भारत नाम सुनकर और बोलने मात्र से ही शरीर स्फूर्ति और ऊर्जा से भर उठता है। भारत विभिन्नता से परिपूर्ण, उन्नतिशील, धार्मिक और सांस्कृतिक देश है। यहां की हरियाली और बदहाली दोनों ही विश्वभर के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र रहे हैं। भारत ने अपनी नींव के समय से ही कई उतार चढ़ाव देखे हैं। किसी भी देश की उन्नति और अवनति वहां के लोगों की वैचारिक सोच का नतीजा होती है। भारत ने लगभग दो सौ वर्षों से अधिक तक अंग्रेजों की गुलामी सही, कारण भारत का समृद्ध होकर भी मानसिक संकीर्णताओं से घिरा होना रहा है। भारत को यूंही सोने की चिड़िया नहीं कहा जाता। अंग्रेजों ने भारतीयों के भोलेपन और धार्मिक होने का भी खूब फायदा उठाया। भारत में लोगों ने स्वयं को स्वयं ही अनेक धर्मों में विभाजित किया। नतीजा यह हुआ कि कुछ लोग नीचे यानी दबाए जाते रहे और कुछ सदा शासन करते रहे। समाज जातियों और धर्मों में बंटता चला गया। मनुष्य स्वयं परमात्मा के बनाए विधान और मार्ग से भटक गया।

डॉ भीमराव अंबेडकर

आज हम एक ऐसे भारतीय की 128वीं जन्म वर्षगांठ मना रहे हैं जिसने भारत के निम्न कहे जाने वाले वर्ग के उत्थान में अपना संपूर्ण सहयोग व जीवन व्यतीत किया।

जय भीम क्या है?

डॉ भीमराव अंबेडकर भारतीय संविधान के पिता माने जाते हैं। जिन्होंने भारत के संविधान का ड्राफ्ट (प्रारुप) तैयार किया था। वो एक महान मानवाधिकार कार्यकर्ता थे जिनका जन्म 14 अप्रैल 1891 को हुआ था। उन्होंने भारत के निम्न स्तरीय समूह के लोगों की आर्थिक स्थिति को बढ़ाने के साथ ही शिक्षा की जरुरत के लक्ष्य को फैलाने के लिये भारत में वर्ष 1923 में “बहिष्कृत हितकरनी सभा” की स्थापना की थी। भारतीय समाज को पुनर्निर्माण के साथ ही भारत में जातिवाद को जड़ से हटाने के लक्ष्य के लिये “शिक्षित करना-आंदोलन करना-संगठित करना” के नारे का इस्तेमाल कर लोगों के लिए वो एक सामाजिक आंदोलन चला रहे थे।
डॉ॰ भीमराव अंबेडकर का भारत के विकास में बड़ा योगदान रहा है। एक अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, शिक्षाविद् और कानून के जानकार के तौर पर अंबेडकर ने आधुनिक भारत की नींव रखी थी।
उनके जन्मदिन पर हर साल उनके लाखों अनुयायी उनके जन्मस्थल भीम जन्मभूमि महू (मध्य प्रदेश), बौद्ध धम्मदीक्षास्थल दीक्षाभूमि, नागपुर और उनका समाधी स्थल चैत्य भूमि, मुंबई में उन्हें अभिवादन करने लिए इकट्टा होते हैं। जयभीम का शाब्दिक अर्थ है “भीम” यानी, भीमराव अम्बेडकर की जीत हो। जय भीम भारतीय बौद्धों और अंबेडकरवादियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाला एक अभिवादन वाक्यांश हैं।

निम्न वर्ग समूह के लोगों के लिये अस्पृश्यता मिटाने के लिए किया कार्य।

अंबेडकर विपुल प्रतिभा के छात्र थे। उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स दोनों ही विश्वविद्यालयों से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधियाँ प्राप्त कीं।अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में शोध कार्य भी किए थे। व्यावसायिक जीवन के आरम्भिक भाग में ये अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे एवं वकालत भी की तथा बाद का जीवन राजनीतिक गतिविधियों में अधिक बीता।
अंबेडकर ने कहा था “छुआछूत गुलामी से भी बदतर है।” अंबेडकर बड़ौदा के रियासत राज्य द्वारा शिक्षित थे अतः उनकी सेवा करने के लिए बाध्य थे। उन्हें महाराजा गायकवाड़ का सैन्य सचिव नियुक्त किया गया, लेकिन जातिगत भेदभाव के कारण कुछ ही समय में उन्हें यह नौकरी छोड़नी पडी। उन्होंने इस घटना को अपनी आत्मकथा, वेटिंग फॉर अ वीजा में वर्णित किया। इसके बाद उन्होंने अपने बढ़ते परिवार के लिए जीविका साधन खोजने के पुनः प्रयास किये, जिसके लिये उन्होंने लेखाकार के रूप में, व एक निजी शिक्षक के रूप में भी काम किया और एक निवेश परामर्श व्यवसाय की स्थापना की, किन्तु ये सभी प्रयास तब विफल हो गये जब उनके ग्राहकों ने जाना कि ये अछूत हैं। 1918 में ये मुंबई में सिडेनहम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स में राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर बने। हालांकि वे छात्रों के साथ सफल रहे, फिर भी अन्य प्रोफेसरों ने उनके साथ पानी पीने के बर्तन साझा करने पर विरोध किया। भारतीय समाज के लिये दिये गये उनके महान योगदान के लिये 1990 के अप्रैल महीने में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

अंबेडकर भी शास्त्र विरुद्ध साधना के विरोधी थे।

अंबेडकर को हिंदू धर्म की त्रिमूर्ति में अविश्वास था। उन्होंने अवतारवाद के खंडन, श्राद्ध-तर्पण, पिंडदान के परित्याग, बुद्ध के सिद्धांतों और उपदेशों में विश्वास, ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह में भाग न लेना, मनुष्य की समानता में विश्वास, बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग के अनुसरण, प्राणियों के प्रति दयालुता, चोरी न करने, झूठ न बोलने, शराब के सेवन न करने, असमानता पर आधारित हिंदू धर्म का त्याग करने और बौद्ध धर्म को अपनाने से संबंधित थीं।

कबीर साहेब जी प्रत्येक युग में अपने निजधाम सतलोक से चलकर आते हैं और सभी प्राणियों को त्रिदेवों की सही भक्ति विधि बताते हैं। परमात्मा के लिए सभी प्राणी समदृष्टि हैं।

परम अक्षर ब्रह्म अर्थात् सत्यपुरूष के अवतारों की जानकारी

परम अक्षर ब्रह्म स्वयं पृथ्वी पर प्रकट होता है। वह सशरीर आता है। सशरीर लौट जाता है :- यह लीला वह परमेश्वर दो प्रकार से करता है।
क = प्रत्येक युग में शिशु रूप में किसी सरोवर में कमल के फूल पर वन में प्रकट होता है। वहां से निःसन्तान दम्पति उसे उठा ले जाते हैं। फिर लीला करता हुआ बड़ा होता है तथा आध्यात्मिक ज्ञान प्रचार करके अधर्म का नाश करता है। सरोवर के जल में कमल के फूल पर अवतरित होने के कारण परमेश्वर नारायण कहलाता है (नार=जल, आयण=आने वाला अर्थात् जल पर निवास करने वाला नारायण कहलाता है।) ख = जब चाहे साधु सन्त जिन्दा के रूप में अपने सत्यलोक से पृथ्वी पर आ जाते हैं तथा अच्छी आत्माओं को ज्ञान देते हैं। फिर वे पुण्यात्माऐं भी ज्ञान प्रचार करके अधर्म का नाश करते हैं। वे भी परमेश्वर के भेजे हुए अवतार होते हैं। कलयुग में ज्येष्ठ शुदि पूर्णमासी संवत् 1455 (सन् 1398) को कबीर परमेश्वर सत्यलोक से चलकर आए तथा काशी शहर के लहर तारा नामक सरोवर में कमल के फूल पर शिशु रूप में विराजमान हुए। वहां से नीरू तथा नीमा जो जुलाहा (धाणक) दम्पति थे, उन्हें उठा लाए। धानक (जुलाहा) परिवार में परवरिश होने के कारण कबीर साहेब जी को भी छुआछूत और छोटी जाति जैसे अपभ्रंश व्यवहार का सामना करना पड़ा। कबीर साहेब जी ने भी अपने आध्यात्मिक ज्ञान द्वारा हिंदू मुस्लिम भेदभाव, धार्मिक रुढ़िवादिता और जातिवाद को मिटाने का भरसक प्रयास किया और इसमें वह पूर्णतया सफल भी हुए।

आइए जानते हैं अंबेडकर ने बौद्ध धर्म क्यों अपनाया।

हिंदू धर्म में जन्मे अंबेडकर जी ने बचपन से छुआछूत का कड़वा घूंट पिया था। वह धर्म और भगवान के नाम पर चल रहे छुआछात से स्वयं को बचाना चाहते थे।
14 अक्टूबर 1956 को अंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया था। वे हिंदू धर्म में चल रहे भेदभाव और छुआछात से छुटकारा चाहते थे।
वे कई बरस पहले से ही मन बना चुके थे कि वे उस धर्म में अपने प्राण नहीं त्यागेंगे जिस धर्म में उन्होंने अपनी पहली सांस ली है। जबकि बुद्ध जैसी साधना करने से भगवान की प्राप्ति हो ही नहीं सकती। बौद्ध धर्म परमात्मा के करीब नहीं ले जा सकता। यहां आपको व्यवहारिक ज्ञान तो अवश्य प्राप्त हो सकता है परंतु निर्वाण नहीं क्योंकि बुद्ध स्वयं जन्म मृत्यु से आज़ाद नहीं हुए। गौतम बुद्ध द्वारा चलाया पंथ वेदों और शास्त्रों पर आधारित न हो बुद्ध की स्वयं की विचारधारा पर आधारित है। जिससे न तो सांसारिक सुखों को प्राप्त किया जा सकता है न ही आध्यात्मिक।

अंबेडकर जी की मौत का रहस्य

वास्तविकता यह है कि अंबेडकर जी को भरी संसद में भरतपुर के राजा बच्चू सिंह ने गोली मारी थी जिससे उनकी मृत्यु हुई थी, परंतु भारी षडयंत्र के चलते भारत सरकार डॉक्टर भीमराव की मौत को रहस्य बना कर भूलाना चाहती है।

साभार (Google)

भीमराव अदम्य साहस व प्रतिभा के व्यक्ति थे परंतु सही भक्ति मार्ग और तत्वदर्शी संत न मिलने के कारण अपनी ही सामाजिक गतिविधियों और पद में उलझ कर रह गए। वह व्यक्ति जो सतभक्ति करता है परमात्मा सदा उसके साथ रहता है। सच्ची भक्ति करने वाले व्यक्ति की कभी भी अकाल मृत्यु नहीं होती। परमेश्वर कबीर जी ने बताया है कि सर्व प्राणी कर्मों के वश जन्मते-मरते तथा कर्म करते हैं। कर्मों के बंधन को सतगुरू छुड़ा देता है।

वर्तमान जीवन में हम देखते हैं कि कोई इतना निर्धन है कि बच्चों का पालन-पोषण भी कठिनता से कर पा रहा है। एक इतना धनी है कि उसके पास कई कार तथा कोठियां हैं। एक रिक्शा खींच रहा है। एक मनुष्य उसमें बैठा जा रहा है। एक सिपाही लगा है, एक पुलिस प्रमुख लगा है। कोई मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, जज, डी.सी., कमिश्नर तथा राष्ट्रपति की पदवी प्राप्त है। इसका कारण है कि जिस-जिसने पूर्व मानव (स्त्री-पुरूष) के जन्म में जैसी-जैसी भक्ति व तप तथा दान-धर्म, शुभ कर्म तथा पाप व अशुभ कर्म किए थे, उनके परिणामस्वरूप उपरोक्त स्थिति प्राप्त है। यदि वर्तमान मानव जीवन में सत्य भक्ति तथा शुभ कर्म नहीं करेंगे तो सब मानव अगले जन्म में पशु-पक्षी आदि-आदि का जीवन प्राप्त करके महाकष्ट उठाऐंगे। राजा लोग भी आपत्ति के समय में परमात्मा से ही आपत्ति निवारण की इच्छा से साधु-संतों से आशीर्वाद प्राप्त करके सुखी होते हैं। सामान्य व्यक्ति को भी परमात्मा की भक्ति करके सुखी होना चाहिए।

शुद्र भी भगवान की भक्ति का अधिकारी है।

गीता अध्याय 18 के श्लोक 46, 47, 48 में गीता ज्ञान दाता ने अपने से अन्य परमेश्वर की पूजा करने को तथा अपने स्वाभाविक कर्म यानि क्षत्रिय-वैश्य, ब्राह्मण तथा शुद्र वाले कर्म करते-करते मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है। संत रामपाल जी महाराज तत्वज्ञान से ओत-प्रोत तत्वदर्शी संत हैं जिनके ज्ञान से सभी वर्ग, वर्ण और जाति के लोग दीक्षा प्राप्त करके समान रूप से भक्ति कर्म कर रहे हैं। संत रामपाल जी महाराज के लिए सभी जातियों के व्यक्ति समान हैं क्योंकि परमात्मा के दरबार में भेदभाव, ऊंच-नीच, जात-पात नहीं होती।

जीव हमारी जाति है, मानव धर्म हमारा।
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, धर्म नहीं कोई न्यारा।।

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