पुलवामा चरमपंथी अटैक

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।। देश के 42 सीआरपीएफ जवानों को देश की जनता का अश्रुपूर्ण नमन ।।

।। या तो माता संत जने या दाता या शूर
नहीं तो रहले बांझडी क्यों व्यर्थ गवांवे नूर ।।

ये देश हे वीर जवानों का, अलबेलों का, मस्तानों का।
इस देश का यारों, इस देश का यारोंं, क्या कहना। ये देश है दुनिया का गहना।
भारत देश भूमि वीरों की भूमि है। देश में वीर जवान, देशभक्त न होते तो भारत 200 वर्ष पुरानी गुलामी की ज़जीरों से कैसे मुक्त हो पाता।

14 फरवरी को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा ज़िले में सीआरपीएफ (Central Reserve Police Force) के काफ़िले पर हुए आतंकवादी हमले में 42 जवान शहीद हुए। यह हमला धोखे से उस समय किया गया जब जवानों की बसों का काफिला शहर में निकल रहा था। पुलवामा ज़िले के लेथपोरा में चरमपंथियों ने आईईडी धमाके के ज़रिये जवानों की बस को निशाना बनाया। इस बस में 40 से अधिक जवान सवार थे। ये सभी जवान सीआरपीएफ के 54 बटालियन के थे। धमाका इतना ज़बरदस्त था कि देखते ही देखते सीआरपीएफ जवानों की पूरी बस ही उड़ गई।

जम्मू कश्मीर के इतिहास में यह अब तक का सबसे खतरनाक चरमपंथी (extremist) हमला है। सीआरपीएफ के काफिले पर जैश-ए मोहम्मद ने आतंकी हमला किया। आतंकी हमले के बाद पूरे इलाके में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया। जवानों की मौत के बाद देशभर के लोग सोशल मीडिया पर अपने दुख और गुस्से का इज़हार कर रहे हैं, तो कहीं जवानों की मौत पर शौक ज़ाहिर करते हुए कैंडल मार्च निकाले जा रहे हैं।
पीएम मोदी ने इस हमले पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए बदले का आश्वासन दिया है। मोदी सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए तुरंत हमले की जांच NIA को सौंपी है।

इस हमले को कहीं ना कहीं सुरक्षा एजेंसियों की चूक भी माना जा रहा है।

हमले को अंजाम दिया है भारत के लिए सिरदर्द और खतरनाक बन चुके चरमपंथी मसूद अज़हर ने। मसूद अज़हर जैश-ए-मोहम्मद का मुखिया है। इस संगठन ने कश्मीरी न्यूज़ एजेंसी जीएनएस को एक टेक्स्ट मैसेज कर इस हमले के बारे में एक हफ्ते पहले ही चेतावनी दे दी थी।
मसूद अज़हर ने इससे पहले भी भारत में कई बड़े हमले करवाए। 2016 में हुए पठानकोट एयरबेस आतंकी हमले और सितंबर 2016 में हुए उरी हमले का भी मास्टरमाइंड भी मसूद ही था। पठानकोट आतंकी हमले से पहले मसूद अज़हर का नाम भारत में पहली बार वर्ष 1994 में सुना गया था। यही नहीं मसूद अज़हर वही आतंकी है जिसे साल 1999 में एयर इंडिया की फ्लाइट आईसी 814 की हाइजैकिंग के समय भारत को मजबूरन छोड़ना पडा़ था।
जैश ने हमले की ज़िम्मेदारी लेते हुए आत्मघाती आतंकी आदिल अहमद डार उर्फ वकास कमांडो की एक तस्वीर और वीडियो भी जारी की। वह विस्फोट स्थल से करीब 10 किलोमीटर दूर गंडीबाग काकपोरा (पुलवामा) में ही रहता था।

आखिर क्या है कश्मीर का मुद्दा संक्षिप्त में जानने की कोशिश करते हैं।

भारत विभाजन के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की ढुलमुल नीति और अदूरदर्शिता के कारण कश्मीर का मामला अनसुलझा रह गया। यदि पूरा कश्मीर पाकिस्तान में होता या पूरा कश्मीर भारत में होता तो शायद परिस्थितियां कुछ और होतीं। लेकिन ऐसा हो नहीं सकता था, क्योंकि कश्मीर पर राजा हरिसिंह का राज था और उन्होंने बहुत देर के बाद निर्णय लिया कि कश्मीर का भारत में विलय किया जाए। देर से किए गए इस निर्णय के चलते पाकिस्तान ने गिलगित और बाल्टिस्तान में कबायली भेजकर लगभग आधे कश्मीर पर कब्जा कर लिया।
कश्मीर की सीमा पाकिस्तान से लगने के कारण समस्या जटिल थी अतः जिन्ना ने कश्मीर पर कब्जा करने की एक योजना पर तुरंत काम करना शुरू कर दिया। हालांकि भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हो चुका था जिसमें क्षेत्रों का निर्धारण भी हो चुका था फिर भी जिन्ना ने परिस्थिति का लाभ उठाते हुए 22 अक्टूबर 1947 को कबाइली लुटेरों के भेष में पाकिस्तानी सेना को कश्मीर में भेज दिया। वर्तमान के पा‍क अधिकृत कश्मीर में खून की नदियां बहा दी गईं। इस खूनी खेल को देखकर कश्मीर के शासक राजा हरिसिंह भयभीत होकर जम्मू लौट आए। वहां उन्होंने भारत से सैनिक सहायता की मांग की, लेकिन सहायता पहुंचने में बहुत देर हो चुकी थी। नेहरू की जिन्ना से दोस्ती थी। वे यह नहीं सोच सकते थे कि जिन्ना ऐसा कुछ कर बैठेंगे। इसके बाद से कश्मीर में कभी अमन-चैन नहीं रहा और भारतीय नेता आज तक इस मसले को सुलझाने में असक्षम हैं।
(Source: Wikipedia)

दिसंबर २०१३ में इंटरनैशनल फिजिशंस फॉर द प्रिवेंशन ऑफ न्यूक्लियर वॉर (आईपीपीएनडब्ल्यू) द्वारा जारी एक रिपोर्ट -‘परमाणु अकाल : दो अरब लोगों को खतरा – में यह कहा गया कि यदि भारत पाकिस्तान में एक और युद्ध हुआ और उसमें परमाणु हथियारों का प्रयोग किया गया तो शायद पृथ्वी पर मानव सभ्यता का ही अंत हो जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक, परमाणु युद्ध वैश्विक पर्यावरण और कृषि उत्पादन पर इतना बुरा प्रभाव डालेगा कि दुनिया की एक-चौथाई जनसंख्या यानी दो अरब से ज्यादा लोगों की मौत हो सकती है। ऐसा भी हो सकता है कि भारत और पाकिस्तान के साथ ही चीन की भी पूरी की पूरी मानवजाति खत्म हो जाए।

आध्यात्मिकता से सुलझेंगे नफरत और आतंक के गोले।

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः भवति भारत, अभि-उत्थानम् अधर्मस्य तदा आत्मानं सृजामि अहम् । परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुस्-कृताम्, धर्म-संस्थापन-अर्थाय सम्भवामि युगे युगे ।”
पृथ्वी पर जब जब धर्म की हानि होती है तब तब महापुरुष ( परमात्मा स्वयं ) अधर्म और अधर्मियों का नाश करने स्वयं धरती पर आते हैं।

फ्रांस के ‘‘नास्त्रेदमस’’ के अनुसार विश्व भर में सैनिक क्रांतियों के बाद थोड़े से ही अच्छे लोग संसार को अच्छा बनाऐंगे। जिनका महान् धर्मनिष्ठ विश्वविख्यात नेता 20 वीं सदी के अन्त और 21 वीं सदी की शुरूआत में किसी पूर्वी देश से जन्म लेकर भ्रातृवृत्ति व सौजन्यता द्वारा सारे विश्व को एकता के सूत्र में बांध देगा। (नास्त्रेदमस शतक 1 श्लोक 50 में प्रमाणित कर रहा है) तीन ओर से सागर से घिरे द्वीप में उस महान संत का जन्म होगा। उस समय तत्व ज्ञान के अभाव से अज्ञान अंधेरा होगा। नैतिकता का पतन होकर, हाहाकार मचा होगा। वह शायरन (धार्मिक नेता) गुरुवर अर्थात् गुरुजी को वर (श्रेष्ठ) मान कर अपनी साधना करेगा तथा करवाएगा। वह धार्मिक नेता (तत्वदर्शी सन्त) अपने धर्म बल अर्थात् भक्ति की शक्ति से तथा तत्वज्ञान द्वारा सर्व राष्ट्रों को नतमस्तक करेगा। एशिया में उसे रोकना अर्थात् उस के प्रचार में बाधा करना पागलपन होगा।

इजरायल के प्रो. हरार के अनुसार भारत देश का एक दिव्य महापुरूष मानवतावादी विचारों से सन् 2000 ई. से पहले-पहले आध्यात्मिक क्रांति की जड़ें मजबूत कर लेगा व सारे विश्व को उनके विचार सुनने को बाध्य होना पड़ेगा। भारत के अधिकतर राज्यों में राष्ट्रपति शासन होगा, पर बाद में नेतृत्व धर्मनिष्ठ वीर लोगों पर होगा। जो एक धार्मिक संगठन के आश्रित होगें।

नार्वे के श्री आनन्दाचार्य की भविष्यवाणी के अनुसार, सन् 1998 के बाद एक शक्तिशाली धार्मिक संस्था भारत में प्रकाश में आएगी, जिसके स्वामी एक गृहस्थ व्यक्ति की आचार संहिता का पालन सम्पूर्ण विश्व करेगा। धीरे-धीरे भारत औद्योगिक, धार्मिक और आर्थिक दृष्टि से विश्व का नेतृत्व करेगा और उसका विज्ञान (आध्यात्मिक तत्वज्ञान) ही पूरे विश्व को मान्य होगा। उपरोक्त भविष्यवाणियों के अनुसार ही आज विश्व में घटनाएँ घट रही हैं। युग परिवर्तन प्रकृति का अटल सिद्धांत है। वैदिक दर्शन के अनुसार चार युगों – सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलयुग की व्यवस्था है। जब पृथ्वी पर पापियों का एक छत्र साम्राज्य हो जाता है तब भगवान पृथ्वी पर मानव रूप में प्रकट होता है।  
 
महाभारत के युद्ध में पांडवों और कौरवों की सेना

कश्मीर मुद्दे को यदि ज़मीन का वह हिस्सा कहा जाए (हस्तिनापुर) जिसे जीतने के लिए एक तरफ पाकिस्तान (कौरवों की सेना) और दूसरी ओर भारत (पांडवों की सेना) है और दोनों ही कश्मीर को अपने सैन्यबल द्वारा जीतना चाहते हैं। सच्चाई तो यह है कुरूक्षेत्र के मैदान में कौरवों के कुल का पूर्णतया नाश हुआ और पांचों पांडव हस्तिनापुर जीत कर भी जीत का जश्न नहीं मना सके। पांचों पांडवों को कृष्ण जी के अंतिम आदेशानुसार हिमालय पर जाकर तप करके शरीर गला देना पड़ा। युद्ध से विजय तो प्राप्त की जा सकती है पर शांति और सुख नहीं। नफरत और बदला लेना जीव का स्वभाव अवश्य है परंतु आत्मा इससे बहुत दुख पाती है।

विश्वविख्यात सतगुरु रामपाल जी महाराज जी तत्वज्ञान से ओत-प्रोत संत हैं।

कश्मीर मुद्दे को सुलझाने के लिए सरकार और सैनिकों के पास कई उपाय हैं जैसे आतंकवाद, आतंकवादियों और पाकिस्तान का परमानेंट सफाया कर देना परंतु एक ऐसा मार्ग भी है जिस ओर किसी का ध्यान अभी तक नहीं गया और वह है आध्यात्मिक ज्ञान। जिससे मानव के अंदर बैठे काल रूपी दैत्य पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
आपको बता दें कि प्रख्यात कश्मीर इतिहासकार कल्हण की पुस्तक राजतरंगिणी में लिखा है कि ,”कश्मीर को आध्यात्मिकता से तो जीता जा सकता है परंतु सैन्य शक्ति से नहीं।”
तारणहार सतगुरु रामपाल जी महाराज जी का जन्म 1951 में 8 सितम्बर को गांव धनाना जिला सोनीपत, प्रांत हरियाणा (भारत) में एक किसान परिवार में हुआ। विश्व में सतगुरु रामपाल जी महाराज जी ही हैं जिनकी आध्यात्मिक अध्यक्षता में भारतवर्ष पूरे विश्व पर राज्य करेगा। पूरे विश्व में एक ही ज्ञान (भक्ति मार्ग) चलेगा। एक ही कानून होगा, कोई दुःखी नहीं रहेगा, विश्व में पूर्ण शांति होगी। जो विरोध करेंगे अंत में वे भी पश्चाताप करेंगे तथा तत्वज्ञान को स्वीकार करने पर विवश होंगे और सर्व मानव समाज, मानव धर्म का पालन करेगा और पूर्ण मोक्ष प्राप्त करके सतलोक जाएंगे।
आध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में मनुष्य अतिकाय दुख पाता है। आध्यात्मिक ज्ञान कैसे करेगा आतंकवाद का नाश यह जानने के लिए प्रतिदिन अवश्य देखिए साधना चैनल 07:30 – 08:30 बजे।

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