कुंभ स्नान हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है जिसमें करोड़ों श्रद्धालु कुंभ स्थल हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में स्नान करते हैं। इनमें से प्रत्येक स्थान पर प्रति बारहवें वर्ष और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ भी होता है। परंतु क्या कुंभ में जाकर स्नान करना हमारे शास्त्रों में वर्णित है?

पवित्र श्रीमद भागवत गीता अध्याय 16 के श्लोक 23 में स्पष्ट किया है कि जो शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करते हैं, उनको ना तो सुख होता है, ना उनकी गति होती है और ना ही कोई अन्य लाभ ही मिलता है।

कुछ लोग कहते हैं कि कुम्भ में जाकर स्नान करना चाहिए जिससे हमारे पाप धुल जाते हैं और वही लोग स्नान करके वही जल अपने किसी भी पात्र में भर लाते हैं।

विचारणीय विषय है कि आप कहते हैं कि कुंभ में स्नान करने से हमारे पाप धुल जाते हैं और जब आप नहा लिए तो फिर वही पापों वाले पानी को फिर आप भरकर ले आये। क्या मतलब रह गया आपका कुम्भ में स्नान करने का? वही पानी घर पर है, वही वहाँ भी, फिर अंतर क्या बचा है दोनों में?

आप घर से चले स्नान करने के लिए और आपके एक कदम रखने से ही लाखों जीवों की हत्या हो गयी। कुम्भ में जाने में जितना हम पैदल चले, उतने में ही हम अरबों जीव मार देते हैं।

भारत का संविधान है कि यदि आपने किसी की हत्या कर दी तो आपको सजा-ए-मौत होगी। ये तो भारत का और इस पृथ्वीमंडल का विधान है। लेकिन परमात्मा की नजरों में चींटी से लेकर हाथी तक सभी एक हैं। तो बताओ अब आपको भगवान कितनी सजा देंगे?
इस विषय में कबीर साहेब कहते हैं:-
तुमने उस दरगाह का महल नहीं देखा, धर्मराय के तिल तिल का लेखा।

आप जितने कदम चले हो और उन कदमों के नीचे जितने जीव मरे हैं (चाहे वो अनजाने में ही मरे हों), उन सभी का पाप भी आपको भोगना ही पड़ेगा।

एक समय की बात है। एक कुंभ का मेला लगा हुआ था। वहां पर सभी साधु संत स्नान करने के लिए आये हुए थे। उसमें तमगुण भगवान शंकर जी के उपासक (नागा साधु) नहाने के लिए पहले चले गए। फिर पीछे से सतगुण विष्णु जी के उपासक आ गए स्नान करने के लिए। विष्णु जी के उपासकों ने नागा साधुओं से कहा कि तुम सभी बाहर आओ, हम पहले स्नान करेंगे क्योंकि हम सर्वश्रेष्ठ हैं। तमगुण शंकर जी के उपासक कहने लगे कि हम त्यागी और वैरागी हैं। इसलिए हम सर्वश्रेष्ठ हैं। विष्णु जी के उपासक कहने लगे, तुम काहे के सर्वश्रेष्ठ हो! तुम शौच के हाथ भी नहीं धोते, बाहर आ जाओ, पहले हम नहाएंगे।

इस प्रकार वाद विवाद करके वे आपस में झगड़ने लगे। 25 हजार त्रिगुण उपासक उस कुंभ के मेले में कट के मर गए। क्या ये साधुओं के लक्षण हैं?

सच्चिदानंद घन ब्रह्म की वाणी में आता है:-

तीर तुपक तलवार कटारी, जमधड़ जोर बधावैं हैं।
हर पैड़ी हर हेत नहीं जाना, वहाँ जा तेग चलावैं हैं।।
काटैं शीश नहीं दिल करुणा, जग में साध कहावैं हैं।
जो जन इनके दर्शन कूं जावैं, उनको भी नरक पठावैं हैं।।

फिर क्या मतलब है इस प्रकार की गलत साधना कर के कुंभ में जाने का? यदि तीर्थ, व्रत करने या कुंभ में जाने से मुक्ति होती है तो फिर अकाल पड़ने वाले तो कब के मुक्त हो जाते और पानी में रहने वाले जीव तो कब के मुक्त हो जाते। इस तरह की जो भी भक्ति हम कर रहे हैं, यह शास्त्रविरुद्ध साधना है जिनका हमें कोई लाभ तो नहीं होगा अपितु हानि ही होगी।

कुंभ स्नान का आदेश किसी भी वेद या गीता में नहीं है। ये तो सिर्फ इन ढोंगी बाबाओं ने पैसे कमाने के चक्कर में लोकवेद, दन्तकथा और सुने सुनाये अज्ञान के आधार से शुरू कर दिया जबकि कुंभ में जाने से कोई लाभ नहीं है।

वास्तव में सत्य ज्ञान व सतभक्ति तो केवल सतगुरु रामपाल जी महाराज जी ही बता रहे हैं। उनका सम्पूर्ण ज्ञान शास्त्रों के अनुसार ही है। वास्तविक भक्ति केवल उन्हीं के पास है। हम सभी का मोक्ष केवल शास्त्रानुकूल सत्य साधना से होगा, कुंभ में जाकर स्नान करने से नहीं क्योंकि, ये शास्त्रविरुद्ध साधना है।

अतः मानव समाज से प्रार्थना है कि मनुष्य जीवन बहुत अनमोल है। इसे गलत भक्ति करके व्यर्थ ना गंवाएं और सतगुरु रामपाल जी महाराज जी की शरण में आकर सतभक्ति करें जिससे हम सभी का मोक्ष होगा और सर्व सुख प्राप्त होंगे।