मानव जीवन अमृत कुंभ है, इसे गलत साधना करके विष न बनाएं

सतयुग, त्रेतायुग और द्वापरयुग में कुंभ मेले का आयोजन और डुबकी लगा कर स्नान करने का चलन नहीं था। राक्षसों और देवताओं के अमृत कुंभ/कलश को लेकर हुई खींचातानी में भगवान विष्णु जी ने मोहिनी रूप बनाकर दैत्यों को भ्रमित किया और देवताओं को अमृत कलश दिलाया। दोनों ओर से हुई कलश के लिए खींचातानी में कुछ बूंदें धरती के कुछ क्षेत्रों में गिरी तो कलयुग आने पर कथाओं को लोककथाओं और दंतकथाओं के रूप में प्रस्तुत करके अनेक रूप और प्रारूप बना दिए गए।

कुंभ मेले का आयोजन भारत में हरिद्वार, इलाहाबाद (वर्तमान में प्रयागराज), उज्जैन और नासिक में किया जाता है। हर तीन साल बाद कुंभ मेले का स्थान बदल दिया जाता है।

यह केवल ज्योतिषीय मान्यता है कि त्रिवेणी संगम के पवित्र जल में डुबकी लगाकर मनुष्य अपने समस्त पापों को धो सकता है। ज्योतिषों और पंडितों ने समाज में ऐसा भ्रम फैला रखा है कि गंगा में डुबकी लगाने से मनुष्य और उसके पूर्वज दोषमुक्त हो जाते हैं। यदि ऐसा है तो फिर पंडित पूर्वजों के नाम पर प्रतिवर्ष श्राद्ध क्यों निकलवाते हैं? आप स्वयं विचार कीजिए कि बिना साबुन के तो मैला वस्त्र भी साफ नहीं होता तो बिना सतभक्ति के केवल जल में स्नान करने या डुबकी लगाने मात्र से आत्मा पर चढ़े युगों युगों के पाप कैसे साफ होंगे? यह केवल भ्रामक कल्पना है कि गंगा स्नान से व्यक्ति अपने और अपने पूर्वजों के पाप धो सकता है। इस प्रदूषण के युग में गंगा के जल की पवित्रता तक को बनाए रखने के लिए कैमिकल का प्रयोग किया जाता है और अंधविश्वास भरे कुंभस्नान से पापों को धोने की बात बिना साबुन और सर्फ के कपड़े धोने जैसी लगती है।

इस वर्ष कुंभ मेले का आयोजन प्रयागराज में हो रहा है जो कि 15 जनवरी (मकर संक्रांति) से शुरू हुआ है और 4 मार्च (महाशिवरात्र‍ि) तक चलेगा। इसमें प्रमुख रूप से गिरि, पुरी, नागा, नाथ, कनपाड़े साधु , फक्कड़ आदि ज्योतिषों के अनुसार तय की गई तिथियों पर शाही स्नान करने के लिए पहुंचते हैं। कुंभ मेले की लोकप्रियता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि लाखों की संख्या में विदेशी लोग भी इसकी भव्यता देखने और स्नान करने पहुंचते हैं।

यहां पहुंचे साधु या तो पूरे नग्न होते हैं या अर्ध नग्न। कलयुगी साधु अपनी बुलेट (बाइक) पर यात्रा करते हुए पहुंचते हैं। भगवान से और ज्ञान से इनका कोई परिचय नहीं होता। यहां कुंभ के मेले में लगभग सभी साधु आपको चिलम, बीड़ी आदि नशे करते हुए दिख जाएंगे। कुछ सिर के बल पैर ऊपर करके करतब दिखाकर पैसा बटोरते हैं तो कुछ सीधे तौर पर हाथ फैला कर। इनकी वेषभूषा भले ही इन्हें अन्य साधकों से अलग व आकर्षक दिखाती है, पर सच मानिए कि वेदों, गीता और स्वयं तमोगुण भगवान शिवजी के जीवन परिचय से ये पूर्ण रूप से अनभिज्ञ हैं। भगवान शिव जी की उत्पत्ति, उनके माता-पिता, दादा और पूर्ण परमात्मा कौन है, आदि के विषय में ये कुछ भी नहीं जानते जबकि हमारे शास्त्रों में ही प्रमाण है कि तीनों देवता (ब्रह्मा जी, विष्णु जी एवं शिवजी) अजर अमर नहीं हैं और ना ही ये परमात्मा हैं।

भगवान शिव जी भस्म रमाते थे, चिलम लगाते थे, इसी को ये अपनी भक्ति का अंग मानते हैं।
यह मानव का दुर्भाग्य है कि वह परमपुरुष से अनभिज्ञ है और देखा-देखी और किंवदंतियों पर आधारित व्यक्तव्यों को भक्ति करने का मार्ग समझ रहा है जिनसे कोई लाभ नहीं मिलने वाला। अनमोल मानुष जन्म व्यर्थ चला जाएगा और हाथ कुछ नहीं आएगा।

कुछ लोग कहते हैं कि स्वर्ग, नरक और उससे ऊपर सतलोक किसने देखा है। फिर गंगा जी में नहाने से पाप धुल जाते हैं, इस बात पर यकीन क्यों किया जाता है? यदि किसी व्यक्ति ने किसी दूसरे व्यक्ति का खून कर दिया हो, बलात्कार के आरोप में या अन्य किसी जुर्म में जेल में सज़ा काट रहा हो तो क्या उसे जेल प्रशासन गंगा स्नान करा दे क्योंकि, यह किंवदंती है कि गंगा में स्नान करने से पाप धुल जाते हैं?

यदि एक कलिहारी सास कुंभ की परबी पड़ने पर गंगा में डुबकी लगा ले तो उसके कितने प्रतिशत पाप धुल जाएंगे? गंगा स्नान के बाद भी वह यदि कलिहारी ही रहती है तो उसे आगे के पापों की चिंता का डर क्यों नहीं बनता? पाप गंगा स्नान से नहीं बल्कि पूर्ण परमात्मा की भक्ति करने से नाश होते हैं जिसका प्रमाण यजुर्वेद अध्याय 8 के मंत्र 13 में है जिसकी शरण में जाने के लिए श्रीमद भागवत गीता के अध्याय 18 के श्लोक 62 में कहा गया है।

संत गरीबदास जी महाराज जी को तत्वज्ञान परमेश्वर कबीर साहेब जी से प्राप्त हुआ था और वह अपनी वाणी में बताते हैं-

परबी लेन जात है दुनिया, हमरा ज्ञान किन्हें न सुनिया।
संन्यासी शंकर कूं भूले, बंब महादेव ध्यावैं हैं।
ये दश नाम दया नहीं जानै, गेरु कपड़ रंगावैं हैं।
पार ब्रह्म सैं परचे नांहि, शिव करता ठहरावैं हैं।
धूमर पान आकाश मुनी मुख, सुच्चित आसन लावैं हैं।
या तपसेती राजा होई, द्वंद धार बह जावैं हैं।
आसन करैं कपाली ताली, ऊपर चरण हलावैं हैं।
अजपा सेती मरहम नांहीं, सब दम खाली जावैं हैं।
चार संप्रदा बावन द्वारे, वैरागी अब जावैं हैं।
कूड़े भेष काल का बाना, संतौं देखि रिसावैं हैं।
त्रिकाली अस्नान करैं, फिर द्वादस तिलक बनावैं हैं।
जल के मच्छा मुक्ति न होई, निश दिन परबी नहावैं हैं।

ये सर्व साधु-महात्मा सतोगुण श्री विष्णु तथा तमोगुण श्री शिव जी के उपासक हैं जिनकी भक्ति करने वालों को गीता अध्याय 7, श्लोक 12-15 तथा 20-23 में राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले, मूर्ख बताया है। प्रथम तो इनकी साधना शास्त्रविधि के विपरीत है। दूसरा, ये नशा भी करते हैं जिस कारण से ये अपना अनमोल मानव जीवन तो नष्ट करते ही हैं, जो इनके अनुयायी बनते हैं, उनको भी नरक का भागी बनाते हैं। उनका भी अनमोल मानव जीवन नष्ट करके पाप इकट्ठा करते हैं। जिस कारण से गीता अध्याय 17 में कहा है कि उनको घोर नरक में डाला जाता है।

ये लोग चारों वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद) को पढ़ते तो हैं परंतु वेदों में स्पष्ट किया है (यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्र 15 ) कि ॐ नाम का जाप करो, अन्य पाखण्ड व कर्मकाण्ड मत करो। ये साधक ॐ नाम को मूल रूप में भक्ति का आधार नहीं रखते। अन्य मनमाने नाम व मनमानी साधना करते हैं, इसलिए इनकी मुक्ति नहीं होती।

सतनाम व सारनाम बिना सर्व साधना व्यर्थ

स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि युधिष्ठिर! ये सर्व भेष धारी व सर्व ऋषि, सिद्ध, देवता, ब्राह्मण आदि सब पाखण्डी लोग हैं। ये सभी मान-बड़ाई के भूखे, क्रोधी तथा लालची हैं। ये सर्प से भी ज्यादा खतरनाक और जहरीले हैं। जरा-सी बात पर लड़ मरते हैं श्राप दे देते हैं। हत्या-हिंसा करते समय आगा-पीछा नहीं देखते। इनके अन्दर भाव भक्ति नहीं है। सिर्फ दिखावा करके दुनिया के भोले-भाले लोगों को मूर्ख बनाते हैं। भक्तों में अपनी महिमा बनाए रखने के लिए बड़ी-बड़ी जटाएं रखते हैं, तन पर भस्म व राख आदि मलते हैं, त्यागी व वैरागी दिखने के लिए लंबी लंबी रूद्राक्ष मालाएं पहनते हैं, अधिकतर साधु तो तन पर केवल एक ही कपड़ा लपेटते हैं। गांव और शहर से भिक्षा और धन मांगकर लाते हैं जिससे सुल्फा, अफीम, गांजा, बीड़ी और शराब आदि का सेवन करते हैं। मांस और मछली भी खाते हैं। लोगों को गलत साधना भक्ति बताकर तांत्रिक विद्या करते हैं। अपना जीवन तो नाश करते ही हैं जो व्यक्ति इन्हें साधु, महात्मा मानकर इनका अनुसरण करता है, उसका भी भट्ठा बिठा देते हैं।

कृपया पाठक जन विचार करें कि वह समय द्वापरयुग का था। उस समय के संत बहुत ही अच्छे थे क्योंकि, आज से लगभग साढे पाँच हजार वर्ष पूर्व आम व्यक्ति के विचार भी नेक होते थे। आज से 30 या 40 वर्ष पहले आम व्यक्ति के विचार आज की तुलना में बहुत अच्छे होते थे। इसकी तुलना को साढे पांच हजार वर्ष पूर्व का विचार करें तो आज के संतों-साधुओं से उस समय के संन्यासी, साधु बहुत ही उच्च थे। फिर भी स्वयं भगवान ने कहा है ये सब पशु हैं, शास्त्रविधि अनुसार उपासना करने वाले उपासक नहीं हैं। यही कड़वी सच्चाई गरीबदास जी महाराज ने षटदर्शन घमोड़ बहदा तथा बहदे के अंग में, तर्क वेदी में, सुख सागर बोध में तथा आदि पुराण के अंग में कही है कि जो साधना यह साधक कर रहे हैं वह सत्यनाम व सारनाम बिना बहदा (व्यर्थ) है।

अनजान व्यक्ति इन्हें महात्मा समझता है परंतु सतनाम तथा सारनाम बिना जीव विकार ग्रस्त ही रहता है, चाहे कितना ही सिद्धि युक्त क्यों न हो जाए। जैसे दुर्वासा ऋषि जी ने बच्चों के मजाक करने मात्र से श्राप दिया जिससे भगवान श्रीकृष्ण जी व समस्त यादव कुल नष्ट हो गए।

परमात्मा प्राप्ति और पाप नाश करवाने की चाह रखने वाले प्रभु प्रेमी आत्माओं को जन्म मरण के रोग से भी पीछा छुड़ाने के लिए सतगुरू की खोज करनी चाहिए।

कबीर, मेलेे ठेले जाइए , मेलेे बड़ा मिलाप।
पत्थर पानी पूजते कोई साधु संत मिल जात।।

इस समय कबीर परमात्मा मानव शरीर में धरती पर तत्वदर्शी संत रूप में प्रकट हैं और सभी को सतभक्ति दे रहे हैं। तत्वदर्शी संत के विषय में गीता अध्याय 4, श्लोक नं. 34 में कहा है तथा गीता अध्याय 15, श्लोक 1 से 4 में तत्वदर्शी सन्त की पहचान बताई है तथा कहा है कि तत्वदर्शी सन्त से तत्वज्ञान जानकर उसके पश्चात् उस परमपद परमेश्वर की खोज करनी चाहिए जहां जाने के पश्चात् साधक लौट कर संसार में नहीं आते अर्थात् पूर्ण मुक्त हो जाते हैं।

भक्ति बिना नहिं निस्तरै , लाख करै जो कोय।
शब्द स्नेही है रहै , घर को पहुंचे सोय।।

भक्ति के बिना उद्धार होना संभव नहीं है, चाहे कोई लाख प्रयत्न करे, सब व्यर्थ ही है। जो जीव सद्गुरु के प्रेमी हैं, सत्यज्ञान का आचरण करने वाले हैं, वे ही अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सकते हैं।

वर्तमान में इस पूरे विश्व में केवल सन्त रामपाल जी महाराज जी ही तत्वदर्शी सन्त की कसौटी पर खरे उतरते हैं। अतः मानव समाज से प्रार्थना है कि मनुष्य जीवन अनमोल है, इसे गलत भक्ति व साधना करके व्यर्थ ना गंवाएं और सन्त रामपाल जी महाराज जी की शरण में आकर सतभक्ति करें जिससे हमारा मोक्ष होगा और सर्व सुख प्राप्त होंगे।