शास्त्रार्थ का शंखनाद किस्त 4: मनु-शतरूपा से तीन चरणों वाली नाम दीक्षा तक, संत रामपाल जी ने खोले आध्यात्मिक रहस्य

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शास्त्रार्थ का शंखनाद किस्त 4: आध्यात्मिक जगत में शास्त्रों के प्रमाणों के आधार पर भक्ति और साधना के मूल स्वरूप को समझाने के उद्देश्य से संत रामपाल जी महाराज ने ‘शास्त्रार्थ का शंखनाद’ कार्यक्रम में एक बार फिर गूढ़ आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा की । 11 अक्टूबर 2026 को प्रसारित विशेष कार्यक्रम में संत रामपाल जी महाराज ने ‘माननीय जनता जनार्दन की अदालत’ के माध्यम से श्री रामचरितमानस और सूक्ष्म वेदों का हवाला देते हुए आदि सनातन धर्म की उत्पत्ति, तरह तरह के धर्मों के विस्तार, स्वयंभू मनु और शतरूपा के प्रसंग तथा तीन चरणों वाली नाम दीक्षा की व्यवस्था पर विस्तार से प्रकाश डाला। इस दौरान उन्होंने अपने विचारों को शास्त्रों के प्रमाण के साथ प्रस्तुत किए। 

आदि सनातन धर्म को बताया सभी धर्मों का मूल आधार

‘शास्त्रार्थ का शंखनाद किश्त 4’ में संत रामपाल जी महाराज ने बताया कि मानव समाज में समय के साथ साथ अनेक मत-पंथ और धार्मिक शाखाएं विकसित हुईं। उनके द्वारा बताए गई आध्यात्मिक व्याख्या के अनुसार, सतयुग के प्रारंभ में परम अक्षर ब्रह्म कबीर साहिब जी ने पृथ्वी पर प्रकट होकर आदि सनातन धर्म की स्थापना की थी। उन्होंने इस मूल मार्ग को मानव कल्याण और परमात्मा प्राप्ति का शाश्वत मार्ग बताया।

महाराज जी ने बताया कि, कबीर साहेब सतयुग में ‘सत सुकृत’ नाम से प्रकट हुए थे। इसी आदि सनातन पंथ से आगे चलकर तरह तरह की धार्मिक परंपराओं और मतों का विकास हुआ। कार्यक्रम में बताए विचारों के अनुसार, सनातन धर्म से हिंदू धर्म तथा हिंदू धर्म की विभिन्न शाखाओं से यहूदी, ईसाई, मुस्लिम और सिख धर्मों का प्रादुर्भाव हुआ। 

आदि सनातन धर्म में तीन चरणों में नाम दीक्षा देने की है परंपरा 

संत रामपाल जी महाराज ने अपने प्रवचन में बताया कि आदि सनातन धर्म में साधकों को तीन चरणों में नाम दीक्षा दान करने की व्यवस्था है। प्रथम चरण में साधक को पहला मंत्र और साधना की विधि प्रदान की जाती हैं। इससे साधक को आध्यात्मिकता के साथ साथ जीवन में आर्थिक लाभ, शारीरिक लाभ, भौतिक लाभ प्राप्त होते है, इस विषय को समझाने के लिए उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्री रामचरितमानस के बालकांड के दोहा नंबर 143 का प्रमाण दिया। 

दूसरे चरण में साधक के आचरण, लगन भक्ति भाव और साधना के प्रति गंभीरता को देखते हुए उसे विशेष शब्द यानी सतनाम दिया जाता हैं। वहीं तृतीय चरण में साधक के हृदय में शब्द के प्रति पूर्ण परिपक्वता और दृढ़ निश्चय होने पर उसे गहन आध्यात्मिक ज्ञान से परिचित कराया जाता है। महाराज जी ने इस व्यवस्था को गीता अध्याय 17 श्लोक 23 तथा गीता अध्याय 8 मंत्र 13  में प्रमाणित करके समझाया।

सतयुग में हुए मनु और शतरूपा के प्रसंग को समझाया

कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण विषय मनु और उनकी पत्नी शतरूपा का प्रसंग रहा। संत रामपाल जी महाराज ने बताया कि सतयुग में मनु और शतरूपा परमेश्वर कबीर जी के पास पहुंचे थे, जहां उन्होंने प्रथम चरण के मंत्र प्राप्त किए थे। उनके अनुसार, उस समय उन्हें पांच मंत्रों की साधना से अनेक सिद्धियां, धन-धान्य और दीर्घायु प्राप्त हुई। महाराज जी ने बताया कि बाद में काल ब्रह्म की प्रेरणा से मनु तथा शतरूपा उस साधना मार्ग से विचलित हो गए और हठयोग करने लग गए। 

कबीर सागर के अमर मूल अध्याय का दिया प्रमाण

संत रामपाल जी महाराज ने अपने द्वारा बताए जा रहे तीन चरणों की दीक्षा व्यवस्था के समर्थन में कबीर सागर के ‘अमर मूल’ अध्याय का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि कबीर सागर के पृष्ठ संख्या 265 पर दीक्षा के तीनों चरणों का विधान वर्णित है। संत रामपाल जी महाराज ने इस प्रमाण के माध्यम से बताया कि उनके द्वारा वर्तमान समय में दी जा रही नाम दीक्षा की व्यवस्था ही प्राचीन शास्त्र अनुकूल साधना का विधान हैं। उन्होंने अपने लगभग तीन दशकों से चल रहे आध्यात्मिक मार्ग को भी इसी ज्ञान पर आधारित बताया।

चारों युगों में परमात्मा के प्रकट होने का बताया रहस्य

कार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी सामने आया कि यदि कबीर साहिब जी का प्राकट्य लगभग 600 वर्ष पूर्व माना जाता है, तो उन्होंने सतयुग में स्वयंभू मनु और शतरूपा को उपदेश कैसे दिया? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए संत रामपाल जी महाराज ने सूक्ष्म वेदों का प्रमाण प्रस्तुत किया। उन्होंने समझाया कि पूर्ण परमात्मा कबीर साहिब जी चारों युगों में अलग-अलग नामों और स्वरूपों में प्रकट होकर अपनी प्रिय आत्माओं को सत्य ज्ञान प्रदान करते हैं। उनके अनुसार, परमात्मा का प्राकट्य केवल एक युग या समय सीमा तक सीमित नहीं है। इस विषय को उन्होंने शास्त्रों में वर्णित ज्ञान के आधार पर समझने की बात कही।

आगामी प्रसारण को लेकर श्रद्धालुओं में उत्सुकता

कार्यक्रम के अंत में आगामी शास्त्रार्थ की जानकारी भी साझा की गई। इसके अनुसार, ‘शास्त्रार्थ का शंखनाद’ की अगली कड़ी का प्रसारण 17 और 18 अक्टूबर 2026 को शाम 7:30 बजे से 9:30 बजे तक साधना टीवी चैनल तथा संत रामपाल जी महाराज के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर किया गया था। इस विशेष कार्यक्रम में प्रस्तुत विषयों के माध्यम से संत रामपाल जी महाराज ने श्री रामचरितमानस, कबीर सागर और सूक्ष्म वेदों के प्रमाणों को जोड़ते हुए धर्म, साधना और परमात्मा के स्वरूप पर अपनी व्याख्या प्रस्तुत की। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य शास्त्रों में वर्णित प्रमाणों के आधार पर आध्यात्मिक विषयों को जनता के सामने रखना और उन्हें विचार करने के लिए प्रेरित करना रहा है। अधिक जानकारी हेतु आप Sant Rampal Ji Maharaj App  डाउनलोड करें।

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