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गणेश चतुर्थी

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संकटमोचन कष्ट हरण : पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी हैं।

आज सब ओर गणपति की मूर्तियां दिखाई दे रही हैं और दस दिन बाद यह जल मग्न कर दी जाएंगी।
गणेश चतुर्थी कोे गणेश जी के जन्मदिन और त्यौहार के रूप में देश और विदेश दोनों में मनाया जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार भद्रा (मध्य अगस्त से मध्य सितंबर) में यह त्यौहार रूप में 10 दिनों तक मनाया जाता है और यह अनंत चतुर्दशी पर समाप्त होता है।
गणेश जी भगवान शिव और देवी पार्वती के छोटे पुत्र हैं। भगवान गणेश को 108 विभिन्न नामों से भी जाना जाता है। व्यापक रूप से इन्हें गणपति या विनायक के रूप में जाना जाता है।

कैसे हुई गणेश जी की उत्पत्ति?

शिवपुराण की कथानुसार शिव के अनेक गण थे जो उनकी आज्ञा का पालन करते थे। परंतु पार्वती जी का कोई गण नहीं था। इसी पीड़ा से क्षुब्ध पार्वती ने अपने शरीर पर लगाए उबटन की मैल से एक पुतला बनाया और उसमें प्राण डाल दिए।

गणेश के धड़ पर क्यों लगाया गया गज शीष?

पार्वती जी ने गणेश को द्वारपाल बना कर बैठा दिया और किसी को भी अंदर न आने देने का आदेश देते हुए स्नान करने चली गईं। इसी दौरान भगवान शिव वहां आ गए। उन्होंने अंदर जाना चाहा, लेकिन बालक गणेश ने रोक दिया। नाराज शिवजी ने बालक गणेश को समझाया, लेकिन उन्होंने एक न सुनी। दोनों भगवान कहलाते हैं परंतु अचंभित करने वाली बात यह है कि दोनों एक-दूसरे को नहीं पहचान सके। भगवान होकर भी शिव ने अपने ही बालक की हत्या कर डाली। कहा जाता है, की भगवान शंकर के कहने पर भगवान विष्णु एक हाथी का सिर काट कर लाये थे तभी से श्री गणेश का नाम गजानन पड़ गया।

गणेश की प्रथम वंदना का शिव ने दिया आशीर्वाद

पार्वती को जब पता चला कि शिव ने बालक गणेश का सिर काट दिया है, तो वे कुपित होकर विलाप करने लगीं और पार्वती जी को राज़ी करने के लिए शिवजी ने गण गणेश जी को तमाम सामर्थ्य और शक्तियां प्रदान करते हुए प्रथम पूज्य और गणों का देव बनाया। विचार करने योग्य विषय यह है की भगवान होकर भी शिव और विष्णु गणेश का कटा सिर नहीं जोड़ पाए और जानवर का सिर लगाना पड़ा तो यह अपने साधक के प्राण और पुन: शरीर कैसे लौटाएंगे? आज तक भोले भक्त इन भगवानों को विघ्नहर्ता मानकर पूजते आए हैं।

वेद व्यास जी ने गणेश जी को कराया था सरोवर स्नान

धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार श्री वेद व्यास ने गणेश जी को महाभारत कथा लगातार 10 दिन तक सुनाई थी जिसे श्री गणेश जी ने ज्यों का त्यों लिखा था। 10 दिन बाद जब वेद व्यास जी ने आंखें खोली तो पाया कि 10 दिन की अथक मेहनत के बाद गणेश जी का तापमान बहुत बढ़ गया है। तुरंत वेद व्यास जी ने गणेश जी को निकट के सरोवर में ले जाकर ठंडे पानी से स्नान कराया। इस दौरान वेदव्यास जी ने 10 दिनों तक श्री गणेश को स्वादिष्ट आहार कराए। इसलिए गणेश स्थापना कर चतुर्दशी को उनको शीतल किया जाता है। लोकवेद के आधार पर और प्रतीकात्मक रूप से श्री गणेश प्रतिमा की स्थापना और विसर्जन किया जाने लगा और 10 दिनों तक उन्हें स्वादिष्ट आहार चढ़ाने की भी प्रथा प्रचलित है। लोकमत अनुसार मान्‍यता है कि गणपति उत्‍सव के दौरान लोग अपनी जिस इच्‍छा की पूर्ति करना चाहते हैं, वे भगवान गणपति के कानों में कह देते हैं। गणेश स्‍थापना के बाद से 10 दिनों तक भगवान गणपति लोगों की इच्‍छाएं सुन-सुनकर इतना गर्म हो जाते हैं कि चतुर्दशी को बहते जल में विसर्जित कर उन्‍हें शीतल किया जाता है।

वर्तमान में इस कारण से मनाई जा रही है गणेश चतुर्थी

ऐतिहासिक धार्मिक मान्यतानुसार गणेश चतुर्थी को महाराष्ट्र में मराठा शासक छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा संस्कृति और राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने के लिए शुरू किया गया था।

भारत में 1893 के आसपास भारतीय समाज सुधारक और स्वतंत्रता सैनानी बाल गंगाधर तिलक ने गणेश उत्सव को एक सामाजिक और धार्मिक कार्य के रूप में व्यवस्थित करना शुरू किया। उन्होंने मंडप में गणेश की मूर्ति को स्थापित करने और दसवें दिन विसर्जन की परंपरा की शुरुआत की। इसे त्योहार रूप में मनाने का उद्देश्य अंग्रेजों के खिलाफ भारतीयों को एकजुट करना था जो धीरे-धीरे पूरे राष्ट्र में त्यौहार की तरह मनाया जाने लगा।

कौन दे सकता है साधक को मनचाहा फल?

किसी भी ईष्ट के साधक को इन भगवानों की विधिवत पूजा विधि का पालन और लाभ प्राप्त करने के लिए पूर्णतया वेदों और गीता जी को आधार बनाना चाहिए। पुराण परमात्मा द्वारा दिया और बोला ज्ञान नहीं है इन्हें पढ़ कर भगवानों का आविर्भाव और तिरोभाव तो समझा जा सकता है। परंतु इनके द्वारा मिलने वाले लाभों से साधक सदा के लिए वंचित हो जाता है। वह प्राप्त तो अपने कर्मों का कर रहा होता है परंतु सोचता यह है कि ईष्ट की साधना करने से लाभ मिल रहा है।
पूर्ण परमात्मा इनकी भक्ति विधि का सही ज्ञान व तरीका बताते हैं जिसका अनुसरण करके साधक पूर्ण लाभ ही नहीं मोक्ष का भी हकदार बनता है।

गजानन नहीं है मोक्षदाता!

वर्तमान में गणेश की जिस तरह से पूजा अर्चना की जा रही है यह भक्त को सात जन्मों में भी लाभ व मोक्ष नहीं दे सकती। साधक सदा जन्म मरण के चक्कर काटता रहता है। किसी भी भगवान को ईष्ट मानकर भक्ति करने से साधक मृत्यु उपरांत कुछ समय के लिए भले ही इन भगवानों के लोक में गण या स्थान प्राप्त कर सकता है परंतु उसे भोगने के बाद उसे फिर से स्वर्ग नरक और पृथ्वी के चक्कर लगाने से कदापि मुक्ति नहीं मिलती।
साधक या भक्त जिस भी भगवान को अपना इष्टदेव मानकर मंत्र जाप करते हैं वे उसी के लोक में चले जाते हैं। जैसे विष्णु का साधक विष्णु लोक में, शिव का साधक शिव लोक में, ब्रह्मा का साधक ब्रह्मा लोक में, काल ब्रह्म का साधक ब्रह्मलोक में चला जाता है। गीता अ. 9 के श्लोक 25-26 और अ.8 के श्लोक 8-9-10 में लिखा है जो जिसकी भक्ति करता है उसी के लोक में चला जाता है। गीता अ. 9 के श्लोक 20 और 21 में लिखा है साधक जन दिव्य स्वर्ग को भोगकर फिर मुत्युलोक में आते हैं। यानि मुक्ति नहीं मिलती।

किसकी करनी चाहिए सर्वप्रथम वंदना?

मान्यतानुसार प्रत्येक काम को आरंभ करने से पहले गणेश की स्तुति वंदना करना शुभ माना जाता है परंतु यह तब तक लाभदायक नहीं हो सकती जब तक वेदों के तत्वज्ञाता तत्वदर्शी संत से सही पूजा भक्ति न प्राप्त हो जाए। तत्वदर्शी संत द्वारा दिया गया मंत्र सर्व सुखदायक, मंगलकारी, विघ्नहर्ता और मोक्षदायक है।
प्रत्येक काम की शुरुआत में आदि गणेश कबीर साहेब का स्मरण व अमरमंत्र का जाप करने से लाभ मिलता है।
उदाहरण के तौर पर यदि राष्ट्रपति किसी काम को करने का आदेश दे तो तुरंत हो जाएगा परंतु यदि वही काम कोई और नेता गण करने को कहें तो शायद वह सालों में भी पूरा न हो सके। उसी प्रकार पूर्ण परमात्मा सब विभागों और भगवानों के रचयिता हैं जिनकी शक्ति का कोई सानी नहीं। पूर्ण परमात्मा की भक्ति विधिवत तरीके से करने से ही यह भगवान जो विभिन्न विभागों के सह कर्मचारी जानिए फल दे सकते हैं।बिना कबीर साहेब की आज्ञा के यह पत्ता भी नहीं हिलने देते।

ततः, पदम्, तत्, परिमार्गितव्यम्, यस्मिन्, गताः, न, निवर्तन्ति, भूयः, तम्, एव्, च, आद्यम्, पुरुषम्, प्रपद्ये, यतः, प्रवृतिः, प्रसृता, पुराणी।।
गीता अध्याय नं. 15 का श्लोक नं. 4 के अनुसार जब तत्वदर्शी संत मिल जाए (ततः) इसके पश्चात् (तत्) उस परमात्मा के (पदम्) पद स्थान अर्थात् सतलोक को (परिमार्गितव्यम्) भली भाँति खोजना चाहिए (यस्मिन्) जिसमें (गताः) गए हुए साधक (भूयः) फिर (न, निवर्तन्ति) लौटकर संसार में नहीं आते (च) और (यतः) जिस परमात्मा-परम अक्षर ब्रह्म से (पुराणी) आदि (प्रवृतिः) रचना-सृष्टी (प्रसृता) उत्पन्न हुई है (तम्) अज्ञात (आद्यम्) आदि यम अर्थात् मैं काल निरंजन (पुरुषम्) पूर्ण परमात्मा की (एव) ही (प्रपद्ये) मैं शरण में हूँ तथा उसी की पूजा करता हूँ।

तत्वदर्शी संत के बताए गुप्त मंत्र से खुलते हैं कमल!

हमारे शरीर में चक्र कमल होते हैं जिनमें विभिन्न भगवानों का वास है। पूर्ण संत द्वारा दीक्षा में दिए गए अनमोल मंत्र जाप से ही केवल यह कमल खुलते हैं और साधक को मनचाहा फल प्रदान करते हैं। पुराणों और लोकवेद अनुसार भक्ति करने से साधक न तो इन कमलों की सही जानकारी प्राप्त कर पाता है न ही किसी लाभ का अधिकारी बन पाता है।

कबीर सागर में अध्याय ‘‘कबीर बानी‘‘ पृष्ठ 111 पर शरीर के कमलों की यथार्थ जानकारी है जो
परम संत रामपाल जी महाराज जी ने इस प्रकार समझाई है;

1) हमारे शरीर में रीड की हड्डी के साथ गुदा से थोड़ा ऊपर मूल कमल है, देव गणेश है। चार पंखुडियाँ का कमल है।
मूल चक्र गणेश वासा, रक्त वर्ण जहां जानिये।
किलियं जाप कुलीन तज सब, शब्द हमारा मानिये।।

मूल चक्र, जिसे मूलाधार कहते हैं। यहां गणेश जी का निवास है। इस कमल का रंग लाल है।

2)मूल चक्र से ऊपर स्वाद कमल है, यहां ब्रह्मा-सावित्राी हैं। छः पंखुड़ियों का कमल है।

3) नाभि कमल में लक्ष्मी-विष्णु जी का निवास है।

4) हृदय कमल महादेव देवं, सती पार्वती संग है।
सोहं जाप जपंत हंसा, ज्ञान योग भल रंग है।।
नाभी कमल से उपर हृदय कमल है। इस कमल में भगवान महादेव शंकर जी सती पार्वती के साथ निवास करते हैं। ये बीच का कमल है, इसलिए इसको हृदय कमल कहते हैं।

5) कंठ कमल है, अविद्या यानि दुर्गा जी का निवास है। 16 पंखुड़ियों का कमल है।

संत रामपाल जी महाराज कबीर सागर से प्रमाण देकर बताते हैं कि त्रिकुटी कमल (भौवों के मध्य पीछे की ओर, आंखों के पीछे) में पूर्ण परमात्मा सतगुरु रूप में विराजमान हैं। इस कमल की दो पंखुड़ियां हैं।
एक सफेद दूसरी काली।

सहस्र कमल जहां कुछ लोग चोटी रखते हैं, उसमे हज़ार पंखुड़ियां हैं। यहां काल निरंजन के साथ परमात्मा की निराकार शक्ति विद्यमान है।
काल 21 ब्रह्मांडों में बंधा है। समर्थ कबीर साहिब जी ही सबके स्वामी हैं।

संत ब्रह्मा, विष्णु, शिव और ब्रह्म की पूजा नहींं करते बल्कि इनका आदर करते हैं। वह केवल कबीर साहेब पूर्ण ब्रह्म सतपुरूष की पूजा करते हैं और करवाते हैं।

वर्तमान में गणेश जी की जिस तरह से भक्ति समाज में की जा रही है इससे समाज को और करने वाले साधक को राई के दाने जितना लाभ भी नहीं हो सकता। मनचाही मूर्ति बाज़ार से लाकर दस दिन तक पूजा और भोग लगाकर दसवें दिन जलप्रवाह करने से पानी में रहने वाले जीव मूर्ति में इस्तेमाल हुए ज़हरीले रंगों के दुषप्रभाव से मर जाते हैं। प्रत्येक वर्ष गणेश चतुर्थी के विसर्जन के दौरान लाखों लोग दुर्घटना के शिकार होते हैं। ढोल नगाड़े बजाकर गणेश जी की मूर्ति को घर लाया और बहाया जाता है। ऐसी पूजा विधि करने का आदेश तो किसी भी प्रकार के पुराण में या ग्रंथ में लिखित नहीं है।
सही भक्ति विधि जानने और प्राप्त करने के लिए तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज द्वारा लिखित पुस्तक ज्ञान गंगा पढ़िए जो सब वेदों का सार है।

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