karva chauth

Karva Chauth Hindi Blog

Blogs
Share to the World

करवाचौथ का व्रत रखना कहीं गीता ज्ञान विरुद्ध तो नहीं है

Contents hide

करवाचौथ हिन्दु महिलाओं के लिए एक विशेष व्रत है। यह भारत के अधिकतर प्रांतों में बड़े उत्साह और भाव के साथ रखा जाता है। उत्तर भारत खासकर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश आदि में तो इस दिन अलग ही नज़ारा होता है। सुहागिन बहनें इस दिन अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत उपवास रखती हैं। यह व्रत कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को रखा जाता है।
करवाचौथ का व्रत सुबह सूर्योदय से पहले करीब 4 बजे के बाद शुरू होता है और रात में चंद्रमा दर्शन के बाद संपूर्ण होता है। रात को चंद्रमा को अर्ध्य देने के बाद ही स्त्रियां भोजन ग्रहण करती हैं। व्रत में शिव, पार्वती, कार्तिकेय, गणेश तथा चंद्रमा की पूजा की जाती है।

करवाचौथ कब है और करवाचौथ की पूजा विधि क्या है ?

करवाचौथ 2019 में 17 अक्टूबर, गुरुवार को है। विभिन्न संस्कृतियों के अनुसार पूजा अर्चना भी विभिन्न प्रकार से की जाती है। इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं। सुहागिनें दीवार पर करवा माता का चित्र बनाती हैं या फ़ोटो लगाती हैं। कई तरह के पकवान बना कर थाली सजाई जाती है और शाम के वक्त सुहागिनें एक जगह इकट्ठी होती हैं तथा पंडित जी द्वारा कथा पढ़ी जाती है। कभी-कभी यह कथा कोई सुहागिन महिला भी पढ़ देती है जो उम्रदार या इस तरह के रीति-रिवाजों में काफी अनुभवी होती है।

लोक मान्यतानुसार पंडितों के अनुसार कथा सुने बगैर करवाचौथ व्रत पूर्ण नहीं माना जाता

वर्तमान के पंडितों ने ही समाज को अंधश्रध्दा के दल-दल में धकेला है। यह नकली और अज्ञानी पंडित सुनी सुनाई बातों में उलझाकर भक्त समाज को शास्त्र विरुद्ध साधना बताते हैं जो की सद्ग्रन्थों से बिल्कुल विपरीत है।

कबीर साहेब जी इन नकली पंडितों तथा नकली कथाकारों की पोल खोलते हुए अपनी वाणी में कहते हैं कि :-

कबीर – पोथी तोथि काहे ढिंढोरे, सुन रे पंडित मूढ़म।
लम्बी जटा अटा क्यों बांधे काहे मुंडावे मुण्डम।।

कबीर- पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढ़ाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय।।

कबीर- करनी तज कथनी कथैं, अज्ञानी दिन रात।
कुकर (कुत्ते) ज्यों भौंकत फिरैं, सुनी सुनाई बात।।

असली पंडित वह है जो ब्रह्म की पूर्ण जानकारी रखता हो। “ब्राह्मण सोई जो ब्रह्म पहचाने, पंडित सोई जो पिंड की जानें” लेकिन आज के पंडितों को किसी भी वेद, गीता जी या किसी अन्य धर्म ग्रंथों का ज्ञान नहीं है। सिर्फ एक तोते की तरह सबको रटा रटाया ज्ञान बताते हैं। जिसका ना तो कोई सिर है ना पैर।

ज़रा सोचिए जिस लोक वेद, झूठे रीति रिवाजों और कथा कहानियों पर आधारित पूजा को आप आधार बनाकर चल रहे हो अगर वो शास्त्र अनुकूल ही ना हुई तो कैसे किसी की आयु बढ़ सकती है। यदि करवा चौथ का उपवास करने से पति की उम्र लंबी होती तो भारत की हिंदू महिलाएं कभी विधवा ना होतीं ! मृत्यु किसी के बस में नहीं है। जिस दिन तय है, उस दिन ही मरेंगे। तो फिर यह व्रत के नाम पर उम्र बढ़ाने का ढोंग क्यों? अगर एक दिन भूखे रहने से उम्र बढ़ सकती तो कितने ही गरीब रोज भूखे पेट सोते हैं तो उनकी उम्र क्यों नहीं बढ़ती? जबकि सच्चाई तो यह है कि आपके प्रारब्ध में जो मिलना है वही मिलेगा क्योंकि आपके पास सतभक्ति नहीं है। यदि हमारे प्रारब्ध के पाप कर्मों को कोई क्षमा कर सकता है तो वह सिर्फ पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी ही कर सकते हैैं।

कबीर साहेब की वाणी है:-
मासा घटे ना तिल बधे, विधना लिखे जो लेख, साचा सतगुरु मेटकर उपर मार दे मेख।

आइए जानते हैं कि गीता जी व अन्य शास्त्रों के अनुसार व्रत करना व्यर्थ क्यों है?

श्रीमद्भगवत् गीता जी के अध्याय 6 श्लोक 16 में एकादशी तथा किसी भी अन्य प्रकार के व्रत करना मना किया गया है। इसके अनुसार यह योग (भक्ति) न तो अधिक खाने वाले की और न ही बिल्कुल न खाने वाले की अर्थात् यह भक्ति न ही व्रत रखने वाले, न अधिक सोने वाले की तथा न अधिक जागने वाले की सफल होती है। इस श्लोक में व्रत रखना पूर्ण रुप से मना है।

संत गरीबदास जी ने भी करवाचौथ व्रत करना गलत बताया है क्योंकि इसका हमारे धर्म ग्रंथो में कहीं भी प्रमाण नहीं है। उन्होंने अपनी वाणी में लिखा है:-

तीरथ बरत करे जो प्राणी, तीन की छूटत है नहीं खानी।। ये चौदस, नौमी, द्वादश, व्रतम,
जिनसे जम जौरा नहीं डरतम।। आठह, सातेह करे कंदूरी, सो तो बने नीच घर सूरी।।
आन धर्म जो मन बसै, कोई करो नर नार,
गरीबदास जिंदा कहैं, वो जासी यम द्वार।।
कहै जो करवाचौथ कहानी, तास गधेरी निश्चय जानी।।

संत गरीबदास के अनुसार अगर कोई करवाचौथ का व्रत करता है, तो वो असंखों युग 84 लाख योनियों में भटकता रहता है। यह व्रत उपवास सिर्फ मनमाना आचरण है।

आडंबर युक्त करवाचौथ पर महिलाओं के सोलह श्रृंगार क्या है?

1 बिंदी, 2 गज़रा, 3 टीका, 4 सिंदूर, 5 काजल, 6 मंगल सूत्र और हार, 7 लाल रंग के कपड़े, 8 मेंहदी, 9 बाजूबंद, 10 नथ, 11 कानों के कुंडल, 12 चूड़ियां या कंगन, 13 कमरबंदप, 14 अंगूठी, 15 पायल, 16 बिछुए।

शास्त्र अनुकूल साधना में भक्त के सोलह श्रृंगार कौन से हैं?

परमात्मा प्राप्ति के लिए एक भक्त के अंदर सोलह लक्षण होने चाहिएं जो आध्यात्मिक दृष्टि से कुछ इस तरह है।

1. तत्त्वज्ञान।
2. विवेक।
3. सत्य भाषण।
4. परमात्मा के दिए में संतोष करे और उसको परमेश्वर की इच्छा जाने।
5. प्रेम भाव से भक्ति करे तथा अन्य से भी मृदु भाषा में बात करे।
6.धैर्य रखें, सतगुरू ने जो ज्ञान दिया है, उसकी सफलता के लिए हौंसला रखें, फल की जल्दी न करें।
7. किसी के साथ दगा (धोखा) नहीं करे ।
8. दया भाव रखे।
9. भक्त तथा संत का आभूषण क्षमा भी है उसको शत्रु को भी क्षमा कर देना चाहिए।
10. शील स्वभाव होना चाहिए।
11. भक्ति को निष्काम भाव से करे। सांसारिक लाभ प्राप्ति के उद्देश्य से नहीं करे।
12. त्याग की भावना बहुत अनिवार्य है।
13. बैराग्य होना चाहिए। संसार को असार तथा अपने जीवन को अस्थाई जानकर परमात्मा के प्रति विशेष लगाव होना मोक्ष में अति आवश्यक है।
14. भक्त का विशेष गुण शांति होती है, यह भी अनिवार्य है।
15. भक्ति करना यानि भक्ति करके अपने जीव का कल्याण कराएं।
16. प्रत्येक व्यक्ति के साथ मित्र के समान व्यवहार करना चाहिए।

ये उपरोक्त गुण होने के पश्चात् सत्यलोक जाया जाएगा। इनके अतिरिक्त गुरू की सेवा, गुरू पद्यति में विश्वास रखे। आन उपासना छोड़कर परमात्मा की भक्ति और संत समागम करना चाहिए।

श्रीमद्भागवत गीता अनुसार किस प्रभु की भक्ति करनी चाहिए?

सूक्ष्मवेद में कहा कि :-
“भजन करो उस रब का, जो दाता है कुल सब का”

गीता अध्याय 8 के ही श्लोक 8, 9,10 में गीता ज्ञान दाता ने अपने से अन्य उस तत् ब्रह्म अर्थात् परम अक्षर ब्रह्म की भक्ति करने को कहा है। उसकी भक्ति का नाम जाप मन्त्र गीता अध्याय 17 श्लोक 23 में बताया हैः-

ऊँ तत् सत् इति निर्देशः ब्रह्मणः त्रिविधः स्मरतः।
ब्राह्मणाः तेन वेदाः च यज्ञाः च विहिताः पुरा।।

सरलार्थ :- ब्रह्मणः = सच्चिदानन्द घन ब्रह्म अर्थात् परम अक्षर ब्रह्म की भक्ति का ॐ, तत्, सत् मन्त्र के स्मरण का (निर्देशः) आदेश है।

श्रीमद् भगवत गीता से सिद्ध हुआ कि गीता ज्ञान दाता से अन्य कोई पूर्ण परमात्मा है जो श्री विष्णु जी, श्री ब्रह्मा जी तथा श्री शिव जी से भी भिन्न है।

जैसे मनुष्य अन्य वस्त्र धारण करता है, ऐसे ही वह परमात्मा भिन्न-भिन्न रूपों में पृथ्वी पर प्रकट होता है। उपरोक्त ऋग्वेद के मन्त्रों से स्पष्ट है कि परमात्मा अपने अमर धाम से चलकर पृथ्वी पर प्रकट होता है। वह तत्वदर्शी सन्त की भूमिका करके तत्व ज्ञान दोहों, चौपाईयों, शब्दों द्वारा बोलता है।

वर्तमान समय में तत्वदर्शी संत केवल संत रामपाल जी महाराज हैं जो सदग्रंथों में प्रमाणित मोक्षदायक भगति बताते हैं और सुक्षमवेद में बताई सतगुरु की पहचान भी संत रामपाल जी महाराज पर सटीक बैठती है जो इस प्रकार है:

सतगुरु के लक्षण कहूं, मधुरे बैन विनोद,
चार वेद, छः शास्त्र , कह अठारह बोध।

तो बिना समय व्यर्थ गवाएं, आन उपासना छोड़कर संत रामपाल जी महाराज जी से उपदेश लें और पूर्ण मोक्ष प्राप्त करें अर्थात अपना कल्याण करवाएं।

अधिक जानकारी के लिए देखें www.supremegod.org

Karva Chauth


Share to the World