाते हुए कहते हैं कि, धर्मदास जी सतयुग में किसका ध्यान करते थे क्योंकि उस समय तो राम और कृष्ण नहीं थे। 

कैसी साधना उचित है?

श्रीमद्भागवत गीता अध्याय 16 के श्लोक 23 और 24 में कहा है कि अर्जुन भक्ति मार्ग के लिए कौन से कर्म करने चाहिए और कौन से नहीं करने चाहिए उसके लिए शास्त्र ही प्रमाण हैं। हमारे शास्त्र वेद और श्रीमद्भगवद्गीता है और दोनों में कहीं भी देवी देवताओं की पूजा के बारे में नहीं कहा गया है। श्रीमद्भागवत गीता के अध्याय 4 के श्लोक 34 में कहा है कि पूर्ण परमात्मा के तत्वज्ञान को समझने के लिए तत्वदर्शी संत की खोज कर, उन्हें दंडवत प्रणाम करके सरलता पूर्वक निष्कपट भाव से उनसे प्रश्न करने पर वह उस परमात्म तत्व का ज्ञान करवाएंगे।

आज वर्तमान में वह तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज हैं जो पूर्ण परमात्मा की साधना और सभी धर्मों के ग्रंथ, चारों वेद, अठारह पुराण, श्रीमद्भागवत गीता आदि से अनमोल ज्ञान खोलकर लोगों को सत्य साधना बता रहे हैं। आन उपासना को त्याग कर पूर्ण परमात्मा की सच्ची भक्ति ग्रहण करनी चाहिए जिसका प्रमाण श्रीमद्भागवत गीता के अध्याय 17 के श्लोक 23 में है जिसमे परमात्मा पाने के तीन सांकेतिक मन्त्र ॐ-तत-सत बताए गए हैं। ये तीनों मन्त्र वर्तमान में केवल तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज देते हैं। जब तक साधक इन मन्त्रों को प्राप्त नहीं कर लेगा, वह जन्म मरण से नहीं छूट सकता। विश्व में एकमात्र तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज हैं, उनसे नामदीक्षा लेकर ही कल्याण हो सकता है। अधिक जानकारी के लिए सतलोक आश्रम यूट्यूब चैनल पर आए

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2 COMMENTS

  1. कबीर -ये माटी का महल है, हो जाए धूरम धूर..
    बिन साहिब की बंदगी, गधा कूत्ता सूर…

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