​रामपुरा गांव: जब मौत के समंदर को चीरकर लौटी खेतों की हरियाली और चेहरों की मुस्कान

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हरियाणा के हिसार जिले का रामपुरा गांव आज एक ऐसी कहानी का गवाह बन गया है, जो पीढ़ियों तक सुनाई जाएगी। यह कहानी कुदरत के कहर, प्रशासनिक विफलता और अंततः एक महान संत के असीम परोपकार की है। एक समय था जब यह गांव पूरी तरह से तबाही के मुहाने पर खड़ा था, लेकिन संत रामपाल जी महाराज की असीम कृपा ने इस डूबते हुए गांव को एक नया और जादुई जीवनदान दे दिया है।

​तबाही और खौफ का वह खौफनाक मंजर

आज से कुछ हफ्ते पहले रामपुरा गांव का दृश्य किसी खौफनाक फिल्म से कम नहीं था। गांव की लगभग 1400 से 1500 एकड़ अत्यधिक उपजाऊ ज़मीन 3 से 4 फुट गहरे, सड़े हुए काले पानी के नीचे दफन हो गई थी। खरीफ की फसल पूरी तरह नष्ट हो चुकी थी, लेकिन तबाही सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रही।

​यह ज़हरीला पानी गांव की सीमाओं को लांघकर रास्तों और घरों तक पहुंच गया था। हालात इतने डरावने हो गए थे कि बाढ़ के पानी के साथ 5-5 फुट लंबे जहरीले सांप घरों में घुसने लगे थे। बच्चों का स्कूल जाना बंद हो गया था और लोग हर पल खौफ के साये में जी रहे थे। आर्थिक तबाही का मंज़र तो और भी रुला देने वाला था। जिन किसानों की जमीनें थीं, वे 10 साल पीछे चले गए थे, लेकिन जो दिहाड़ी मजदूर खेतों में काम करके अपना घर चलाते थे, उनके घरों के चूल्हे ठंडे पड़ गए थे। एक मज़दूर ने रोते हुए बताया, “पानी भरा होने के कारण कोई काम नहीं था। ऐसा लग रहा था कि हम अपने बच्चों को भूख से तड़पते हुए देखने के लिए ही ज़िंदा बचे हैं।”

​मदद की गुहार और मसीहा का आगमन

जब पानी हफ्तों तक नहीं उतरा और प्रशासन द्वारा दी गई छोटी-मोटी मोटरें पूरी तरह विफल हो गईं, तब गांव भुखमरी की कगार पर आ गया। रबी (गेहूं) की बिजाई का समय तेज़ी से निकल रहा था। इसी बीच गांव के मौजिज लोगों ने संत रामपाल जी महाराज के राहत कार्यों के बारे में सुना। एक आखिरी उम्मीद के साथ, उन्होंने अपनी व्यथा लिख कर एक एप्लीकेशन सीधे मुनिंद्र धर्मार्थ ट्रस्ट ऑफिस में जमा की।

​सरकारी दफ्तरों की तरह यहां कोई लालफीताशाही नहीं हुई। प्रार्थना पत्र मिलते ही संत रामपाल जी महाराज द्वारा तुरंत एक्शन लिया गया। संत रामपाल जी महाराज ने 1500 एकड़ के इस विशाल समंदर को सुखाने के लिए 14,000 फुट लंबी बेहतरीन क्वालिटी की 8-इंची पाइपलाइन और 10-10 HP की अति शक्तिशाली मोटरें भेजीं। मदद इतनी बारीकी से की गई थी कि मोटरों के स्टार्टर, तार, और यहां तक कि पाइपों को जोड़ने वाला फेविकोल भी साथ भेजा गया, ताकि लाचार ग्रामीणों का एक रुपया भी खर्च न हो।

​धरातल पर उतरा ‘परमेश्वर का संविधान’

संत रामपाल जी महाराज द्वारा दी गई यह मदद केवल एक भौतिक राहत कार्य नहीं है, बल्कि यह “परमेश्वर के संविधान” का सबसे पवित्र प्रमाण है। दुनिया के संविधान और सरकारें अक्सर बजट, वोट बैंक या रसूख देखकर मदद करती हैं। लेकिन परमेश्वर का संविधान यही सिखाता है कि परमात्मा की नज़र में हर इंसान उसका बच्चा है, और संकट के समय हर बेबस की निस्वार्थ भाव से रक्षा करना ही सच्चा ईश्वरीय कर्तव्य है। संत जी ने इसी परमेश्वर के संविधान को रामपुरा की धरती पर लागू करके यह दिखा दिया कि जब परमात्मा की शक्ति कार्य करती है, तो वह पूरे समाज को बिना किसी भेदभाव के समान प्रेम और सुरक्षा प्रदान करती है।

​’काले पानी’ से 100% बिजाई तक का सफर

संत रामपाल जी महाराज द्वारा दी गई उन विशाल मोटरों ने दिन-रात लगातार काम किया और उस गहरे पानी को महज 15 दिनों के भीतर गांव की सीमाओं से बाहर खदेड़ दिया। आज का रामपुरा उस तबाही के दौर से बिल्कुल अलग है।

​जिन खेतों में कुछ दिन पहले तक सांप और मछलियां तैर रही थीं, वहां आज 100% गेहूं की बिजाई पूरी हो चुकी है। ट्रैक्टरों की गड़गड़ाहट ने गांव का सन्नाटा तोड़ दिया है। किसानों के चेहरों पर सुकून है और मज़दूरों को वापस उनका रोज़गार मिल गया है। गांव के पूर्व फौजी और बुजुर्ग खुलेआम कहते हैं कि उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी में कई सरकारें देखी हैं, लेकिन बिना स्वार्थ के ऐसी सेवा केवल एक सच्चा संत ही कर सकता है।

​एक अमर मसीहा

रामपुरा गांव आज सिर्फ एक बाढ़ प्रभावित क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि निस्वार्थ सेवा कैसे मौत के मुंह से ज़िंदगी खींच लाती है। संत रामपाल जी महाराज ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह केवल एक आध्यात्मिक गुरु नहीं हैं, बल्कि संकट की घड़ी में लाखों परिवारों के असल भाग्य विधाता हैं। उनकी इस महान दया ने न केवल रामपुरा के खेतों को सींचा है, बल्कि मानवता के इतिहास में परोपकार का एक ऐसा सुनहरा अध्याय लिख दिया है जिसे आने वाली पीढ़ियां कभी नहीं भूलेंगी।

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