असली राम के भक्तों के घर रोज़ happy दीपावली होती है।

चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात श्री राम जी सीता जी सहित अयोध्या लौटे थे। अयोध्यावासियों ने अपने प्रिय राजा राम की वापसी पर समस्त अयोध्या को घी के दीयों (दीपोत्सव) की रोशनी से जगमगा दिया था। कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों (happy deepavali) की रोशनी से जगमगा उठी थी। तब से आज तक भारतीय प्रतिवर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्षोउल्लास से मनाते हैं। यह पर्व अधिकतर अक्टूबर या नवंबर के महीने में पड़ता है। दीपावली (happy diwali 2108) दीपों का त्योहार है और इस वर्ष यह 7 नवंबर, 2018 को मनाया जा रहा है। भारतीय परंपरा व सोच के अनुसार राम जी ने अधर्म पर विजय पाई थी और अधर्मी रावण का नाश किया था। भारतीय राजा राम को भगवान मानते हैं और यही राजा राम मनुष्यों में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम से प्रसिद्ध हैं। भगवान श्री राम को श्री विष्णू जी का अवतार माना जाता है।

अयोध्या में केवल दो वर्ष ही दिपावली (दिवाली) व दशहरा मनाया गया था।

सीता जी रावण की गिरफ्त में बारह वर्ष रहीं। कुल मिलाकर चौदह वर्ष का वनवास काटा। जब अयोध्या लौटे तो लोगों ने खुशी मनाई की राम जी सीता माता को रावण की कैद से छुड़ा कर ला रहे हैं। हर तरफ खुशी का माहौल था। लोगों ने अयोध्या को घी के दीयों की रोशनी से प्रकाशमान कर दिया था। परंतु किसी भी प्रकार के बंब, पटाखे अयोध्यावासियों ने नहीं फोडे़ थे। न ही एक-दूसरे से मिठाई और तोहफों की अदला-बदली की। न ही किसी ने धनतेरस मनाया और न लक्ष्मी पूजन किया। न ही नए कपड़े खरीदे और पहने। न ही बाज़ारों में बंब पटाखों की, खेल-खिलौनों की खरीदारी और बिक्री हुई। तो फिर यह ग़लत परंपराएं कहां से और क्यों जुड़ती रहीं!

आइए त्रेतायुग में आए विष्णु अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम राम को जानें-

ओउम राम निरंजन रारा, निरालम्ब राम सो न्यारा।
सगुन राम विष्णु जग आया, दसरथ के पुत्र कहाया॥

वनवास के दौरान श्री सीता जी का अपहरण करके रावण ने सीता जी को नौ लखा बाग में कैद कर लिया था। भक्तमति मंदोदरी के बार-बार प्रार्थना करने से भी रावण ने सीता जी को वापिस छोड़ कर आना स्वीकार नहीं किया। तब भक्तमति मंदोदरी जी ने अपने गुरुदेव मुनिन्द्र जी से (कबीर परमेश्वर त्रेतायुग में ऋषि मुनिन्दर जी रूप में आए थे) कहा महाराज जी, मेरे पति ने किसी की औरत का अपहरण कर लिया है। वह उसे वापिस छोड़ कर आना किसी कीमत पर भी स्वीकार नहीं कर रहा है। आप दया करो मेरे प्रभु। आज तक जीवन में मैंने ऐसा दुःख नहीं देखा था। परमेश्वर मुनिन्दर जी ने कहा कि बेटी मंदोदरी यह औरत कोई साधारण स्त्री नहीं है। श्री विष्णु जी को शापवश पृथ्वी पर आना पड़ा है, वे अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र रामचन्द्र नाम से जन्में हैं। इनको 14 वर्ष का वनवास प्राप्त हुआ है तथा लक्ष्मी जी स्वयं सीता रूप में विष्णु अवतार राम जी की पत्नी बन कर आईं हैं।
तमोगुण भगवान शिव की कठिन साधना करके, दस बार शीश न्यौछावर करके रावण ने यश और धन प्राप्त किया था। वह क्षणिक सुख भी रावण का चला गया तथा नरक का भागी हुआ। इसके विपरीत पूर्ण परमात्मा के सतनाम साधक विभीषण को बिना कठिन साधना किए पूर्ण प्रभु की सत्य साधना व कृपा से लंकादेश का राज्य भी प्राप्त हुआ। हजारों वर्षों तक विभीषण ने लंका के राज्य का सुख भोगा तथा प्रभु कृपा से राज्य में पूर्ण शान्ति रही। सभी राक्षस वृत्ति के व्यक्ति विनाश को प्राप्त हो चुके थे। भक्तमति मंदोदरी तथा भक्त विभीषण तथा परम भक्त चन्द्रविजय जी के परिवार के पूरे सोलह सदस्य तथा अन्य जिन्होंने पूर्ण परमेश्वर का उपदेश प्राप्त करके आजीवन मर्यादावत् सतभक्ति की वे सर्व साधक यहाँ पृथ्वी पर भी सुखी रहे तथा अन्त समय में परमेश्वर के विमान में बैठ कर सतलोक (शाश्वतम् स्थानम्) में चले गए।

भक्ति बिना क्या होत है ये भ्रम रहा संसार।
रति कंचन पाया नहीं रावण चलती बार।।

राम जी को सीता जी पर नहीं था विश्वास

जब सीता जी रावण कि कैद में थी और हनुमान जी सीता जी को खोजनेे लंका आए थे तो सीता जी का दुबला पतला सुखा हुआ चेहरा देख कर अति दुखी हुए थे। सीता जी से मिलकर लौटने पर जब हनुमान जी ने राम जी को यह बताया कि हां ! सीता जी वहीं रावण की गिरफ्त में हैं। तो राम जी ने हनुमान जी को अकेले में ले जाकर पूछा था कि कैसे ठाट थे वहां सीता के। मंहगे वस्त्र पहन रही होगी, खूब हार श्रृंगार कर रखा होगा। तुम्हें बहुत बढ़िया भोजन खिलाया होगा। यह सब राम जी के मुख से सुनकर हनुमानजी को बहुत बड़ा झटका लगा था। हनुमान जी ने रोते हुए सीता जी का सारा वृत्तांत राम जी को कह सुनाया था। हनुमान जी ने राम जी से कहा था माता सीता जी आपसे वियोग के कारण बहुत दुखी हैं और केवल आपको ही याद करती हैं।

बोले पौनि सुन रघुपति राय,
“नाज़ुक बदन, नाम तुमरे से जैसे माता जाय
रावण से ती प्रीत न जागी, वो चंद्र बदन मुरझाए”

भावार्थ सीता माता निष्कलंक हैं वह तो ऐसी पवित्र है जैसे मां के गर्भ से अभी पैदा हुई हो। वह तो नौ लखा बाग में हर ओर आपको ही ढूंढती है। अब मां का वो पहले वाला मुख नहीं रहा अर्थात मुरझा गया है।

सीता जी ने दी थी अग्नि परीक्षा

राम जी ने जब सीता जी से पहली बार रावण वध के उपरांत भेंट की तो सभी के सामने अग्नि परीक्षा लेने की बात कही। राम ने सीता जी से कहा, मैं तुम्हें घर वापिस तभी लेकर जाऊंगा जब तुम अग्नि परिक्षा में सफल हो जाओगी। यदि तुम अग्नि में जल गई तो तुमने रावण को अपना सर्वस्व सौंप दिया था। यदि तुम नहीं जली तो मैं मान लूंगा तुम पतिव्रता हो। अग्नि परिक्षा में सफल होने पर ही तुम्हें वापिस लेकर जाऊंगा। सीता जी अग्नि परिक्षा में सफल हुई थीं।
(हनुमान जी से सीता जी के चरित्र को जानने के बाद भी राम जी ने सीता जी की परीक्षा ली थी )।

धोबी का व्यंग्य सुनकर किया था सीता जी का त्याग

अयोध्या आने के बाद राजा राम रात्रि में नगरी के लोगों का छिपकर कुशल मंगल देखने जाया करते थे। तभी एक दिन एक घर से उन्हें एक दंपति के झगड़े की आवाज़ सुनाई दी। राम जी छिपकर उनकी बातें सुनने लगे। पति (धोबी) अपनी पत्नी को उलाहना दे रहा था कि “मैं राजा राम जैसा नहीं हूं जो रावण की कैद में रहने के बाद भी पत्नी सीता को घर ले आऊं।
धोबी के इस ओछे व्यंग्य को सुनकर मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाने वाले राम जी ने अपनी गर्भवती पत्नी सीता को उसी रात घर से निकाल दिया था और कहा था कि मैं लोगों की ऐसी बातें नहीं सुनना चाहता। कोई मेरे चरित्र पर उंगली उठाए यह मैं नहीं सह सकूंगा। ऐसे थे हमारे भगवान राम जिन्हें हम मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहते हैं। सीता जी ने बाकि का पूरा जीवन अपने दो पुत्रों लव और कुश के साथ जंगल में बिताया था।
अंत में राम ने सरयु नदी में जलसमाधि ली और सीता जी ने धरती की गोद में। जीवनपर्यंत राम – सीता और दोनों पुत्रों का जीवन अलग-थलग रहा। राजा का धर्म न्याय करना होता है। विचार कीजिए क्या सीता जी के साथ राम जी ने न्याय किया था!
रावण समेत करोड़ों की संख्या में सैनिक, रावण के एक लाख पुत्र और सवा लाख रिश्तेदार सीता जी को रावण की कैद से मुक्त कराने में मारे गए थे। परंतु घर लाने से पहले और रावण के वध के बाद भी सीता जी परीक्षा देती रहीं।

पाखण्ड और आडंबर से बाहर निकलिए

दीवाली (diwali greetings) का वर्तमान रूप मनुष्य की काल्पनिक देन है बंब पटाखे और खर्चीली दीवाली का हमारे सदग्रंथों में कहीं कोई उल्लेख नहीं है। यह दीवाली (diwali) समाज को खोखला और वातावरण को महादूषित कर रही है। प्रतिवर्ष दीवाली (whatsapp status) की चकाचौंध में लाखों लोग हादसों का शिकार होते हैं। गरीब व्यक्ति अमीरों की दीवाली (diwali celebration) देखकर अंतरात्मा से दुखी होता है क्योंकि न तो वह नया कपड़ा खरीद सकता है न ही मिठाई। अमीर लोग दीवाली पर जुआ खेलते हैं, शराब पीते हैं, लक्ष्मी पूजन करते हैं, नया बर्तन और नया सामान खरीदते हैं। जबकि यह सभी कुछ करने से कोई भला नहीं होता। सोचिये यदि दीवाली से कुछ दिन पहले घर में किसी की मृत्यु हो जाए तो शोकाकुल परिवार दीवाली नहीं बनाता। यदि दीवाली मनानी इतनी ही ज़रूरी होती है तो क्यों नहीं मनाते उस वर्ष की दीवाली।
दुनिया में मलेरिया और एचआईवी ( एड्स ) के मुकाबले प्रदूषण के कारण ज्यादा मौतें होती हैं। लगभग 30 लाख लोग हर साल प्रदूषण से मरते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े कहते हैं कि 2.5 माइक्रो से कम अल्ट्रा फाइन पार्टिकल्स के स्तर के मामले में भारत सबसे आगे है। प्रदूषित देशों में भारत सबसे आगे है। शहरों की हवा जैसे जैसे खराब हो रही है इसका सबसे ज़्यादा असर बच्चे और बूढ़ों पर होता है। हार्ट अटैक, हृदय रोग, लंग कैंसर ,अस्थमा और क्रोनिक डिजीज़ का ख़तरा बढ़ता चला जा रहा है।

गीता जी में लिखित ज्ञान को भक्ति का आधार बनाइए

अर्जुन को काल ब्रह्म ने श्रीमदभगवत गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में कहा है कि हे अर्जुन! जो व्यक्ति शास्त्रविधि को त्याग कर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण (पूजा) करता है। वह न सिद्धि को प्राप्त होता है न परमगति को (गीता अ 16/ श्लोक 23) इस से तेरे लिए कर्तव्य अर्थात् करने योग्य भक्ति कर्म तथा अकर्त्तव्य अर्थात् न करनेेे योग्य जो त्यागने योग्य कर्म हैं उनकी व्यवस्था में शास्त्रों में लिखा उल्लेख ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्रविधि से नियत भक्ति कर्म अर्थात् साधना ही करने योग्य है। (गीता अ.16/ श्लोक 24) गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 व 20 से 23 तथा गीता अध्याय 9 श्लोक 20 से
23 तथा 25 में गीता ज्ञान दाता काल ब्रह्म ने तीनों देवताओं (रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव) की पूजा करना भी व्यर्थ कहा है, भूतों की पूजा, पितरों की पूजा व अन्य सर्व देवताओं की पूजा को भी अविधिपूर्वक (शास्त्रविधि विरूद्ध) बताया है।
भक्त के घर हर रोज़ दीवाली होती है वह केवल पूर्ण परमात्मा को अपना सर्वस्व मानकर पूरे तन मन से भक्ति करता है। वह 33 करोड़ देवी-देवताओं की भक्ति में उलझ कर अपना अनमोल जीवन व्यर्थ नहीं कर जाता। लक्ष्मी, गणेश, राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान को अलग-अलग से आरती करके खुश नहीं करता। सच्चे परमात्मा की भक्ति करने वाले को, सच्चे संत पर आश्रित भक्त को परमात्मा बिन मांगे ही सब कुछ दे देता है।
कबीर सब सुख राम है, और ही दुख की राशि
सुर, नर, मुनि, जन,असुर, सुर, परे काल की फांसि।
कबीर साहेब जी कहते हैं कि :-
सबमें रमै रमावै जोई, ताकर नाम राम अस होई।
घट – घट राम बसत हैं भाई, बिना ज्ञान नहीं देत दिखाई।
आतम ज्ञान जाहि घट होई, आतम राम को चीन्है सोई।
कस्तूरी कुण्डल बसै, मृग ढूंढ़े वन माहि।
ऐसे घट – घट राम हैं, दुनिया खोजत नाहिं ।
सुमिरन करहु राम की, काल गहे हैं केश।
न जाने कब मारि हैं, क्या घर क्या परदेश ॥
एक राम दसरथ घर डोलै, एक राम घट-घट में बोलै।
एक राम का सकल पसारा, एक राम हैं सबसे न्यारा ।
बिंदराम का सकल पसारा, एकः राम है सबसे न्यारा॥

विष्णु जी नारद मुनि के शापवश पृथ्वी पर राम अवतार धर कर आए थे। यह केवल तीन लोक के स्वामी हैं ।यह साधक को मनइच्छा फल नहीं दे सकते। न ही उसे जन्म मृत्यु से मुक्त कर सकते हैं। यह तो स्वयं जन्म मृत्यु, अंहकार, मोह, लोभ में फंसे हुए हैं। परमेश्वर कबीर जी ही सर्व शक्तिमान हैं। परमेश्वर कबीर जी की शरण में आने वाली आत्मा को परमात्मा का साक्षात्कार होता है। परमात्मा कबीर जी ही स्वयं चारों युगों में भेष और नाम बदल कर आते हैं। परमात्मा और उसकी शक्ति पर विश्वास करने वालों को कलयुग में भी परमात्मा की खोज करनी चाहिए और असली राम को तत्व से पहचान कर सतभक्ति करनी चाहिए। तत्वदर्शी संत के पास असली राम को पहचानने की मास्टर की (चाबी) होती है। कलयुग में तत्वदर्शी संत स्वयं कबीर साहेब जी अवतार सतगुरु रामपाल जी महाराज जी हैं। जो असली राम के बाखबर हैं जिनके सत्संग सुनकर आत्मा हर क्षण दीवाली जैसा सुख पाती है।