दीदी मुझे एक महीने की छुट्टी चाहिए। मैंने साहिबा से पूछा क्यों? एक महीना क्यों। दीदी वो घर जाना है। ईद है दीदी। मैंने खुशी से पूछा कब है ईद।
दीदी! इस बार 22 अगस्त को कुर्बानी का त्यौहार यानी ईद-उल-जुहा बकरीद मनाया जाएगा।
इसलिए गांव जाना है। सबसे मिले हुए बहुत दिन हो गए और फिर ईद की तैयारी भी करनी है। पूरे परिवार के साथ मनाने में खुशी होती है। मेरे ससुर जी के नाम से इस बार ईद पर कुर्बानी भी देनी है। मैंने आश्चर्य से पूछा, किसकी कुर्बानी और क्यों? दीदी बकरे की कुर्बानी। वो ससुर जी के नाम से देनी है। साहिबा कुरान तो मैं भी पढ़ती हूं, मुझे उर्दू , अरबी लिखने और पढ़ने का बहुत शौक है। मैंने फारसी भी सीखी है। इन तीनों ही भाषाओं को मैं बहुत अच्छे से जानती हूं जिस कारण मैंने कुरान शरीफ पढ़ना सीखा। परंतु आश्चर्य की बात यह है कि कुरान शरीफ में कहीं पर भी अल्लाह ने अपने बनाए बंदों को मांस खाने और जीव हत्या का कहीं कोई आदेश नहीं दिया न ही कुराने पाक़ में ऐसा कहीं लिखा है। साहिबा चुप थी। दीदी वो मुझे नहीं पता। चार दिन तक ईद और कुर्बानी चलेंगी। और उसी मांस को प्रसाद बना कर पूरे रिश्तेदारों और गांव में बांटा जाएगा। साहिबा मांस और प्रसाद का कोई मेल नहीं।

काजी पढें कुरान कुं, मुझे अंदेशा और।
गरीबदास उस स्वर्ग में, नहीं खूनी को ठौर।।

दीदी आप मेरी बात सुनो देखो हम उस गोश्त को अकेले नहीं खाएंगे। जानवर की कुर्बानी देने से पहले मौलवी साहब कलमा पढेंगे। फिर बलि किए हुए जानवर के मांस को तीन भागों में बांटा जाएगा। मांस का एक-तिहाई हिस्सा परिवार रखता है; एक तिहाई रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों को दिया जाता है। और शेष तीसरा गरीब और जरूरतमंदों को दिया जाता है।
*पशु आदि को हलाल, बिस्मिल आदि करके माँस खाने व प्रसाद रूप में वितरित करने का आदेश प्रभु का कब हुआ ? सबसे बड़ा अल्लाह कबीर है जिसने छःदिन में सृष्टि रची और सातवें दिन तख्त पर जा विराजा सुरत फुर्कानि आयत 25 (52 से 59 ) में स्पष्ट लिखा है।
*पवित्र बाईबल उत्पत्ति ग्रन्थ में पूर्ण परमात्मा कबीर ने छः दिन में सृष्टि रची, सातवें दिन ऊपर तख्त पर जा बैठा तथा सर्व मनुष्यों के आहार के लिए आदेश किया था कि मैंने तुम्हारे खाने के लिए फलदार वृक्ष तथा बीजदार पौधे दिए हैं। उस करीम (दयालु प्रभु पूर्ण परमात्मा) की ओर से आपको फिर से कब आदेश हुआ? यह कौन-सी कुरान में लिखा है?
पूर्ण परमात्मा ने सर्व मनुष्यों आदि की सृष्टि रची।

*बाइबल तथा पवित्र कुरान शरीफ आदि ग्रन्थों में जो विवरण है वह ब्रह्म (काल/ज्योति निरंजन) का तथा उसके फरिश्तों का है या भूत-प्रेतों का है। करीम अर्थात् पूर्ण ब्रह्म दयालु अल्लाहु कबीरू का नहीं है। उस पूर्ण ब्रह्म के आदेश की अवहेलना किसी भी फरिश्ते व ब्रह्म आदि के कहने से करने की सज़ा भोगनी पड़ेगी।
दीदी मैं आप की बात से सहमत हूं। पर हमारे पैगंबरों के समय से ऐसा होता आ रहा है हम तो वही कर रहे हैं बस।
दीदी इस्लामी साल में दो ईद मनाई जाती हैं (दूसरी ईद उल जुहा या बकरीद कहलाता है)। मुसलमानों का यह दूसरा प्रमुख त्यौहार है। इस दिन बकरे, ऊंट, मेमने, भेड़ की कुर्बानी दी जाती है। हम सब नए कपड़े पहनते हैं। छोटों को ईदी देते हैं। परिवार की औरतें मिलजुल कर मिठाई भी बनाती हैं। हां साहिबा मिठाई जैसे पकवान बहुत बढ़िया हैं पर मांस खाना महापाप है। किसी भी जीव की हत्या करना अल्लाह को पसंद नहीं।
*एक बार की बात है 600 वर्ष पहले जब कबीर परमेश्वर काशी में सशरीर आए थे तब दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोदी के जलन का रोग दूर किया था। सिकंदर लोदी ने कबीर साहेब को अपना गुरू बनाकर उनसे दिल्ली चलने को कहा तब कबीर परमेश्वर ने महाराजा सिंकदर से कहा था कि अब आप मेरे शिष्य बन गए हैं। अब आपको सब प्रकार की जीव हत्या और मांस आहार बंद करना होगा। अब से आप मांस नहीं खाओगे और अपने राज्य में भी मुनादी करा दो की कोई जीव भक्षण और मांसाहार नहीं करेगा।
तब सिकंदर ने कहा, हे परवरदिगार! मैं आपका बच्चा, आपका शिष्य, मैं नहीं खाऊंगा। यदि मैंने अपने राज्य में यह एलान कर दिया कि अब से कोई जीव हत्या और मांसाहार नहीं करेगा तो ये जो मेरा पीर है शेख तकी सब को मेरे खिलाफ भड़का देगा और कहेगा राजा काफ़िर हो गया है। अब ये मुसलमान नहीं रहा। हे मेरे मालिक! ये मेरा जीना दुश्वार कर देगा। कबीर साहेब जी ने कहा तो ठीक है अब से आप कभी मांस नहीं खाओगे।

सोचने वाली बात यह है की यदि मांसाहार और जीव हत्या आवश्यक होती तो कबीर परमेश्वर सर्व सृष्टि रचनहार सिंकदर लोदी को इसकी मनाही कभी न करते। हज़रत निजामुद्दीन, ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती जैसे फकीरों का सभी धर्मो के लोग सम्मान करते हैैं। क्योंकि ये भी अहिंसा के प्रचारक थे और यह सब भी बकरे आदि कभी नहीं काटते थे।

दीदी आप कुर्बानी को सही नहीं मानते परंतु यह तो हमारे नबियों ने ही शुरू की हम तो सिर्फ देखा-देखी कर रहे हैं। और ऐसे ही अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी मांगते हैं। साहिबा मैंने और तूने जो भी मुस्लिम पैगंबर इब्राहीम के बलिदान ( बेटे को अल्लाह के नाम पर कुर्बानी देना स्वीकार किया) के बारे में पढा़ और सुना है वह सब दंतकथा है जो वास्तविक नहीं है। पर पैगंबरों और उनके मानने वालों ने ही जनता को अब तक भ्रमित कर रखा है।

ऐसी मान्यता है ; पैगंबर इब्राहीम के समय में हुई बकरीद की शुरूआत

इस्लाम धर्म के मानने वालों को मुस्लिम कहा जाता है। मुस्लिम शब्द सबसे पहले हज़रत इब्राहीम के मानने वालों के लिए इस्तेमाल किया गया था। इन्हीं के जीवनकाल में बकरीद की शुरूआत हुई।
पैगंबर अब्राहम को यहूदी, ईसाई और मुसलमान तीनों ही पैगंबर मानते हैं। मुस्लिम हजरत अब्राहम को हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम कहते हैं। हज़रत मोहम्मद इन सब नबियों में सबसे आखिरी नबी हैं।
मुसलमानों के मुताबिक अब तक कुल 313 रसूल, नबी, अल्लाह की तरफ से भेजे जा चुके हैं। इनमें से 5 सबसे बड़े रसूल हुए हैं जैसे इब्राहीम, हज़रत मूसा ,हज़रत दावूद, हज़रत  ईसा, हज़रत मोहम्मद।

मुस्लिम समाज में क्यों मनाई जाती है बकरीद?

मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार अल्लाह पैगंबर हजरत इब्राहीम की परीक्षा लेना चाहते थे। एक दिन इब्राहीम ने अपने सपने में अल्लाह को देखा जिन्होंने उनसे कहा कि तुम्हें दुनिया में जो भी चीज़ सबसे प्यारी है उसकी कुर्बानी दे दो। अल्लाह के हुक्म को मानना इब्राहीम की मज़बूरी थी और उन्हें सबसे ज्यादा प्यारा उनका बेटा था लेकिन उन्होंने अपने बेटे की कुर्बानी देने में कोई हिचकिचाहट महसूस नहीं की। इब्राहीम ने अपनी आँखों पर पट्टी बांधकर अपने बेटे की बलि देने के लिए जैसे ही छुरी चलाई वैसे ही एक फ़रिश्ते ने उनके बेटे को हटाकर वहां एक मेमना रख दिया और कुर्बानी हुई। उसके बाद से ही उस दिन को ईद-उल-अजहा नाम से पुकारा जाने लगा और बकरे की कुर्बानी दी जाने लगी।
मुस्लिम समाज को समझना चाहिए हम पैगंबर अब्राहम जैसे पाक़दिल व दयावान नहीं है। न ही हमारा दिल मज़बूत है। खुदा के आगे तो चींटी से हाथी तक सब बराबर हैं क्योंकि अल्लाह की हम सब संतानें हैं । वह एक बच्चे की जान बचाने के लिए दूसरे जीव की कुर्बानी कभी नहीं लेगा। कुर्बानी देने का फरमान अल्लाह का नहीं किसी शैतान का लगता है।

हलाल कर कुर्बानी देने के लिए पाला जाता है बकरा

हर साल आने वाली बकरीद के लिए मुस्लिम परिवारों में बकरे को पाला जाता है। अपनी हैसियत के अनुसार उसकी देख रेख की जाती है और जब वो बड़ा हो जाता है उसे बकरीद के दिन अल्लाह के लिए कुर्बान कर दिया जाता हैं जिसे फर्ज-ए-कुर्बान कहा जाता है। इस दिन इस्लाम से जुड़ा हर शख्स खुदा के सामने सबसे करीबी जानवर को कुर्बान करता है, इसे ईद-उल-जुहा (Eid al-Adha) के नाम से जाना जाता है।
अपने पापों को छिपाने का सबसे आसान तरीका है जानवर की हत्या। समझ नहीं आता कि ये स्वयं को मूर्ख बना रहे हैं या अल्लाह को। यदि हलाल करना ही है तो मानवीय दैत्य कर्मों क्रोध, नफरत, लोभ, काम को हलाल करें। कुर्बानी से केवल पाप बढ़ेंगे और दोजख (नरक) का द्वार खुलेगा।

कैसे मनाते हैं मुस्लिम बकरीद

मुस्लिम आम तौर पर इस ईद में एक दूसरे को आमंत्रित करते हैं। ईद अल-आधा में चार दिन होते हैं। यह याद रखने के लिए मनाया जाता है कि पैगंबर इब्राहिम (अब्राहम) ने अपने बेटे पैगंबर इस्माइल (इश्माएल) का बलिदान किया पर अल्लाह ने उसके बेटे की जगह भेड़ रख दी। अब मुसलमान भेड़ या बकरे का त्याग करते हैं अपनी औलाद का नहीं। पैगंबर इब्राहीम को तो अल्लाह परख रहे थे पर आम मुस्लिम समाज जो मूर्ख निकला जो पुण्य के मार्ग पर न चल पाप कर्म खुले में कर रहा है और अपनी नासमझी का बोझ अल्लाह पर डाल रहा है।

काज़ी/मुल्ला कलमा पढ़ कर हलाल करते हैं

गला काटै कलमा भरै, किया करै हलाल।
साहिब लेखा मांगसी तब होगा कौन हवाल।।

मुस्लिम अल्लाह के नाम पर जानवरों को मार डालते हैं। जो व्यक्ति जीव हिंसा करते हैं (चाहे गाय, सूअर, बकरी, मुर्गी, मनुष्य, आदि किसी भी प्राणी को मारते हैं) वे महापापी हैं। वे कभी स्वर्ग प्राप्त नहीं कर सकते।
काजी तथा मुल्ला व कोई भी जीव हिंसा करने वाला
पूर्ण प्रभु के कानून का उल्लंघन कर रहा है, जिस कारण वहाँ धर्मराज के दरबार में खड़ा-खड़ा पिटेगा।
कबीर परमेश्वर कह रहे हैं कि हे काजी, मुल्लाओं आप पीर (गुरु) भी कहलाते हो। पीर तो वह होता है जो दूसरे के दुःख को समझे उसे, संकट में गिरने से बचाए। किसी को कष्ट न पहुँचाए। जो दूसरे के दुःख में दुःखी नहीं होता वह तो काफिर (नीच) बेपीर (निर्दयी) है। वह पीर (गुरु) के योग्य नहीं है।

पहले नमाज़ फिर मांस वितरण

इस दिन मस्जिदों में प्रार्थनाएं दी जाती हैं और मांस को नमाज़ के बाद वितरित किया जाता है। पाँच समय नमाज़ भी पढ़ते हो व रोजों के समय रोजे (व्रत) भी रखते हो। शाम को गाय, बकरी, मुर्गी आदि को मार कर माँस खाते हो। एक तरफ तो परमात्मा की स्तुति करते हो, दूसरी ओर उसी के प्राणियों की हत्या करके पाप करते हो। ऐसा करने से प्रभु कैसे खुश होगा? अर्थात् आप स्वयं भी पाप के भागी हो रहे हो तथा अनुयाईयों को भी गुमराह करने के दोषी होकर नरक में गिरोगे।

हज़रत मोहम्मद मुस्लिम धर्म के आखिरी पैगंबर हुए

नबी मोहम्मद तो आदरणीय हैं जो प्रभु के अवतार कहलाए हैं। कसम है एक लाख अस्सी हजार को जो उनक अनुयायि थे उन्होंने कभी बकरे, मुर्गे तथा गाय आदि पर करद नहीं चलाया अर्थात् जीव हिंसा नहीं की तथा माँस भक्षण नहीं किया। वे हजरत मोहम्मद, हजरत मूसा, हरजत ईसा आदि पैगम्बर(संदेशवाहक) तो पवित्र व्यक्ति थे तथा ब्रह्म(ज्योति निरंजन/काल) के कृपा पात्र थे, परन्तु जो आसमान के अंतिम छोर(सतलोक) में पूर्ण परमात्मा(अल्लाहू अकबर अर्थात् अल्लाह कबीर) है उस सृष्टि के मालिक की नजर से कोई नहीं बचा।

।।मारी गऊ शब्द के तीरं, ऐसे थे मोहम्मद पीरं।।
शब्दै फिर जिवाई, हंसा राख्या माँस नहीं भाख्या,
एैसे पीर मुहम्मद भाई।।

एक समय नबी मोहम्मद ने एक गाय को शब्द(वचन सिद्धि) से मार कर सब के सामने जीवित कर दिया था। उन्होंने गाय का माँस नहीं खाया। अब मुसलमान समाज वास्तविकता से परिचित नहीं है। जिस दिन गाय जीवित की थी उस दिन की याद बनाए रखने के लिए गऊ मार देते हो। आप जीवित नहीं कर सकते तो मारने के भी अधिकारी नहीं हो। आप माँस को प्रसाद रूप जान कर खाते तथा खिलाते हो। आप स्वयं भी पाप के भागी बनते हो तथा अनुयाईयों को
भी गुमराह कर रहे हो। केवल रोज़ा व बंग तथा नमाज किया करते थे। गाय आदि को बिस्मिल(हत्या) नहीं करते थे।

सत्य साहेब अल्लाह का संदेश

पवित्र बाईबल में लिखा है कि हजरत आदम के काईन तथा हाबिल दो पुत्र थे। हाबिल भेड़ बकरियाँ पाल कर निर्वाह कर रहा था तथा काईन खेती करता था। एक दिन काईन अपनी पहली फसल का कुछ अंश प्रभु के लिए ले गया। प्रभु ने काईन की भेंट स्वीकार नहीं की क्योंकि काईन का दिल पाक नहीं था। हाबिल अपने भेड़ का पहलौंठा मेमना(बच्चा) भेंट के लिए प्रभु के पास लेकर गया, जो प्रभु ने स्वीकार कर लिया। इस बात से काईन क्रोधित हो गया। वह अपने छोटे भाई हाबिल को बहका कर जंगल में ले गया, वहाँ उसकी हत्या कर दी। प्रभु ने पूछा काईन तेरा भाई कहाँ गया? काईन ने कहा मैं क्या उसके पीछे-पीछे फिरता हूँ? मुझे क्या मालूम? तब प्रभु ने कहा कि तुने अपने भाई के खून से पृथ्वी को रंगा है। अब मैं तुझे शाप देता हूँ, कि तू रोजीरोटी के लिए भटकता रहेगा।
वास्तव में हजरत आदम के शरीर में कोई पितर आकर प्रवेश करता था। वही माँस खाने का आदी होने के कारण पवित्र आत्माओं को गुमराह करता था कि अल्लाह (प्रभु) को भेड़ के बच्चे की भेंट स्वीकार है। दोनों भाईयों का झगड़ा करा दिया। हजरत आदम जी के परिवार को बर्बाद कर दिया।

नोट: यह गुमराह करने और कराने वाला कोई और नहीं जबरील नामक राक्षस है जो अपनी भूख शांत करने के लिए सपनों में, दूसरे के शरीरों में या आसमानी आवाज़ के द्वारा अपना फ़रमान सुनाता है और मनुष्य से पाप कर्म करवा कर उसे कबीर अल्लाह के दरबार में गुनहगार बनाता है।

जिस समय बकरी को मुल्ला मारता है तो वह बेजुबान प्राणी आँखों में आंसू भर कर म्यां-म्यां करके
समझाना चाहता है कि हे मुल्ला, मुझे मार कर पाप का भागी मत बन। जब परमेश्वर के न्याय अनुसार लेखा किया जाएगा उस समय तुझे बहुत संकट का सामना करना पड़ेगा। पूर्ण ब्रह्म(अल्लाह कबीर) सर्व का पिता है। उसके प्राणियों को मारने वाले से अल्लाह कभी खुश नहीं होता।

कबीर-माँस अहारी मानई, प्रत्यक्ष राक्षस जानि। ताकी संगति मति करै, होइ भक्ति में हानि।।