हिन्दू समाज मे कई तरह के धार्मिक क्रियाएं व क्रिया कर्म किये जाते है। इनमे श्राद्ध हिन्दू समाज में एक महत्वपूर्ण व आवश्यक रूप से किया जाने वाला कर्म कांड है। हिन्दू महीने भाद्रपक्ष की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि के दिन श्राद्ध पक्ष शुरू होते हैं। इस साल श्राद्ध पक्ष 24 सितंबर, सोमवार से लेकर 8 अक्टूबर, सोमवार तक चलेगा। श्राद्धपक्ष के 16 दिन होने का कारण ये माना जाता है कि हिन्दू समाज मे यदि किसी की मौत होती है तो वह 16 तिथियों में ही होती है। इन तिथियों के अनुसार ही पितरों का श्राद्ध श्राद्धपक्ष के दौरान उसी तिथि पर कर दिया जाता है। आज लगभग हर हिन्दू परिवार में श्राद्ध किया जाता है। लेकिन फिर भी हिन्दू समाज को उनके पितरों द्वारा सम्पन्न नहीं किया जा रहा है। यही नहीं आज काफी परिवार श्राद्ध निकालने के बाद भी पितृदोष से परेशान हैं। तो श्राद्ध निकालने के बाद भी पितृदोष होने का कारण क्या है?

पुराण के अनुसार श्राद्ध

हिन्दू धर्म के मार्कण्डेय पुराण (गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित पेज 237 पर है, जिसमें मार्कण्डेय पुराण तथा ब्रह्म पुराणांक एक साथ जिल्द किया है) में भी श्राद्ध के विषय मे एक कथा का वर्णन मिलता है जिसमे एक रूची नाम का ब्रह्मचारी साधक वेदों के अनुसार साधना कर रहा था। वह जब 40 वर्ष का हुआ तब उसे अपने चार पूर्वज जो मनमाना आचरण व शास्त्र विरुद्ध साधना करके पितर बने हुए थे तथा कष्ट भोग रहे थे, दिखाई दिए। “पितरों ने उससे कहा कि बेटा रूची शादी करवा कर हमारे श्राद्ध निकाला करो, हम तो दुःखी हो रहे हैं। इस पर रूची ऋषि बोले कि पित्रामहो वेद में क्रिया या कर्म काण्ड मार्ग (श्राद्ध, पिण्ड भरवाना आदि) को मूर्खों की साधना कहा है। फिर आप मुझे क्यों उस गलत(शास्त्रविधि रहित) रास्ते पर लगा रहे हो। इस पर पितरों ने कहा कि बेटा आपकी बात सत्य है कि वेदों में पितर पूजा, भूत पूजा के साथ साथ देवी देवताओं की पूजा को भी अविद्या की संज्ञा दी है। पितरों ने उससे कहा कि पितर कुछ तो लाभ दे सकते हैं। इस तरह से पितर खुद कह रहे हैं कि पितृपूजा वेदों के विरुद्ध है पर फिर लाभ की अटकलें खुद के मतानुसार लगा रहे हैं। जिनका पालन नहीं किया जा सकता। क्योंकि ये आदेश वेदों में नहीं है, पुराणों में आदेश किसी ऋषि विशेष का है जो कि खुद के विचारों के अनुसार पितर पूजने, भूत या अन्य देव पूजने को कह रहा है। इसलिए किसी संत या ऋषि के कहने से वेदों की आज्ञा का उल्लंघन करने से हम सजा के भागी होंगे और वैसा करने पर हमें फायदे नहीं नुकसान होंगे।

गीता के अनुसार श्राद्ध

गीताजी भी हमें श्राद्ध के विषय मे निर्णायक ज्ञान देती है। गीता के अध्याय 9 के श्लोक 25 में कहा है कि देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजने (पिण्ड दान करने) वाले भूतों को प्राप्त होते हैं अर्थात् भूत बन जाते हैं, शास्त्रानुकूल (पवित्र वेदों व गीता अनुसार) पूजा करने वाले मुझको ही प्राप्त होते हैं अर्थात् ब्रह्मलोक के स्वर्ग व महास्वर्ग आदि में कुछ ज्यादा समय मौज कर लेते हैं और पुण्यरूपी कमाई खत्म होने पर फिर से 84 लाख जूनियों में प्रवेश कर जाते हैं। गीताजी के इस निर्णायक ज्ञान से हमें पता चलता है कि क्यों आज देश के काफी परिवार प्रेतबाधा या पितृबाधा से परेशान हैं। अज्ञानी गुरुओं व स्वार्थी पंडितों के कारण समस्त हिन्दू समाज पितर पूजा यानी भूत पूजा में लग गया जिसके कारण समाज के लोग मौत के बाद पितर बनने लगे। फिर पितर योनि के दुख के कारण वापस उनके ही वंशजों को आकर परेशान करने लगे।

आत्ममंथन
श्राद्ध जीवित माता-पिता, गुरु का करें, मृतकों का नहीं!

जब हिन्दू समाज में किसी की मौत होती है तो पंडितजन बताते हैं कि मृतक की अस्थियों को गंगा में डालने से मोक्ष होगा, फिर कहते हैं कि छमाही, बरसोदि से मोक्ष होगा। इतना करने के बाद जब श्राद्ध आते हैं तो पंडित बताते हैं कि तुम्हारा मरा हुआ बाप तो कौआ बन गया अब उसे श्राद्ध में खाना खिलाओ। ऐसा करने से वह तृप्त हो जाएगा। आज सभी पढ़े लिखे हैं सब यह समझ सकते हैं कि आदमी को तृप्त सिर्फ एक दिन खाना खिलाने से नहीं किया जा सकता।

संत रामपाल जी महाराज जी बताते हैं कि
जीवित बाप के लट्ठम लट्ठा, मूवे गंग पहुँचइया।
जब आये आसोज का महीना, कौआ बाप बनइया।
रे भोली से दुनिया सतगुरु बिन कैसे सरिया।।

इसी पाखण्ड पूजा के बारे में गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में मना किया है कि जो शास्त्र विधि त्याग कर मनमाना आचरण (पूजा) करते हैं वे न तो सुख को प्राप्त करते हैं न परमगति को तथा न ही कोई कार्य सिद्ध करने वाली सिद्धि को ही प्राप्त करते हैं अर्थात् जीवन व्यर्थ कर जाते हैं। इसलिए अर्जुन तेरे लिए कर्तव्य (जो साधना के कर्म करने योग्य हैं) तथा अकर्तव्य (जो साधना के कर्म नहीं करने योग्य हैं) की व्यवस्था (नियम में) में शास्त्र ही प्रमाण है। गीता के ही अध्याय 4 के 34 श्लोक में बताया है कि तत्वदर्शी संतों की खोज करो, और कपट छोड़कर उन्हें दंडवत प्रणाम करने से वे भक्त को तत्वज्ञान का उपदेश करेंगे। आज वह संत रामपाल जी महाराज हैं जिनके बताये हुए सतमार्ग से ही हमारे पितरों की भी पितर योनि छूटेगी व सर्व साधकों को मोक्ष का मार्ग मिलेगा।