उत्तर प्रदेश के मथुरा अंतर्गत गोवर्धन क्षेत्र का ऐतिहासिक बछगांव बीते डेढ़ दशक से एक भीषण जल-त्रसदी का दंश झेल रहा था। यहाँ की लगभग 2000 बीघा उपजाऊ कृषि भूमि पानी में समाकर एक टापू का रूप ले चुकी थी। हालात इतने बदतर थे कि संपर्क मार्ग ठप होने से नौनिहालों की शिक्षा रुक गई थी और अन्नदाता अपनी ही ज़मीन पर बेबसी के आंसू रो रहा था। इस मुसीबत से उबरने के लिए पंचायत और ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन के हर छोटे-बड़े दफ़्तर की चौखट छान मारी। एसडीएम से लेकर मंत्रियों तक गुहार लगाई गई, लेकिन हर बार बजट का रोना रोकर प्रशासन ने पल्ला झाड़ लिया। परेशानी तब और बढ़ गई जब ऐतिहासिक 84 कोस परिक्रमा पर निकले श्रद्धालुओं और संतों को भी इस दलदल से गुज़रना पड़ा। जब सरकारी तंत्र से उम्मीद की आखिरी किरण भी टूट गई, तब हताश ग्रामीणों ने संकटमोचक के रूप में संत रामपाल जी महाराज के चरणों में अपनी अर्ज़ी लगाई।
संकट का पूर्ण निवारण: संत रामपाल जी महाराज का ऐतिहासिक कदम
जैसे ही संत रामपाल जी महाराज ने ग्रामीणों की इस करुण पुकार को स्वीकार किया, वैसे ही हरियाणा के औद्योगिक क्षेत्रों से राहत सामग्री और मशीनों से लदे ट्रकों का एक ऐसा अभूतपूर्व काफिला रवाना हुआ, जिसने उत्तर प्रदेश के इतिहास में नि:स्वार्थ मानव सेवा का एक नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया। संत रामपाल जी महाराज ने ग्रामीणों की उम्मीदों से कहीं बढ़कर संसाधनों की बौछार कर दी। इस महासंकट को जड़ से खत्म करने के लिए उन्होंने गांव में निम्नलिखित भारी-भरकम उपकरण और सामग्री भेजी:
- 38,400 फुट मजबूत 8-इंची पाइप
- 7 विशाल मोटरें (छह 15-HP की और एक 10-HP की)
- 12,795 फुट बिजली की केबल
संत रामपाल जी महाराज की यह सहायता इतनी सुनियोजित और विस्तृत थी कि बड़ी मशीनों के साथ-साथ हर छोटी चीज़ का पूरा प्रबंध किया गया था। उन्होंने मोटरों और पाइपों के साथ ऑटोमेटिक स्टार्टर, बैंड, सुंडिया और यहाँ तक कि पाइप फिक्स करने के लिए 150 किलो का खास सॉल्यूशन भी खुद भिजवाया। उन्होंने यह पक्का किया कि बछगांव के सरपंच या किसी भी निवासी को बाहर से एक रुपये का सामान भी न लाना पड़े। महाराज जी के इस सेवा कार्य ने संकट में फंसे और भुखमरी का सामना कर रहे 400 से ज्यादा गाँवों के किसानों के जीवन में एक नई उम्मीद जगाई है।
बछगांव का कायाकल्प: पहले और बाद की स्थिति
संत रामपाल जी महाराज द्वारा भेजे गए विशाल संसाधनों और उनके इस परोपकारी कदम से गांव में जो व्यापक बदलाव आया है, उसे इस तालिका के माध्यम से देखा जा सकता है:
| विवरण | संत रामपाल जी महाराज की सहायता से पूर्व | संत रामपाल जी महाराज की सहायता के बाद |
| जल स्तर और भूमि की स्थिति | पिछले 15 वर्षों से गांव की 2,000 बीघा उपजाऊ जमीन एक अंतहीन झील और दलदल बनी हुई थी। | विशाल मोटरों की मदद से 500 बीघा जमीन से पानी को पूरी तरह खदेड़ दिया गया है। |
| कृषि और फसल की स्थिति | जमीन जलमग्न होने के कारण फसलों के उत्पादन की सारी उम्मीदें खत्म हो चुकी थीं और किसान हताश थे। | पानी साफ होने के बाद 500 बीघा भूमि पर रबी की फसल पूरी तरह लहलहा रही है। |
| रास्ते और आवागमन | बस्तियों के रास्ते बंद थे, स्कूल जाने के मार्ग ठप थे और 84 कोस परिक्रमा मार्ग दलदल में तब्दील था। | जल निकासी होने से रास्ते सुगम हुए हैं और ग्रामीणों का जीवन सामान्य हो रहा है। |
| ग्रामीणों की मानसिक स्थिति | सरकारी तंत्र से बार-बार निराशा मिलने के कारण किसान उम्मीद खो चुके थे और भुखमरी की कगार पर थे। | किसानों के मन में दोबारा खेती करने की आस जगी है और वे पूरी तरह से उत्साह और संतोष से भरे हैं। |
2000 बीघा जलमग्न जमीन से उठी हरियाली | मथुरा जिले के बछगांव में बदली किसानों की किस्मत। Mathura
पड़ोसी क्षेत्रों से निकासी का सही रास्ता न मिल पाने के कारण फिलहाल 1500 बीघा जमीन अभी भी जलमग्न है। हालांकि, इसमें संत रामपाल जी महाराज की तरफ से संसाधनों की रत्ती भर भी कमी नहीं रही। ग्रामीणों ने योजना बनाई है कि इस बार फसल कटते ही, पानी आने से पहले वे बची हुई पाइप लाइन बिछा देंगे ताकि अगली बार पूरा निस्तारण हो सके।
ग्रामीणों की जुबानी: संत के प्रति अटूट आभार
बछगांव के निवासियों ने खुले दिल से संत रामपाल जी महाराज की इस परमार्थ भावना की सराहना की है:
जगबीर सिंह मास्टर (स्थानीय निवासी, बछगांव):
“हमारे गांव का लगभग 2,000 बीघा उपजाऊ इलाका पूरी तरह जलमग्न हो चुका था, लेकिन ऐसे संकट में संत रामपाल जी महाराज ने भारी-भरकम मोटरें और पाइपलाइनें देकर एक अद्भुत समाधान निकाला। उनके इस त्वरित और पुख्ता इंतजाम की बदौलत ही आज हमारी 20% ज़मीन से पानी पूरी तरह हट चुका है, जहाँ अब फसलें लहलहा रही हैं। मगर, एक पड़ोसी गांव के साथ चल रहे सीमा विवाद और कुछ अन्य जमीनी दिक्कतों की वजह से बाकी बची 80% भूमि की जल-निकासी का काम बीच में ही रुक गया। हालांकि महाराज जी ने एक स्थानीय पॉइंट पर पूरा पंपिंग सिस्टम पूरी तरह तैयार रखा था, लेकिन हमारे पास उस भारी मात्रा में जमा पानी को सुरक्षित निकालने का कोई रास्ता नहीं बचा था। जैसे ही हमने पानी को पास के एक छोटे नाले में छोड़ा, तो सीमा से सटे दूसरे गाँव के लोगों ने विरोध कर दिया। उन्हें डर था कि हमारे खेतों का पानी उनके खेतों में घुसकर फसलें डुबो देगा। उनके इस कड़े विरोध के कारण हमें मजबूरन अपना पंपिंग सिस्टम बंद करना पड़ा। हमारे पास दूसरा विकल्प यही था कि हम पाइपलाइन को 5-6 किलोमीटर दूर स्थित मुख्य नहर तक ले जाते, लेकिन अफ़सोस कि उस रास्ते में आने वाले खेतों में किसानों की फसलें खड़ी थीं, जिसके कारण पाइप बिछाने के लिए खुदाई करना मुमकिन नहीं था। इसी लाचारी की वजह से बाकी का पानी वहीं फंसा रह गया।”
गुड्डू चौधरी (ग्रामीण):
“हमारी 1500 बीघा जमीन जो डूबी रह गई, उसमें गुरु जी के सामान की कोई कमी नहीं रही। पानी बहुत ज्यादा था और हमारा अपना काम (स्थानीय रुकावटों के कारण) समय पर नहीं हो पाया। संत रामपाल जी महाराज ने हमारे किसानों की जो मदद की है, वैसी मदद आज तक इतिहास में किसी ने नहीं की। पूरा गांव उनका आभारी है। अब जैसे ही यह खड़ी फसल कटेगी और खेत खाली होंगे, हम पानी आने से पहले ही महाराज जी की दी हुई पाइपलाइन को नाले की तरफ डाल देंगे। अगली बार गुरु जी की कृपा से पूरा पानी निकल जाएगा और हमारी पूरी की पूरी जमीन पर फसल बोई जाएगी।”
जब व्यवस्था हारी, तब संत बने खेवनहार
बछगांव की यह गाथा इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जब सरकारी तंत्र और प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह हार मान लेती है, तब एक सच्चा संत ही समाज का वास्तविक खेवनहार बनकर सामने आता है। जो काम बड़े-बड़े अधिकारी और नेता 15 सालों में नहीं कर पाए, उसे संत रामपाल जी महाराज ने बिना कोई स्वार्थ या बिना एक भी पैसा लिए कुछ ही दिनों में पूरा करके दिखा दिया। आज बछगांव के हजारों निवासियों के लिए वे केवल एक मददगार नहीं, बल्कि साक्षात संकटमोचक का रूप हैं, जिन्होंने कलयुग में मानवता और निस्वार्थ सेवा की सबसे बड़ी मिसाल कायम की है।



