संत रामपाल जी महाराज की मदद ने सोलधा गांव को जल-समाधि से निकाला

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झज्जर जिले की बहादुरगढ़ तहसील का सोलधा गांव आज एक ऐसी मिसाल बन गया है, जहां भक्ति और शक्ति (सेवा) का अनूठा संगम देखने को मिला। 4 फीट गहरे पानी में डूबे इस गांव के लिए संत रामपाल जी महाराज की सहायता किसी दैवीय चमत्कार से कम नहीं थी।

एक फौजी सरपंच की बेबसी और कुदरत का कहर

सोलधा के सरपंच प्रतिनिधि प्रदीप काजला, जिन्होंने 8 साल तक पैरामिलिट्री में देश की सेवा की, बताते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में पहली बार गांव में ऐसा जलभराव देखा था।

दोहरा संकट: ऊपर से बारिश और नीचे से जमीन का बढ़ता जलस्तर, खेत ‘जल-समाधि’ ले चुके थे।

अधूरा सहारा: प्रशासन ने कुछ पाइप दिए, लेकिन वे लाखों टन पानी निकालने के लिए पर्याप्त नहीं थे।

बिना सिफारिश, 48 घंटे में ‘फरिश्ते’ का आगमन

प्रदीप काजला और गांव के युवाओं ने जब सुना कि संत रामपाल जी महाराज बाढ़ पीड़ितों की मदद कर रहे हैं, तो वे बरवाला पहुंचे। बिना किसी राजनीतिक सिफारिश के, मात्र 24 से 48 घंटे के भीतर राहत सामग्री का विशाल काफिला सोलधा की दहलीज पर खड़ा था।

संत रामपाल जी महाराज की ओर से भेजी गई सामग्री:

  •   10,000 फुट 8-इंची पाइप।
  •   3 विशाल मोटरें: (दो 15 HP की और एक 10 HP की)।
  •  पूर्ण सामग्री: पाइप और मोटर के साथ स्टार्टर, केबल, फेविकोल और नट-बोल्ट जैसी छोटी से छोटी चीज भी भेजी गई ताकि काम तुरंत शुरू हो सके।

एक ‘स्थायी उपहार’ और सख्त संदेश

ट्रस्ट के सेवादारों ने गांव वालों को स्पष्ट कर दिया कि यह सामान अब गांव की अमानत है और इसे वापस नहीं लिया जाएगा। संत रामपाल जी महाराज का निर्देश था: “पाइपों को जमीन में दबा लो ताकि भविष्य में दोबारा कभी बाढ़ न आए।”

यही नहीं, संत जी ने आदेश दिया कि अगर पानी समय पर नहीं निकला और बिजाई नहीं हुई, तो वे अगली बार मदद नहीं करेंगे। उन्होंने गांव का ‘ड्रोन सर्वे’ भी करवाया ताकि सेवा की पारदर्शिता बनी रहे।

ग्रामीणों का भावुक आभार

प्रदीप काजला ने भावुक होकर कहा, “फौज में हम हथियार को तभी अच्छा मानते हैं जब वह वक्त पर चले। संत जी हमारे लिए फरिश्ते बनकर आए हैं। बिना मांगे तो मां भी दूध नहीं पिलाती, लेकिन उन्होंने हमारे दुख को अपना समझकर करोड़ों की मदद घर पहुंचा दी।”

एक अन्य ग्रामीण ने कहा, “इतना तो कोई सगा बाप भी नहीं करता जितना महाराज जी ने हमारे लिए किया है।”

 सेवा का नया अनुशासन

सोलधा में राहत सामग्री का स्वागत किसी त्योहार जैसा था। ट्रैक्टरों पर गूंजते शब्द और फूलों से पटी सड़कें इस बात का गवाह थीं कि सच्ची मानवता किसी विज्ञापन की मोहताज नहीं होती। आज सोलधा के किसान और मजदूर, 36 बिरादरी के लोग मिलकर पानी निकाल रहे हैं, और उनके चेहरों पर फिर से सोना उगाने (फसल बोने) का विश्वास लौट आया है।

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