मीरा बाई की अनसुनी सत्य कहानी – SA NEWS

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मीराबाई ने श्री कृष्ण जी की भक्ति क्यों छोड़ी?

आज पूरा विश्व हिंदू संतों का लोहा मानता है और इन्ही संतों के नाम पर बहुत से पंथ विदेशों में भी चले हुए हैं। उन्ही संत भक्तों में से एक है मीरा बाई।
बहन मीरा बचपन से ही लोकवेद के आधार पर कृष्णभक्ति में रुचि लेने लगी थीं। विवाह के थोड़े ही दिन के बाद मीराबाई के पति का निधन हो गया। इस विपत्ति के बावजूद इनकी निष्काम भक्ति दिनोदिन बढ़ती ही चली गई। ये मंदिरों में जाकर वहां मौजूद भक्तों के सामने कृष्णजी की मूर्ति के आगे नाचती रहती थीं।

मीरा बाई को जान से मारने की कोशिश
भक्त कोई भी हो कड़ा संघर्ष करना ही पड़ता है। मीराबाई का इस तरह मंदिर में जाना और नाचना राज परिवार को अच्छा नहीं लगा। मीराबाई के देवर राणा जी जो अब राजा बन गया था, उसने मीराबाई को कई बार मारने की कोशिश की। कभी जहरीले सांप से तो कभी भयंकर विष पिलाकर। राजा ने मीरा से कहा कि यह विष पी ले अन्यथा तेरी गर्दन काट दी जाएगी। मीरा ने सोचा कि गर्दन काटने में तो पीड़ा होगी, विष पी लेती हूँ। मीरा ने विष का प्याला परमात्मा को याद करके पी लिया। लेकिन उन्हें कुछ नहीं हुआ। जब मीरा बाई को जान से मारने के सारे प्रयास करके देख लिए तो राणा समझ गया कि मीरा नहीं मरने वाली है। इसकी रक्षा करने वाली शक्ति मामूली नहीं है। क्योंकि जब भी भक्त पर कोई विपत्ति आती है तो भक्ति की लाज बचाने को कबीर परमात्मा ही मदद करते हैं। राणा ने फिर मीरा बाई को मंदिर में जाने से नहीं रोका।

 

मीरा बाई को कबीर साहेब  जी से पता चला कि शास्त्र अनुकूल ज्ञान तो कोई और है।

जिस श्री कृष्ण जी के मंदिर में मीराबाई पूजा करने जाती थी, उसके मार्ग में एक छोटा बगीचा था। उस बगीचे में परमेश्वर कबीर जी तथा संत रविदास जी सत्संग कर रहे थे। मीरा जी ने देखा कि यहाँ परमात्मा की चर्चा या कथा चल रही है। कुछ देर सुनकर चलते हैं। परमेश्वर कबीर जी ने सत्संग में संक्षिप्त सृष्टि रचना का ज्ञान सुनाया। कहा कि श्री कृष्ण जी यानि श्री विष्णु जी से ऊपर अन्य सर्वशक्तिमान परमात्मा है। जन्म-मरण समाप्त नहीं हुआ तो भक्ति करना या न करना समान है। जन्म-मरण तो श्री कृष्ण जी (श्री विष्णु) का भी समाप्त नहीं है। उसके पुजारियों का कैसे होगा। जैसे हिन्दू संतजन कहते हैं कि गीता का ज्ञान श्री कृष्ण अर्थात् श्री विष्णु जी ने अर्जुन को बताया। गीता ज्ञानदाता गीता अध्याय 2 श्लोक 12, अध्याय 4 श्लोक 5, अध्याय 10 श्लोक 2 में स्पष्ट कर रहा है कि हे अर्जुन! तेरे और मेरे बहुत जन्म हो चुके हैं। तू नहीं जानता, मैं जानता हूँ। इससे स्वसिद्ध है कि श्री कृष्ण जी का भी जन्म-मरण समाप्त नहीं है। वो अविनाशी नहीं है। इसीलिए गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में गीता बोलने वाले ने कहा है कि हे भारत! तू सर्वभाव से उस परमेश्वर की शरण में जा। उस परमेश्वर की कृपा से ही तू सनातन परम धाम को तथा परम शांति को प्राप्त होगा। परमेश्वर कबीर जी के मुख कमल से ये वचन सुनकर परमात्मा के लिए भटक रही आत्मा को नई रोशनी मिली। सत्संग के उपरांत मीराबाई जी ने प्रश्न किया कि हे महात्मा जी! आपकी आज्ञा हो तो शंका का समाधान करवाऊँ। कबीर परमात्मा जी ने कहा कि प्रश्न करो बहन जी!

मीरा बाई ने शंका समाधान हेतु कबीर जी एवं अपने इष्टदेव श्री कृष्ण से पूछे कुछ प्रश्न
प्रश्न:- हे महात्मा जी! आज तक मैंने किसी से नहीं सुना कि श्री कृष्ण जी से ऊपर भी कोई परमात्मा है। आज आपके मुख से सुनकर मैं दोराहे पर खड़ी हो गई हूँ। मैं मानती हूँ कि संत झूठ नहीं बोलते। परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि आपके धार्मिक अज्ञानी गुरूओं का दोष है जिन्हें स्वयं ज्ञान नहीं कि आपके सद्ग्रन्थ क्या ज्ञान बताते हैं? देवी पुराण के तीसरे स्कंद में श्री विष्णु जी स्वयं स्वीकारते हैं कि मैं (विष्णु), ब्रह्मा तथा शंकर नाशवान हैं। हमारा आविर्भाव (जन्म) तथा तिरोभाव (मृत्यु) होता रहता है। (लेख समाप्त)
मीराबाई बोली कि हे महाराज जी! भगवान श्री कृष्ण मुझे साक्षात दर्शन देते हैं। मैं उनसे संवाद करती हूँ। कबीर जी ने कहा कि हे मीराबाई जी! आप एक काम करो। भगवान श्री कृष्ण जी से ही पूछ लेना कि आपसे ऊपर भी कोई मालिक है। वे देवता हैं, कभी झूठ नहीं बोलेंगे। मीराबाई को लगा कि वह पागल हो जाएगी यदि श्री कृष्ण जी से भी ऊपर कोई परमात्मा है तो। रात्रि में मीरा जी ने भगवान श्री कृष्ण जी का आह्वान किया। त्रिलोकी नाथ प्रकट हुए। मीरा ने अपनी शंका के समाधान के लिए निवेदन किया कि हे प्रभु! क्या आपसे ऊपर भी कोई परमात्मा है। एक संत ने सत्संग में बताया है। श्री कृष्ण जी ने कहा कि मीरा! परमात्मा तो है, परंतु वह किसी को दर्शन नहीं देता। हमने बहुत समाधि व साधना करके देख ली है। मीराबाई जी ने सत्संग में परमात्मा कबीर जी से यह भी सुना था कि उस पूर्ण परमात्मा को मैं प्रत्यक्ष दिखाऊँगा। सत्य साधना करके उसके पास सतलोक में भेज दूँगा। मीराबाई ने श्री कृष्ण जी से फिर प्रश्न किया कि क्या आप जीव का जन्म-मरण समाप्त कर सकते हो? श्री कृष्ण जी ने कहा कि यह संभव नहीं। कबीर परमात्मा जी ने कहा था कि मेरे पास ऐसा भक्ति मंत्र है जिससे जन्म-मरण सदा के लिए समाप्त हो जाता है। वह परमधाम प्राप्त होता है जिसके विषय में गीता अध्याय 15 श्लोक 4 में कहा है कि तत्वज्ञान तथा तत्वदर्शी संत की प्राप्ति के पश्चात् परमात्मा के उस परमधाम की खोज करनी चाहिए जहाँ जाने के पश्चात् साधक फिर लौटकर संसार में कभी नहीं आते। उसी एक परमात्मा की भक्ति करो। मीराबाई ने कहा कि हे भगवान श्री कृष्ण जी! संत जी कह रहे थे कि मैं जन्म-मरण समाप्त कर देता हूँ। अब मैं क्या करूं। मुझे तो पूर्ण मोक्ष की चाह है। श्री कृष्ण जी बोले कि मीरा! आप उस संत की शरण ग्रहण करो, अपना कल्याण कराओ। मुझे जितना ज्ञान था, वह बता दिया। मीरा अगले दिन मंदिर नहीं गई। सीधी संत जी के पास अपनी नौकरानियों के साथ गई तथा दीक्षा लेने की इच्छा व्यक्त की तथा श्री कृष्ण जी से हुई वार्ता भी कबीर परमात्मा जी से साझा की। उस समय छूआछात चरम पर थी। ठाकुर लोग अपने को सर्वोत्तम मानते थे। परमात्मा मान-बड़ाई वाले प्राणी को कभी नहीं मिलता। मीराबाई की परीक्षा के लिए कबीर परमात्मा जी ने संत रविदास जी से कहा कि आप मीरा को प्रथम मंत्र दे दो। यह मेरा आपको आदेश है। संत रविदास जी ने आज्ञा का पालन किया। संत कबीर परमात्मा जी ने मीरा से कहा कि बहन जी! वो बैठे संत जी, उनके पास जाकर दीक्षा ले लें। बहन मीरा जी तुरंत रविदास जी के पास गई और बोली, संत जी! दीक्षा देकर कल्याण करो। संत रविदास जी ने बताया कि बहन जी! मैं चमार जाति से हूँ। आप ठाकुरों की बेटी हो। आपके समाज के लोग आपको बुरा-भला कहेंगे। जाति से बाहर कर देंगे। आप विचार कर लें। मीराबाई अधिकारी आत्मा थी। परमात्मा के लिए मर-मिटने के लिए सदा तत्पर रहती थी। बोली, संत जी! आप मेरे पिता, मैं आपकी बेटी। मुझे दीक्षा दो। भाड़ में पड़ो समाज। सत्संग में बड़े गुरू जी (कबीर जी) ने बताया है कि भक्ति बिना वह कल को कुतिया बनेगी, तब यह ठाकुर समाज मेरा क्या बचाव करेगा?

परमात्मा प्राप्ति के लिए घर त्याग दिया मीरा बाई ने।
उसी समय संत रविदास जी ने बहन मीरा को प्रथम मंत्र केवल पाँच नाम दिए। मीराबाई को बताया कि यह इनकी पूजा नहीं है, इनकी साधना है। परमात्मा कबीर जी तथा संत रविदास जी वहाँ एक महीना रूके। मीराबाई पहले तो दिन में घर से बाहर जाती थी, फिर रात्रि में भी सत्संग में जाने लगी क्योंकि सत्संग दिन में कम तथा रात्रि में अधिक होता था। कोई दिन में समय निकाल लेता, कोई रात्रि में। मीरा के देवर राणा जी मीरा को रात्रि में घर से बाहर जाता देखकर जल-भुन गए, परंतु मीरा को रोकना तूफान को रोकने के समान था। इसलिए राणा जी ने मीरा की माता जी को बुलाया और मीरा को समझाने के लिए कहा। कहा कि इसने हमारी इज्जत का नाश कर दिया। बेटी माता की बात मान लेती है। मीरा की माता ने मीरा को समझाया पर मीरा को तो पूर्ण परमात्मा की लगन लगी थी। उसे इतना परेशान किया गया कि अंत में उसने घर त्याग दिया और वृंदावन चली गई। वहां मीरा बहन को कबीर परमात्मा मिले और उसे अगला मोक्ष मंत्र दिया। जिस से उस आत्मा का कल्याण हुआ।

वर्तमान में वह पूर्ण मोक्ष (सत मंत्र) उपलब्ध है जो मीरा बाई को कबीर परमेश्वर ने दिए थे।

आज संत रामपाल जी महाराज जी वही मोक्ष मंत्र मानव समाज को प्रदान कर रहे हैं, जिस से मीरा बहन का कल्याण हुआ और जिस मीरा की गाथा पूरी दुनिया गाती है। हमारा सभी से अनुरोध है कि संत रामपाल जी महाराज से दीक्षा लेकर अपना मनुष्य जन्‍म सफल बनाएं। जिस तरह से मीरा बाई ने अपना कल्याण कराया था।

Story of meera bai


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1 thought on “मीरा बाई की अनसुनी सत्य कहानी – SA NEWS

  1. Ek dam Right story hai. Parmeshwar Kabir sahib Ji hai. aap please ese hi logo ko jagruk kare and meerabai ji jaisi suddha bhakt ke baare mai sahi story btane ke lie thanks.

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