।।दुर्गा की भक्ति करवाना काल का महाजाल है।।

यह किसी फिल्म की कहानी नहीं है। सूक्ष्म वेद में लिखा गूढ़ परमात्म सत्य है। किसी व्यक्ति विशेष के जीवन को गहनता से जानने के लिए हम उसकी जीवनी पढ़ते हैं। उसी तरह सभी भगवानों की उत्पत्ति व स्थिति जानने के लिए हमें वेदों, शास्त्रों और गीता जी में लिखे तत्वज्ञान को पढ़ना व तत्वदर्शी संत द्वारा समझना चाहिए।
आइए जानते हैं कौन है दुर्गा? कैसे हुई उसकी उत्पत्ति?

सृष्टि रचना
दुर्गा और उसके पति ज्योति निरंजन उर्फ़ काल ब्रह्म की स्थिति समझने के लिए सर्व प्रथम सृष्टि रचना की संपूर्ण जानकारी होना अति आवश्यक है।
सर्व प्रथम सतलोक में केवल कबीर परमेश्वर थे उन्होंने अपने शब्द से अपने सोलह पुत्रों की उत्पत्ति की और सतपुरुष कविर्देव ने अपने पुत्र अचिन्त को सत्यलोक की अन्य रचना का भार सौंपा तथा शक्ति प्रदान की। अचिन्त ने अक्षर पुरुष (परब्रह्म) की शब्द से उत्पत्ति की तथा कहा कि मेरी मदद करो।
अक्षर पुरुष स्नान करने मानसरोवर पर गया। वहाँ आनन्द आया तथा सो गया। लम्बे समय तक बाहर नहीं आया। तब अचिन्त की प्रार्थना पर अक्षर पुरुष को नींद से जगाने के लिए कविर्देव (कबीर परमेश्वर) ने उसी मानसरोवर से कुछ अमृत जल लेकर एक अण्डा बनाया तथा उस अण्डे में एक आत्मा प्रवेश की तथा अण्डे को मानसरोवर के अमृत जल में छोड़ा। अण्डे की गड़गड़ाहट से अक्षर पुरुष की निंद्रा भंग हुई। उसने अण्डे को क्रोध से देखा। जिस कारण से अण्डे के दो भाग हो गए। उसमें से ज्योति निंरजन (क्षर पुरुष) निकला जो आगे चलकर ‘काल‘ कहलाया। इसका वास्तविक नाम ‘‘कैल‘‘ है।

क्षर पुरूष ने किया था तप

क्षर पुरुष (ज्योति निरंजन) ने तप करना शुरु किया। उसने 70 युग तक तप किया। सतपुरुष जी ने क्षर पुरुष से पूछा कि आप तप किसलिए कर रहे हो? क्षर पुरुष ने कहा कि यह स्थान मेरे लिए कम है। मुझे अलग स्थान चाहिए। परमेश्वर (सतपुरुष) जी ने उसे 70 युग के तप के प्रतिफल में 21 ब्रह्माण्ड दे दिए जो सतलोक के बाहरी क्षेत्रों में थे जैसे 21 प्लॉट मिल गए हों। ज्योति निरंजन (क्षर पुरुष) ने विचार किया कि इन ब्रह्माण्डों में कुछ रचना भी होनी चहिए। उसके लिए, फिर 70 युग तक तप किया। फिर सतपुरुष जी ने पूछा कि अब क्या चाहता है? क्षर पुरुष ने कहा कि सृष्टि रचना की सामग्री देने की कृपा करें। सतपुरुष जी ने उसको पाँच तत्व (जल, पृथ्वी, अग्नि, वायु तथा आकाश) तथा तीन गुण (रजगुण, सतगुण तथा तमगुण) दे दिये तथा कहा कि इनसे अपनी रचना कर। क्षर पुरूष ने तीसरी बार फिर तप प्रारम्भ किया। जब 64 (चौंसठ) युग तप करते हो गए तो सत्य पुरूष जी ने पूछा कि आप और क्या चाहते हैं? क्षर पुरूष (ज्योति निरंजन) ने कहा कि मुझे कुछ आत्मा दे दो। मेरा अकेले का दिल नहीं लग रहा।

‘‘हम काल के लोक में धक्के खाने कैसे आए?’’

तत्पश्चात् पूर्ण ब्रह्म के सामने सर्व प्रथम काल ब्रह्म के साथ जाने की स्वीकृति देने वाले हंस (पुरूष आत्मा) को लड़की का रूप दिया । परन्तु स्त्री इन्द्री नहीं रची तथा सर्व आत्माओं को (जिन्होंने ज्योति निरंजन अथवा ब्रह्म के साथ जाने की सहमति दी थी) उस लड़की के शरीर में प्रवेश कर दिया तथा उसका नाम आष्ट्रा (आदि माया/प्रकृति देवी/दुर्गा) पड़ा तथा सत्यपुरूष ने कहा कि पुत्री मैंने तुझेे शब्द शक्ति प्रदान कर दी है। जितने जीव ब्रह्म कहे आप उत्पन्न कर देना। पूर्ण ब्रह्म कर्विदेव (कबीर साहेब) ने अपने पुत्र सहज दास के द्वारा प्रकृति को क्षर पुरूष के पास भिजवा दिया। सहज दास जी ने ज्योति निरंजन को बताया कि पिता जी ने इस बहन के शरीर में उन सब आत्माओं को प्रवेश कर दिया है, जिन्होंने आपके साथ जाने की सहमति व्यक्त की थी। इसको वचन शक्ति प्रदान की है। आप जितने जीव चाहोगे प्रकृति अपने शब्द से उत्पन्न कर देगी। यह कहकर सहज दास वापिस अपने द्वीप में आ गया।

दुर्गा का पति काल ब्रह्म है

श्री देवी महापुराण के तीसरे स्कंद में अध्याय 5 के श्लोक 12 में स्पष्ट है कि दुर्गा अपने पति काल ब्रह्म के साथ रमण करती है।

काल और दुर्गा के संयोग से होती है जीवों की उत्पत्ति

गीता अध्याय 7 श्लोक 4 से 6 में स्पष्ट किया है कि मेरी आठ प्रकार की माया जो आठ भाग में विभाजित है। पाँच तत्व तथा तीन (मन, बुद्धि, अहंकार) ये आठ भाग हैं। यह तो जड़ प्रकृति है। सर्व प्राणियों को उत्पन्न करने में सहयोगी है। जैसे मन के कारण प्राणी नाना इच्छाएं करता है। इच्छा ही जन्म का कारण है। पाँच तत्वों से स्थूल शरीर बनता है तथा मन, बुद्धि, अहंकार के सहयोग से सूक्ष्म शरीर बना है तथा इससे दूसरी चेतन प्रकृति (दुर्गा)है। यही दुर्गा (प्रकृति) ही अन्य तीन रूप महालक्ष्मी –  महासावित्री – महागौरी आदि बनाकर काल (ब्रह्म) के साथ पति-पत्नी व्यवहार से तीनों पुत्रों रजगुण युक्त श्री ब्रह्मा जी, सतगुण युक्त श्री विष्णु जी, तमगुण युक्त श्री शिव जी को उत्पन्न करती है। फिर भूल – भूलईयाँ करके तीन अन्य स्त्री रूप सावित्री, लक्ष्मी तथा गौरी बनाकर तीनों देवताओं (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी, श्री शिव जी) से विवाह करके काल के लिए जीव उत्पन्न करती है। जो चेतन प्रकृति (शेराँवाली) है। इसके सहयोग से काल सर्व प्राणियों की उत्पत्ति करता है।

दुर्गा और काल जीव को कभी मुक्त नहीं होने देते

गीता अध्याय 14 श्लोक 3 में कहा है कि (मम ब्रह्म) मुझ ब्रह्म की (महत्) प्रकृति यानि दुर्गा की योनि है। मैं (तस्मिन) उस (योनिः) योनि में गर्भ स्थापित करता हूँ। उससे सर्व प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
अध्याय 14 श्लोक 4 :- हे अर्जुन! सर्व योनियों में जितने भी शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते हैं (तासाम) उन सबकी गर्भ धारण करने वाली माता (महत्) प्रकृति यानि दुर्गा है (अहम् ब्रह्म) मैं ब्रह्म उनमें (बीज प्रदः) बीज डालने वाला (पिता) पिता हूँ। अध्याय 14 श्लोक 5 :- हे अर्जुन! रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव ये तीनों गुण यानि देवता (प्रकृति सम्भवाः) प्रकृति यानि दुर्गा अष्टंगी से उत्पन्न हुए हैं जो जीवात्माओं को कर्मों के फल अनुसार भिन्न-भिन्न प्राणियों के शरीर में उत्पन्न करके बाँधते हैं। इन श्लोकों से स्पष्ट है कि देवी दुर्गा व काल ब्रह्म भोग-विलास करके ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवजी को उत्पन्न करते हैं।

ब्रह्मा जी ने दुर्गा जी से शंका का निवारण करने को कहा

तीसरा स्कंद पृष्ठ 14, अध्याय 5 श्लोक 43 :- एकमेवा द्वितीयं यत् ब्रह्म वेदा वदंति वै। सा किं त्वम् वा प्यसौ वा किं संदेहं विनिवर्तय।
जो कि वेदों में अद्वितीय केवल एक पूर्ण ब्रह्म कहा है क्या वह आप ही हैं या कोई और है? ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर देवी ने कहा –  यह है सो मैं हूं, जो मैं हूं सो यह है। हम दोनों का जो सूक्ष्म अन्तर है इसको जो जानता है वही मतिमान अर्थात् तत्वदर्शी है, वह संसार से पृथक् होकर मुक्त होता है, इसमें संदेह नहीं।

नोट: काल ने जब प्रथम बार अष्टंगी दुर्गा को देखा तो उसके रूप पर आसक्त हो उसके साथ दुष्कर्म करना चाहा ।डर कर दुर्गा ने सूक्ष्म रूप बनाया और काल के पेट में चली गई वहां से कबीर परमेश्वर को याद किया। कबीर परमेश्वर ने वहां प्रकट होकर उसे काल के पेट से निकाला और काल को श्राप दिया कि तू एक लाख जीव रोज़ खाएगा और सवा लाख उत्पन्न करेगा। यह कह दोनों को सतलोक से निष्कासित कर दिया।

यह तत्वज्ञान है जिसे जानने के बाद कोई परमात्मा प्रेमी आत्मा गलत साधना नहीं कर सकता। केवल कबीर जी ही पूर्ण परमात्मा हैं सभी आत्माओं के सृजनहार व पूर्ण मोक्षदायक हैं। काल और दुर्गा की साधना करना सही नहीं है। इनकी साधना करने वाले अपना अनमोल जीवन व्यर्थ गंवा कर जन्म मृत्यु में ही चक्कर काटते रहते हैं। दुर्गा व अन्य भगवानों की भक्ति करवा कर भोली आत्माओं को फंसाए रखना काल का महाजाल है। समाज में प्रचलित दुर्गा की भक्ति का परमात्मा के विधान में कहीं कोई स्थान नहीं है।
तत्वज्ञान की संपूर्ण जानकारी के लिए पढ़ें पुस्तक “ज्ञान गंगा”। दुर्गा और काल से पीछा छुड़ाने के लिए कबीर साहेब जी के अवतार संत रामपाल जी महाराज द्वारा बताई सदभक्ति आरंभ करें और परमात्मा को पहचानें।