​अलीपुर का पुनर्जन्म: जब मौत के साये से निकलकर खेतों में फिर मुस्कुराई फसलें

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​हरियाणा के हिसार जिले का अलीपुर गांव आज एक ऐसी कहानी का गवाह बन गया है, जो पीढ़ियों तक सुनाई जाएगी। यह कहानी कुदरत के कहर, प्रशासनिक विफलता और अंततः एक महान संत के ईश्वरीय परोपकार की है। एक समय था जब यह गांव 1995 से भी भयंकर बाढ़ का दंश झेल रहा था, लेकिन संत रामपाल जी महाराज की असीम कृपा ने इस डूबते हुए गांव को एक नया जीवनदान दे दिया है।

​तबाही का वह खौफनाक मंज़र 

आज से कुछ महीने पहले अलीपुर गांव का दृश्य किसी बुरे सपने से कम नहीं था। गांव की लगभग 200 से 300 एकड़ सबसे उपजाऊ ज़मीन 10 फुट गहरे, सड़े हुए पानी के नीचे दफन हो गई थी। खरीफ की फसल 100% बर्बाद हो चुकी थी और रबी (गेहूं) की बिजाई की आखिरी उम्मीद भी उस ठहरे हुए पानी में डूबती नज़र आ रही थी।

​स्थिति केवल खेतों तक सीमित नहीं थी। बाढ़ का पानी घरों की नींव तक पहुंच गया था, जिससे मकानों में गहरी दरारें आ गई थीं और फर्श धंसने लगे थे। ग्रामीण अमित मलिक उस भयानक समय को याद करते हुए बताते हैं, “वह ‘काले पानी की सज़ा’ काटने जैसा था। चारों तरफ सिर्फ पानी था। न इंसान घर से बाहर निकल सकता था, न पशुओं के लिए चारा बचा था। ऐसा लग रहा था मानो हम किसी मौत के टापू पर फंस गए हों।”

​जिन किसानों का पूरा जीवन और अर्थव्यवस्था खेतों पर टिकी है, उनके लिए एक फसल का बर्बाद होना मौत के समान होता है। 25 एकड़ ज़मीन के मालिक किसान बलवान सिंह रुंधे हुए गले से बताते हैं कि यदि यह पानी नहीं निकलता, तो उन पर कर्ज़ का इतना भारी बोझ हो जाता कि पेड़ों पर लटक कर फांसी खाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता।

​मदद की गुहार और त्वरित समाधान

जब पानी हफ्तों तक नहीं उतरा और प्रशासन द्वारा दी गई छोटी-मोटी मदद (कमज़ोर पाइप और ट्यूब) पूरी तरह विफल हो गई, तब गांव वालों को अपनी पुरानी उम्मीद याद आई। “2018 के किसान धरने”, के समय भी संत रामपाल जी महाराज ने किसानों की ₹5 लाख रुपए देकर मदद की थी। इसी विश्वास के साथ, गांव के प्रतिनिधियों ने अपनी व्यथा लिख कर एक प्रार्थना पत्र सीधे मुनींद्र धर्मार्थ ट्रस्ट ऑफिस में जमा किया।

​सरकारी दफ्तरों की तरह यहां कोई लालफीताशाही या देरी नहीं हुई। प्रार्थना पत्र मिलते ही जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ने तुरंत एक्शन लिया गया। गांव में एक उत्सव की तरह राहत सामग्री का काफिला पहुंचा। संत रामपाल जी महाराज ने पानी निकालने के लिए 6000 फुट लंबी और 8-इंची चौड़ी बेहतरीन क्वालिटी की पाइपें, और  दो 10 HP की अति शक्तिशाली मोटरें भेजीं। मदद इतनी बारीकी से की गई थी कि मोटरों के स्टार्टर, तार, और यहां तक कि पाइपों को जोड़ने वाला फेविकोल भी साथ भेजा गया, ताकि किसानों का एक रुपया भी खर्च न हो और काम तुरंत शुरू हो सके।

परमेश्वर ने भेजा राहत अभियान

आज के समाज में जहां हर चीज जाति, धर्म और वोट बैंक के तराजू पर तौली जाती है, वहां संत जी ने बिना किसी भेदभाव के ’36 बिरादरी’ के इस गांव को गले लगाया।

​परमेश्वर का संविधान यही सिखाता है कि परमात्मा की नज़र में हर जीव समान है और संकट के समय हर बेबस की निस्वार्थ भाव से रक्षा करना ही सच्चा ईश्वरीय कर्तव्य है। संत जी ने यह दिखा दिया कि जब परमात्मा की शक्ति कार्य करती है, तो वह पूरे समाज को एक समान प्रेम और सुरक्षा प्रदान करती है।

​’काले पानी’ से लहलहाती फसलों तक का सफर

ट्रस्ट द्वारा दी गई उन विशाल मोटरों ने दिन-रात लगातार काम किया और उस गहरे पानी को गांव की सीमाओं से बाहर खदेड़ दिया। आज का अलीपुर उस तबाही के दौर से बिल्कुल अलग है।

​जिन खेतों में कुछ दिन पहले तक 10 फुट पानी खड़ा था, वहां आज गेहूं और सरसों की हरी-हरी फसलें हवा में लहरा रही हैं। सरपंच प्रतिनिधि कुलबीर मलिक पूरे गांव की तरफ से आभार जताते हुए कहते हैं, “आज हरियाणा में अगर कोई किसानों को असल मायने में बचा रहा है, तो वह सिर्फ संत रामपाल जी महाराज हैं। उन्होंने हमें मालिक से मज़दूर बनने से बचा लिया।” गांव की ताई सुनहरी भी भावुक होकर कहती हैं कि, संत जी ने इंसान ही नहीं, बल्कि उनके बेजुबान पशुओं को भी भूख से तड़प कर मरने से बचा लिया।

​एक अमर मसीहा

अलीपुर गांव आज सिर्फ एक बाढ़ प्रभावित क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि सच्ची आस्था और निस्वार्थ सेवा मिलकर कैसा चमत्कार कर सकती है। संत रामपाल जी महाराज ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह केवल एक आध्यात्मिक गुरु नहीं हैं, बल्कि संकट की घड़ी में लाखों परिवारों की ढाल और असल भाग्यविधाता हैं। उनकी इस महान दया ने न केवल अलीपुर के खेतों को सींचा है, बल्कि मानवता के इतिहास में परोपकार का एक ऐसा सुनहरा अध्याय लिख दिया है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।

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