आपने अकसर लोगों को माता के ये जयकारे लगाते हुए जागरण में और माता के मंदिर में घंटियां बजाते, आरती गाते हुए सुना होगा। हिंदू लोगों में दुर्गा देवी को ईष्ट मानकर मन्नतें मांगी जाती हैं, पूजा और व्रत रखे जाते हैं। लोग दुर्गा जी का गुणगान करने के लिए जागरण रखवाते हैं। दुर्गा की पूजा करने के साथ साथ लोग नकली धर्म गुरूओं जिनके पास न ज्ञान है न ही भगवानों की सही और श्रेष्ठ जानकारी के चक्कर में फंसे हैं। दुर्गा देवी जी को उनके साधक माता, मैय्या, शेरांवाली, शारदा, भवानी और संतोषी मां कहकर साधना करते हैं।
आज 6 अप्रैल से देवी दुर्गा की पूजा नौ दिन तक चलेगी जिसे नवरात्रि पूजन कहते हैं। देवी पुराण के अनुसार नवरात्रे वर्ष में 2 बार आते हैं। इन दिनों दुर्गा जी की पूजा नौ दिनों तक विशेष रूप से की जाती है। भारतीय वर्ष के पहले महीने चैत्र (मार्च/अप्रैल) में दुर्गा देवी के पहले नवरात्रे रखे जाते हैं जिन्हें चैत्र नवरात्रे के नाम से भी जाना जाता है। इसके अलावा आश्विन मास ( सितम्बर / अक्टूबर) में आने वाले नवरात्रों को मुख्य नवरात्रे माना जाता है। इन्हें शारदीय नवरात्रों के नाम से भी जाना जाता है।

महिलाएं अपने घर में सुख, शांति, धन और समृद्धि के लिए दुर्गा देवी से मन्नतें मांगती हैं। आपको बता दें की दुर्गा की भक्ति करने वालों को नवरात्रि और अन्य धार्मिक दिनों को छोड़कर बाकी के दिनों में शराब, गुटका, सिगरेट, बीड़ी, भांग और अन्य नशे करने से कोई परहेज़ नहीं है। ये वही लोग हैं जो अंडे, मांस, मछली और अन्य जीव हत्या करके पेट भरने से भी नहीं हिचकिचाते। परंतु नवरात्रि के दिनों में यह लहसुन और प्याज़ के प्रयोग पर भी बैन लगा देते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों के लिए दुर्गा जी के साधक मांस और नशे से स्वयं को दूर रखते हैं। सच्चे परमात्मा की भक्ति करने वाले पूरा जीवन जीव हत्या कर पेट भरने और नशा आदि करना तो दूर इन्हें छूते भी नहीं हैं।

सृष्टि रचना से जानें दुर्गा और काल की संपूर्ण जानकारी।

हम सब पहले उस परमेश्वर (सतपुरूष) के पास रहते थे। वहाँ हमने गलती की थी। हमने अपने परम सुखदाई परमात्मा (सतपुरूष) की अपेक्षा काल ब्रह्म (ज्योति निरंजन) में आस्था बना ली थी। यह सतलोक में तप करके घोर तपस्या कर रहा था। हम इसे अच्छा व्यक्ति जानकर दिल से चाहने लगे। यही गलती प्रकृति देवी ने की थी। वह भी इसे अच्छा व्यक्ति मानकर आसक्त हुई थी। जिस कारण से परमात्मा यानि सतपुरूष जी ने हमको त्याग दिया। इस काल ब्रह्म ने तपस्या के प्रतिफल में सतपुरूष से इक्कीस ब्रह्माण्ड प्राप्त किए हैं।

काल ने दुर्गा के साथ दुष्कर्म करने की कोशिश की थी।

इसने सतलोक में युवती प्रकृति देवी (दुर्गा) के साथ दुष्कर्म करने की कोशिश की थी। प्रकृति देवी (दुर्गा) अपनी इज्जत की रक्षा के लिए सूक्ष्म रूप बनाकर काल ब्रह्म के खुले मुख द्वार से उसके पेट में चली गई थी। परम अक्षर ब्रह्म ने देवी को ब्रह्म के उदर से निकालकर देवी सहित हम सबको काल ब्रह्म के साथ सत्यलोक से सोलह (16) संख कोस (48 शंख कि.मी.) दूर यहाँ भेज दिया। परम अक्षर ब्रह्म ने प्रकृति देवी के साथ किए दुर्व्यवहार के कारण काल ब्रह्म को इक्कीस ब्रह्माण्डों सहित सतलोक से निकाल दिया था।

काल और दुर्गा के संयोग से जीवों की उत्पत्ति होती है।

दुर्गा (प्रकृति देवी) और काल (ब्रह्म) के पति-पत्नी व्यवहार से तीनों पुत्रों रजगुण युक्त श्री ब्रह्मा जी, सतगुण युक्त श्री विष्णु जी, तमगुण युक्त श्री शिव जी को उत्पन्न करती है।

गीता अध्याय 7 श्लोक 4 से 6 में स्पष्ट किया है कि मेरी आठ प्रकार की माया जो आठ भाग में विभाजित है पाँच तत्व तथा तीन (मन, बुद्धि, अहंकार) ये आठ भाग हैं। यह तो जड़ प्रकृति है। सर्व प्राणियों को उत्पन्न करने में सहयोगी हैं, यही दुर्गा (प्रकृति) ही अन्य तीन रूप महालक्ष्मी – महासावित्री – महागौरी आदि बनाकर काल (ब्रह्म) के साथ पति-पत्नी व्यवहार से तीनों पुत्रों रजगुण युक्त श्री ब्रह्मा जी, सतगुण युक्त श्री विष्णु जी, तमगुण युक्त श्री शिव जी को उत्पन्न करती है। फिर यही दुर्गा अन्य तीन स्त्री रूप सावित्री, लक्ष्मी तथा गौरी बनाकर तीनों देवताओं (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी, श्री शिव जी) से विवाह करके काल के लिए जीव उत्पन्न करती है। जो चेतन प्रकृति (शेराँवाली) है। इसके सहयोग से काल सर्व प्राणियों की उत्पत्ति करता है।

दुर्गा और काल जीव को कभी मुक्त नहीं होने देते।

गीता अध्याय 14 श्लोक 3 में कहा है कि (मम ब्रह्म) मुझ ब्रह्म की (महत्) प्रकृति यानि दुर्गा की योनि है। मैं (तस्मिन) उस (योनिः) योनि में गर्भ स्थापित करता हूँ। उससे सर्व प्राणियों की उत्पत्ति होती है।

लोग अज्ञानतावश करते हैं दुर्गा की गलत पूजा विधि।

जब काल ब्रह्म (ज्योति स्वरूप निरंजन) ने गुप्त (अव्यक्त) रहने की प्रतिज्ञा की तो भवानी (दुर्गा) जी ने कहा कि आप मेरे साथ रहो। मैं अकेली स्त्री इतने बड़े साम्राज्य (21 ब्रह्माण्डों) को कैसे सम्भालूँगी? तब काल ब्रह्म ने कहा, हे भवानी! अदृश्य रूप से सर्व कार्य मैं करूँगा। आप मुझसे मिलती रहोगी, परंतु मैं तेरे अतिरिक्त किसी को दर्शन नहीं दूँगा। मेरा यह भेद किसी से न कहना। कारण है कि मैं (काल ब्रह्म) प्रतिदिन एक लाख मानव को खाया करूँगा, प्रतिदिन हाहाकार मचेगी अन्यथा मेरे पुत्र ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव भी मुझ से घृणा करेंगे। यदि उनको सच्चाई का पता चल गया तो वे मेरा सहयोग नहीं देंगे। मेरे लोक (21 ब्रह्माण्डों का काल लोक है, इसे क्षर पुरूष का लोक भी कहते हैं) में कोई भी अमर नहीं हो सकता। तू और मैं (काल ब्रह्म) भी नष्ट होते रहेंगे, परंतु तेरा और मेरा किसी माता के संयोग से जन्म नहीं होगा।

दुर्गा, काल के हाथ की कठपुतली है।

दुर्गा को अष्टंगी भी कहते हैं, इस की आठ भुजाएं हैं यह पूर्ण परमात्मा नहीं है बल्कि उस पूर्ण परमात्मा की शब्द से उत्पन्न की हुई बेटी है। यह वही करती है जो इसे काल ने आदेश दिया हुआ है।
दुर्गा और काल (ब्रहमा, विष्णु और शिव) को परमात्मा मानकर पूजा करने वालों की मुक्ति कभी नहीं होती।
इनके साधक प्रायः पाखण्ड , मनमाना आचरण और लोकवेद पर आधारित भक्ति करते हैं। यह वेदों को समझ नहीं पाते। तत्वज्ञानहीन पुरूषों की भक्ति कभी सफल नहीं होती । यह सदा जन्मते और मरते रहते हैं।
परमेश्वर कबीर जी ने तत्वज्ञानहीन उपासकों की अंध श्रद्धा भक्ति को विवेकहीन साधना कहा है जो व्यर्थ है।

आइए जानते हैं क्यों रखते हैं लोग व्रत।

नात्यश्र्नतस्तु योगोअस्ति न चैकान्तमनश्र्नतः |
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ||

व्रत रखना गीता अध्याय 6 श्लोक 16 में मना किया है। कहा है कि जो लोग बिल्कुल अन्न नहीं खाते यानि व्रत करते हैं, उनका योग यानि भक्ति कर्म कभी सफल नहीं होता।

देवी के भगत भौतिक दुखों से बचने के लिए करते हैं मनमाना आचरण।

पति शराबी घर पर नित ही, करत बहुत लड़ईयाँ।
पत्नी षोडष शुक्र व्रत करत है, देहि नित तुड़ईयाँ।।

एक बहन से जगतगुरू संत रामपाल जी महाराज जी ने पूछा कि ‘‘सोलह शुक्रवार के व्रतों से ज्ञानहीन गुरूओं ने क्या लाभ बताया है?’’ उस बेटी ने बताया कि एक स्त्री का पति रोजगार के लिए दूर देश में चला गया था। वह वर्षों तक नहीं आया। उस स्त्री को चिंता सताने लगी। एक दिन उसको देवी संतोषी माता दिखाई दी और बोली कि मेरे सोलह शुक्रवार के व्रत लगातार कर दे। तेरा पति घर आ जाएगा। ऐसा ही हुआ। संत रामपाल जी ने कहा विचार करो बेटी! आपका पति तो तेरे पास ही रहता है। प्रतिदिन लड़ाई करता है। आपकी देही तोड़ता है यानि मार-पीट करता है। आप इस व्रत को किसलिए कर रही हो? आपने तो ऐसा व्रत करना चाहिए था कि वह कई दिन घर ना आए और मार ना पड़े। आप तो अपनी आफत लाने का व्रत कर रही थी। उसने बताया कि मेरी सहेली एक गुरू के पास जाती है। उसने मुझे बताया था। मैं भी व्रत करने लगी। मुझे तो आज पता चला कि मैं तो व्यर्थ भक्ति कर रही थी।
सूक्ष्मवेद में कबीर परमेश्वर जी ने कहा है कि :- गुरूवाँ गाम बिगाड़े संतो, गुरूवाँ गाम बिगाड़े। ऐसे कर्म जीव कै ला दिए, बहुर झड़ैं नहीं झाड़े।।

परमेश्वर कबीर जी ने समझाया है कि तत्वज्ञानहीन गुरूओं ने गाँव के गाँव को शास्त्रविरूद्ध साधना पर लगाकर उनका जीवन नाश कर रखा है। भोली जनता को शास्त्रविरूद्ध साधना पर इतना दृढ़ कर दिया है कि वे शास्त्रों में प्रमाण देखकर भी उस व्यर्थ पूजा को त्यागना नहीं चाहते।
तज पाखण्ड सत नाम लौ लावै, सोई भव सागर से तरियाँ। कह कबीर मिले गुरू पूरा, स्यों परिवार उधरियाँ।।
परमात्मा कबीर जी ने स्पष्ट किया है कि अन्य शास्त्राविरूद्ध पाखण्ड पूजा को त्यागकर पूर्ण सतगुरु से सच्चे नाम का जाप प्राप्त करके श्रद्धा से भक्ति करके भक्तजन पार हो जाते हैं। उनके परिवार के सर्व सदस्य भी भक्ति करके कल्याण को प्राप्त हो जाते हैं।

रामायण के अरण्य काण्ड में दोहा नम्बर 14 की चौपाई नम्बर 8 में लक्ष्मण जी ने श्रीरामचन्द्र जी से पूछा कि भक्ति कैसी होती है। तो रामचन्द्रजी ने कहा,

।।कहिय तात सो परम बिरागी।
त्रण सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी।।

24 सिद्धि व तीनों गुणों की यानी ब्रह्मा, विष्णु शिव जी ये ही तीन देवता हैं, और ये ही तीन गुण हैं। जो इन तीनों गुणों की भक्ति व सिद्धी को तिनके के समान त्याग देगा। तब भक्ति की पहली सीढ़ी चढ़ पायेगा।

सूक्ष्मवेद (तत्वज्ञान) में कहा है कि :-

अंध श्रद्धा भक्ति करने वालों को इतना भी विवेक नहीं कि वे जो साधना कर रहे हैं, इससे लाभ है या हानि।
दुर्गा और काल की सच्चाई जानने के लिए सतगुरु रामपाल जी महाराज द्वारा बताया जा रहा तत्वज्ञान सुनिए प्रतिदिन साधना चैनल पर 7:30 – 8:30 बजे और आज ही अवश्य मंगाएं फ्री पुस्तक ज्ञान गंगा। पुस्तक मंगाने के लिए मैसेज करें 7496801825 पर।